Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७१

Page 226Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७१
न्यायकन्दली
चानेकद्रव्या चेति । एकं द्रव्यमाश्रयो यस्याः सा एकद्रव्या । अनेकं द्रव्यमाश्रयो यस्याः
सा अनेकद्रव्या । 'च'शब्दावेकद्रव्यानेकद्रव्ययोरन्योन्यसमुच्चयं प्रदर्शयन्तौ प्रकारान्तराभावं
कथयतः । तत्रैकद्रव्यानेकद्रव्ययोर्मध्य एकद्रव्यायाः सलिलादिपरमाणुरूपादीनामिव
नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो यथा सलिलपरमाणौ रूपरसस्पर्शा नित्यास्तथैकत्वसङ्ख्यापि । यथा
च कार्यसलिलस्य रूपादयोऽनित्या आश्रयविनाशाद्विनश्यन्ति कारणगुणप्रक्रमेण च
निष्पद्यन्ते, तथैकत्वसङ्ख्यापि ।
अनेकद्रव्या तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता । द्वित्वमादिर्यस्याः सा द्वित्वादिका,
परार्द्धोऽन्तो यस्याः सा परार्द्धान्ता । यस्मिन्नियत्ताव्यवहारः समाप्यते स परार्द्धः । एकद्रव्य-
वर्त्तिन्या एकत्वसङ्ख्यायाः सकाशाद् द्वित्वादेरनेकवृत्तित्वविशेषप्रतिपादनार्थः 'तु'शब्दः ।
निरूपण करते हैं । 'एकं द्रव्यमाश्रयो यस्याः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार एक द्रव्य
में ही रहने वाली संख्या को 'एकद्रव्या' कहते हैं । 'अनेकद्रव्यमाश्रयो यस्याः' इस
विग्रह के अनुसार अनेक द्रव्यों में ही रहनेवाली संख्या को 'अनेकद्रव्या' कहते
हैं । दोनों ही 'च' शब्द से एक द्रव्य और अनेक द्रव्य इन दोनों के समुच्चय का
बोध होता है एवं इन दोनों से तीसरी तरह की संख्या की सम्भावना का खण्डन
भी होता है । 'तत्र' अर्थात् एकद्रव्या और अनेकद्रव्या इन दोनों प्रकार की
संख्याओं में, एकद्रव्या संख्या का निर्णय (कार्यरूप) जलादि और परमाणुरूप
जलादि की तरह समझना चाहिए । अर्थात् जिस प्रकार जलादि के परमाणुओं के
रूप-रसादि नित्य हैं, वैसे ही उनमें रहनेवाली एकद्रव्या संख्या भी नित्य है । एवं
जिस प्रकार कार्यरूप जलादि के रूप-रसादि अनित्य हैं, (अर्थात्) आश्रय के नाश
से उनका नाश एवं कारणगुणक्रम से उत्पत्ति होती है, वैसे ही कार्यरूप जलादि में
रहनेवाली एकत्व (एकद्रव्या) संख्या भी (आश्रय के नाश से) विनष्ट होती है एवं
(कारणगुणक्रम से) उत्पन्न भी होती है ।
'अनेकद्रव्या तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता' (इस वाक्य में प्रयुक्त) 'द्वित्वादिका'
शब्द का अर्थ वह संख्या समूह है जिस समूह के पहले व्यक्ति का नाम द्वित्व है,
क्योंकि 'द्वित्वादिका' इस समस्त वाक्य का विग्रह वाक्य 'द्वित्वमादिर्यस्याः' इस
प्रकार का है । जिस संख्या (परम्परा) की समाप्ति परार्द्ध में हो वही
(संख्यासमूह) 'परार्द्धान्त' शब्द का अर्थ है; क्योंकि 'परार्द्धान्ता' इस समस्त वाक्य
का विग्रह वाक्य 'परार्द्धोऽन्तं यस्याः' इस प्रकार है । जहाँ संख्या के व्यवहार की
समाप्ति हो उसी संख्या को 'परार्द्ध' कहते हैं । एकत्व संख्या केवल एक ही द्रव्य
में रहती है, द्वित्वादि संख्यायें अनेक द्रव्यों में ही रहती हैं, अनेकद्रव्या संख्या में
एकद्रव्या संख्या से इसी अन्तर को समझाने के लिए प्रकृत वाक्य में 'तु' शब्द है ।

Page 227Permalink

२७२ न्यायाकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षा-
बुद्धिविनाशाद् विनाश इति। कथम् ? यदा बोद्धुश्चक्षुषा समानासमान-
जातीययोर्द्रव्ययोः सन्निकर्षे सति तत्संयुक्तसमवेतसमवेतैकत्वसामान्यज्ञानो-
त्पत्तावेकत्वसामान्यतत्सम्बन्धज्ञानेभ्य एकगुणयोरनेकविषयिण्येका
अनेक एकत्व की बुद्धि एवं अनेक एकत्व इन सबों से इसकी उत्पत्ति
होती है । (प्र.) कैसे ? (उ.) चक्षु के साथ सम्बद्ध उक्त दोनों द्रव्यों में
से प्रत्येक में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली 'एक' संख्या में समवाय
सम्बन्ध से रहनेवाली एकत्व जाति का ज्ञान होता है । इसके हो जाने
पर एकत्व सामान्य एवं इसके (दोनों 'एक' संख्यारूप गुणों के साथ)
सम्बन्ध एवं (इन संख्यारूप गुणों में) उस सामान्य का ज्ञान इन सबों से
दोनों 'एक' संख्याओं में अनेक (एकसंख्या) विषयक एक बुद्धि उत्पन्न होती
न्यायकन्दली
तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाद्धि
नाशः । खल्वित्यवधारणे, तस्या एकत्वेभ्यो निष्पत्तिरेव, न त्वेकैकगुणसमुच्चय-
मात्रत्वमित्यर्थः । एकत्वे चैकत्वानि चेति समासाश्रयणम्, अन्यथा द्वित्वोत्पत्तिकारणं न
कथितं स्यात् । अनेकविषयबुद्धिसहितेभ्य इति । अनेकशब्द एको न भवतीति व्युत्पत्त्या
द्वयोर्बहुषु च द्रष्टव्यः, अनेकेषु विषयेषु या बुद्धिरुत्तत्सहितेभ्य इति । एतदेव प्रश्नपूर्वकं
प्रतिपादयति कथमित्यादिना । यदा यस्मिन् काले बोद्धुरात्मनश्चक्षुषा समानजातीययोर्घटयो-
'तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाद्विनाशः'
(इस वाक्य में प्रयुक्त) 'खलु' शब्द का प्रयोग इस अवधारण के लिए हुआ है कि
अनेकद्रव्या संख्या अनेक एकत्व संख्याओं का समूहमात्र नहीं है; किन्तु अनेक
एकत्वों से उत्पन्न होनेवाली (एकत्व से भिन्न) अनेकद्रव्या संख्या (स्वतन्त्र) ही है ।
'एकत्वेभ्यः' इस पद की निष्पत्ति के लिए 'एकत्वे च एकत्वानि च' इसी समास
का अवलम्बन करना चाहिए, ऐसा न करने पर (एकत्वञ्च एकत्वञ्च एकत्वञ्च
एकत्वानि' ऐसा समास मानने पर) 'एकत्वेभ्यः' इस पद से द्वित्व के कारणीभूत
दो एकत्वों में द्वित्व की कारणता नहीं कही जायगी । 'अनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यः'
इस वाक्य में प्रयुक्त 'अनेक' शब्द से दो एवं उससे आगे की सभी संख्याओं का
बोध होता है; क्योंकि 'अनेक' शब्द की 'एको न भवति' इस प्रकार की व्युत्पत्ति
है । अनेक विषयों में जो (अनेक एकत्वों की) बुद्धि है, उससे (द्वित्वादि) अनेक-
द्रव्या संख्याओं की उत्पत्ति होती है । 'कथम्' इस पद के द्वारा प्रश्न कर इसी विषय
को समझाने का उपक्रम करते हैं । 'यदा' अर्थात् जिस समय 'बोद्धुः' अर्थात्

