जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
DevanagariHindipublished479 पृष्ठ
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- उच्चिट्ठभत्त ] ३४१
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व ने
एक ऐसे दरिद्र नट के कुल में जन्म ग्रहण किया जो भीख मांगकर जीविका
चलाता था। बडे होने पर वह दरिद्र अवस्था को प्राप्त हो भीख माँग कर
जीविका चलाने लगे।
उस समय काशी देश के एक गाँव में एक ब्राह्मण की ब्राह्मणी दुश्शीला
थी, पापिन थी, व्यभिचार करती थी। एक दिन किसी काम से जब ब्राह्मण
बाहर गया तो उसका जार मौका देख घर मे घुस आया। उसने उसके साथ
अनाचार कर चुकने पर कहा—"कुछ अच्छा खा कर ही जाओगे ?” उसने
भात तैयार कर दाल (= सूप) व्यञ्जन से युक्त भात परोस कर दिया कि तू
खा। स्वय ब्राह्मण के आगमन की प्रतीक्षा करती हुई द्वार पर खडी हुई।
उस समय बोधिसत्त्व ब्राह्मणी के जार के खाने की जगह पर भीख की
प्रतीक्षा में खडे थे। तभी ब्राह्मण घर की तरफ आया। ब्राह्मणी-ने उसे आते
देख जल्दी से घर मे जाकर जार को कहा—'उठ, ब्राह्मण आ रहा हैं' और उसे
कोठे में उतार दिया। ब्राह्मण के घर में दाखिल हो बैठने के समय पीढा तथा
हाथ धोने को पानी दे जार के जूठे छोडे ठंडे भात के ऊपर गरम भात परोस
दिया। उसने जब भात में हाथ डाला तो ऊपर का भात गरम और नीचे
का ठंडा पाया। वह सोचने लगा कि यह दूसरे का खाकर बचा हुआ जूठा भात
होगा। उसने ब्राह्मणी से पूछते हुए पहली गाथा कही—
अञ्ञो उपरिमॊ वण्णो अञ्ञो वण्णोय हेट्ठिमो,
ब्राह्मणित्वेव पुच्छामि किं हेट्ठा कि च उपरि ॥
[ऊपर (के भात) का रूप ढग दूसरा हैं, नीचे (के भात) का दूसरा।
ब्राह्मणी ! तुझे ही पूछता हूँ कि यह क्या ऊपर है और क्या नीचे ?]
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वण्णो आकार। यह ऊपर वाले के गरम होने की और नीचे वाले के
ठंडे होने की बात पूछते हुए कहा। किं हेट्ठा किञ्च उपरि परोसा हुआ भात