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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

उपसाळ्हक ] २०३
उस समय बोधिसत्व मगध देश में ब्राह्मण कुल में पैदा हो, सब विद्याएँ
सीख, ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो अभिज्ञा और समापत्तियाँ प्राप्त
कर ध्यान-क्रीडा करते हुए हिमालय प्रदेश में चिरकाल तक रहे । फिर नमक-
खटाई खाने के लिए गृध्रकूट पर पर्ण-कुटी में रहने लगे ।
उस समय उस ब्राह्मण ने इसी तरह से पुत्र को कह, पुत्र के यह कहने पर
• कि 'तुम्ही मुझे उस तरह का स्थान बता दो' यही स्थान बताया । फिर पत्र
के साथ उतरते हुए ब्राह्मण बोधिसत्त्व को देख उनके पास पहुँचा ।
बोधिसत्त्व ने इसी तरह पूछ माणवक की बात सुन, कहा—'आ, तेरे
पिता द्वारा बताए गए स्थान की परीक्षा करें कि वहाँ पहले कोई जलाया गया
है, वा नहीं ?' फिर उनके साथ पर्वत-शिखर पर चढ़, जब माणवक ने कहा
कि यह तीनो चोटियो के बीच का स्थान ऐसा है जहाँ कोई नहीं जलाया गया,
कहा—"माणवक ! इसी स्थान पर जलाए गयो का हिसाब नहीं है। तेरा
पिता इसी राजगृह में ब्राह्मण कुल में ही पैदा होकर, उपसाळ्हक नाम से ही
इन्ही चोटियो के बीच में चौदह हजार बार जलाया गया है। पृथ्वी में ऐसी
कोई जगह नहीं है, जहाँ कोई न कोई जलाया न गया हो, जहाँ श्मशान न
बना हो, जहाँ सिर न कटे हो। पूर्व-जन्मो का ज्ञान होने से, उघाड कर यह
दो गाथाएँ कही—
उपसाळ्हक नामान सहस्सानि चतुद्दस
अस्मिं पदेसे दट्ठानि नत्थि लोके अनामंतं ॥
यम्हि सच्चं च धम्मो च अहिंसा सयमो दमो
एतदरिया सेवन्ति एतं लोके अनामंतं ।
[ उपसाळ्हक नाम से ही चौदह हजार व्यक्ति इसी स्थान में जलाए गए।
लोक में ऐसी जगह नहीं है जहाँ कोई न कोई मरा न हो।
जिसमे सत्य है, धर्म है, अहिंसा है, सयम है उसे आर्य्य-जन सेवन करते हैं।
यही लोक में नहीं मरता है ।]
———
अनामंतं, मृत-स्थान को ही व्यवहार से अमृत-स्थान कहा गया है।
उसका प्रतिषेध करते हुए अनामंत कहा है। अनमतं, भी पाठ है। लोक में

[ २.२.१६७

री जगह नहीं है जहाँ श्मशान न बना हो, जहाँ कोई न मरा हो। यम्हि
च्चं च धम्मो च, जिस व्यक्ति में चार आर्य-सत्य, पूर्व-भाग-सत्य ज्ञान¹ तथा
कुत्तर धर्म हैं, अहिंसा, दूसरो को कष्ट न देना, संयमो, सदाचार, दमो
न्द्रियो का दमन। जिस आदमी में यह गुण है, एतदरिया सेवन्ति बुद्ध, प्रत्येक
र तथा बुद्ध श्रावक आर्य-जन इस स्थान का सेवन करते हैं। इस प्रकार
आदमी के पास जाते हैं, उसकी संगति करते हैं। एत लोके अनामृतं, यही
र लोक में अमृतत्व का साधन होने से अमृत कहलाते है।

इस प्रकार बोधिसत्त्व पिता तथा पुत्र को धर्मोपदेश दे चारो ब्रह्मविहारो
भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने इस धर्मोपदेश को ला (आर्य-)सत्यों को प्रकाशित कर जातक
मेल बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर दोनो पिता पुत्र
तापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुए।
उस समय के पिता पुत्र ही अब के पिता पुत्र हुए। तपस्वी तो मैं ही था।

१६७. समिद्धि जातक

"अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु..." यह शास्ता ने राजगृह के तपोदाराम मे
ार करते हुए समिद्धि स्थविर के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

एक दिन आयुष्मान् समिद्धि सारी रात योगाभ्यास करके अरुणोदय के
य स्नान कर अपने स्वर्ण-वर्ण शरीर को सुखा रहे थे। उन्होने अन्तरवासक


