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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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३०२ [ २.५.१६६
तं तं गामपति ब्रूमि कदरै अप्पस्मि जीविते,
द्वे मासे कारुं कत्वान मंसं जरगवं किसं;
अप्पत्तकाले चोदेसि तम्पि मय्हं न रुचति ॥
[दोनो मुझे पसन्द नही; दोनो मुझे अच्छे नही लगते। यह जो कोठे
पर चढ़ कहती है—(धान) नही दिखाई देते। हे ग्रामपति ! मै यह कहता
हूँ कि जीवन इतना कठिन होने पर भी तू बूढे कृष बैल के मास (के मूल्य)
का दो महीने का करार करके समय के पूर्व ही उलाहना देता है। यह भी मुझे
अच्छा नही लगा ।]
तं तं गामपति ब्रूमि भो । ग्राम के मुखिया इस कारण से यह कहता हूँ।
कदरे अप्पस्मि जीविते, हमारा जीवन दुःखी है, जड है, रूक्षा है, न्यून है, अल्प
है, मन्द है, परिमित है। इस प्रकार के जीवन के होने पर द्वे मासे कारं कत्वान
मंसं जरग्गवं किसं हमारे मास लेते समय बूढा, कृष, दुर्बल बैल देते हुए तूने
दो महीने की अवधि बांधी थी कि दो महीने मे मूल्य देना। इस प्रकार करार
करके, अवधि बांध कर अप्पत्तकाले चोदेसि, उस समय के आने से पूर्व ही दोष
लगाता है। तम्पि मय्हं न रुचति यह जो पापिन दुराचारिणी, कोठे में धान
नही है जानती हुई अनजान की तरह कोट्ठमोतिण्णा कोठे के द्वार पर खड़ी
हो न दस्सं इति भासति। यह भी और यह जो तू असमय माँगता है तम्पि
यह दोनो न मुझे पसन्द है, न अच्छा लगता है।
इस प्रकार कहते कहते बोधिसत्व ने गाँव के मुखिया को केशो से पकड़,
खींच कर घर के बीच में गिराया। "'मैं गाँव का मुखिया हूँ' समझ दूसरो की
रखी, हिफाजत की हुई चीज के प्रति अपराध करता है ?" आदि बातो से
धपदाब्द कह, पीट कर, दुर्बल कर, गरदन से पकड़ घर से निकाल दिया।
उस दुष्ट स्त्री को भी बेणी से पकड़ कोठे से उतार, पीटते हुए डांटा—"यदि
फिर ऐसा करेगी, तो जानेगी ?"
उसके बाद से गाँव का मुखिया उस घर की ओर नजर भी नही उठा
सका। वह पापिन भी फिर मन से भी दुराचार नही कर सकी।