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७३

Page 228Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७३
न्यायकदली
रसमानजातीययोर्घटपटयोर्वा सन्निकर्षे संयोगे सति चक्षुःसंयुक्तयोर्द्रव्ययोः प्रत्येकं समवेतौ
यावेकगुणौ तयोः समवेतं यदेकत्वं सामान्यं तस्मिन् ज्ञानमुत्पद्यते । विशेषणज्ञानं विशेष्य-
ज्ञानस्य कारणम् । एकगुणयोश्च विशेष्ययोरेकत्वसामान्यं विशेषणम्, तेनादौ तत्रैव ज्ञानं
चिन्त्यते । न च प्रत्यासत्तिमन्तरेण चाक्षुषं ज्ञानं जायत इत्येकत्वसामान्यस्येन्द्रियेण
संयुक्तसमवेतसमवायलक्षणः सम्बन्धो दर्शितः । एवं ज्ञानोत्पत्तौ भूतायामेकत्वसामान्यात्
तस्यैकत्यस्यैकगुणाभ्यां सम्बन्धाज्ज्ञानाच्च एकगुणयोरनेकविषयिण्युभयैकगुणालम्बिन्येका
बुद्धिरुत्पद्यत इति, एकं चक्षुरिन्द्रियमन्तःकरणेन युगपदुभयोरधिष्ठानासम्भवादेकस्यैव सर्वदा
विषयग्राहकत्वे द्वितीयस्य कल्पनावैयर्थ्यात् । तस्योभाभ्यां गोलकाभ्यां रश्मयो निस्सरन्ति
विषयैश्च सह सम्बद्ध्यन्ते, प्रदीपस्येव गृहान्तर्गतस्य गवाक्षविवराभ्याम् । तत्रान्तःकरणं
साक्षाच्चक्षुरधितिष्ठति, न विषयसम्बन्धात्, बहिर्निर्गमनाभावात्, चक्षुरधिष्ठानादेव
आत्मा को आँखों से समान जाति के दो द्रव्यों में अर्थात् दो घटों में (अथवा)
असमानजातीय दो द्रव्यों अर्थात् घट और पट के 'सन्निकर्ष' अर्थात् संयोग होने
के बाद कथित समानजातीय एवं असमानजातीय दोनों प्रकार के दोनों द्रव्यों के
प्रत्येक में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली एकत्वसंख्यागत जातिरूप एकत्व (अर्थात्
एकत्वत्व) का ज्ञान होता है । विशेषण का ज्ञान विशेष्यज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) का
कारण है । संख्यारूप दोनों एकत्वों से अभिन्न विशेष्य का जातिरूप एकत्व
(एकत्वत्व) विशेषण है, अतः सबसे पहले उसी का विचार करते हैं । (विषयों के
साथ) चक्षु का सम्बन्ध रहे बिना चाक्षुष ज्ञान नहीं हो सकता, अतः सबसे पहले
जातिरूप एकत्व के साथ (चक्षु का) संयुक्तसमवेतसमवायरूप सम्बन्ध ही दिखलाया
गया है । इस प्रकार जातिरूप एकत्वविषयक ज्ञान की उत्पत्ति हो जाने पर उस
सामान्य का अपने आश्रयों के साथ सम्बन्ध एवं इस सम्बन्ध के ज्ञान, इन दोनों
से दोनों 'एक' नाम की संख्याओं में (अलग-अलग) 'एक' (संख्या) गुणविषयक
एकबुद्धि (अर्थात् 'अयमेकः', 'अयमेकः' इस आकार की बुद्धि) की उत्पत्ति होती
है । एक ही समय एक ही चक्षुरिन्द्रिय अन्तःकरण के द्वारा दो विषयों का
अधिष्ठान नहीं हो सकती । एवं अगर एक ही चक्षु से प्रत्यक्ष की उत्पत्ति मानें तो
दूसरे चक्षु की कल्पना ही व्यर्थ हो जायगी। अतः (यही जानना पड़ेगा कि) जिस
प्रकार गवाक्ष के छिद्रों से घर के भीतर के दीप की रश्मियाँ घटादि के साथ
सम्बद्ध होती हैं, उसी प्रकार चक्षु के दोनों गोलकों से रश्मियाँ निकल कर
विषयों के साथ सम्बद्ध होती हैं । अन्तःकरण का साक्षात् सम्बन्ध चक्षु
के साथ ही होता है, विषयों के साथ नहीं । क्योंकि वह किसी भी
प्रकार बाहर नहीं निकल सकता । (विषयों से सम्बद्ध) चक्षु स्वरूप

Page 229Permalink

२७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धिरुत्पद्यते तदा तामपेक्ष्यैकत्वाभ्यां स्वाश्रययोर्द्वित्वमारभ्यते । ततः
पुनस्तस्मिन् द्वित्वसामान्यज्ञानमुत्पद्यते । तस्माद् द्वित्वसामान्यज्ञानाद-
है (इसे ही अपेक्षाबुद्धि कहते हैं)। उस समय उसी बुद्धि की 'अपेक्षा' करके
उन दोनों एकत्व नाम के गुणों से उनके आश्रयरूप दोनों द्रव्यों में द्वित्व
संख्या की उत्पत्ति होती है । इसके बाद द्वित्व संख्या में द्वित्वसामान्य
(द्वित्वत्व) का ज्ञान उत्पन्न होता है । द्वित्वसामान्यविषयक इस ज्ञान से
न्यायकन्दली
च तस्य सम्बन्धा ज्ञानोत्पत्तिहेतवः । एवं च सति युगपदनेकेषु विषयेषु ज्ञानं
भवेत्येव, कारणसामर्थ्यात् । तच्च भवदेकमेव प्रभवति, आत्मान्तःकरण-
संयोगस्यैकस्यैकज्ञानोत्पत्तावेव सामर्थ्यात् । अत एव सविकल्पोत्पत्तिरपि,
युगपदभिव्यक्तेष्वनेकसङ्केतविषयेषु संस्कारेष्वस्मृतिहेतुष्वात्मान्तःकरणसंयोगस्य सामर्थ्या-
दिकस्यानेकविषयस्मरण स्योत्पादात् । यदि नामानेकगुणालम्बनैका बुद्धिरुपजाता
ततः किमेतायता ? तदैतां बुद्धिमपेक्ष्यैकत्वाभ्यामेकगुणाभ्यां स्वाश्रययोर्द्रव्ययो-
र्द्वित्वमारभ्यते । स्वाश्रययोः समवायिकारणत्वम्, एकगुणयोरसमवायिकारणत्वम्,
अनेकविषयाया बुद्धेर्निमित्तकारणत्वम् । यदैकगुणयोरेका बुद्धिरुत्पद्यते तदैकत्वाभ्यां
अधिष्ठान के साथ अन्तःकरण का सम्बन्ध ही ज्ञान का कारण है । ऐसी स्थिति
में अनेक विषयों का ज्ञान सुलभ होगा; क्योंकि अनुरूप कारणों का संवलन है ।
अनेक विषयों का यह एक ही ज्ञान हो सकता है; क्योंकि आत्मा और अन्तःकरण
के एक संयोग में एक ही ज्ञान को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है । इसी हेतु से
सविकल्पोत्पत्ति अर्थात् अनेक विषयों की स्मृति की उत्पत्ति भी सङ्गत होती है;
क्योंकि पहले का अनुभव जितने विषयों का होगा, उससे संस्कार भी उतने ही
विषयक उत्पन्न होंगे । इसके अनुसार अनेकविषयक या एकविषयक अनुभव से
जहाँ स्मृति में कारणीभूत अनेकविषयक संस्कार उत्पन्न होते हैं, एवं एक ही समय
उद्बुद्ध होते हैं, वहाँ अनेक विषयों की एक ही स्मृति उत्पन्न हो सकती है, चूँकि
आत्मा और अन्तःकरण के उक्त संयोग में उक्त प्रकार के स्मरण को भी उत्पन्न
करने का सामर्थ्य है । (प्र.) अनेकविषयक एक बुद्धि की यदि उत्पत्ति मान ली
गयी तो प्रकृत में इसका क्या उपयोग है ? (उ.) यही उपयोग है कि
अनेकविषयक एक बुद्धि की सहायता से दो संख्याविषयक एक बुद्धि
('अयमेकः,' 'अयमेकः' इस प्रकार की एक बुद्धि) उत्पन्न होती है । उक्त
रीति से ज्ञात इन्हीं दो एकत्वों से द्वित्व की उत्पत्ति होती है । दोनों एकत्वों के
आश्रयीभूत दोनों द्रव्य द्वित्व के समवायिकारण हैं । दोनों एकत्व संख्यायें असम-