¹ मार्ग प्राप्ति से पहले का आर्य-सत्यों का ज्ञान।

समिद्धि ] २०५
पहन लिया था और उत्तरासंग उनके हाथ में था। वे सोने की सुन्दर प्रतिमा
की तरह प्रतीत होते थे। उनका शरीर समृद्ध होने से ही उनका नाम
समिद्धि था।
उनके शरीर का सौन्दर्य देख एक देव-कन्या उन पर आसक्त हो गई और
बोली—"भिक्षु ! तू तरुण है, तू युवा है, तेरे केश सुन्दर तथा काले है, तू
श्रेष्ठ यौवन से युक्त हैं, तू मनोरम है, तू दर्शनीय है, तू मन को प्रसन्न करने वाला
हैं। तेरे ऐसे शरीर वाले को काम-भोगो को न भोग प्रव्रजित होने में क्या लाभ ?
अभी तू काम-भोगो को भोग। पीछे प्रव्रजित होकर श्रमण-धर्म का पालन
करना।"
उसे स्थविर ने उत्तर दिया—"हे देव-कन्या ! मैं नही जानता कि मैं किस
आयु में मरूँगा। मेरी मृत्यु मुझसे छिपी है। इसलिए तरुणाई की अवस्था
में ही श्रमण-धर्म करके दुःख का अन्त करूँगा।"
स्थविर ने उसका स्वागत नही किया। वह वही अन्तर्ध्यान हो गई।
स्थविर ने शास्ता के पास जाकर यह बात कही। शास्ता बोले—
"समिद्धि ! न केवल तुझे ही अब देव-कन्या ने प्रलोभित किया है ? पूर्व में
भी देव-कन्याओ ने प्रव्रजितों को प्रलोभित किया है।"
शास्ता ने उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी-गाँव में ब्राह्मण कुल में पैदा हो, बडे होने पर सब विद्याओ में पारङ्गत
हो, ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो, अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त
कर हिमालय प्रदेश में एक तालाब के पास रहने लगे।
वह सारी रात योगाभ्यास करते रहे। अरुणोदय होने पर स्नान किया।
फिर एक वल्कल चीर पहन, एक हाथ में ले शरीर को सुखाने लगे। उसका
सुन्दर शरीर देख एक देव-कन्या उस पर आसक्त हो बोधिसत्व को ललचाती
हुई यह पहली गाथा बोली—

[२२।६७]
अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु ! नहि भुत्वान भिक्खसि ।
भुत्वान भिक्खु ! भिक्खसु मा त कालो उपच्चगा ॥१
[ भिक्षु ! तू बिना काम भोगो को भोगे भिक्षु बना है। काम भोगो को
भोग कर भिखारी नहीं बना है। भिक्षु ! काम भोगो का भोग करके तू
भिखारी बन। यह तेरा काम भोगो को भोगने का समय न बीत जाए ॥]
अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु, भिक्षु ! तू तरुणाई में काम भोगो को न भोग
कर भिक्षाचार करता है। नहि भुत्वान भिक्खसि, क्या पांच प्रकार के काम-
भोगो को भोग कर ही भिखारी नहीं बनना चाहिए ? तू काम भोगो को न
भोग कर ही भिखारी बना है। भुत्वान भिक्खु ! भिक्खसु, भिक्षु ! अभी
तरुणाई में काम भोगो को भोग। काम भोगो को भोग कर पीछे वृद्ध होने पर
भिखारी बनना। मा तं कालो उपच्चगा, यह काम भोगो के उपभोग करने
की आयु यह तरुणाई यूँ ही न बिता।
बोधिसत्व ने देव-कन्या की बात सुन अपना विचार प्रकट करने के लिए
दूसरी गाथा कही—
काल वोह न जानामि, छन्नो कालो न दिस्सति
तस्मा अभुत्वा भिक्खामि, मा म कालो उपच्चगा ॥
[ मैं मृत्यु के समय को नहीं जानता। छिपा हुआ समय दिखाई नहीं देता।
इसलिए बिना काम भोगा का उपभोग किए ही भिक्षु बना हूँ। मेरा यह समय
न बीत जाए।]
काल वोह न जानामि, 'वो' केवल निपात है। मै प्रथम आयु में मरूँगा,
मध्यम-आयु में अथवा आखिरी में—अपना मरन का समय नहीं जानता हूँ।
अत्यन्त पण्डित आदमी को भी—
१ देवता संयुत्त, संयुक्त निकाय।

सकुणिग्घि ] २०७
जीवित ब्याधि कालो च देहनिक्खेपन गति
पञ्चेते जीवलोकस्मि अनिमित्ता न नायरे ।
[ जीव-लोक में इन पाँच बातो का पता नही लगता—(१) जीने की
आयु, (२) रोग, (३) मृत्यु-समय, (४) शरीर के पतन का स्थान, (५)
मरने पर क्या गति होगी ? ]
छन्नो कालो न दिस्सति, इसलिए इस आयु में अथवा इस समय वा हेमन्त
आदि ऋतुओ में से इस ऋतु में मुझे मरना होगा, यह मुझसे भी छिपा हुआ
मृत्यु-समय मुझे दिखाई नहीं देता। अच्छी प्रकार ढका होने से प्रकट नही है।
तस्मा अभुत्वा भिक्खामि इसलिए काम-भोगो को न भोग भिखारी बना हूँ।
मा म कालो उपच्चगा, मेरा श्रमण धर्म करने का समय बीत न जाए।
इसलिए तरुणाई में ही प्रव्रजित होकर श्रमण धर्म करता हूँ।
देव-कन्या बोधिसत्त्व की बात सुन वही अन्तर्ध्यान हो गई।
शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय देव-कन्या यही देव-कन्या थी। मैं ही उस समय तपस्वी था।
१६८. सकुग्णग्घि जातक
सेनो बलसा पतमानो, यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय अपने विचार
के द्योतक सकुगोवाद सूत्र१ के बारे में कही।
१ महावग्ग ।

