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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 455

गुत्तिल ] ४३६
उस समय वाराणसी निवासी बनियो ने व्यापार के लिए उज्जैनि जाकर
उत्सव घोषित होने पर चन्दा करके बहुत सा माला गन्ध विलेपन आदि तथा
खाद्य भोज्य ले क्रीडा-स्थान पर इकट्ठे हो कहा—कि वेतन देकर एक गन्धर्व
को लाओ । उस समय उज्जैनि मे मूसिल नामक ज्येष्ठ गन्धर्व था । उन्होने
उसे बुलवाकर अपना गन्धर्व बनाया ।
मूसिल वीणा भी बजाता था । उसने वीणा को स्वर चढ़ा कर बजाया ।
गुत्तिल गन्धर्व के गन्धर्व से परिचित उन लोगो को मूसिल का बजाना चटाई
खुजलाने जैसा प्रतीत हुआ । कोई भी कुछ न बोला । उन्होने अपनी प्रसन्नता
न प्रकट की । मूसिल ने उनकी प्रसन्नता न देखी तो सोचा—मालूम होता है
मै बहुत तीखा बजाता हूँ । उसने मध्यम स्वर चढा मध्यम स्वर से बजाया ।
वे तब भी उपेक्षावान् ही रहे । उसने सोचा—मालूम होता है यह कुछ नही
जानते । स्वय भी कुछ न जानने वाला बन उसने वीणा के तारों को ढीला
र बजाया । उन्होने तब भी कुछ न कहा ।
मूसिल बोला—भो व्यापारियो ! क्या आप लोग मेरे वीणा-वादन से
सन्न नही होते ?
"क्या तू वीणा बजाता था ? हम तो समझते रहे कि तू वीणा को कस
रहा है ।"
"क्या तुम मुझसे बढ़कर आचार्य को जानते हो ? अथवा अपने अज्ञान
के कारण प्रसन्न नही होते हो ?"
“वाराणसी मे जिन्होने गुत्तिल गन्धर्व का वीणा-वादन सुना है उन्हें
तुम्हारा वीणा बजाना ऐसा ही लगता है जैस स्त्रियाँ बच्चो को सन्तुष्ट कर
रही हों।"
"अच्छा, तो आपने जो खर्चा दिया है उसे वापिस ले । मुझे यह नही
चाहिए । लेकिन हाँ, वाराणसी जाते समय मुझे साथ लेकर जाएँ ।"
उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया । जाते समय उसे साथ वाराणसी
ले गए । वहीं 'यह गुत्तिल का निवासस्थान है' बताकर अपने अपने घर
चले गए ।
मूसिल ने बोधिसत्व के घर में प्रवेश कर वहाँ टँगी हुई बोधिसत्व की
बहुत ही अच्छी वीणा देख उतारकर बजाई । बोधिसत्व के माता पिता