Page 230Permalink

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २७५
न्यायकन्दली
द्वित्वमारभ्यत इत्येककालनिर्देशः क्षणद्वयात्मकलवाख्यकालाभिप्रायेण । क्षणाभिप्रायेण तु
कालभेद एव, कार्यकारणयोः पूर्वापरकालभावात् । ज्ञानार्थस्योत्पाद इति नालौकिक-
मिदम्, सुखादीनां तस्मादुत्पत्तिदर्शनात् । बाह्यार्थस्योत्पादो न दृष्ट इति न वैधर्म्यमात्रम्,
तदन्वयव्यतिरेकानुविधायित्वस्योभयत्राविशेषात्। उभयगुणालम्बनस्य द्वित्वाभिव्यञ्जकत्वे
सिद्धे सति ज्ञानस्य तदा नानन्तर्यनियमोपपत्तिरिति चेत्, न, अनियमप्रसङ्गात् । यदि हि
द्वित्वम्बुद्धिर्जं स्याद्रूपादिवत्पुरुषान्तरेणापि प्रतीयते, नियमहेतोरभावात् । बुद्धिजन्ये तु
यस्य बुद्ध्या यज्जन्यते तत् तेनैवोपलभ्यत इति नियमोपपत्तिः । प्रयोगस्तु द्वित्वं बुद्धिर्जं
नियमेनैकप्रतिपत्तृवेद्यत्वात्, यन्नियमेनैकप्रतिपत्तृवेद्यं तद् बुद्धिर्जं यथा सुखादिकम् । नियमे-
नैकप्रतिपत्तृवेद्यं च द्वित्वं तस्मादिदमपि बुद्धिर्जम् ।
वायिकारण हैं । दोनों एकत्व रूप अनेकविषयक एकबुद्धि (अपेक्षाबुद्धि) निमित्त-
कारण हैं । जिस समय दोनों एकत्व संख्याओं की एकबुद्धि (अपेक्षाबुद्धि) उत्पन्न
होती है, उसी समय दोनों एकत्व संख्याओं से द्वित्व की उत्पत्ति होती है । इसी
अभिप्राय से 'इत्येकः कालः' इस वाक्य से एक काल का निर्देश किया गया है ।
इस निर्देश वाक्य के 'एक काल' शब्द से दो क्षणात्मक 'लव'रूप काल अभिप्रेत है ।
क्षणात्मक काल के अनुसार वस्तुतः वे क्रियायें क्रमशः ही होती हैं; क्योंकि कारण
को पहले एवं कार्य को पीछे रहना आवश्यक है । ज्ञान से वस्तु की उत्पत्ति कोई
अलौकिक घटना नहीं है; क्योंकि ज्ञान से सुखादि की उत्पत्ति देखी जाती है ।
'ज्ञान से बाह्य वस्तु की सृष्टि नहीं होती है' यह कहना केवल बाह्य और आन्तर
दोनों वस्तुओं के भेद को ही प्रकट करता है; क्योंकि दोनों ही प्रकार की
अवस्थाओं के साथ ज्ञान का अन्वय और व्यतिरेक दोनों ही समान रूप से देखे
जाते हैं । (प्र.) (द्वित्व के) दोनों आश्रयों में रहनेवाले दोनों एकत्वों से द्वित्व की
उत्पत्ति हो ही जायेगी, फिर उसके लिए अपेक्षाबुद्धि को भी कारण मानने की क्या
आवश्कता है ? (उ.) द्वित्व को अगर बुद्धिजन्य न मानें तो साधारण्यरूप अनियम
की आपत्ति होगी; क्योंकि रूपादि साधारण विषयों की तरह सभी द्वित्व सभी
पुरुषों से गृहीत नहीं होते, किन्तु जिस पुरुष की अपेक्षाबुद्धि से जिस द्वित्व की
उत्पत्ति होती है; वह द्वित्व उसी पुरुष से गृहीत होता है और किसी पुरुष से
नहीं । इस प्रकार द्वित्व असाधारण है, साधारण नहीं । अतः अपेक्षाबुद्धि भी
द्वित्व का कारण है । (इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि)
नियमतः सुखादि की तरह जो कोई भी वस्तु नियमतः किसी एक ही पुरुष के
द्वारा गृहीत होती है, उसकी उत्पत्ति अवश्य ही बुद्धि से होती है । द्वित्व का ग्रहण
भी किसी एक ही पुरुष से होता है, अतः द्वित्व भी बुद्धि से उत्पन्न होता है ।

Page 231Permalink

२७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
एवं द्वित्वस्योत्पन्नस्य प्रतीतिकारणं निरूपयति—ततः पुनरिति । ततो द्वित्वोत्पा-
दादनन्तरं द्वित्वसामान्ये तस्मिन् ज्ञानमुत्पद्यते । अत्रापि संयुक्तसमवाय एव हेतुः ।
एकत्वसामान्यापेक्षया पुनरिति वाचोयुक्तिः । द्वित्वसामान्यं द्वित्वगुणस्य विशेषणम्, न
चागृहीते विशेषणे विशेष्ये बुद्धिरुदेति,, अतो विशेष्यविज्ञानकारणत्वेनादौ सामान्यज्ञानं
निरूपितम् । अस्य सद्भावेऽपि द्वित्वसामान्यविशिष्टा द्वित्वबुद्धिरेव प्रमाणम् । तस्याः
सद्भावेऽपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं प्रमाणम् । द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं विशेषणज्ञानपूर्वकं
विशिष्टज्ञानत्वाद् दण्डीति ज्ञानवदित्यनुमिते गुणज्ञाने तस्यापि विशिष्टज्ञानत्वेन विशेषण-
ज्ञानपूर्वकत्वमनुमेयम् ।
ये तु विशेषणविशेष्ययोरेकज्ञानालम्बनत्वमाहुः, तेषां सुरभिचन्दन-
इस प्रकार से उत्पन्न द्वित्व के कारणों का निरूपण 'ततः पुनः' इत्यादि ग्रन्थ से
करते हैं । 'ततः' अर्थात् द्वित्व की उत्पत्ति के बाद, 'तस्मिन्' अर्थात् संख्यारूप
द्वित्व में जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) का ज्ञान उत्पन्न होता है । जाति स्वरूप इस
द्वित्व के प्रत्यक्ष में संयुक्तसमवेतसमवाय सम्बन्ध ही कारण है । (द्वित्व के
आश्रयीभूत दोनों द्रव्यों में अलग-अलग) पहले एकत्व ही था, उसके बाद द्वित्व की
उत्पत्ति हुई-इस आनन्तर्य को समझाने के लिए ही 'पुनः' शब्द का प्रयोग है ।
जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) संख्यारूप द्वित्व का विशेषण है । विशेषण का ज्ञान
विशेष्य (विशिष्ट) ज्ञान का कारण है, अतः बिना विशेषण ज्ञान के विशेष्य
(विशिष्ट) ज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । इसीलिए सबसे पहले सामान्यरूप द्वित्व
के ज्ञान का ही निरूपण किया गया है । जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) विशिष्ट
संख्यारूप द्वित्व का ज्ञान सर्वजनीन है, इसी से प्रमाणित होता है कि जातिरूप
द्वित्व का भी अस्तित्व है । एवं 'द्वे द्रव्ये' इत्यादि आकार की विशिष्ट अनुभूतियों
से ही संख्यारूप द्वित्व की सत्ता प्रमाणित होती है । इस प्रसङ्ग में अनुमान का
प्रयोग इस प्रकार है कि जिस प्रकार 'दण्डी पुरुषः' यह विशिष्ट बुद्धि केवल
विशिष्ट बुद्धि होने के कारण ही दण्डरूप विशेषण की सत्ता के बिना नहीं हो
सकती, उसी प्रकार 'द्वे द्रव्ये' इस आकार की विशिष्ट बुद्धि भी केवल विशिष्ट
बुद्धि होने के कारण ही संख्यात्मक द्वित्वरूप विशेषण के अस्तित्व के बिना सम्भव
नहीं है । अतः द्वित्व संख्या की सत्ता अवश्य है । द्वित्व संख्या की इस प्रकार से
अनुमिति हो जाने पर 'इस अनुमिति की भी उत्पत्ति विशिष्ट बुद्धि होने के कारण
ही जातिरूप द्वित्व विशेषण के अस्तित्व के बिना सम्भव नहीं है, अतः जातिरूप
द्वित्व की भी सत्ता अवश्य है' इस प्रकार द्वित्व संख्या की अनुमिति के बाद
जातिरूप द्वित्व का भी उक्त रीति से अनुमान करना चाहिए ।
जो कोई विशेष्य और विशेषण दोनों को (नियमतः) एक ही ज्ञान का
विषय मानते हैं, उनके सामने 'सुरभिचन्दनम्' इस ज्ञान का प्रसङ्ग रखना चाहिए;