क. वर्तमान कथा

[२०८] [ २.२.१६८

क. वर्तमान कथा
एक दिन शास्ता ने भिक्षुओं को सम्बोधन कर उपदेश दिया "भिक्षुओ !
जो तुम्हारे योग्य हो उसमें विचरो। जो तुम्हारा पैतृक विषय हो उसमें।"
यह संयुक्त निकाय के महावर्ग का सूत्र है।' इसका उपदेश करते हुए कहा-
"तुम अपनी बात रहने दो। पूर्व समय में जानवर भी अपने पैतृक विषय को
छोड़ अयोग्य-स्थान में विचरने से शत्रुओं के हाथ में पड़, अपनी बुद्धि तथा
उपाय-कौशल से शत्रुओं के हाथ से मुक्त हुए।" इतना कह शास्ता ने पूर्व-
जन्म की कथा कही।

ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्व बटेर
होकर पैदा हुआ। वह हल चलाने की जगह पर ढेलों में रहता था।
एक दिन अपनी गोचर-भूमि को छोड़ दूसरे की गोचर भूमि में जाने की
इच्छा से वह जंगल तक चला गया। उसे वहाँ घूमता देख एक बाज ने यकायक
आकर पकड़ लिया। जब उसे बाज पकड़ कर ले जा रहा था, तो वह इस
प्रकार रोने लगा- "हम अत्यन्त अभाग्यवान् हैं। हमारा पुण्य बहुत कम है।
हम दूसरों के स्थान में चरने गए। यदि आज हम अपने पैतृक स्थान में ही
चरते तो यह बाज मेरे साथ युद्ध करने में समर्थ न होता"।
"लापक ! तेरा स्वकीय पैतृक स्थान कौन सा है ?"
"यही जहाँ हल चलाने की जगह पर ढेले हैं।"
बाज ने अपने दल को ढीला कर उसे छोड़ दिया और कहा- 'ह बटेर
तू जा। मैं तुझे वहाँ भी जाकर पकड़ लूँगा।'
बटेर ने वहाँ जा एक बड़े से ढेले पर चढ बाज को ललकारा- 'बाज !
अब तू आ।'
बाज ने अपना बल सँभाल, दो पक्षों को उठा बटेर को एकदम घेर लिया।

१ सतिपट्ठान सयुत्त, अम्बपालि वर्ग ।

शास्ता ने यह अतीत-कथा सुना कहा—‘भिक्षुओ ! इस प्रकार जानवर

सकुणग्घि ] २०६
जब उस बटेर ने समझा कि बाज मेरे बहुत समीप आगया, तो वह पलट कर
उस ढेले के अन्दर चला गया।
बाज अपने जोर को न रोक सका। उसकी छाती ढेले से टकराई।
इस प्रकार उसका कलेजा चूर चूर हो गया। आँखें निकल आईं। यह मर गया।
शास्ता ने यह अतीत-कथा सुना कहा—‘भिक्षुओ ! इस प्रकार जानवर
भी अयोग्य स्थान पर चरने से शत्रु के हाथ मे पड जाते है। योग्य स्थान में,
अपने पैतृक स्थान में चरते हुए शत्रुओ को जीत लेते हैं। इसलिए तुम भी अयोग्य
स्थान में, जो तुम्हारा विषय नही है, मत विचरो। अयोग्य-स्थान में, जो अपना
विषय नही है विचरने वाले पर भिक्षुओ ! मार आक्रमण करता है। वह
मार का निशाना बनता है। भिक्षुओ ! भिक्षुओ के लिए अयोग्य-स्थान,
जो उनका विषय नही है, क्या है ? जो यह पाँच प्रकार के कामोपभोग हैं।
कौन से पाँच ? आँख से देखे जाने वाले (प्रिय) रूप, कान से सुने जाने वाले
शब्द, नाक से सूंघी आने वाली सुगन्धियाँ, जिह्वा से मजा लिए जानेवाले रस
और शरीर से छुए जाने वाले स्पर्श—भिक्षुओ, यह भिक्षुओ के लिए अयोग्य-
स्थान हैं। यह उनका विषय नही है।"
इतना कह सम्यक सम्बुद्ध हुए रहने की अवस्था में प्रथम गाथा कही—
सेनो बलसा पतमानो लापं गोचरठायिनं,१
सहसा अज्झपत्तो मरण तेनुपागमि ॥
[ बाज अपने बल को न रोक करके अपने योग्य-स्थान पर विचरन वाले
बटेर पर झपटा। इसीसे वह मर गया।]
बलसा पतमानो, बटेर को पकडन की इच्छा से जोर से गिरने वाला,
गोचरठायिनं, अपने विषय (=प्रदेश) से निकल जगल तक चरने के लिए
स्थित। अज्झपत्तो, पहुँचा। मरण तेनुपागमि, इस कारण से मर गया।
१ अगोचर ठायिनं के स्थान पर गोचर ठायिन श्रेयस्कर प्रतीत
होता है।
१४

