जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
कुल्लपदुम ] २८३
प्रणाम करने लगे—ओह ! पतिदेवता !
राजा ने फिर उससे पूछा—"तुझे कुलवालो ने इसे सौंपा है ? यह तेरा
स्वामी है ?"
उसने राजा को न पहचानते हुए धीर बन कर कहा—"देव ! हाँ।"
तब राजा ने उसे पूछा—"क्या यह वाराणसी राजा का पुत्र है ? क्या
तू पदुमकुमार की भार्या अमुक राजा की अमुक नाम की लडकी नही है ?
मेरी जाँघ का लहू पीकर इस लुञ्जे के प्रति आसक्त हो मुझे प्रपात से गिरा
दिया। यह तू अब अपने सिर पर मृत्यु ले मुझे मरा समझ यहाँ आई है ? मैं
जीता हूँ।" इतना कह, अमात्यो को बुला राजा ने कहा—"अमात्यो ! क्या मैने
तुम लोगो के पूछने पर यह नहीं कहा था कि मेरे छ छोटे भाइयो ने छ स्त्रियो
को मार कर मास खाया। लेकिन मैने अपनी स्त्री को सकुशल गङ्गा किनारे
लाकर एक आश्रम में रहते हुए, एक दण्ड-प्राप्त लुञ्जे को (पानी से) निकाल
सेवा की। उस स्त्री ने उस आदमी के प्रति आसक्त हो मुझे पर्वत पर से गिरा
दिया। मै अपने मैत्रीचित्त के कारण नही मरा। जिसने मुझे पर्वत से गिराया
था, वह कोई और नहीं थी, यही दुराचारिणी थी। जो दण्ड-प्राप्त लुञ्जा था,
वह भी कोई दूसरा न था, यही था।"
यह कह यह गाथाएँ कही—
अयमेव सा अहमपि सो अनञ्ञो,
अयमेव सो हत्थच्छिन्नो अनञ्ञो;
यमाहु कोमारपती ममन्ति,
वज्झित्थियो नत्थि इत्थीसु सच्चं ॥
इमञ्च जम्म मुसलेन हन्त्वा,
लूदं छव परदारूपसेविं;
इमिस्सा च न पापपतिव्वताय,
जीवन्तिया छिन्दथ कण्णनासं ॥
[ यही वह है। मैं भी वही हूँ। यह हाथ कटा भी वही है। दूसरा नही
है जिसे 'यह मेरा कोमारपति' कहती है। स्त्रियाँ वध्य करने योग्य हैं। उनमें
सत्य नहीं होता ।
' * २८४ [ २.५.१६३
इस नीच-लोभी, मृतसदृश, पराई स्त्री का सेवन करने वाले को मूसल से
मार डालो। और इस पापी पति-व्रता के जीते जी (इसके) कान नाक काट
डालो। ]
यमाहु कोमारपती ममं, जिसे यह मेरा कोमारपति, जिसे मैं कुल द्वारा
सौंपी गई, स्वामी कहती हूँ। अयमेव सो न अञ्ञो। यमाहु कुमारपति, यह
भी पाठ है। यही पुस्तको मे लिखा है। उसका भी यही अर्थ है। वचन-भेद
मात्र है। जो राजा ने कहा, वही यहाँ आ गया। वज्झित्थियो, स्त्रियाँ वध्य
होती है, वध करने के योग्य ही होती हैं। नत्थि इत्थीसु सच्चं, इनका स्वभाव
एक नही रहता। इमञ्च जम्मं, यह उन दोनो को दण्डाज्ञा देने के लिए कहा।
जम्मं नीच। मूसलेन हन्त्वा, मूसल से मारकर, पीटकर, हड्डियो को
तोडकर, चूर्ण विचूर्ण करके। लुद्दं कठोर। छवं निर्गुण होने से निर्जीव मृत-
सदृश। इमिस्सा च नं, इसमें नं निपातमात्र है। इसके पापपतिव्वताय
अनाचारिणी दुःशीला के जीवन्तियाव कण्णं नासं छिन्दथ।
बोधिसत्त्व ने क्रोध को न सम्भाल सकने के कारण उनको ऐसे दण्ड की
आज्ञा दे दी; लेकिन वैसा करवाया नही। क्रोध को कम करके उसने टोकरी
को उसके सिर पर ऐसे कसकर बँधवाया कि वह उतार न सके। फिर उस लुञ्जे
को उसमें फिंकवा उसे अपने राज्य से निकलवा दिया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न-चित्त भिक्षु
स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय छ भाई कोई स्थविर थे। भार्या चिञ्चामाणविका थी।
लुञ्जा देवदत्त था।, गोहराज आनन्द था। पदुमराज तो मैं ही था।
१९४. मणिचोर जातक
मणिचोर ] २८५
१९४. मणिचोर जातक
"न सन्ति देवा पयसन्ति नून..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार
करते समय वध का प्रयत्न करने वाले देवदत्त के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय शास्ता ने यह सुन कर कि देवदत्त मेरे वध के लिए प्रयत्न करता
है, 'भिक्षुओ, न केवल अभी, पहले भी देवदत्त ने मेरे वध का प्रयत्न किया ही
है, लेकिन सफल नहीं हुआ" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
वाराणसी के समीप के एक गामड़े में गृहपति कुल में पैदा हुए। उसके बड़े
होने पर उसके लिए वाराणसी से एक लड़की लाई गई। वह प्रिया थी, सुन्दर
