जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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दूसरी ने भिक्षा मांगते हुए भिक्षु को पूजने के लिए पुष्प दिए। दूसरी
ने चैत्य में पञ्चाङ्गुलि चिह्न लगाने के लिए सुगन्धि दी। दूसरी ने मधुर
फलमूल दिए। दूसरी ने उत्तम रस दिया। दूसरी ने काश्यप बुद्ध के चैत्य पर
सुगन्धित पञ्चाङ्गुलि-चिन्ह लगाया। दूसरी ने रास्ते चलते भिक्षुओं तथा
भिक्षुणियों के घर में वास ग्रहण करने पर धर्म सुना। दूसरी ने नौका में बैठ
भोजन किए भिक्षु को पानी में खड़े हो पानी दिया। दूसरी ने गृहस्थ में रह
क्रोधरहित चित्त से सास ससुर की सेवा की। दूसरी ने अपने को मिले हिस्से
में से भी बाँट कर ही खाया और शीलवान् रही। दूसरी ने पराए घर में दासी
होकर क्रोध रहित मान रहित रह अपने हिस्से को बाँट कर खाया। इसीसे
वह देवराज की परिचारिका होकर पैदा हुई।
इस प्रकार गुत्तिलविमानवत्थु में आई सैंतीस देवकन्याओं ने जो जो कर्म
करके वहाँ जन्म ग्रहण किया वह सब बोधिसत्त्व ने पूछा। उन सब ने भी अपना
कर्म गाथाओं में ही कहा। यह सुन बोधिसत्त्व ने कहा—"मुझे बड़ा लाभ
हुआ। मुझे बड़ी प्राप्ति हुई। मैंने यह जो यहाँ आकर अल्पमात्र कर्म से भी
प्राप्त सम्पत्तियों की बात सुनी। अब यहाँ से मैं मनुष्यलोक जाकर दानादि
कुशल कर्म ही करूँगा।" यह कह उसने यह हर्ष वाक्य कहा—
स्वागतं वत मे अज्ज सुप्पभात सुवुद्वितं,
य अद्दसासि देवतार्यो अच्छरा कामवण्णियो ॥
इमासाह धम्म सुत्वान काहामि कुसलं बहुं,
दानेन समचरियाय सञ्जमेन दमेन च;
सोहं तत्थ गमिस्सामि यत्थ गन्त्वा न सोचरे ॥
[आज मेरा आना शुभ है। आज का प्रभात शुभ है। आज का उठना
शुभ है। आज मैंने इच्छित रूप धारण कर सकने वाली अप्सरा देवियों को देख
लिया। इनसे धर्म सुनकर मैं बहुत कुशल कर्म करूँगा। दान से, समचर्या
से तथा संयम के प्रताप से मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ जाकर आदमी सोचता नहीं है।]
सप्ताह के बाद देवराज ने मातली सारथी को आज्ञा दे बोधिसत्त्व को
रथ पर बिठा बाराणसी ही भेज दिया। उसने बाराणसी पहुँच देवलोक में
जो देखा था वह मनुष्यों को बताया। उस समय से मनुष्यों ने उत्साहपूर्वक
पुण्य-कर्म करना स्वीकार किया।