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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 221

[२२।६७]
अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु ! नहि भुत्वान भिक्खसि ।
भुत्वान भिक्खु ! भिक्खसु मा त कालो उपच्चगा ॥१
[ भिक्षु ! तू बिना काम भोगो को भोगे भिक्षु बना है। काम भोगो को
भोग कर भिखारी नहीं बना है। भिक्षु ! काम भोगो का भोग करके तू
भिखारी बन। यह तेरा काम भोगो को भोगने का समय न बीत जाए ॥]
अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु, भिक्षु ! तू तरुणाई में काम भोगो को न भोग
कर भिक्षाचार करता है। नहि भुत्वान भिक्खसि, क्या पांच प्रकार के काम-
भोगो को भोग कर ही भिखारी नहीं बनना चाहिए ? तू काम भोगो को न
भोग कर ही भिखारी बना है। भुत्वान भिक्खु ! भिक्खसु, भिक्षु ! अभी
तरुणाई में काम भोगो को भोग। काम भोगो को भोग कर पीछे वृद्ध होने पर
भिखारी बनना। मा तं कालो उपच्चगा, यह काम भोगो के उपभोग करने
की आयु यह तरुणाई यूँ ही न बिता।
बोधिसत्व ने देव-कन्या की बात सुन अपना विचार प्रकट करने के लिए
दूसरी गाथा कही—
काल वोह न जानामि, छन्नो कालो न दिस्सति
तस्मा अभुत्वा भिक्खामि, मा म कालो उपच्चगा ॥
[ मैं मृत्यु के समय को नहीं जानता। छिपा हुआ समय दिखाई नहीं देता।
इसलिए बिना काम भोगा का उपभोग किए ही भिक्षु बना हूँ। मेरा यह समय
न बीत जाए।]
काल वोह न जानामि, 'वो' केवल निपात है। मै प्रथम आयु में मरूँगा,
मध्यम-आयु में अथवा आखिरी में—अपना मरन का समय नहीं जानता हूँ।
अत्यन्त पण्डित आदमी को भी—
१ देवता संयुत्त, संयुक्त निकाय।