थी, दर्शनीय थी देवाप्सराओं के समान वा पुष्पित लता के समान। वह मस्त
किन्नरी की तरह क्रीडा करने वाली थी। नाम था सुजाता। पतिव्रता थी;
सदाचारिणी थी और थी कर्त्तव्यपरायणा। पति की सेवा तथा सास ससुर की
सेवा वह नित्य करती थी। वह बोधिसत्त्व को प्रिय थी, मन के अनुकूल थी।
वे दोनो प्रसन्नतापूर्वक एक चित्त हो मेल से रहते थे।
एक दिन सुजाता ने बोधिसत्त्व से कहा—मैं मातापिता को देखना
चाहती हूँ। उसने कहा—भद्रे ! अच्छा पर्याप्त पाथेय तैयार करो।
खाद्य-पक्वान पक्वा, खाद्य आदि गाड़ी पर रखवा, गाड़ी को हाँकता हुआ
वह स्वयं आगे बैठा। वह पीछे बैठी। नगर के समीप पहुँच गाड़ी खोल नहा
कर उन्होने खाया। फिर बोधिसत्त्व ने गाड़ी जोती और स्वयं आगे बैठा।
२८६ [ २.५.१६४
सुजाता कपडे बदल अलङ्कृत हो पीछे बैठी। जिस समय गाड़ी ने नगर में
प्रवेश किया, उसी समय हाथी के कन्धे पर बैठ नगर की प्रदक्षिणा करता हुआ
वाराणसी नरेश उधर आ निकला। सुजाता उतर कर गाड़ी के पीछे पीछे
पैदल चल रही थी। राजा ने उसे देख, उसके सौन्दर्य पर ऐसे मुग्ध हो मानो
वह उसकी आँखें खींच ले रहा हो, एक अमात्य को भेजा कि पता लगाए कि
उसका स्वामी है वा नही ? उसने जाकर पता लगाया कि उसका स्वामी है
और आकर निवेदन किया—'देव ! यह विवाहिता है। गाड़ी में बैठा हुआ
आदमी उसका स्वामी है।"
राजा अपनी आसक्ति को हटाने में असमर्थ था। उसने कामातुर हो
सोचा, किसी उपाय से इस आदमी को मरवा कर स्त्री को लूंगा; और एक
आदमी को बुलाकर कहा—"अरे ! यह चूडामणि ले जाकर रास्ते चलते
हुए की तरह जाते हुए इसे इस आदमी की गाड़ी में फेंक कर आओ।" उसे
चूडामणि देकर भेजा। उसने "अच्छा" कह उसे ले जाकर गाड़ी में डाल आकर
कहा—'देव ! मैने डाल दी।" राजा ने कहा—मेरी चूडामणि खो गई।
लोगो ने शोर मचा दिया। राजा ने आज्ञा दी—"सब दरवाजो को बन्द कर,
रास्ते रोक कर चोर का पता लगाओ।" राजपुरुषो ने वैसा ही किया। नगर
एक सिरे से क्षुब्ध हो गया। एक जन आदमियो को लेकर बोधिसत्त्व के पास
जा बोला—"अरे ! गाडी रोको। राजा की चूडामणि खो गई है। गाड़ी की
तलाशी लेगे।" उसने गाड़ी की तलाशी लेते हुए अपनी रक्खी हुई मणि
उठा, बोधिसत्त्व को पकड, 'यह मणि-चोर है' कहते हुए हाथों और पाँवों से
पीट, उसके हाथो को पिछली तरफ बाँध उसे ले जाकर राजा के सामने पेश,
किया—यह मणि-चोर है। राजा ने आज्ञा दी—इसका सिर काट डालो।
राजपुरुष उसे चार चार बेतो से पीटते हुए नगर से बाहर ले गए।
सुजाता भी गाड़ी छोड़ दोनो हाथ उठा 'मेरे कारण स्वामी इस दुःख का
प्राप्त हुए' कह रोती पीटती उसके पीछे पीछे चली। राज पुरुषो ने बोधिसत्व
का सिर काटने के लिए उसे सीधे लिटाया। उसे देख सुजाता ने अपने सदा-
चार का ध्यान कर “मालूम होता है इस लोक में कोई ऐसा देवता नही है जो
पापी दुत्साहसियो को सदाचारियो पर अत्याचार करने से रोक सके" कह,
रोते पीटते पहली गाथा कही—
मणिचोर ] २८७
न सन्ति देवा पवसन्ति नून
नहूनून सन्ति इध लोकपाला
सहसा करोन्तान असञ्ञतान
नहूनून सन्ति पटिसेधितारो ॥
[ असयमी, दुस्साहसिक दुष्कर्म करने वालो को रोकने वाले न देवता हैं
(यदि हैं तो समय पर चले जाते हैं) न ही यहाँ लोकपाल हैं—उन्हें रोकने
वाला कोई नहीं । ]
न सन्ति देवा इस लोक में सदाचारियों की देख भाल करने वाले तथा
पापियो को रोकने वाले देवता नही है। पवसन्ति नून, अथवा इस प्रकार के
मौको पर वह निश्चय से प्रवास को चले जाते हैं। इध लोकपाला इस लोक
में लोकपाल कहलाने वाले श्रमण-ब्राह्मण भी सदाचारियो पर अनुग्रह करने
वाले नहू नून सन्ति। सहसा करोन्तान असञ्ञतान, सहसा बिना विचारे
दुस्साहस, कठोर-कर्म करने वाले दुराचारियो को। पटिसेधितारो इस प्रकार
का कर्म मत करो। ऐसा करना नही मिलेगा--इस प्रकार रोकने वाले नहीं।
इस प्रकार उस सदाचारिणी के रोने पीटने से देवेन्द्र शक्र का आसन
गर्म हुआ। शक्र ने सोचा कौन है जो मुझे मेरे आसन से गिराना चाहता है ?
