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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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' * २८४ [ २.५.१६३
इस नीच-लोभी, मृतसदृश, पराई स्त्री का सेवन करने वाले को मूसल से
मार डालो। और इस पापी पति-व्रता के जीते जी (इसके) कान नाक काट
डालो। ]
यमाहु कोमारपती ममं, जिसे यह मेरा कोमारपति, जिसे मैं कुल द्वारा
सौंपी गई, स्वामी कहती हूँ। अयमेव सो न अञ्ञो। यमाहु कुमारपति, यह
भी पाठ है। यही पुस्तको मे लिखा है। उसका भी यही अर्थ है। वचन-भेद
मात्र है। जो राजा ने कहा, वही यहाँ आ गया। वज्झित्थियो, स्त्रियाँ वध्य
होती है, वध करने के योग्य ही होती हैं। नत्थि इत्थीसु सच्चं, इनका स्वभाव
एक नही रहता। इमञ्च जम्मं, यह उन दोनो को दण्डाज्ञा देने के लिए कहा।
जम्मं नीच। मूसलेन हन्त्वा, मूसल से मारकर, पीटकर, हड्डियो को
तोडकर, चूर्ण विचूर्ण करके। लुद्दं कठोर। छवं निर्गुण होने से निर्जीव मृत-
सदृश। इमिस्सा च नं, इसमें नं निपातमात्र है। इसके पापपतिव्वताय
अनाचारिणी दुःशीला के जीवन्तियाव कण्णं नासं छिन्दथ।
बोधिसत्त्व ने क्रोध को न सम्भाल सकने के कारण उनको ऐसे दण्ड की
आज्ञा दे दी; लेकिन वैसा करवाया नही। क्रोध को कम करके उसने टोकरी
को उसके सिर पर ऐसे कसकर बँधवाया कि वह उतार न सके। फिर उस लुञ्जे
को उसमें फिंकवा उसे अपने राज्य से निकलवा दिया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न-चित्त भिक्षु
स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय छ भाई कोई स्थविर थे। भार्या चिञ्चामाणविका थी।
लुञ्जा देवदत्त था।, गोहराज आनन्द था। पदुमराज तो मैं ही था।