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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

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“एक अलङ्कृत स्त्री को देखकर कामुकता का भाव उत्पन्न हो जाने के कारण
शास्ता ने कहा—“भिक्षु ! स्त्रियां अपने रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श र
हासविलास से पुरुषो को आसक्त कर, जब उन्हें अपने वश में हुआ सम
हैं, तो उनका शील और धन नष्ट कर डालती हैं। इसीसे यह यक्षिणियां
लाती हैं। पहले भी यक्षिणियो ने स्त्रियो के हासविलास से एक काफले के
जा, व्यापारियो को आकृष्ट कर, अपने वशीभूत कर, फिर दूसरे आदमियो
देख पहले के सब आदमियो को मार डाला। और दोनो दाढो से रक्त बः
हुए, उन्हें मुरमुरे की तरह खा डाला।” इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म
कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वं काल में ताम्रपर्णी द्वीप में सिरीसवत्थु नाम का यक्षो का नगर थ
जहाँ यक्षिणियां रहती थी । जिन व्यापारियो की नौकाएँ टूट जाती, उ
आने पर वे सजसजा कर खाद्य भोज्य लिवा, दासियो से घिरी हुई तथा
में बच्चो को उठाए व्यापारियो के पास जाती । उन पर यह प्रगट करने
लिए कि वे मनुष्य-निवास से आए है, जहाँ तहाँ कृषि, गोरक्षा आदि क
हुए आदमी, गौएँ कुत्ते आदि दिखाती। व्यापारियो के पास जाकर कहती-
यह यवागू पीएँ । भोजन करें । खाद्य खाएँ। व्यापारी न जानने के का
उनका दिया खा लेते ।
उनके खा-पीकर विश्राम करने के समय उनसे कुशल क्षेम पूछती—“
कहाँ के रहने वाले हे ? कहाँ से आए हैं ? कहाँ जाएँगे ? यहाँ किस का
से आए ?” वे कहते कि नौका टूट जाने के कारण इधर आये। तब वे कहती-
“आर्यो ! अच्छा ! हमारे स्वामियो को भी नौका पर चढ कर गए
वर्ष हो गए। वे मर गए होगे। आप लोग भी व्यापारी ही है। हम आप
चरण-सेविकाएँ होकर रहेगी।”
इस प्रकार वे उन व्यापारियो को स्त्रियो के हासविलास से आसक्त
यक्ष-नगर ले जाती। यदि पहले से पकडे हुए आदमी (अभी जीवित) हो
तो उन्हें जादू की जंजीर से बाँध कारा-गृह में डाल देती। जब उन्हें अ
निवास-स्थान पर ऐसे आदमी जिनकी नौकाएँ टूट गई हो, न मिलते तो उ