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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

मक्कट ] २२१
समय शास्ता ने 'भिक्षुओ, यह भिक्षु केवल अभी ढोगी नही है, इसने
पहले भी जब यह बन्दर था अग्नि के लिए ढोग किया है', कह पूर्व-जन्म की
कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसो मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
किसी काशी-ग्राम मे ब्राह्मण कुल मे पैदा हुए। बडे होने पर तक्षशिला जा
विद्या सीख घर बसाया।
उसकी ब्राह्मणी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जब लडका दौडने भागने
लग गया, तो वह मर गई।
बोधिसत्त्व ने उसका शरीर-कृत्य करके सोचा, अब मुझे घर में रहने
से क्या लाभ ? मै पुत्र को लेकर प्रव्रजित हो जाऊँ। रोते हुए रिश्तेदारो
तथा मित्र-समूह को छोड वह पुत्र को ले हिमालय मे प्रविष्ट हुआ। वहाँ ऋपियो
के ढग से प्रव्रजित हो फल-मूल खाता हुआ रहने लगा।
एक दिन वर्षा ऋतु में जब वर्षा हुई, तो वह सूखी लकडियाँ जलाकर
आग तापते हुए एक तख्ते पर लेटा था। इसका पुत्र तपस्वी-कुमार भी इसके
पैरो को दबाता हुआ बैठा था। एक जगली बन्दर ने शीत से पीडित हो उस
पर्ण-कुटी में आग देख कर सोचा—"यदि मैं यहाँ प्रवेश करूँगा, तो 'बन्दर है,
बन्दर है' कह मुझे पीट कर निकाल देंगे। मुझे आग तापना न मिलेगा।
एक उपाय है। मै तपस्वी-वेश बना ढोग करके प्रवेश करूँ।"
उसने एक मृत तपस्वी के वल्कल वस्त्र पहन लिए। फिर खारी ले,
पर्ण-कुटी के द्वार पर एक ताड-वृक्ष के नीचे सिकुड कर बैठा।
तपस्वी-कुमार ने उसे देख, बन्दर न समझ सोचा—शीत से पीडित
एक बूढा तपस्वी आग तापने आया होगा। तपस्वी को कह कर इसे पर्ण-कुटी
मे ला आग तपवाऊँ।
उसने पिता को सम्बोधन कर यह पहली गाथा कही—
तात ! माणवको एसो तालमूल अपस्सितो,
अगारफञ्च्चिदं अत्थि हन्द देमस्स गारक ॥