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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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३३६ [ २६.२१०
केवल सिर ही फूटा चोच भी टूट गई। वह वेदना से पीडित हो खदिर-वृक्ष को
न जान सका कि यह खदिर-वृक्ष है, और इस गाथा से विलाप किया—
इसे सुन खदिरवनी ने दूसरी गाथा कही—
अचारुताय¹ वितुद वनानि कट्ठङ्गरुक्खेसु असारकेसु,
अथासदा खदिर जातसार यत्यब्भिदा गळ्हो उत्तमाङ्गं ॥
[ अभी तक सार-रहित काठ के वृक्षो वाले बनो को ठोग मारी । अब यह
सारवान् खदिर-वृक्ष को प्राप्त हुआ, जहाँ पक्षी ने सिर तुड़वाया । ]
अचारुताय, उसने आचरण किया । वितुद वनानि सार रहित सेमर पालि-
भद्रक के वन आदि को ठोग मारते हुए बीधते हुए । कट्ठङ्गरुक्खेसु असारकेसु,
बन की सामान्य लकडी सार रहित पालिभद्रक सेमर आदि में । अथासदा
खदिर जातसार, छोटपन से सारवान् खदिर-वृक्ष को प्राप्त हुआ । यत्यब्भिदा,
जिस खदिर-वृक्ष से लगकर तोड लिया फाड लिया गळ्हो पक्षी । सभी
पक्षियो के लिए आदर का शब्द है ।
खदिरवनी ने उसे यह सुना कर कहा—कन्दगळक ! जहाँ तून सिर
तुड़ाया यह खदिर नाम का सारवान् वृक्ष है । वह वही मर गया ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना सुना जातक का मेल बैठाया ।
उस समय कन्दगळक देवदत्त था । खदिरवनी तो मे ही था ।
¹ अचारिताय भी पाठ है।