२१० [ २.२.१६६
उसके मरने पर बटेर ने निकल कर शत्रु की पीठ देख कर सन्तुष्ट हो
उसकी छाती पर खड़े हो उल्लास पूर्वक दूसरी गाथा कही—
सोहं नयेन सम्पद्यो पेत्तिके गोचरे रतो
अपेतसत्तु मोदामि सम्पस्स अत्यमत्तनो ॥
[ में उपाय से अपने पैतृक-प्रदेश में चरता हुआ, अपनी उन्नति देखता हुआ
प्रसन्न हूँ, क्योंकि मेरा शत्रु नहीं रहा है।]
नयेन, उपाय से, अत्यमत्तनो, अपनी आरोग्य नामक उन्नति।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर बहुत से भिक्षुओं ने श्रोतापत्ति
आदि फल प्राप्त किए।
उस समय बाज देवदत्त था। बटेर तो मैं ही था।
१६६. अरक जातक
"यो वे मेत्तेन चित्तेन " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय मेत्तसूत्त¹ के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक समय शास्ता ने भिक्षुओं को सम्बोधन कर कहा—"भिक्षुओ, मैत्री-
भावना जो कि चित्त की विमुक्ति (का साधन) है का सेवन करने से, की
¹अंगुत्तर निकाय, एकादसक निपात।

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अरक ]' ' २११
[/page-header]

भावना करने से, को बढ़ाने से, को जारी रखने से, का अभ्यास करने से,
का अनुष्ठान करने से, का अच्छी तरह आरम्भ करने से ग्यारह लाभो की
आशा करनी चाहिए। कौन से ग्यारह ? सुख पूर्वक सोता है, सुख से जागता
है, बुरा स्वप्न नही देखता, मनुष्यो का प्रिय होता है, अ-मनुष्यों का प्रिय
होता है, देवता रक्षा करते हैं, इस पर अग्नि, विष, या शस्त्र का आक्रमण
नही होता, चित्त जल्दी शान्त हो जाता है, मुख-वर्ण सुन्दर होता है, होश
रखकर शरीर छोड़ता है तथा अधिक कुछ (निर्वाण-मार्ग) न प्राप्त कर
सकने पर ब्रह्मलोकगामी अवश्य होता है। भिक्षुओ मैत्री भावना जो कि
चित्त की विमुक्ति (का साधन) है, का सेवन करने से.. .इन ग्यारह
लाभो की आशा करनी चाहिए।" इन ग्यारह लाभो वाली मैत्री-भावना की
प्रशंसा कर आगे कहा—"भिक्षुओ, भिक्षु को सभी प्राणियो के प्रति खास तौर
पर, साधारण तौर पर मैत्री-भावना करनी चाहिए। हितैषी का भी हित-
चिन्तक होना चाहिए, जो हितैषी न हो उसका भी हित-चिन्तक होना चाहिए,
जो मध्यस्थ-वृत्ति हो उसका भी हित-चिन्तक होना चाहिए। इस प्रकार सभी
प्राणियो के प्रति खास तौर पर, तथा साधारण तौर पर मैत्री-भावना करनी
चाहिए । करुणा-भावना की भावना करनी चाहिए । मुदिता-भावना की
भावना करनी चाहिए। उपेक्षा-भावना की भावना करनी चाहिए। इन
चारो ब्रह्म-विहारो का अभ्यास करना ही चाहिए। इस प्रकार अभ्यास करने
से यदि मार्ग तथा फल की प्राप्ति न भी हो तो भी ब्रह्मलोकगामी होता है ।
पुराने समय में भी पण्डित लोग सात वर्ष तक मैत्री-भावना करके सात सबत-
विवर्त्त कल्प तक ब्रह्मलोक में ही रहे।" इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा
कही—
ख. अतीत कथा

पूर्व समय में एक कल्प में बोधिसत्त्व एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए । बड़े
होने पर काम-भोगो को छोड़ ऋषि-प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो चारो
ब्रह्म-विहारो को प्राप्त कर अरक नाम से उपदेशक हुए। वह हिमालय प्रदेश
में रहते थे। उनके बहुत अनुयाई थे। वे ऋषि-गणो को उपदेश देते हुए कहते
—"प्रव्रजित को मैत्री-भावना का अभ्यास करना चाहिए। करुणा-भावना,

२१२ [ २.२.१६६
मुदिता-भावना तथा उपेक्षा-भावना का अभ्यास करना चाहिए। मैत्री-पूर्ण
चित्त अर्पणा-समाधि तथा ब्रह्मलोक-परायणता तक को प्राप्त कराता है।"
इस प्रकार मैत्री-भावना की प्रशंसा करते हुए उन्होने यह गाथा कही—
यो वे मेत्तेन चित्तेन सब्ब लोकानुकम्पति
उद्धं अधो च तिरियं च अप्पमाणेन सब्बसो
अप्पमाणं हितं चित्तं परिपुण्णं सुभावितं
यं पमाण कतं कम्मं न तं तत्रावसिस्सति
[ जो अप्रमाण मैत्री चित्त से ऊपर-नीचे तथा तिर्यक् दिशा में सारे लोको
पर अनुकम्पा करता है, उसके प्रमाण रहित, परिपूर्ण अच्छी तरह से भावना
किए गए मैत्री-चित्त के (फल) के आगे जो सीमित कर्म है उसका फल नहीं
ठहरता।]
यो वे मेत्तेन चित्तेन सब्ब लोकानुकम्पति, क्षत्रिय आदि में अथवा श्रमण-
ब्राह्मण आदि में जो कोई अर्पणा-प्राप्त चित्त से सारे प्राणियो पर अनुकम्पा
करता है, उद्धं पृथिवी से नेवसञ्ञानासञ्ञायतन ब्रह्मलोक तक अधो पृथ्वी
से नीचे उस्सद नाम के महानरक तक, तिरियं, मनुष्य लोक में जितने चक्रवाल
हैं उन सब में जितने प्राणी है वह सभी वैर-रहित हो, क्रोध-रहित हो, दुःख-
रहित हो; इस प्रकार भावना किए गए मैत्री-चित्त से। अप्पमाणेन अप्रमाण
प्राणियो के कारण असीम आलम्बन होने से अप्रमाण। सब्बसो सब तरह
से ऊपर, नीचे तथा तिर्यक् इस प्रकार सब सुगति तथा दुर्गति में। अप्पमाणं
हितं चित्तं सभी प्राणियों के प्रति मैत्री की असीम भावना। परिपुण्णं सम्पूर्ण
सुभावितं अच्छी प्रकार उन्नत, इसका मतलब है अर्पणा-चित्त। यं पमाण कतं
कम्मं जो यह अप्पमाण-अप्पमाणारम्मण, परित्तं-अप्पमाणारम्मण तथा अप्प
माणं-परित्तारम्मणं तीन प्रकार के आरम्मण पर पूर्ण अधिकार करते हुए उसे
न बढा कर जो सीमित कामावचर कर्म किया जाता है। न तं तत्रावसिस्सति
वह सीमित (परित्त) कर्म जो अप्रमाण मैत्री-चित्त रूपी रूपावचर धर्म है,
उसके सामने नहीं ठहरता। जैसे बाढ़ के आने पर सीमित पानी उससे पृथक
नहीं रह सकता है, नहीं ठहरता है; वह बाढ़ में ही मिल जाता है। उसी प्रकार

