जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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कोकालिक के ज्ञान की तुच्छता अज्ञात थी। अब इसने अपने ही बोलकर उसे
प्रकट कर दिया।"
शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे
हो ?" "अमुक बातचीत" कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, न केवल
अभी कोकालिक ने बोलकर अपने आपको प्रकट किया है, पहले भी बोलकर
प्रकट किया है।"
यह कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
हिमालय-प्रदेश में सिंह के रूप में पैदा हुए। वह बहुत से सिंहो के राजा बने।
अनेक सिंहो के साथ वह रजत-गुफा में रहते थे। उसके पास ही एक गुफा
में एक सियार रहता था। एक दिन वर्षा के हो चुकने पर सब सिंह सिंहराज के
गुफा-द्वार पर इकट्ठे हो सिंह-नाद करते हुए सिंह-क्रीडा करने लगे।
उनके इस प्रकार दहाड़ते हुए क्रीडा करने के समय वह सियार भी
चिल्लाया। सिंहो ने जब उसकी आवाज सुनी तो वह यह सोचकर लज्जा के
मारे चुप हो गए कि यह सियार भी हमारे साथ आवाज लगा रहा है। उनके
चुप हो जाने पर बोधिसत्त्व के पुत्र सिंह-बच्चे ने पूछा—"तात ! यह सिंह
दहाड़ दहाड़ कर सिंह-क्रीडा करते हुए किसी एक की आवाज सुनकर लज्जा
से चुप हो गए। यह कौन है जो अपने शब्द से अपने को प्रकट कर रहा है ?"
इस प्रकार पिता से पूछते हुए सिंह-बच्चे ने पहली गाथा कही—
को नु सद्देन महता अभिनादेति दद्दरं
किं सीहा न पटिनदन्ति को नामेसो मिगाधिभू ॥
[ हे मृगराज ! यह कौन है जो बड़े शब्द मे दद्दर पर्वत को गुंजा रहा
है ? यह कौन है जिसके कारण सिंह नही बोलते है ? ]
अभिनादेति दद्दरं, दद्दर पर्वत को गुंजा रहा है। मिगाधिभु पिता को
सम्बोधन करता है। यहाँ यह अर्थ है। मिगाधिमु ! मृग-ज्येष्ठ ! सिंह-
राज ! मै तुम्हे पूछता हूँ कि यह कौन है ?