पता लगाने से जब उसे यह कारण मालूम हुआ तो उसने सोचा—'वाराणसी
नरेश अत्यन्त निर्दयता का काम कर रहा है। सदाचारिणी सुजाता को कष्ट
दे रहा है। अब मुझ पहुँचना चाहिए।' उसने देवलोक से उतर अपने प्रताप
से हाथी की पीठ पर जाते हुए उस पापी राजा को उतार सीस काटने की जगह
पर सीधा लिटा, बोधिसत्त्व को उठा सब अलङ्कारो से अलङ्कृत कर राजवेष
पहना हाथी के कन्धे पर बिठाया। फरसा उठा कर खड़े सीस काटने वालो
ने राजा का सिर काट दिया। सीस कट जाने पर ही उन्हें पता लगा कि यह
राजा का सिर था।
देवेन्द्र शक्र ने दिखाई देने वाले शरीर से बोधिसत्त्व के पास जा बोधिसत्त्व
को राज्याभिषेक तथा सुजाता को अग्रमहिषीपद दिलवाया। अमात्य तथा
२८८ [ २.५.१९४
ब्राह्मण-गृहपति आदि देवेन्द्र शक्र को देखकर प्रसन्न हुए—अधार्मिक राजा
मारा गया। अब हमें शक्र का दिया हुआ धार्मिक राजा प्राप्त हुआ। शक्र
ने भी आकाश में खड़े हो कहा—"यह शक्र का बनाया हुआ राजा अब से
धर्मपूर्वक राज्य करेगा। यदि राजा अधार्मिक होता है तो वर्षा असमय
होती है, समय पर नहीं होती है, अकाल-भय, रोग-भय तथा शस्त्र-भय बना
ही रहता है।" इस प्रकार उपदेश देते हुए शक्र ने दूसरी गाथा कही—
अकाले वस्सति तस्स काले तस्स न वस्सति
सग्गा च चवतिट्ठना ननु सो तावता हतो ॥
[ उसके राज्य में असमय वर्षा होती है, समय पर नहीं होती। वह स्वर्ग-
स्थान से गिरता है। निश्चय से वह उतने से मारा गया।]
अकाले, अधार्मिक राजा के राज्य करने के समय—अनुचित समय पर
खेती के पकने के समय या कटाई तथा मर्दन करने के समय देव वस्सति।
काले, योग्य समय पर, बोने के समय, खेती छोटी रहने के समय वा दाना
पड़ने के समय न वस्सति। सग्गा च चवतिट्ठना, स्वर्ग-स्थान से अर्थात् देवलोक
से। अधार्मिक राज अप्रतिलाभ होने से देवलोक से च्युत होता है। यह भी
अर्थ है कि स्वर्ग में भी राज्य करता हुआ अधार्मिक राजा वहाँ से च्युत होता
है। ननु सो तावता हतो, निश्चय से वह अधार्मिक राजा इस से मारा जाता
है। अथवा "नु" यहाँ एकान्तवाची है, न केवल वह इतने से मारा गया,
बल्कि वह आठ महा नरकों में तथा सोलह उस्सद नरकों में चिरकाल तक
भाग जाएगा।
इस प्रकार शक्र जन-समूह को उपदेश दे अपने देवस्थान को ही चला गया।
बोधिसत्व ने भी धर्म से राज्य करते हुए स्वर्ग-मार्ग को भरा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
अधार्मिक राजा देवदत्त था। शक्र अनुरुद्ध था। सुजाता राहुल-माता थी।
शक्र का बनाया हुआ राजा तो मैं ही था।
१६५. पब्बतूपत्थर जातक
पब्बतूपत्थर ] २८६
१६५. पब्बतूपत्थर जातक
' "पब्बतूपत्थरे रम्मे. " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
कोशल राजा के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
कोशल राजा के एक अमात्य ने रनिवास को दूषित किया। राजा ने
खोज करके उसे ठीक ठीक जान शास्ता को निवेदन करने की इच्छा से जेतवन
जा, शास्ता को प्रणाम कर पूछा- भन्ते ! हमारे रनिवास को एक अमात्य
ने दूषित किया है। उसको क्या करना चाहिए ?" शास्ता ने पूछा-"महा-
राज ! वह अमात्य उपकारी है ? वह स्त्री प्रिया है ?"
"हाँ भन्ते ! बहुत उपकारी है। सारे राजकुल को सँभालता है। वह
स्त्री भी मेरी प्रिया है।
"महाराज ! अपने उपकारी सेवकों के प्रति तथा प्रिया स्त्री के प्रति
बुरा व्यवहार नही किया जा सकता। पूर्व समय में भी राजा लोग पण्डितो
की बात सुन उपेक्षावान् हो गए थे।"
उनके याचना करने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही-
ख. अतीत कथा
: पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
अमात्यकुल में पैदा हो बड होने पर उस राजा के अर्थधर्मानुशासक हुए।
उस राजा के एक अमात्य ने रनिवास दूषित किया। राजा ने उसका ठीक ठीक
पता लगा सोचा-अमात्य भी मेरा बहुत उपकारी है। वह स्त्री भी प्रिया
है। मैं इन दोनो को नष्ट नहीं कर सकता। पण्डित-अमात्य से प्रश्न पूछकर
१६
२६० [ २.५.१६५
यदि सहन करने योग्य होगा तो सहन कर लूंगा; नही सहन करने योग्य होगा
तो नही सहन करूँगा।" उसने बोधिसत्त्व को बुला, आसन दे पूछा—
"पण्डित ! प्रश्न पूछता हूँ।"
"महाराज ! पूछें, उत्तर दूँगा।"
राजा ने प्रश्न पूछते हुए यह पहली गाथा कही—
पब्बतूपत्थरे रम्मे जाता पोक्खरणी सिवा
तं सिगालो अपापासि जानं सीहेन रक्खितं ॥
[ पर्वत के रम्य दामन में सुन्दर पुष्करिणी रही। यह जानते हुए भी कि
इसे सिंह ने अपने लिए सुरक्षित रखा है, उसमें शृगाल ने पानी पिया। ]
पब्बतूपत्थरे हिमालय पर्वत के दामन में फैले हुए आँगन में जाता पोक्ख-
रणी सिवा, शीतल, मधुर जल वाली पुष्करिणी पैदा हुई। कमल से ढकी
हुई नदी भी पुष्करिणी ही। अपापासि, अप उपसर्ग है अपासि अर्थ है। जानं
सीहेन रक्खितं यह पुष्करिणी सिंह के परिभोग की है, सिंह के द्वारा रक्षित
है; उस शृगाल ने यह जानने हुए ही कि यह सिंह द्वारा रक्षित है जल पिया !