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७५

Page 232Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७५
न्यायकन्दली
द्वित्वमारभ्यत इत्येककालनिर्देशः क्षणद्वयात्मकलवाख्यकालाभिप्रायेण । क्षणाभिप्रायेण तु
कालभेद एव, कार्यकारणयोः पूर्वापरकालभावात् । ज्ञानादर्थस्योत्पाद इति नालौकिक-
मिदम्, सुखादीनां तस्मादुत्पत्तिदर्शनात् । बाह्यार्थस्योत्पादो न दृष्ट इति न वैधर्म्यमात्रम्,
तदन्वयव्यतिरेकानुविधायित्वस्योभयत्राविशेषात्। उभयगुणालम्बनस्य द्वित्वाभिव्यञ्जकत्वे
सिद्धे सति ज्ञानस्य तदा नानन्तर्य्यनियमोपपत्तिरिति चेत्, न, अनियमप्रसङ्गात् । यदि हि
द्वित्वमबुद्धिर्ज स्याद्रूपादिवत्पुरुषान्तरेणापि प्रतीयेत, नियमहेतोरभावात् । बुद्धिजन्ये तु
यस्य बुद्ध्या यज्जन्यते तत् तेनैवोपलभ्यत इति नियमोपपत्तिः । प्रयोगस्तु द्वित्वं बुद्धिर्जं
नियमेनेकप्रतिपत्तृवेद्यत्वात्, यन्नियमेनेकप्रतिपत्तृवेद्यं तद् बुद्धिर्जं यथा सुखादिकम् । नियमे-
नैकप्रतिपत्तृवेद्यं च द्वित्वं तस्मादिदमपि बुद्धिर्जम् ।
वायिकारण हैं । दोनों एकत्व रूप अनेकविषयक एकबुद्धि (अपेक्षाबुद्धि) निमित्त-
कारण हैं । जिस समय दोनों एकत्व संख्याओं की एकबुद्धि (अपेक्षाबुद्धि) उत्पन्न
होती हैं, उसी समय दोनों एकत्व संख्याओं से द्वित्व की उत्पत्ति होती है । इसी
अभिप्राय से 'इत्येकः कालः' इस वाक्य से एक काल का निर्देश किया गया है ।
इस निर्देश वाक्य के 'एक काल' शब्द से दो क्षणात्मक 'लव'रूप काल अभिप्रेत है ।
क्षणात्मक काल के अनुसार वस्तुतः वे क्रियायें क्रमशः ही होती हैं; क्योंकि कारण
को पहले एवं कार्य को पीछे रहना आवश्यक है । ज्ञान से वस्तु की उत्पत्ति कोई
अलौकिक घटना नहीं है; क्योंकि ज्ञान से सुखादि की उत्पत्ति देखी जाती है ।
'ज्ञान से बाह्य वस्तु की सृष्टि नहीं होती है' यह कहना केवल बाह्य और आन्तर
दोनों वस्तुओं के भेद को ही प्रकट करता है; क्योंकि दोनों ही प्रकार की
अवस्थाओं के साथ ज्ञान का अन्वय और व्यतिरेक दोनों ही समान रूप से देखे
जाते हैं । (प्र.) (द्वित्व के) दोनों आश्रयों में रहनेवाले दोनों एकत्वों से द्वित्व की
उत्पत्ति हो ही जायेगी, फिर उसके लिए अपेक्षाबुद्धि को भी कारण मानने की क्या
आवश्यकता है ? (उ.) द्वित्व को अगर बुद्धिजन्य न मानें तो साधारण्यरूप अनियम
की आपत्ति होगी; क्योंकि रूपादि साधारण विषयों की तरह सभी द्वित्व सभी
पुरुषों से गृहीत नहीं होते, किन्तु जिस पुरुष की अपेक्षाबुद्धि से जिस द्वित्व की
उत्पत्ति होती है; वह द्वित्व उसी पुरुष से गृहीत होता है और किसी पुरुष से
नहीं । इस प्रकार द्वित्व असाधारण है, साधारण नहीं । अतः अपेक्षाबुद्धि भी
द्वित्व का कारण है । (इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि)
नियमतः सुखादि की तरह जो कोई भी वस्तु नियमतः किसी एक ही पुरुष के
द्वारा गृहीत होती है, उसकी उत्पत्ति अवश्य ही बुद्धि से होती है । द्वित्व का ग्रहण
भी किसी एक ही पुरुष से होता है, अतः द्वित्व भी बुद्धि से उत्पन्न होता है ।

Page 233Permalink

२७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
एवं द्वित्वस्योत्पन्नस्य प्रतीतिकाणं निरूपयति-ततः पुनरिति । ततो द्वित्वोत्पा-
दादनन्तरं द्वित्वसामान्ये तस्मिन् ज्ञानमुत्पद्यते । अत्रापि संयुक्तसमवाय एव हेतुः ।
एकत्वसामान्यापेक्षया पुनरिति वाचोयुक्तिः । द्वित्वसामान्यं द्वित्वगुणस्य विशेषणम्, न
चागृहीते विशेषणे विशेष्ये बुद्धिरुदेति,, अतो विशेष्यविज्ञानकारणत्वेनादौ सामान्यज्ञानं
निरूपितम् । अस्य सद्भावेऽपि द्वित्वसामान्यविशिष्टा द्वित्वबुद्धिरेव प्रमाणम् । तस्याः
सद्भावेऽपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं प्रमाणम् । द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं विशेषणज्ञानपूर्वकं
विशिष्टज्ञानत्वाद् दण्डीति ज्ञानवदित्यनुमिते गुणज्ञाने तस्यापि विशिष्टज्ञानत्वेन विशेषण-
ज्ञानपूर्वकत्वमनुमेयम् ।
ये तु विशेषणविशेष्ययोरेकज्ञानालम्बनत्वमाहुः, तेषां सुरभिचन्दन-
इस प्रकार से उत्पन्न द्वित्व के कारणों का निरूपण 'ततः पुनः' इत्यादि ग्रन्थ से
करते हैं । 'ततः' अर्थात् द्वित्व की उत्पत्ति के बाद, 'तस्मिन्' अर्थात् संख्यारूप
द्वित्व में जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) का ज्ञान उत्पन्न होता है । जाति स्वरूप इस
द्वित्व के प्रत्यक्ष में संयुक्तसमवेतसमवाय सम्बन्ध ही कारण है । (द्वित्व के
आश्रयीभूत दोनों द्रव्यों में अलग-अलग) पहले एकत्व ही था, उसके बाद द्वित्व की
उत्पत्ति हुई-इस आनन्तर्य को समझाने के लिए ही 'पुनः' शब्द का प्रयोग है ।
जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) संख्यारूप द्वित्व का विशेषण है । विशेषण का ज्ञान
विशेष्य (विशिष्ट) ज्ञान का कारण है, अतः बिना विशेषण ज्ञान के विशेष्य
(विशिष्ट) ज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । इसीलिए सबसे पहले सामान्यरूप द्वित्व
के ज्ञान का ही निरूपण किया गया है । जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) विशिष्ट
संख्यारूप द्वित्व का ज्ञान सर्वजनीन है, इसी से प्रमाणित होता है कि जातिरूप
द्वित्व का भी अस्तित्व है । एवं 'द्वे द्रव्ये' इत्यादि आकार की विशिष्ट अनुभूतियों
से ही संख्यारूप द्वित्व की सत्ता प्रमाणित होती है । इस प्रसङ्ग में अनुमान का
प्रयोग इस प्रकार है कि जिस प्रकार 'दण्डी पुरुषः' यह विशिष्ट बुद्धि केवल
विशिष्ट बुद्धि होने के कारण ही दण्डरूप विशेषण की सत्ता के बिना नहीं हो
सकती, उसी प्रकार 'द्वे द्रव्ये' इस आकार की विशिष्ट बुद्धि भी केवल विशिष्ट
बुद्धि होने के कारण ही संख्यात्मक द्वित्वरूप विशेषण के अस्तित्व के बिना सम्भव
नहीं है । अतः द्वित्व संख्या की सत्ता अवश्य है । द्वित्व संख्या की इस प्रकार से
अनुमिति हो जाने पर 'इस अनुमिति की भी उत्पत्ति विशिष्ट बुद्धि होने के कारण
ही जातिरूप द्वित्व विशेषण के अस्तित्व के बिना सम्भव नहीं है, अतः जातिरूप
द्वित्व की भी सत्ता अवश्य है' इस प्रकार द्वित्व संख्या की अनुमिति के बाद
जातिरूप द्वित्व का भी उक्त रीति से अनुमान करना चाहिए ।
जो कोई विशेष्य और विशेषण दोनों को (नियमतः) एक ही ज्ञान का
विषय मानते हैं, उनके सामने 'सुरभिचन्दनम्' इस ज्ञान का प्रसङ्ग रखना चाहिए;