ककण्टक ] २१३
वह सीमित कर्म उस महान् कर्म के अन्दर, उस महान् कर्म में मिलकर, फल
देने में असमर्थ हो रहता है, अपना फल नहीं दे सकता।
वह महान् कर्म ही उसे ढक देता है, महान् कर्म ही फल देने वाला
रहता है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व अपने शिष्यो को मैत्री-भावना का फल कह ध्यान
में अवस्थित रह ब्रह्मलोक में पैदा हो सात सवत्तं-विवत्तं कल्प तक फिर इस
लोक में नहीं आए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।•
उस समय ऋषि-गण बुद्ध-परिषद थी। अरक नाम का उपदेशक तो मै
ही था।
१७०. ककण्टक जातक
“नायं पुरे श्रोनमति' •” यह ककण्टक जातक महाउम्मग जातक१ में
आएगी।
१ महाउम्मग जातक (५४६)

१७१. कल्याणधम्म जातक

दूसरा परिच्छेद
३. कल्याणधम्म वर्ग
१७१. कल्याणधम्म जातक
"कल्याण धम्मो " यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक बहरी
सास के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में एक कुटुम्बिक रहता था। वह श्रद्धावान् था। वह प्रसन्न-
चित्त था। वह त्रिशरण ग्रहण किए था और पञ्चशील भी।
एक दिन वह घी आदि बहुत सी औषधियाँ,¹ पुष्प, सुगन्धियाँ तथा वस्त्र
ले शास्ता से धर्म सुनने की इच्छा से जेतवन गया।
उसके वहाँ गए रहने पर सास खाद्य-भोजन ले लडकी को देखने की इच्छा
से लडकी के घर आई। वह थोडी बहरी थी। जब लडकी के साथ खाना खा
चुकी, तो भोजनोपरान्त आराम करते हुए उसने लडकी से पूछा—'अम्म !
क्या तेरा पति तुझसे प्रसन्न है ? क्या वह विवाद न करता हुआ, प्रेमपूर्वक
रहता है ?"
'अम्म ! क्या कहना ! जैसा तुम्हारा जँवाई है, वैसा शीलवान् तथा
सदाचारी प्रव्रजित भी मिलना दुर्लभ है।"
उस उपासिका ने लडकी की सारी बात पर भली प्रकार ध्यान न दे


¹ घी, मक्खन आदि औषध रूप से भिक्षु अपराह्न में भी ग्रहण कर सकता
है।

कल्याणधम्म ] २१५
केवल 'प्रव्रजित' शब्द को सुन चिल्लाना शुरू किया—'धम्म ! तेरा स्वामी
प्रव्रजित क्यों हो गया ?'
उसकी बात सुन सारे घर वाले रोने लगे—'हमारा घर का मालिक
प्रव्रजित हो गया ।'
उनका रोना सुन दरवाजे से गुजरने वाले लोग पूछने लगे कि रो क्यों
रहे हैं ? "इस घर का मालिक प्रव्रजित हो गया है ।'
यह कुटुम्बिक भी बुद्ध का उपदेश सुन, विहार से निकल नगर में प्रविष्ट
हुआ । एक आदमी ने उसे रास्ते में ही देख कर कहा—'सौम्य ! तेरे घर पर
तेरे लड़के, स्त्री आदि सम्बन्धी रो रहे हैं कि तू प्रव्रजित हो गया है।'
उसने सोचा—मैं प्रव्रजित नहीं हूँ, तो भी मुझे लोग प्रव्रजित समझ रहे
हैं। मेरी प्रशंसा होने लगी है। इसे गँवाना नहीं चाहिए। आज ही मुझे
प्रव्रज्या ग्रहण करनी चाहिए।
वह वहीं से वापिस लौट कर शास्ता के पास गया। शास्ता ने पूछा—
"उपासक ! अभी तू बुद्ध की सेवा म आकर लौटा, और तुरन्त फिर
आया है ?"
उसने वह बात कह निवेदन किया—"भन्ते ! मेरी प्रशंसा होने लगी।
है। उस शुभ-नाम को गँवाना नहीं चाहिए। इसलिए मैं प्रव्रजित होने की
इच्छा से आया हूँ।"
प्रव्रज्या और उपसम्पदा प्राप्त कर वह अच्छी तरह से जीवन व्यतीत
करता हुआ थोड़ी ही देर में अर्हत् हुआ ।
यह बात भिक्षुसंघ में प्रकट हुई। एक दिन धर्म-सभा में भिक्षुओ ने बात-
चीत चलाई—"आयुष्मानो ! अमुक कुटुम्बिक ने सोचा कि उसकी जो प्रशंसा
होने लगी है, उस शुभ-नाम का लोप नहीं होना चाहिए। वह प्रव्रजित होकर
अर्हत् हो गया ।"
शास्ता ने आकर पूछा—' भिक्षुओ ! बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?"
"अमुक बातचीत" कहने पर, शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, पुराने समय में
पण्डित जन भी यही सोच कर कि जो प्रशंसा होने लगे उस शुभ-नाम का लोप
नहीं होने देना चाहिए प्रव्रजित ही हुए ।'
इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।