तू क्या समझता है ? शृगाल सिंह का भय न मान कर इस प्रकार की पुष्करिणी
से जल पिए ?
बोधिसत्त्व ने यह समझ कर कि निश्चय से इसके रनिवास को किसी
अमात्य ने दूषित किया होगा, दूसरी गाथा कही—
पिपन्ति वे महाराज ! सापदानि महानदिं
न तेन अनदी होति खमस्सु यदि ते पिया ॥
[ महाराज ! महानदी पर सभी प्राणी जल पीते हैं। उससे नदी अनदी
नही होती। यदि वह प्रिया है, तो क्षमा करें। ]
सापदानि न केवल गीदड ही किन्तु चीते, कुत्ते, खरगोश, बिल्ले, हिरन
आदि सभी प्राणी कमल से ढकी हुई होने के कारण पुष्करिणी कहलाने वाली
धासाहस्स ] २६१
नदी पर पानी पीते ही हैं। न तेन अनदी होति नदी पर दो पैरो वाले, चार
पैरो वाले, साँप-मत्स्य आदि सभी प्यासे पानी पीते हैं। उससे वह न अनदी
होती है, न जूठी। क्यों? सब के लिए साधारण होने से। जिस प्रकार नदी
जिस किसी के पानी पीने से दूषित नहीं होती, उसी प्रकार स्त्री भी कामुकता के
वशीभूत हो अपने पति के अतिरिक्त किसी दूसरे से सहवास करने से अनिस्त्री
नहीं होती। क्यों? सब के लिए साधारण होने से। न हि स्त्री जूठी होता
है। क्यों? जल-स्नान से शुद्ध हो सकने के कारण। खमस्सु यदि ते पिया, यदि
वह स्त्री तुझे प्रिया है तथा वह अमात्य बहुत उपकारी है; उन दोनों को क्षमा
कर। उपेक्षावान् हो।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने राजा को उपदेश दिया। राजा ने उसका उप-
देश मान 'फिर ऐसा पापकर्म न करना' कह दोनों को क्षमा किया। उसके
बाद से वह विरत रहे।
राजा भी दानादि पुण्य कर्म करते हुए मरने पर स्वर्ग सिधारे। कागल
नरेश भी यह धर्मदेशना सुन उन दोनों को क्षमा कर उपेक्षावान् हुआ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
राजा आनन्द था। पण्डित अमात्य तो मैं ही था।
१६६. वालाहस्स जातक
"ये न काहन्ति ओवाद..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय.एक उत्कण्ठित भिक्षु के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने उस भिक्षु से पूछा- "क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?" "सच-
मुच" कहने पर पूछा-किस कारण से उत्कण्ठित है ? उसने उत्तर दिया-
२६२
“एक अलङ्कृत स्त्री को देखकर कामुकता का भाव उत्पन्न हो जाने के कारण
शास्ता ने कहा—“भिक्षु ! स्त्रियां अपने रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श र
हासविलास से पुरुषो को आसक्त कर, जब उन्हें अपने वश में हुआ सम
हैं, तो उनका शील और धन नष्ट कर डालती हैं। इसीसे यह यक्षिणियां
लाती हैं। पहले भी यक्षिणियो ने स्त्रियो के हासविलास से एक काफले के
जा, व्यापारियो को आकृष्ट कर, अपने वशीभूत कर, फिर दूसरे आदमियो
देख पहले के सब आदमियो को मार डाला। और दोनो दाढो से रक्त बः
हुए, उन्हें मुरमुरे की तरह खा डाला।” इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म
कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वं काल में ताम्रपर्णी द्वीप में सिरीसवत्थु नाम का यक्षो का नगर थ
जहाँ यक्षिणियां रहती थी । जिन व्यापारियो की नौकाएँ टूट जाती, उ
आने पर वे सजसजा कर खाद्य भोज्य लिवा, दासियो से घिरी हुई तथा
में बच्चो को उठाए व्यापारियो के पास जाती । उन पर यह प्रगट करने
लिए कि वे मनुष्य-निवास से आए है, जहाँ तहाँ कृषि, गोरक्षा आदि क
हुए आदमी, गौएँ कुत्ते आदि दिखाती। व्यापारियो के पास जाकर कहती-
यह यवागू पीएँ । भोजन करें । खाद्य खाएँ। व्यापारी न जानने के का
उनका दिया खा लेते ।
उनके खा-पीकर विश्राम करने के समय उनसे कुशल क्षेम पूछती—“
कहाँ के रहने वाले हे ? कहाँ से आए हैं ? कहाँ जाएँगे ? यहाँ किस का
से आए ?” वे कहते कि नौका टूट जाने के कारण इधर आये। तब वे कहती-
“आर्यो ! अच्छा ! हमारे स्वामियो को भी नौका पर चढ कर गए
वर्ष हो गए। वे मर गए होगे। आप लोग भी व्यापारी ही है। हम आप
चरण-सेविकाएँ होकर रहेगी।”
इस प्रकार वे उन व्यापारियो को स्त्रियो के हासविलास से आसक्त
यक्ष-नगर ले जाती। यदि पहले से पकडे हुए आदमी (अभी जीवित) हो