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७७

Page 234Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७७
न्यायकन्दली
मित्यत्र का वार्ता ? न हि चक्षुर्गन्धविषयं न च घ्राणं द्रव्यमादत्ते । अत एव न ताभ्यां
सम्बन्धग्रहणम्, उभयसम्बन्धिग्रहणाधीनत्वात् सम्बन्धग्रहणस्य । यथा संस्कारेन्द्रियजन्यं
प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षमुभयकारणसामर्थ्यात्पूर्वापरकालविषयम्, एवं चक्षुर्घाणाभ्यां सम्भूय
जन्यमानमिदं कारणद्वयसामर्थ्यादुभयविषयं स्यादित्येके समर्थयन्ति ।
तदपि न साधीयः, निर्भागत्वात् । यदि ज्ञानं सभागं स्यात्तदा कश्चिदस्यांशो घ्राणेन
जन्येत कश्चिच्चक्षुषेत्युपपद्यते व्यवस्था; किन्त्विदमेकमखण्डमुभाभ्यां जनितं यदि गन्धं द्रव्यं
च गृह्णाति, तदा गन्धोऽपि चाक्षुषो द्रव्यमपि घ्राणगम्यं प्रसक्तम्, तज्जनितज्ञानविषयत्व-
लक्षणत्वात्तत्तदिन्द्रियग्राह्यतायाः । न चाणुत्वान्मनसो युगपदुभयेन्द्रियाधिष्ठानसम्भवः । तस्माद्
घ्राणेन गन्धे गृहीते पश्चात्तद्ग्रहणसहकारिणा चक्षुषा केवलविशेष्यालम्बनमेवेदं विशेष्यज्ञानं
जन्यत इत्यकामेनाप्यभ्युपगन्तव्यम् । तथा च सत्यन्येषामपि विशेष्यज्ञानानामयं न्याय
क्योंकि गन्ध का ग्रहण आँखों से नहीं होता एवं घ्राण में द्रव्य को ग्रहण करने की
शक्ति नहीं है । अतएव सौरभ और चन्दन इन दोनों का ग्रहण भी इन दोनों
इन्द्रियों से नहीं हो सकता, क्योंकि सम्बन्ध के प्रत्यक्ष के लिए उनके दोनों आश्रयों
का प्रत्यक्ष आवश्यक है । कोई कहते हैं कि 'सुरभिचन्दनम्' यह एक ही ज्ञान चक्षु
और घ्राण दोनों इन्द्रियों से होता है । इसका समर्थन इस प्रकार करते हैं कि जिस
प्रकार (योऽहं घटमद्राक्षं सोऽहमिदानीं स्मरामि) इत्यादि आकार की प्रत्यभिज्ञारूप
प्रत्यक्ष इन्द्रिय से उत्पन्न होने के कारण वर्तमानकालविषयक होता है, एवं संस्कार
से उत्पन्न होने के कारण भूतकालविषयक भी होता है, इस प्रकार 'सुरभिचन्दनम्'
यह ज्ञान अलग-अलग सामर्थ्य वाली चक्षु और घ्राण इन दोनों इन्द्रियों से उत्पन्न
होने के कारण द्रव्य एवं सौरभ दोनों विषयों का हो सकता है ।
किन्तु इस प्रकार का समर्थन संगत नहीं है; क्योंकि ज्ञान अखण्ड है, उसके
अंश नहीं होते । यदि ज्ञान अंशों से युक्त होता तो यह कह सकते थे कि उसका
एक अंश आँखों से उत्पन्न होता है तो दूसरा घ्राण से । अतः ज्ञान अगर अखण्ड
है और उसकी उत्पत्ति दो इन्द्रियों से होती है एवं सौरभ और द्रव्य दोनों उसके
विषय हैं, तो फिर यह मानना ही पड़ेगा कि गन्ध का ग्रहण भी आँख से होता है,
एवं घ्राण से द्रव्य भी गृहीत होता है; क्योंकि जिस इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न
ज्ञान से जिसका प्रतिभास होता है, वही उस इन्द्रिय का ग्राह्य विषय है ।
दूसरी बात यह है कि मन अणु है, अतः एक ही समय वह दो इन्द्रियों का
अधिष्ठान नहीं हो सकता, अतः इच्छा न रहते हुए भी प्रकृत में आपको यही
मानना पड़ेगा कि घ्राण के द्वारा केवल गन्ध का ग्रहण हो जाने के बाद उसके
सहकारी चक्षु के द्वारा केवल विशेष्यविषयक (चन्दनविषयक) ज्ञान उत्पन्न
होता है । इस प्रकार यही रीति अन्य विशेष्य ज्ञानों के लिए भी प्रयुक्त होती

Page 235Permalink

२७८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
उपतिष्ठते । विवादाध्यासितं विशेष्यज्ञानम्, केवलविशेष्यालम्बनम्, प्रत्यक्षत्वे सति विशेष्य-
ज्ञानत्वात्, सुरभिचन्दनमिति ज्ञानवत् । प्रत्यक्षत्वे सतीति लैङ्गिकज्ञानव्यवच्छेदार्थम् । ननु
यदि द्रव्यस्वरूपमात्रमेव विशेष्यज्ञानस्यालम्बनम्, असत्यपि विशेषणे तथा प्रत्ययः स्यात् ।
अथ विशेषणस्य जनकत्वान्न तदभावे विशेष्यज्ञानोदयः, तथापि द्रव्यरूपप्रत्ययादस्य न
विशेषः, विषयविशेषमन्तरेण ज्ञानस्य विशेषान्तराभावात्, न, अनभ्युपगमात् । न
विशेष्यज्ञानस्य द्रव्यस्वरूपमात्रमालम्बनं ब्रूमः, किन्तु विशिष्टम् । विशिष्टता च
स्वरूपातिरेकिण्येव, या दण्डीति ज्ञाने प्रतिभासते । न खलु तत्र पुरुषमात्रस्य प्रतीतिर्नापि
दण्डसंयोगितामात्रस्य । तथा च दण्डीति प्रतीतावितरविलक्षण एव पुरुषः संवेद्यते
वैलक्षण्यं चास्य दण्डोपसर्जनत्वमेव । अत एव विशेषणं व्यवच्छेदकमिति गीयते । दण्डो
हि स्वोपसर्जनताप्रतिपत्तिं पुरुषे कुर्वन् पुरुषमितरस्माद् व्यवच्छिनत्ति । अयमेव
है। इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार 'सुरभिचन्दनम्' यह ज्ञान
प्रत्यक्षात्मक होने पर भी केवल विशेष्यविषयक ज्ञान है, उसी प्रकार प्रकृत में
विवाद का विषय 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान भी केवल विशेष्यविषयक ही है; क्योंकि वह
भी प्रत्यक्षात्मक होने पर भी विशेष्य ज्ञान है । प्रकृत अनुमान वाक्य के प्रयोग के
हेतु वाक्य में 'प्रत्यक्षत्वे सति' यह विशेषण अनुमिति में व्यभिचार वारण के लिए
है । (प्र.) यदि 'द्वे द्रव्ये' इस विशेष्य (विशिष्ट) ज्ञान का विषय केवल द्रव्य ही हो
तो फिर विशेषण के न रहने पर भी उक्त प्रकार की प्रतीति होनी चाहिए । यदि
यह कहें कि विशेषण विशेष्यज्ञान का कारण है, अतः विशेषण के न रहने पर
विशिष्टज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती है, तथापि केवल 'द्रव्यम्' इस आकार के ज्ञान
में और उक्त विशिष्टज्ञान में कोई अन्तर नहीं रहेगा; क्योंकि कारणों की विभिन्नता
रहते हुए भी दोनों ज्ञानों के विषयों में कोई अन्तर नहीं है । विषयों के भेद से ही
ज्ञानों में भेद होता है, कारणों के भेद से नहीं । (उ.) हम यह नहीं मानते कि 'द्वे
द्रव्ये' इस ज्ञान में केवल द्रव्य ही विषय है; किन्तु 'विशेष्य' (विशिष्ट) को उक्त
ज्ञान का विषय मानते हैं । 'दण्डी' इस प्रकार की विशिष्ट प्रतीति में भासित होने
वाली विशिष्टता विशेष्य (विशिष्ट) के स्वरूप से कोई भिन्न वस्तु नहीं है । 'दण्डी'
इस प्रतीति से दण्ड से रहित पुरुषों से विलक्षण पुरुष का ही बोध होता है । और
पुरुषों से इस पुरुष में यही वैलक्षण्य है कि यह दण्डरूप विशेषण का विशेष्य है,
और कुछ भी अन्तर नहीं है । अतएव विशेषण को व्यवच्छेदक (भेदक)
कहा जाता है । पुरुष में अपनी (दण्ड की) विशेष्यता की प्रतीति एवं इस पुरुष
को और पुरुषों से भिन्न समझना ये ही दो काम यहाँ दण्डरूप विशेषण
के हैं । विशेषण और उपलक्षण इन दोनों में यही अन्तर है कि उपलक्षण