ख. अतीत कथा

२१६ [ २३।७१
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणशी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व एक
सेठ के घर में पैदा हुए। बड़े होने पर पिता के मरने के बाद सेठ का पद मिला।
वह एक दिन घर से निकल राजा की सेवा में पहुॅचा।
उसकी सास अपनी लड़की को देखने की इच्छा से उसके घर आई।
वह थोड़ी बहरी थी। आगे की सब कथा 'वर्तमान-कथा' सदृश ही है।
उसे राजा की सेवा करके अपने घर लौटते समय एक आदमी ने देख कर
कहा—'तुम्हारे घर पर सब लोग रो पीट रहे हैं कि तुम प्रव्रजित हो गए।'
बोधिसत्त्व ने सोचा कि जो प्रशंसा होने लगी है, उस शुभ-नाम को नष्ट
नहीं होने देना चाहिए। वह वहीं से लौट कर राजा के पास पहुँचे। राजा ने
पूछा—
"महासेठ ! अभी जाकर अभी फिर क्या लौट आए ?"
"देव ! घर के लोग मुझ अप्रव्रजित को ही प्रव्रजित हुआ समझ कर
रोते पीटते हैं। यह जो मुझे शुभ-नाम मिला है, इसको लुप्त होने देना ठीक
नहीं। मैं प्रव्रजित होऊँगा। मुझे प्रव्रजित होने की आज्ञा दें।"
सेठ ने इस भाव को प्रकट करने वाली दो गाथाएँ कहीं—
कल्याणधम्मोति यदा जनिन्द
लोके समञ्ञा अनुपापुणाति,
तस्मा न हीयेय नरो सपञ्जो
हिरियापि सन्तो धुरमादियन्ति ॥
सायं समञ्ञा इध मञ्ज पत्ता
कल्याणधम्मोति जनिन्द लोके,
ताहं समेक्ख इध पब्बजिस्स
नहि मत्थि छन्दो इध कामभोगे ॥
[ हे राजन् ! जब लोक में किसी की कीर्ति होती है, उसे शुभ-नाम
मिलता है, तो बुद्धिमान् आदमी को उसे छोड़ना नहीं चाहिए। श्रेष्ठ पुरुष
लज्जा से भी (प्रव्रज्या ) धुर को प्राप्त करते हैं।

दद्दर ] २१७
हे राजन ! आज मुझे वह कीर्ति उत्पन्न हुई है, शुभ-नाम मिला
है। उसे देखकर मैं प्रव्रजित होऊँगा । मुझे काम-भोगो की इच्छा नही
रही है।]
कल्याण धम्मो, सुन्दर धर्म, समञ्ञ अनुपापुणाति जब शीलवान, सदाचारी,
वा प्रव्रजित इस प्रकार की कीर्ति तथा लोक-व्यवहार आरम्भ हो जाता है।
तस्मा न हीयेय, उस श्रमणत्व (की ख्याति) से न हटे । हिरियापि सन्तो धुर-
मादियन्ति, महाराज ! सत्पुरुष अपने अन्दर से उत्पन्न लज्जा से, बाह्य-निन्दा
से पैदा हुए भय से भी इस प्रव्रज्या को ग्रहण करते हैं।
इध मज्ज, यहाँ मेरे द्वारा आज ताह समेक्ख मैं उस श्रमणत्व को गुण-
रूप से देखता हुआ नत्थि मय्हि छन्दो, मुझ में इच्छा नही है, इध कामभोगे, इस
दुनिया में वस्तु-कामना वा कामेच्छा ।
बोधिसत्त्व ने यह कह राजा से प्रव्रज्या की आज्ञा ली। फिर हिमालय-
प्रदेश में जा ऋषि-प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ
प्राप्त कर ब्रह्म-लोक गामी हुए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय राजा आनन्द था। वाराणसी सेठ तो मैं ही था।
१७२. दद्दर जातक
को नु सद्देन महता, यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कोकालिक
भिक्षु के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