तो उन्हें जादू की जंजीर से बाँध कारा-गृह में डाल देती। जब उन्हें अ
निवास-स्थान पर ऐसे आदमी जिनकी नौकाएँ टूट गई हो, न मिलते तो उ
यालाहस्स ] २६३
कल्याणि (नदी) और इधर नाग द्वीप—इन दोनो के बीच में समुद्र तट पर
घूमती। यही उनका स्वभाव था।
एक दिन पाँच सौ ऐसे व्यापारी जिनकी नौकाएँ टूट गई थी, उनके नगर
के पास उतरे। वे उनके पास गईं और उन्हें लुभा कर यक्ष-नगर ला पहले
जिन आदमियो को पकड़ा था, उन्हे जादू की ज़जीर में बांध कारा-गृह में
डाल दिया। ज्येष्ठ यक्षिणी ने ज्येष्ठ व्यापारी को शेष यक्षिणियो ने शेष
व्यापारियो को, इस प्रकार उन पाँच सौ यक्षिणियो ने पाँच सौ व्यापारियो को
अपना पति बनाया।
वह ज्येष्ठ यक्षिणी रात को जिस समय व्यापारी सोए रहते उठ कर जा
कारा-गृह मे आदमियो को मार उनका मास खाकर आती। बाकी भी उसी
तरह करती। ज्येष्ठ यक्षिणी जिस समय मनुष्य-मास खाकर लौटती उसका
शरीर ठंडा होता। ज्येष्ठ व्यापारी ने उसका स्पर्श किया तो उसे पता लगा
'कि यह यक्षिणी है। उसने सोचा यह पाँच सौ भी यक्षिणियां ही होगी। हमें
भागना चाहिए।
अगले दिन प्रात काल ही मुंह धोने जाकर उसने बाकी व्यापारियो को
कहा—"यह मानवी नही है। यह यक्षिणियां है। दूसरे नौका-टूटे व्यापारियो
के आने पर उन्हें स्वामी बना हमें खा डालेंगी। हम यहाँ से भागें।"
उनमें से ढाई सौ बोले—"हम इन्हे नही छोड़ सकते। तुम जाओ।
'हम नही भागगे।"
ज्येष्ठ व्यापारी अपनी बात मानने वाले ढाई सौ जनो को ले उनसे डर
कर भाग गया।
उस समय बोधिसत्त्व बादल-अश्व की योनि में पैदा हुए थे। सारा रग
श्वेत । सिर कौए जैस। बाल मूंज के से। ऋद्धिमान। आकाशचारी।
वह हिमालय से आकाश में चढ कर ताम्रपर्णी द्वीप जा वहाँ ताम्रपर्णी तालाव
के कीचड मे अपने से उगे हुए धान खाकर लौटता। इस प्रकार जाते हुए वह
दया से प्रेरित हो तीन बार मानुषी-वाणी बोलता—"कोई जनपद जाने वाला
है ? कोई जनपद जाते वाला है?"
उन्होने उसकी बात सुन, पास जा हाथ जोड कर कहा—"स्वामी ! हम
नपद जाएँग।'
४
२६४ [ २.५.१६६
"तो मेरी पीठ पर चढो।"
कुछ चढे। कुछ ने पूँछ पकड़ी। कुछ हाथ जोडे खडे ही रहे। बोधिसत्व
अपने प्रताप से सभी ढाई सौ व्यापारियो को, जो हाथ जोडे खडे थे उन तक को
जनपद ले गए। वहाँ उन्हे उन उनके स्थान पर पहुँचा स्वय अपने निवास-
स्थान को गए। वह यक्षिणियाँ भी औरो के आने पर उन ढाई सौ व्यापारियो
को जो पीछे रह गए थे मार कर खा गईं।
शास्ता ने भिक्षुओ को सम्बोधन कर कहा—"भिक्षुओ, जैसे उन यक्षि-
णियो के वशीभूत हुए व्यापारी विनाश को प्राप्त हुए। बादल अश्व-राज
का कहना मानने वाले अपने अपने स्थान पर पहुँच गए। इसी प्रकार बुद्धों
के उपदेश के अनुसार न चलने वाले भिक्षु, भिक्षुणियों तथा उपासक और
उपासिकाएँ भी चारों नरको तथा पाँच प्रकार के बन्धन, दण्ड आदि से महान्
दुःख को प्राप्त होते हैं। उपदेश मानने वाले तीन कुल-सम्पत्तियों,¹ छ काम-
स्वर्ग तथा बीस ब्रह्मलोको को प्राप्त हो, अमृत महानिर्वाण को साक्षात कर
महान् सुख का अनुभव करते हैं।" अभिसम्बुद्ध होने पर यह गाथाएँ कही—
ये न काहन्ति ओवाद नरा बुद्धेन देसित,
व्यसन ते गमिस्सन्ति रक्खसीहिव वाणिजा ॥१॥
ये च काहन्ति ओवाद नरा बुद्धेन देसित,
सोत्थि पारङ्गमिस्सन्ति वालाहेनेव वाणिजा ॥२॥
[ जो बुद्ध के उपदेश के अनुसार आचरण नही करते थे उसी तरह दुःख
को प्राप्त होते हैं जैसे राक्षसियो द्वारा व्यापारी। जो बुद्ध के उपदेश के अनुसार
चलते हैं वे उसी तरह सकुशल पार पहुँच जाते हैं जैसे बादल (के अश्व) की
सहायता से व्यापारी।]
ये न काहन्ति जो नहीं करेगे। व्यसन ते गमिस्सन्ति, वे महान् दुःख को
प्राप्त होगे। रक्खसीहीव वाणिजा राक्षसिंयो द्वारा लुभाए गए व्यापारियो
की तरह। सोत्थि पारङ्गमिस्सन्ति बिना किसी विघ्न के निर्वाण को प्राप्त
¹ ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक
मित्तामित्त ] २६५
धरेंगे। वालाहेनेय वाणिजा यादत के घोडे के 'श्रामो' कहने पर उसरा
कहना मानने वाले व्यापारियों की तरह। जैसे वह समुद्र पार जाकर अपने
