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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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राध ] २६७
करता है; और उलटा बर्तता है। ये अमित्र के रगढग हैं, उन्हें देख सुनकर
पण्डित आदमी को अपने अमित्र को पहचानना चाहिए।]
न नं उम्हयते दिस्वा जो जिसका अमित्र होता है वह उसे देख कर न
मुस्कराता है, न हँसता है; प्रसन्नकार प्रदर्शित नही करता। न च नं पटि-
नन्दति उसकी बात सुनकर उसे आनन्द नहीं होता, 'अच्छा' कहा है, 'सुभाषित
हैं' (कह) अनुमोदन नहीं करता। चक्खूंनि चस्स न ददाति, आंख से आँख
मिलाकर सामने नही देखता, आंख दूसरी ओर ले जाता है। पटिलोमञ्च
वत्तति, उसका काय-कर्म अथवा वाणी का कर्म भी उसे अच्छा नहीं लगता;
विरोधी-भाव ही ग्रहण करता है। आकारा, बातें। येहि अमिरत्तं जिन बातो
से वे बातें। दिस्वा च सुत्वा च पण्डितो आदमी को चाहिए कि पहचान करे
कि यह मेरा अमित्र है। इससे विरुद्ध बातो से मित्र-भाव जानना चाहिए।
इस प्रकार बोधिसत्व मित्र तथा अमित्र के लक्षण कह ब्रह्मविहारो की
भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
हाथी को पालने वाला तपस्वी शिष्य था। हाथी उपाध्याय था। ऋषिगण
बुद्ध-परिषद थी। गण का नेता तो में ही था।
१६८. राध जातक¹
"पयासा आगतो तात...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक उत्कण्ठित चित्त भिक्षु के बारे मे कही।
¹ राधजातक (१४५)