२१८ [ २३।७२
क. वर्तमान कथा
उस समय दोव बहुश्रुत भिक्षुसघ के बीच में ऐसे पाठ करते थे जैसे मनो-
शिला के नीचे तरुण सिंह गर्ज रहा हो, अथवा आकाश से गङ्गा उतारी जा
रही हो।
मोकालिक भिक्षु अपने तुच्छ-ज्ञान पर विचार न कर जिस समय भिक्षु
पाठ करते थे, स्वय भी पाठ करने की इच्छा से भिक्षुओ के बीच में जाकर सघ
का नाम न ले कहता कि भिक्षु मुझे पाठ करने नही देते, यदि पाठ करने दें
तो मैं भी पाठ करूँ। इस प्रकार यह जहाँ तहाँ कहता हुआ घूमता था।
उसकी यह बात भिक्षुसघ में प्रगट हो गई। भिक्षुओ ने सोचा इसकी
परीक्षा करें। इस विचार से उन्होने कहा—"आयुष्मान् ! कोकालिक !
आज सघ के सम्मुख पाठ कर।" उसने अपना बल न पहचान कर स्वीकार
कर लिया कि मै आज सघ के सम्मुख पाठ करूँगा।
तब उसने अपने को अनुकूल पडने वाला यवागु पिया। भोजन किया।
अनुकूल दाल भी ली।
सूर्यास्त होने पर धर्म सुनने के समय सूचना देने पर भिक्षुसघ एकत्र हुआ।
वह कुरण्ड-पुष्प सदृश काषाय-वस्त्र पहन घोर कनेर पुष्प सदृश लाल
चीवर ओढ सघ के बीच जा, स्थविरो को प्रणाम कर, अलकृत रत्न-मण्डप
के बीच बिछे हुए श्रेष्ठ आसन पर चढ चित्रित पखा हाथ में ले पाठ करने के
लिए बैठा। उसी समय उसके शरीर से पसीना बहने लगा। वह लज्जित हो
गया। वह पूर्व-गाथा¹ का प्रथम पाद भर कह सका। उसके आगे उसे नहीं
सूझा। वह काँपता हुआ आसन से उतर आया। लज्जित हो सघ के बीच से
गुजर वह अपने परिवेण में चला गया।
किसी दूसरे ही बहुश्रुत भिक्षु ने पाठ किया। उस समय से भिक्षु जान गए
कि वह अज्ञानी है।
एक दिन भिक्षुओ ने धर्मसभा में बात चलाई—"आयुष्मनो ! पहले
¹ धर्मोपदेश देने के लिए जिस गाथा का आधार लिया जाता है।

यह कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।

दद्दर ] २१६
कोकालिक के ज्ञान की तुच्छता अज्ञात थी। अब इसने अपने ही बोलकर उसे
प्रकट कर दिया।"
शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे
हो ?" "अमुक बातचीत" कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, न केवल
अभी कोकालिक ने बोलकर अपने आपको प्रकट किया है, पहले भी बोलकर
प्रकट किया है।"
यह कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
हिमालय-प्रदेश में सिंह के रूप में पैदा हुए। वह बहुत से सिंहो के राजा बने।
अनेक सिंहो के साथ वह रजत-गुफा में रहते थे। उसके पास ही एक गुफा
में एक सियार रहता था। एक दिन वर्षा के हो चुकने पर सब सिंह सिंहराज के
गुफा-द्वार पर इकट्ठे हो सिंह-नाद करते हुए सिंह-क्रीडा करने लगे।
उनके इस प्रकार दहाड़ते हुए क्रीडा करने के समय वह सियार भी
चिल्लाया। सिंहो ने जब उसकी आवाज सुनी तो वह यह सोचकर लज्जा के
मारे चुप हो गए कि यह सियार भी हमारे साथ आवाज लगा रहा है। उनके
चुप हो जाने पर बोधिसत्त्व के पुत्र सिंह-बच्चे ने पूछा—"तात ! यह सिंह
दहाड़ दहाड़ कर सिंह-क्रीडा करते हुए किसी एक की आवाज सुनकर लज्जा
से चुप हो गए। यह कौन है जो अपने शब्द से अपने को प्रकट कर रहा है ?"
इस प्रकार पिता से पूछते हुए सिंह-बच्चे ने पहली गाथा कही—
को नु सद्देन महता अभिनादेति दद्दरं
किं सीहा न पटिनदन्ति को नामेसो मिगाधिभू ॥
[ हे मृगराज ! यह कौन है जो बड़े शब्द मे दद्दर पर्वत को गुंजा रहा
है ? यह कौन है जिसके कारण सिंह नही बोलते है ? ]
अभिनादेति दद्दरं, दद्दर पर्वत को गुंजा रहा है। मिगाधिभु पिता को
सम्बोधन करता है। यहाँ यह अर्थ है। मिगाधिमु ! मृग-ज्येष्ठ ! सिंह-
राज ! मै तुम्हे पूछता हूँ कि यह कौन है ?