अपने स्थान पर पहुँच गए; उसी प्रकार बुद्धो या उपदेश मानने वाले संसार
को पार कर निर्वाण को प्राप्त होते है। अमृत महानिर्वाण से धर्मदेशना को
समाप्त किया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक
का मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उत्कण्ठित-चित्त
भिक्षु स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। और भी बहुतो को स्रोतापत्ति,
सकृदागामी, अनागामी तथा अर्हत् फल प्राप्त हुआ।
उस समय बादल अश्व-राज था। कहना मानने वाले ढाई सौ व्यापारी
बुद्ध-परिषद थे। बादल अश्व-राज तो मैं ही था।
१६७. मित्तामित्त जातक
“न नं उम्हयते दिस्वा....” यह शास्ता ने श्रावस्ती में विहार करते
समय एक भिक्षु के बारे में कही—
क. वर्तमान कथा
एक भिक्षु ने यह समझ कि मेरे ले लेने पर मेरा उपाध्याय बुरा नही
मानेगा, विश्वास कर उसके रखे हुए एक वस्त्र-खण्ड को ले उससे जूता रखने
की थैली बना ली। पीछे उपाध्याय को कहा। उपाध्याय ने पूछा—"क्यो
लिया ?”
“मेरे लेने से आप क्रोधित नहीं होंगे; आपका ऐसा विश्वास करके।”
२६६ [ २.५.१६७
उपाध्याय ने क्रोध से उठकर पीटा—'तेरा मेरा विश्वास क्या है ?"
उसकी वह करनी भिक्षुओ में प्रकट हो गई। एक दिन भिक्षुओ ने धर्म-
सभा में बातचीत चलाई—"आयुष्मानो ! अमुक तरुण-भिक्षु ने उपाध्याय
का विश्वास कर वस्त्र-खण्ड ले उससे जूता रखने की थैली बनाई। उपाध्याय
ने 'तेरा मेरा क्या विश्वास हैं' कह क्रोध से उठकर पीटा।
शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?"
"अमुक बातचीत।"
"भिक्षुओ, यह भिक्षु न केवल अभी अपने शिष्य का अविश्वासी है, पहले
भी अविश्वासी ही था।"
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी देश मे ब्राह्मण-कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम
से प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर गण के नेता हो वह
हिमालय-प्रदेश मे रहने लगे।
उन ऋषियो के समूह में एक तपस्वी था, जो बोधिसत्त्व का कहना न
मान एक हाथी के बच्चे को जिसकी माँ मर गई थी, पालता था। बडे होने
पर वह उस तपस्वी को मार जगल में चला गया। उसका शरीर-कृत्य कर
ऋषियो ने बोधिसत्त्व को घेर कर पूछा—"भन्ते ! मित्र या अमित्र कैसे
पहचाना जा सकता है ?"
बोधिसत्त्व ने 'इस इस बात से' कहते हुए यह गाथा कही—
न नं उम्हयते दिस्वा न च नं पटिनन्दति
चक्खूनि चस्स न ददाति पटिलोमञ्च वत्तति ॥१॥
एते भवन्ति आकारा अमित्तस्मि पतिट्ठिता
येहि अमित्तं जानेय्य दिस्वा सुत्वा च पण्डितो ॥२॥
राध ] २६७
करता है; और उलटा बर्तता है। ये अमित्र के रगढग हैं, उन्हें देख सुनकर
पण्डित आदमी को अपने अमित्र को पहचानना चाहिए।]
न नं उम्हयते दिस्वा जो जिसका अमित्र होता है वह उसे देख कर न
मुस्कराता है, न हँसता है; प्रसन्नकार प्रदर्शित नही करता। न च नं पटि-
नन्दति उसकी बात सुनकर उसे आनन्द नहीं होता, 'अच्छा' कहा है, 'सुभाषित
हैं' (कह) अनुमोदन नहीं करता। चक्खूंनि चस्स न ददाति, आंख से आँख
मिलाकर सामने नही देखता, आंख दूसरी ओर ले जाता है। पटिलोमञ्च
वत्तति, उसका काय-कर्म अथवा वाणी का कर्म भी उसे अच्छा नहीं लगता;
विरोधी-भाव ही ग्रहण करता है। आकारा, बातें। येहि अमिरत्तं जिन बातो
से वे बातें। दिस्वा च सुत्वा च पण्डितो आदमी को चाहिए कि पहचान करे
कि यह मेरा अमित्र है। इससे विरुद्ध बातो से मित्र-भाव जानना चाहिए।
इस प्रकार बोधिसत्व मित्र तथा अमित्र के लक्षण कह ब्रह्मविहारो की
भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
हाथी को पालने वाला तपस्वी शिष्य था। हाथी उपाध्याय था। ऋषिगण
बुद्ध-परिषद थी। गण का नेता तो में ही था।
१६८. राध जातक¹
"पयासा आगतो तात...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक उत्कण्ठित चित्त भिक्षु के बारे मे कही।
¹ राधजातक (१४५)
क. वर्तमान कथा
२६८ [ २.४.१६८
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने पूछा-"भिक्षु, क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?"
