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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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३३८ [ २.७.२११
राजा से एक बैल मांग। “तात ! राजा की सेवा मे रहते थोडे ही दिन हुए
है। अभी बैल मांगना ठीक नही। आप ही मांगे।”
“तात ! तू मेरे अधिक लज्जाशील होने को नही जानता ? मै दो तीन
जनो के सामने बोल नही सकता। यदि मे राजा के पास बैल मांगने जाऊँगा;
तो यह भी देकर आऊँगा।”
“तात ! जो होना है सो हो। मै राजा से नही माँग सकता। लेकिन
मैं तुम्हे बोलने का अभ्यास करा दूंगा।”
“तो अच्छा, मुझे अभ्यास करा।”
बोधिसत्त्व उसे ऐसे श्मशान में ले गए, जहाँ बीरण-घास के झुण्ड थे।
वहाँ घास के पूले बांधकर 'यह राजा है', 'यह उपराजा है', 'यह सेनापति है'
नाम रख, क्रम से पिता को दिखा कर कहा—“तात ! तू राजा के पास जा
'महाराज की जय हो' कह, इस तरह यह गाथा कह बैल मांगना। गाथा
सिखाई—
द्वे मे गोणा महाराज येहि खेतं कसाकसे,
तेसु एको मतो देव दुतियं देहि खत्तिय ॥
[महाराज ! मेरे दो बैल थे, जिनसे खेती होती थी। देव ! उनमें से एक
मर गया। राजन् ! दूसरा दें।]
ब्राह्मण ने एक वर्ष में गाथा का अभ्यास कर बोधिसत्त्व को कहा—
'तात ! सोमदत्त ! मुझे गाथा (कहने) का अभ्यास हो गया। अब मै इसे
जिस किसी के सामने कह सकता हूँ। मुझे राजा के पास ले चल।
उसने कहा 'तात अच्छा' और योग्य भेंट लिवा पिता को राजा के पास ले
गया। ब्राह्मण ने 'महाराज की जय हो' कह भेंट दी। राजा ने पूछा—
'सोमदत्त ! यह ब्राह्मण तेरा क्या लगता है ?'
“महाराज ! मेरा पिता है।”
“किस मतलब से आया है ?”
उस समय ब्राह्मण ने बैल मांगने के लिए गाथा कहते हुए कहा—
द्वे मे गोणा महाराज येहि खेतं कसाकसे,
तेसु एको मतो देव दुतियं गण्ह खत्तिय ॥