२२० [ २.३.१७३
उसकी बात सुन पिता ने दूसरी गाथा कही—
अधमो मिगजातानं सिगालो तात वस्सति
जातिमस्स जिगुच्छन्ता तुण्ही सीहा समच्छरे ॥
[तात ! पशुओ में जो सबसे नीच शियार है वही चिल्लाता है। सिंह
उसकी जाति से घृणा करने के कारण चुप हो गए हैं।]
समच्छरे, सं केवल उपसर्ग है । अच्छा समझते हैं अर्थ है । तुण्ही, बैठते
हैं, चुप होकर बैठते हैं, यही अर्थ है । पुस्तको में समच्छरे लिखते हैं।
शास्ता बोले—"भिक्षुओ ! कोकालिक ने केवल अभी अपनी वाणी से
अपने को प्रकट नहीं किया, पहले भी किया ही है।"
यह धर्म-देशना ला शास्ता ने जातक का मेल बैठाया ।
उस समय सियार कोकालिक था। सिंह-बच्चा राहुल । सिंह-राज
मैं ही था।
१७३. मक्कट जातक
"तात ! माणवको एसो..." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक
ढोंगी के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
यह कथा प्रकीर्णक परिच्छेद की उद्दालक जातक' मे आएगी । उस
'उद्दालक जातक (४८७)

कथा कही।

मक्कट ] २२१
समय शास्ता ने 'भिक्षुओ, यह भिक्षु केवल अभी ढोगी नही है, इसने
पहले भी जब यह बन्दर था अग्नि के लिए ढोग किया है', कह पूर्व-जन्म की
कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसो मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
किसी काशी-ग्राम मे ब्राह्मण कुल मे पैदा हुए। बडे होने पर तक्षशिला जा
विद्या सीख घर बसाया।
उसकी ब्राह्मणी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जब लडका दौडने भागने
लग गया, तो वह मर गई।
बोधिसत्त्व ने उसका शरीर-कृत्य करके सोचा, अब मुझे घर में रहने
से क्या लाभ ? मै पुत्र को लेकर प्रव्रजित हो जाऊँ। रोते हुए रिश्तेदारो
तथा मित्र-समूह को छोड वह पुत्र को ले हिमालय मे प्रविष्ट हुआ। वहाँ ऋपियो
के ढग से प्रव्रजित हो फल-मूल खाता हुआ रहने लगा।
एक दिन वर्षा ऋतु में जब वर्षा हुई, तो वह सूखी लकडियाँ जलाकर
आग तापते हुए एक तख्ते पर लेटा था। इसका पुत्र तपस्वी-कुमार भी इसके
पैरो को दबाता हुआ बैठा था। एक जगली बन्दर ने शीत से पीडित हो उस
पर्ण-कुटी में आग देख कर सोचा—"यदि मैं यहाँ प्रवेश करूँगा, तो 'बन्दर है,
बन्दर है' कह मुझे पीट कर निकाल देंगे। मुझे आग तापना न मिलेगा।
एक उपाय है। मै तपस्वी-वेश बना ढोग करके प्रवेश करूँ।"
उसने एक मृत तपस्वी के वल्कल वस्त्र पहन लिए। फिर खारी ले,
पर्ण-कुटी के द्वार पर एक ताड-वृक्ष के नीचे सिकुड कर बैठा।
तपस्वी-कुमार ने उसे देख, बन्दर न समझ सोचा—शीत से पीडित
एक बूढा तपस्वी आग तापने आया होगा। तपस्वी को कह कर इसे पर्ण-कुटी
मे ला आग तपवाऊँ।
उसने पिता को सम्बोधन कर यह पहली गाथा कही—
तात ! माणवको एसो तालमूल अपस्सितो,
अगारफञ्च्चिदं अत्थि हन्द देमस्स गारक ॥

२२२ [ २.३.१७३
[ तात ] यह एक माणवक ताड-वृक्ष को आश्रय करके बैठा है। यह घर
है। हन्त ! हम इसे गृह दे । ]
माणवको एसो, प्राणी वाची शब्द है। तात ! यह एक माणवक प्राणी है।
'एक तपस्वी है' यही प्रकट करता है। तालमूलं अपस्सितो, ताड के वृक्ष के
आश्रय है। अगारकञ्चिद अत्थि, यह हमारा प्रव्रजितो का घर है। पर्ण-
कुटी को लेकर कहा है। हन्द, निश्चय के अर्थ में निपात है। वेमस्सगारकं,
इसे एक कोने में रहने के लिए घर दें।
बोधिसत्त्व ने पुत्र की बात सुन उठकर पर्ण-कुटी के दरवाजे पर खडे हो
देखकर पहचान लिया कि वह बन्दर है। उन्होने कहा—'तात ! मनुष्यों का
मुंह ऐसा नहीं होता। यह बन्दर है। इसे यहाँ नहीं बुलाना चाहिए।' यह
कहते हुए दूसरी गाथा कही—
मा खो तं तात ! पक्कोसि दूसेय्य नो अगारकं
नेतादिस मुखं होति ब्राह्मणस्स सुसीलिनो ॥
[ तात ! इसे मत बुला । यह हमारे घर को खराब कर देगा। सदाचारी
ब्राह्मण का ऐसा मुंह नही होता । ]
दूसेय्य नो अगारकं, यह यहाँ प्रवेश पाकर इस कठिनाई से बनाई हुई
पर्ण-कुटी को या तो आग से जलाकर अथवा मल त्याग कर खराब कर दे
सकता है। नेतादिसं शीलवान् ब्राह्मण का ऐसा मुंह नहीं होता।
'यह बन्दर है' कह बोधिसत्त्व ने एक जलती हुई लकडी फेंकी कि यहाँ
क्यो बैठा है ? इस प्रकार उसे भगा दिया। बन्दर वल्कल वस्त्र छोड वृक्ष
पर चढ वन में चला गया। बोधिसत्त्व चारो ब्रह्म विहारो की भावना कर
ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बन्दर
यह ढोंगी भिक्षु था। तपस्वी-कुमार राहुल। तपस्वी तो मैं ही था।