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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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३०० [ २.५.१६६
इस प्रकार बोधिसत्त्व ब्राह्मण को धर्मोपदेश दे 'मैं भी यहाँ नहीं रह
सकता' कह जंगल को गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक
का मेल बैठाया।
सत्यों (का प्रकाशन) समाप्त होने पर उत्कण्ठित भिक्षु स्रोतापत्ति फल में
प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय पोट्ठपाद आनन्द था। राध तो मैं ही था।
१६६. गहपति जातक
"उभयम्मे न खमति...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
उत्कण्ठित-चित्त के ही बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
यह कथा कहते हुए शास्ता ने 'स्त्री जाति की हिफाजत नहीं की जा सकती।
पाप करके जिस किसी उपाय से स्वामी को ठगती ही हैं' कह पूर्व-जन्म की
कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ने काशी-राष्ट्र के गृहपति-कुल में जन्म ग्रहण कर बड़े होने पर विवाह किया।
उसकी भार्या दुराचारिणी थी; गाँव के मुखिया के साथ दुराचार करती।
बोधिसत्त्व जानकर परीक्षा करते हुए रहने लगे।
उस समय वर्षा काल में बीजों के बह जाने से अकाल हो गया था। खेती