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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 233

२१८ [ २३।७२
क. वर्तमान कथा
उस समय दोव बहुश्रुत भिक्षुसघ के बीच में ऐसे पाठ करते थे जैसे मनो-
शिला के नीचे तरुण सिंह गर्ज रहा हो, अथवा आकाश से गङ्गा उतारी जा
रही हो।
मोकालिक भिक्षु अपने तुच्छ-ज्ञान पर विचार न कर जिस समय भिक्षु
पाठ करते थे, स्वय भी पाठ करने की इच्छा से भिक्षुओ के बीच में जाकर सघ
का नाम न ले कहता कि भिक्षु मुझे पाठ करने नही देते, यदि पाठ करने दें
तो मैं भी पाठ करूँ। इस प्रकार यह जहाँ तहाँ कहता हुआ घूमता था।
उसकी यह बात भिक्षुसघ में प्रगट हो गई। भिक्षुओ ने सोचा इसकी
परीक्षा करें। इस विचार से उन्होने कहा—"आयुष्मान् ! कोकालिक !
आज सघ के सम्मुख पाठ कर।" उसने अपना बल न पहचान कर स्वीकार
कर लिया कि मै आज सघ के सम्मुख पाठ करूँगा।
तब उसने अपने को अनुकूल पडने वाला यवागु पिया। भोजन किया।
अनुकूल दाल भी ली।
सूर्यास्त होने पर धर्म सुनने के समय सूचना देने पर भिक्षुसघ एकत्र हुआ।
वह कुरण्ड-पुष्प सदृश काषाय-वस्त्र पहन घोर कनेर पुष्प सदृश लाल
चीवर ओढ सघ के बीच जा, स्थविरो को प्रणाम कर, अलकृत रत्न-मण्डप
के बीच बिछे हुए श्रेष्ठ आसन पर चढ चित्रित पखा हाथ में ले पाठ करने के
लिए बैठा। उसी समय उसके शरीर से पसीना बहने लगा। वह लज्जित हो
गया। वह पूर्व-गाथा¹ का प्रथम पाद भर कह सका। उसके आगे उसे नहीं
सूझा। वह काँपता हुआ आसन से उतर आया। लज्जित हो सघ के बीच से
गुजर वह अपने परिवेण में चला गया।
किसी दूसरे ही बहुश्रुत भिक्षु ने पाठ किया। उस समय से भिक्षु जान गए
कि वह अज्ञानी है।
एक दिन भिक्षुओ ने धर्मसभा में बात चलाई—"आयुष्मनो ! पहले
¹ धर्मोपदेश देने के लिए जिस गाथा का आधार लिया जाता है।