जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१० [ २.२.१६६
उसके मरने पर बटेर ने निकल कर शत्रु की पीठ देख कर सन्तुष्ट हो
उसकी छाती पर खड़े हो उल्लास पूर्वक दूसरी गाथा कही—
सोहं नयेन सम्पद्यो पेत्तिके गोचरे रतो
अपेतसत्तु मोदामि सम्पस्स अत्यमत्तनो ॥
[ में उपाय से अपने पैतृक-प्रदेश में चरता हुआ, अपनी उन्नति देखता हुआ
प्रसन्न हूँ, क्योंकि मेरा शत्रु नहीं रहा है।]
नयेन, उपाय से, अत्यमत्तनो, अपनी आरोग्य नामक उन्नति।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर बहुत से भिक्षुओं ने श्रोतापत्ति
आदि फल प्राप्त किए।
उस समय बाज देवदत्त था। बटेर तो मैं ही था।
१६६. अरक जातक
"यो वे मेत्तेन चित्तेन " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय मेत्तसूत्त¹ के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक समय शास्ता ने भिक्षुओं को सम्बोधन कर कहा—"भिक्षुओ, मैत्री-
भावना जो कि चित्त की विमुक्ति (का साधन) है का सेवन करने से, की
¹अंगुत्तर निकाय, एकादसक निपात।