"भन्ते ! सचमुच।"
"किस कारण से ?"
"एक अलङ्कृत स्त्री को देखकर कामुकता के कारण।"
"भिक्षु, स्त्री की जाति की संभाल नही की जा सकती। पूर्व समय में
द्वारपाल रखकर हिफाजत करने वाले भी हिफाजत नहीं कर सके। तुझे
स्त्री से क्या ? मिलने पर भी उसकी हिफ़ाज़त नही की जा सकती।" इतना
कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही-
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसो में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
तोते की योनि में पैदा हुए। उसका नाम था राध। उसके छोटे भाई का
नाम था पोट्ठपाद। उन दोनो को ही, जब वह छोटे ही थे एक चिड़ीमार ने
पकड़ कर वाराणसी के एक ब्राह्मण को दिया। ब्राह्मण ने उन्हें पुत्र की तरह
पाला। उसकी ब्राह्मणी दुश्चारिणी थी, उसकी हिफाजत नही 'की जा
सकती थी।
ब्राह्मण ने व्यापार करने के लिए जाते समय उन तोते-बच्चो को बुलाकर
कहा-"तात ! में व्यापार के लिए जाता हूँ। समय असमय तुम अपनी माता
की करनी पर नजर रखना। दूसरे आदमी का अन्दर आना जाना देखना।"
इस प्रकार वह उन तोते-बच्चों को ब्राह्मणी सौंप कर गया।
वह उसके बाहर जाने के समय से ही अनाचार करने लगी। रात को
भी, दिन को भी आने जाने वालो की सीमा न रही। उसे देख पोट्ठपाद ने राध
से कहा- "ब्राह्मण इस ब्राह्मणी को हम सौंप कर गया। यह पाप-कर्म
करती है। मैं इसे मना करूँ?" राध न कहा- "मत बोल।" वह उसका
कहना न मान बोला- "अम्ब ! तू पापकर्म किस लिए करती है ?"
उसने उसे मार डालने की इच्छा से कहा- "तात ! तू मेरा पुत्र है।
अब से न करूंगी। जरा, यहाँ आ।" इस प्रकार प्यार करती हुई की तरह
राय ] २६१
उसे बुझाकर, झाने पर पटक दिया। फिर 'तू मुझे उपदेश देता है। अपनी
हैसियत नहीं देखता ?' वह, गरदन मरोड मारकर चूल्हे में फेंक दिया।
ब्राह्मण ने लौट कर, विश्राम से बोधिसत्त्व से कहा—"तात राय ! तुम्हारी
माता भ्रष्टाचार करती थी या नहीं करती थी ?" पूछते हुए यह पहली गाथा
कही—
पवासा आगतो तात ! इदानि न चिरागतो,
कच्चिन्नु तात ! ते माता न अञ्ञमुपसेवति ॥
[ तात ! मैं अब प्रवास से लौट आया हूँ। मैं अभी आ रहा हूँ। तात !
क्या तेरी माता दूसरे पुरुष का सेवन करती थी ? ]
मैं तात पवासा आगतो, यह मैं अभी आया हूँ। न चिरागतो, इसीसे समा-
चार न जानने के कारण पूछता हूँ। कच्चिन्नु तात ते माता अञ्ञं पुरुष को
न उपसेवति ?
राय ने 'तात ! पण्डित सत्य या असत्य असत्यानाकार बात कभी नहीं
कहते' प्रकट करते हुए दूसरी गाथा कही—
न खो पनेतं सुभणं गिरं सच्चमसङ्कितं,
शयेय पोट्ठपादोव मुम्मुरे उपकूलितो ॥
[ यह सच्ची बात सुभाषित वाणी नहीं है; बिगरे कहने से पोट्ठपाद की
तरह गर्म राख में भुने । ]
• गिरं वचन। यथा को ही जैसे अब 'गिरा' कहते हैं वैसे ही तब 'गिरं'
कहते थे। तोला-बच्चा सिद्ध का ख्याल न कर ऐसा कहता हूँ। लेकिन इसका
अर्थ यह है—तात ! पण्डित लोग सच्ची, यथार्थ, तथ्य-युक्त स्वाभाविक बात
भी असत्याकार होने से न सुभणं। असत्याकार सच्ची बात कहने से सयेय
पोट्ठपादोव मुम्मुरे उपकूलितो जैसे पोट्ठपाद गरम राख में भुना हुआ सोता है;
उस प्रकार सोए। उपकूलितो पाठ का भी यही अर्थ है।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक
३०० [ २.५.१६६
इस प्रकार बोधिसत्त्व ब्राह्मण को धर्मोपदेश दे 'मैं भी यहाँ नहीं रह
सकता' कह जंगल को गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक
का मेल बैठाया।
सत्यों (का प्रकाशन) समाप्त होने पर उत्कण्ठित भिक्षु स्रोतापत्ति फल में
प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय पोट्ठपाद आनन्द था। राध तो मैं ही था।
१६६. गहपति जातक
"उभयम्मे न खमति...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
उत्कण्ठित-चित्त के ही बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
यह कथा कहते हुए शास्ता ने 'स्त्री जाति की हिफाजत नहीं की जा सकती।
पाप करके जिस किसी उपाय से स्वामी को ठगती ही हैं' कह पूर्व-जन्म की
कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ने काशी-राष्ट्र के गृहपति-कुल में जन्म ग्रहण कर बड़े होने पर विवाह किया।
उसकी भार्या दुराचारिणी थी; गाँव के मुखिया के साथ दुराचार करती।
बोधिसत्त्व जानकर परीक्षा करते हुए रहने लगे।
उस समय वर्षा काल में बीजों के बह जाने से अकाल हो गया था। खेती
गहपति ] ३०१
मे दाना पडा। सारे ग्रामवासियो ने मिलकर निश्चय किया कि अब से दो
महीने बाद खेत काटकर धान दे देंगे, और गाँव के मुखिया से एक बूढ़ा बैल
ले उसका मास खा गए।
एक दिन गाँव का मुखिया मौका देख, जिस समय बोधिसत्व बाहर गया
था घर में घुसा। उनके सुख से लेटने के समय ही बोधिसत्व ग्राम-द्वार से
प्रविष्ट हो घर की ओर हो लिया। ग्राम-द्वार की ओर देखते हुए उस स्त्री ने
सोचा, 'यह कौन है ?' फिर देहली पर खडे होकर देखने से जब उसे निश्चय
हुआ कि यह वही है, तो उसने मुखिया से कहा। गाँव का मुखिया डर के मारे
काँपने लगा।
उसने कहा—डर मत। एक उपाय है। हमने तेरा दिया गोमास खाया
है। तू मांस का मूल्य उगाहने वाले की तरह हो। मैं कोठे पर चढ काठ के
द्वार पर खडी हो कहती हूँ कि धान नहीं है। तू घर के बीच म खडा होकर
बार बार उलाहना दे—'हमारे घर मे बच्चे भूखे हैं। मेरे मांस का मूल्य दो।'
इतना कह वह कोठे पर चढ कोठे के दरवाजे पर बैठी। मुखिया घर में खडा
हो कहने लगा—मांस की कीमत दो। वह कोठे के दरवाजे पर बैठ कहती—
धान नहीं है। खेत कटने पर देंगे। जा।
बोधिसत्व ने घर में प्रवेश कर उनकी करतूत देख समझ लिया कि इस
पापिन ने यह ढग बनाया होगा। उसने गाँव के मुखिया को बुलाकर कहा—
"हे ग्राम-भोजक ! हमने तेरे बूढे बैल का मास खाते समय, 'अब से दो महीने
बाद धान देंगे' कहकर मास खाया था। अभी आधा महीना भी नहीं गुजरा।
तू अभी से क्यो धान लेना चाहता है ? लेकिन तू इस उद्देश्य से नही आया,
दूसरे ही उद्देश्य से आया होगा ? मुझे तेरी करतूत अच्छी नही लगती।
यह भी दुराचारिणी पापिन जानती है कि कोठे में धान नहीं है। वह अब कोठे
पर चढ कहती है—धान नही है। तू भी कहता है—दे। मुझे दोनो की
बात अच्छी नही लगती।"
इस भाव को प्रकट करते हुए बोधिसत्त्व ने यह गाथाएँ कही—
उभयम्मे न खमति उभयम्मे न रुच्चति,
या चाय कोट्ठमोतिण्णा न दस्स इति भासति ॥
३०२ [ २.५.१६६
तं तं गामपति ब्रूमि कदरै अप्पस्मि जीविते,
द्वे मासे कारुं कत्वान मंसं जरगवं किसं;
अप्पत्तकाले चोदेसि तम्पि मय्हं न रुचति ॥
[दोनो मुझे पसन्द नही; दोनो मुझे अच्छे नही लगते। यह जो कोठे
पर चढ़ कहती है—(धान) नही दिखाई देते। हे ग्रामपति ! मै यह कहता
हूँ कि जीवन इतना कठिन होने पर भी तू बूढे कृष बैल के मास (के मूल्य)
का दो महीने का करार करके समय के पूर्व ही उलाहना देता है। यह भी मुझे
अच्छा नही लगा ।]
तं तं गामपति ब्रूमि भो । ग्राम के मुखिया इस कारण से यह कहता हूँ।
कदरे अप्पस्मि जीविते, हमारा जीवन दुःखी है, जड है, रूक्षा है, न्यून है, अल्प
है, मन्द है, परिमित है। इस प्रकार के जीवन के होने पर द्वे मासे कारं कत्वान
मंसं जरग्गवं किसं हमारे मास लेते समय बूढा, कृष, दुर्बल बैल देते हुए तूने
दो महीने की अवधि बांधी थी कि दो महीने मे मूल्य देना। इस प्रकार करार
करके, अवधि बांध कर अप्पत्तकाले चोदेसि, उस समय के आने से पूर्व ही दोष
लगाता है। तम्पि मय्हं न रुचति यह जो पापिन दुराचारिणी, कोठे में धान
नही है जानती हुई अनजान की तरह कोट्ठमोतिण्णा कोठे के द्वार पर खड़ी
हो न दस्सं इति भासति। यह भी और यह जो तू असमय माँगता है तम्पि
यह दोनो न मुझे पसन्द है, न अच्छा लगता है।
इस प्रकार कहते कहते बोधिसत्व ने गाँव के मुखिया को केशो से पकड़,
खींच कर घर के बीच में गिराया। "'मैं गाँव का मुखिया हूँ' समझ दूसरो की
रखी, हिफाजत की हुई चीज के प्रति अपराध करता है ?" आदि बातो से
धपदाब्द कह, पीट कर, दुर्बल कर, गरदन से पकड़ घर से निकाल दिया।
उस दुष्ट स्त्री को भी बेणी से पकड़ कोठे से उतार, पीटते हुए डांटा—"यदि
फिर ऐसा करेगी, तो जानेगी ?"
उसके बाद से गाँव का मुखिया उस घर की ओर नजर भी नही उठा
सका। वह पापिन भी फिर मन से भी दुराचार नही कर सकी।