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २७९

Page 236Permalink

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २७९
प्रशस्तपादभाष्यम्
पेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता, द्वित्वसामान्यतत्सम्बन्धतज्ज्ञानेभ्यो द्वित्वगुणबुद्धेरुत्पद्यमा-
नेतेत्येकः कालः । तत इदानीमपेक्षाबुद्धिविनाशाद् द्वित्वगुणस्य
अपेक्षाबुद्धि के विनाश की सम्भावना उत्पन्न होती है । द्वित्व
संख्यारूप गुण का द्वित्वसामान्य के साथ सम्बन्ध और
द्वित्व गुण में द्वित्वसामान्य का ज्ञान इन सबों से गुणरूप द्वित्व-
विषयक बुद्धि की उत्पत्ति की सम्भावना, इतने काम एक काल में होते
हैं । इसके बाद उसी समय अपेक्षाबुद्धि के विनाश से गुणरूप द्वित्व
न्यायकन्दली
चास्योपलक्षणाद्विशेषः । उपलक्षणमपि व्यवच्छिनत्ति, न तु स्वोपसर्जनताप्रतीतिहेतुः । न
हि यथा दण्डीति दण्डोपसर्जनता पुरुषे प्रतीयते तथा जटाभिस्तापस इति तापसे जटोप-
सर्जनता, दण्डोपसर्जनतापुरुषस्य प्राधान्यं चार्थक्रियायामुपभोगातिशयाऽनतिशायापेक्षया ।
नन्वेवं तर्ह्यापेक्षिकोऽयं विशेषणविशेष्यभावो न वास्तवः, किं न दृष्टो भवद्भिः कर्तृ-
करणादिव्यवहार आपेक्षिको वास्तवश्चेति कृतं विस्तरेण संग्रहटीकायाम् ।
द्वित्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता । उभयगुणालम्बना बुद्धिरपेक्षा-
बुद्धिरित्युच्यते । तस्या द्वित्वसामान्यज्ञानाद्विनश्यत्ता विनाशकारणसान्निध्यं
द्वित्वसामान्यात् । तस्य द्वित्वगुणेन सह सम्बन्धाज्ज्ञानाच्च द्वित्वगुणबुद्धे-
अपने आश्रय को दूसरों से भिन्न रूप में समझाता तो है; किन्तु उसमें अपनी
उपसर्जनता की प्रतीति को उत्पन्न नहीं करता; क्योंकि 'दण्डी' इस प्रतीति से जिस
प्रकार पुरुष में दण्डरूप विशेषण की उपसर्जनता प्रतीत होती है, उसी प्रकार
'जटाभिस्तापसः' इस प्रकार के स्थलों में जटादि से युक्त तापसादि का जटा से
शून्य तापसादि से विलक्षण रूप में भान यद्यपि होता है, फिर भी जटादि
उपलक्षणों की उपसर्जनता की प्रतीति तापसादि में नहीं होती । दण्ड से युक्त
(दण्डी) पुरुष में दण्ड से रहित पुरुष की अपेक्षा विशेष प्रकार का उपभोग
मिलता है, इसी दृष्टि से दण्डी पुरुष में प्रधानता और दण्ड में उपसर्जनता है ।
(प्र.) तो फिर यह कहिये कि विशेष्यविशेषणभाव आपेक्षिक है, वास्तविक नहीं ?
(उ.) क्या आप लोगों ने कर्तृत्वकरणत्वादि के आपेक्षिक, वास्तविक दोनों
प्रकार के व्यवहार नहीं देखे हैं ? टीकादि रूप संग्रह ग्रन्थों में इससे अधिक
लिखना व्यर्थ है ।
(द्वित्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता) गुणस्वरूप दो एकत्वों को विषय करनेवाले
एक ज्ञान को 'अपेक्षाबुद्धि' कहते हैं । जातिस्वरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) के ज्ञान से उसकी
(अपेक्षाबुद्धि की) 'विनश्यत्ता' अर्थात् उसको विनष्ट करनेवाले कारणों की समीपता
संघटित होती है (फलतः विनाश को उत्पन्न करनेवाली सामग्री का संवलन होता है) ।

Page 237Permalink

२८० न्यायकन्दलीसंविलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विनश्यत्ता, द्वित्वगुणज्ञानम्, द्वित्वसामान्यज्ञानस्य विनाशकारणम्, द्वित्व-
गुणतज्ज्ञानसम्बन्धेभ्यो द्वे द्रव्ये इति द्रव्यबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः ।
के विनाश की सामग्री का संवलन, गुणरूप द्वित्व का ज्ञान, सामान्यरूप
द्वित्वविषयक ज्ञान के विनाशक गुणरूप द्वित्व का ज्ञान, गुणरूप द्वित्व और
उसका ज्ञान एवं गुणरूप द्वित्व का (अपने आश्रय द्रव्य के साथ) सम्बन्ध
इन तीनों से 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के द्रव्यविषयक ज्ञान की सामग्री का
न्यायकन्दली
रुत्पद्यमानता उत्पत्तिकारणसान्निध्यम् । द्वित्वसामान्यज्ञानमपेक्षाबुद्धेर्विनाशकं गुणबुद्धेर्भो-
त्पादकम् । तेन तदुत्पत्तिरेवैकस्य विनश्यत्तापरस्य चोत्पद्यमानतेत्युपपद्यते विनश्यत्तोत्पद्य-
मानतयोरेककालत्वम् । तत इदानीमपेक्षाबुद्धिविनाशो द्वित्वविनाशस्य कारणम्, तत्सद्भावे
तस्यानुपलम्भात् । अतोऽपेक्षाबुद्धिविनाशो द्वित्वस्य विनश्यत्ता । दृष्टो गुणानां निमित्त-
कारणादपि विनाशो यथा मोक्षप्राप्त्यवस्थायामन्त्यतत्त्वज्ञानस्य शरीरविनाशात् ।
द्वित्वगुणज्ञानं द्वित्वसामान्यज्ञानस्य विनाशकारणं बुद्धेर्बुद्ध्यन्तर-
विरोधात् । तथा द्रव्यज्ञानस्यापि कारणम् । अतो गुणबुद्ध्युत्पाद
एवैकस्योत्पद्यमानताऽपरस्य विनश्यत्ता स्यात् । द्वित्वगुणज्ञानसम्बन्धेभ्य इति ।
जातिरूप द्वित्व का गुणस्वरूप द्वित्व के साथ सम्बन्ध एवं इस सम्बन्ध का ज्ञान इन
दोनों से गुणस्वरूप द्वित्व की 'उत्पद्यमानता' अर्थात् द्वित्व संख्या को उत्पन्न करने
वाले कारणसमूह परस्पर समीप हो जाते हैं (द्वित्वोत्पत्ति की सामग्री एकत्र हो
जाती है) । जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) का ज्ञान अपेक्षाबुद्धि का नाशक एवं
गुणस्वरूप द्वित्व (संख्या) विषयक बुद्धि का उत्पादक भी है, अतः जातिरूप द्वित्व-
विषयक बुद्धि की उत्पत्ति एक (अपेक्षाबुद्धि) की 'विनश्यत्ता' एवं दूसरे
(गुणस्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि) की उत्पद्यमानता दोनों ही है । सुतराम् उक्त
विनश्यत्ता एवं उक्त उत्पद्यमानता दोनों का एक ही समय रहना युक्ति से सिद्ध है
(असङ्गत नहीं) । उसके बाद के क्षण में अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है, यही (नाश)
द्वित्व के नाश का कारण है; क्योंकि अपेक्षाबुद्धि के विनाश के बाद द्वित्व की
उपलब्धि नहीं होती है, अतः अपेक्षाबुद्धि का विनाश ही द्वित्वबुद्धि की
'विनश्यत्ता' है । जिस प्रकार मोक्षप्राप्ति की अवस्था में शरीररूप निमित्तकारण के
विनाश से अन्तिम तत्त्वज्ञानरूप गुण का विनाश होता है, उसी प्रकार (यह मानना
पड़ेगा कि) निमित्तकारण के विनाश से भी अन्य गुणों का विनाश होता है ।
गुणस्वरूप द्वित्व का ज्ञान जातिरूप द्वित्वविषयक ज्ञान का विनाशक है,
क्योंकि एक बुद्धि दूसरी बुद्धि की विनाशिका है । एवं (गुणस्वरूप द्वित्वविषयक यह

