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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

३४० [ २.७ २१२
द्वय याचनको तात सोमदत्त निगच्छति
अलाभं धनलाभञ्च एवधम्मा हि याचना ॥
[ तात सोमदत्त ! माँगने वाले की दो ही हालते होती है—धन मिलता है
या नही मिलता । माँगने का यह स्वभाव ही है । ]
एवधम्मा हि याचना; माँगने का यही स्वभाव है ।
शास्ता ने “भिक्षुओ-लालुदायी केवल अभी अधिक लज्जाशील नही है,
पहले भी अधिक लज्जाशील ही था” कह यह धर्मदेशना ला जातक का
मेल बैठाया ।
उस समय सोमदत्त का पिता लालुदायी था। सोमदत्त मै ही था।
२१२. उच्छिट्ठभत्त जातक
“अद्धओ उपरिमो धण्णो ” यह शास्ता ने जतवन म विहार करते
समय पूर्व भार्या की आसक्ति के बारे में कही—
क. वर्तमान कथा
शास्ता, ने पूछा—भिक्षु, क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?
“सचमुच !”
“तुझे किसने आकर्षित किया ?”
“पूर्व भार्या ने ।”
“भिक्षु ! यह स्त्री तेरा अपकार करने वाली है। पहले भी इसने तुझे
अपने जार का जूठा खिलाया है।”