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८१

Page 238Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८१
प्रशस्तपादभाष्यम्
तदनन्तरं द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्योत्पादो द्वित्वस्य विनाशो द्वित्व-
गुणबुद्धेर्विंनश्यत्ता द्रव्यज्ञानात् संस्कारस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः ।
तदनन्तरं द्रव्यज्ञानाद् द्वित्वगुणबुद्धेर्विनाशो द्रव्यबुद्धेरपि संस्कारात् ।
संवलन, द्रव्यज्ञान से उसी विषयक संस्कार की उत्पादक सामग्री का
संवलन-इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद उक्त द्रव्य-
विषयक ज्ञान से गुणरूप द्वित्वविषयक बुद्धि का विनाश और उस
द्रव्यविषयक बुद्धि का भी संस्कार से विनाश हो जाता है ।
न्यायकन्दली
द्वित्वगुणश्च तस्य ज्ञानं च सम्बन्धश्चेति योजना । तदनन्तरं द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्योत्पादो
द्वित्वस्य विनाशो गुणबुद्धेर्विनाशश्चेत्येकः कालः । यद्यपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानोत्पत्तिकाले
द्वित्वं नास्ति, तथापि तदस्य कारणम्, कार्योत्पत्तिकाले कारणस्थितेरनुपयोगात् । कार्योत्पत्त्य-
नुगुणव्यापारजनकत्वं हि कारणस्य कारणत्वम् । स चेदनेन कृतः, किमस्य कार्योत्पत्ति-
काले स्थित्या ? व्यापारादेव कार्योत्पत्तिसिद्धेः । न त्वेवं सति तस्याकारकत्वम्, व्यापार-
द्वारेण तस्यैव हेतुत्वात् । न चैवं सति भाक्तं कारकत्वम् ? स्वव्यापारेण व्यवधाना-
ज्ञान 'द्वे द्रव्ये' इस प्रकार के) द्रव्यविषयक ज्ञान का उत्पादक भी है । अतः गुण-
स्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि की उत्पत्ति एक (सामान्यरूप द्वित्वविषयक ज्ञान) की
'विनश्यत्ता' एवं दूसरे ('द्वे द्रव्ये' इस द्रव्य ज्ञान) की 'उत्पद्यमानता' दोनों ही होगी ।
'द्वित्वगुणज्ञानसम्बन्धेभ्यः' इस समस्त वाक्य का विग्रह इस प्रकार है-द्वित्वगुणश्च,
तस्य ज्ञानञ्च, सम्बन्धश्च । इसके बाद के एक समय में 'द्वे द्रव्ये' इस द्रव्यज्ञान की
उत्पत्ति, द्वित्व का विनाश एवं गुणस्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि की विनश्यत्ता ये तीन
काम होते हैं । यद्यपि 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान के उत्पत्तिकाल में द्वित्व की सत्ता नहीं
रहती, फिर भी द्वित्व उस ज्ञान का कारण अवश्य है । कारण होने के लिए यह
आवश्यक नहीं है कि वह कार्य के उत्पत्ति क्षण तक रहे ही; क्योंकि कार्य के
उत्पादन में उस समय तक कारण की सत्ता का कुछ भी उपयोग नहीं है । कारण
का इतना ही स्वरूप है कि कार्य की उत्पत्ति के अनुकूल किसी व्यापार को वह
उत्पन्न कर दे । यह (व्यापारोत्पादनरूप) काम अगर इस (द्वित्व) ने कर दिया तो
फिर कार्य की उत्पत्ति के समय उसकी सत्ता रहे ही इससे क्या प्रयोजन ? द्वित्व
से उत्पन्न व्यापार के द्वारा 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञानस्वरूप कार्य की उत्पत्ति तो हो ही
जाएगी; किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वह (व्यापारी द्वित्व) कारण ही नहीं है,
वह भी (उत्पत्तिकण के अव्यवहित पूर्व क्षण में न रहने पर भी) व्यापार के
उत्पादन के द्वारा कारण अवश्य है । (प्र.) तो फिर द्वित्व में व्यापार के द्वारा
कारणत्व के रहने से कारकत्व का प्रयोग गौण है ? (उ.) नहीं; क्योंकि मध्य में

Page 239Permalink

२८२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता । एकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो
निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाच्च विनाश इति ।
इसी से (अनेक द्रव्यों में रहने वाली) त्रित्वादि संख्याओं की भी
व्याख्या समझनी चाहिए । (फलतः अनेक द्रव्यों में रहनेवाली संख्याओं
की उत्पत्ति) अनेकविषयक बुद्धि का साथ रहने पर अनेक एकत्वों से
होती है एवं अपेक्षाबुद्धि के विनाश से इन (अनेकद्रव्या संख्याओं) का
विनाश होता है ।
न्यायकन्दली
भावात् । अन्यथा शरमुक्तिसमकालं निष्ठुरपृष्ठाभिघातादभिपतितस्य धन्विनः क्षणान्तर-
भाविनि लक्ष्यव्यतिभेदे कर्तृत्वं न स्यात् । तदनन्तरं द्रव्यज्ञानाद् गुणबुद्धेर्विनाशः, संस्कार-
स्योत्पद्यमानता, ततः संस्कारस्योत्पादो द्रव्यबुद्धेर्विनश्यत्ता, क्षणान्तरे संस्काराद् द्रव्यबुद्धे-
र्विनाशः, द्रव्यबुद्धिविनाशकारणत्वं च, संस्कारस्य तद्भावभावित्वादप्यन्याऽसम्भवाच्च ।
एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता । एतेन द्वित्वोत्पत्तिविनाशनिरूपणप्रक्रमेण
त्रित्यादीनामुत्पत्तिर्व्याख्याता । तमेव प्रकारं दर्शयति-एकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो
निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाच्च विनाश इति ।
व्यापार के रहने से भी व्यवधान नहीं माना जाता । अगर ऐसी बात न हो तो
फिर तीर छोड़ने के समय यदि कोई धनुषधारी पीठ में पाये हुए किसी निष्ठुर
आघात से गिर जाय और उस छोड़े हुए तीर से आगे क्षण में लक्ष्य का छेदन भी
हो जाय, तब उस धनुषधारी में उस छेदन क्रिया के कर्तृत्व का व्यवहार नहीं होगा
(क्योंकि छेदन क्रिया की उत्पत्ति के समय उसकी सत्ता नहीं है) । इसके बाद 'द्वे
द्रव्ये' इस आकार के द्रव्यज्ञान से गुण (द्वित्व) बुद्धि का नाश होता है एवं
संस्कार के कारण एकत्र होते हैं। इसके दूसरे क्षण में संस्कार की उत्पत्ति होती है
एवं उक्त द्रव्यबुद्धि के विनाशक और कारणों का संवलन होता है । इसके बाद के
क्षण में संस्कार से उक्त 'द्वे द्रव्ये' इस बुद्धि का विनाश होता है । संस्कार के रहने
से ही उक्त बुद्धि का नाश होता है एवं संस्कार को छोड़कर और कोई उसके
विनाश का कारण सम्भव भी नहीं है । इन्हीं दोनों से यह समझना चाहिए कि
संस्कार ही उक्त द्वित्वविषयक बुद्धि के विनाश का कारण है ।
एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता । 'एतेन' द्वित्व की उत्पत्ति एवं विनाश के
उक्त उपपादन क्रम से त्रित्वादि और अनेक द्रव्यों में ही रहनेवाली (अनेकद्रव्या)
और संख्याओं की भी व्याख्या हो गयी समझनी चाहिए । त्रित्वादि संख्याओं की
उत्पत्ति की ही रीति 'एकत्वेभ्योऽनेकबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाच्च
विनाशः' इत्यादि से दिखलायी गयी है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८३

Page 240Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८३
न्यायकन्दली
एतेन शतसङ्ख्याद्युत्पत्तिरपि समर्थिता । प्रत्येकमनुभूतेष्वेकैकगुणेषु क्रमभाविनां
संस्काराणामन्त्यगुणानुभवानन्तरं शतव्यवहारसंवर्तकादृष्टाद्युगपदभिव्यक्तौ संयोगैकत्वादनेक-
विषयैकस्मरणोत्पादे सत्यनुभवस्मरणाभ्यामपेक्षाबुद्धिभ्यां स्वाश्रयेषु शतसङ्ख्या जन्यते । सा
च सर्वद्रव्ये संस्कारसचिवा अन्त्यद्रव्यसंयुक्तैन्द्रियज्ञानविषयत्वात् प्रत्यक्षैव । यत्र विनष्टेषु
सङ्ख्येयेष्वन्ते सङ्कलनात्मकः प्रत्ययो जायते, शतं पिपीलिकानां मया निहतमिति, तत्र कथं
शतसङ्ख्याया उत्पत्तिः ? आश्रयाभावाद् नोत्पद्यत एव तत्र सा, कारणाभावात् । शतव्यवहारस्तु
रूपादिष्विव गौण इत्येके समर्थयन्ति । अपरे तु प्रतीतस्तुल्यत्वाद्रुपचारकल्पनामनादृत्या-
तीतानामेव द्रव्याणां संस्कारोपनीतत्वादाश्रयतामिच्छन्ति । यदत्यन्तमसत् खपुष्पादि, तद-
कारणम्, निःस्वभावत्वात् । अतीतानां तु वर्तमानकालसम्बन्धो नास्ति, न तु स्वरूपम्, तेषां
इससे सौ प्रभृति संख्याओं की उत्पत्ति का भी समर्थन होता है । सौ द्रव्यों में
से प्रत्येक में क्रमशः 'यह एक है' इस आकार के 'एक' गुण का अनुभव होता
है । उन अनुभवों से एकत्व गुणविषयक संस्कारों की क्रमशः उत्पत्ति होती है ।
अन्तिम 'एक' रूप गुणविषयक अनुभव के बाद सौ विषयक व्यवहार के सम्पादक
अदृष्ट से वे सभी संस्कार उद्बुद्ध हो जाते हैं । (किन्तु उन सभी संस्कारों से)
आत्मा और उनके एक ही संयोग के कारण अनेक एकत्व गुणविषयक एक ही
स्मरण उत्पन्न होता है । इसके बाद अनुभव और स्मरण दोनों प्रकार की अपेक्षा
बुद्धियों से उन आश्रयीभूत द्रव्यों में 'सौ' नाम की संख्या उत्पन्न होती है । कथित
सभी द्रव्यविषयक संस्कारों से उत्पन्न होनेवाली 'सौ' नाम की इस संख्या की सत्ता
में प्रत्यक्ष ही प्रमाण है; क्योंकि उन द्रव्यों में अन्तिम द्रव्य एवं इन्द्रिय इन दोनों के
संयोग से उत्पन्न ज्ञान के द्वारा ही वह गृहीत होता है । (प्र.) संख्येयों (द्रव्यों) के
विनष्ट होने के बाद जोड़कर जहाँ संख्या की प्रतीति "मैंने सौ कीड़ों को मारा"
इत्यादि आकार की होती है, वहाँ 'सौ' संख्या की उत्पत्ति किस प्रकार से होगी ?
क्योंकि उसके आश्रय ही विनष्ट हो गये हैं । इस प्रश्न का उत्तर कोई इस
प्रकार देते हैं कि ऐसे स्थलों में 'सौ' संख्या की उत्पत्ति ही नहीं होती, अतः
ऐसे स्थलों में सौ संख्या का व्यवहार रूपादि गुणों में संख्या के व्यवहार की
तरह गौण है । कोई कहते हैं कि दोनों ही प्रकार के (जहाँ सौ संख्या का
आश्रयीभूत द्रव्य है एवं जहाँ उनका विनाश हो गया है) स्थलों में संख्या की उक्त
प्रतीति समान रूप से होती है, अतः इन प्रतीतियों में से एक प्रतीति को
मुख्य और दूसरी को गौण नहीं मान सकते, अतः उक्त स्थल में विनष्ट अथ
च संस्कार के द्वारा समीप लायी गयी पिपीलिका ही उक्त सौ संख्या का आश्रय
है । आकाशकुसुमादि की किसी भी काल में सत्ता नहीं है, अतः वे कभी
किसी के भी कारण नहीं होते, विनष्ट पिपीलिकादि में तो केवल वर्तमान-
काल का ही सम्बन्ध नहीं है, उनके स्वरूप के अस्तित्व का तो अभाव नहीं है ।

Page 241Permalink

२८४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
स्मृतिसन्निहितानां तर्काऽनुगुणसहकारिलाभात् समवायिकारणत्वमविरुद्धम् । न चैवं सति
सर्वत्र तथाभावः, यथादर्शनं व्यवस्थापनात् । अतीतस्य जनकत्वेऽनुभवस्यैव स्मृतिहेतुत्व-
सम्भवे संस्कारकल्पनावैयर्थ्यमिति चेत्, न, निरन्वयप्रध्वस्तस्यानुपस्थितस्यापि कारकत्वात्,
तदुपस्थापनाकल्पनायां तु संस्कारसिद्धिः । तथा चान्त्यवर्णप्रतीतिकाले पूर्ववर्णानां विनष्टा-
नामपि स्मृत्युपनीततयाऽर्थप्रतीतौ निमित्तकारणत्वमस्त्येव । यथेदं तथा समवायि-
कारणत्वमपि केषाञ्चिद्भविष्यति । यथा च संस्कारसचिवस्य मनसो बाह्ये स्मृत्युत्पादन-
सामर्थ्यमेवं प्रत्यक्षानुभवजननसामर्थ्यमपि दृष्टत्वादिष्टव्यम् । एवं च सति नान्धबधिराद्यभावो
बाह्येन्द्रियप्रवृत्त्यनुविधायित्वात् ।
यत्र विनष्ट एव पराश्रये स्मृत्युपनीते द्वित्वमुत्पद्यते, तत्र
स्मृतिलक्षणापेक्षाबुद्धिविनाशादेवास्य विनाशः, यत्र त्वाश्रये विद्यमाने तदुत्पन्नं
अतः स्मृति के द्वारा समीप आयी हुई विनष्ट पिपीलिकादि वस्तुओं को भी अगर
तर्कसम्मत सहकारी मिले तो वे भी समवायिकारण हो सकती हैं । इसमें कोई
विरोध नहीं है । वस्तुस्थिति के अनुसार ही कल्पना की जाती है, अतः उपर्युक्त
दृष्टान्त (मात्र) से यह कल्पना करना सङ्गत नहीं है कि विनष्ट हुए
समवायिकारणों से ही सभी कार्य हों । (प्र.) अतीत वस्तु भी अगर कारण हो तो
फिर अतीत अनुभव से ही स्मृति की उत्पत्ति हो ही जायेगी, इसके लिए संस्कार
की कल्पना ही व्यर्थ है । (उ.) जड़-मूल से विनष्ट वस्तुओं को जब तक कोई
विद्यमान दूसरी वस्तु (कारण होने के लिए) उपस्थित न करे तब तक वह कारण
नहीं हो सकती । प्रकृत में अगर अनुभव को उपस्थित करनेवाले की कल्पना करें
तो फिर संस्कार की ही कल्पना होगी । (नाम में विवाद की सम्भावना रहने पर
भी) संस्कार (वस्तु) की सिद्धि हो ही जाएगी, अतः जिस प्रकार ज्ञान के समय
विनष्ट भी पहले के वर्ण वाक्य के अन्तिम अक्षर से स्मृति के द्वारा समीप लाये
जाने पर शाब्दबोध के निमित्तकारण होते हैं, वैसे ही कुछ विनष्ट वस्तु
समवायिकारण भी होंगे । वस्तुस्थिति के अनुसार ही तो कल्पना की जाती है,
अतः प्रकृत में भी ऐसी कल्पना करेंगे कि संस्कार का साहाय्य पाकर मन जिस
प्रकार बाह्य वस्तुओं के स्मरण को उत्पन्न करता है, उसी प्रकार बाह्य वस्तुविषयक
प्रत्यक्ष रूप अनुभव को भी (मन) उत्पन्न कर सकता है । इस (मन से बाह्य वस्तु-
विषयक प्रत्यक्ष मान लेने) से संसार से अन्धे और बहरों का लोप नहीं होगा;
क्योंकि मन की प्रवृत्ति बाह्य इन्द्रियों के पीछे चलनेवाली है ।
जहाँ किसी आश्रयरूप वस्तुओं के नष्ट होने पर भी स्मृति के द्वारा उन्हें
समीप लाये जाने पर विनष्ट वस्तुओं में द्वित्व उत्पन्न होता है, ऐसे स्थलों में स्मृति
रूप अपेक्षाबुद्धि के नाश से ही द्वित्व का नाश होता है; किन्तु जहाँ विद्यमान वस्तुओं

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८५

Page 242Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८५
प्रशस्तपादभाष्यम्
क्वचिच्चाश्रयविनाशादिति । कथम् ? यदै कत्याधारावयवे कर्मोत्पद्यते
तदैवैकत्वसामान्यज्ञानमुत्पद्यते, कर्मणा चावयवान्तराद्विभागः
क्रियते, अपेक्षाबुद्धेश्चोत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव
कहीं आश्रय के विनाश से भी संख्यायें विनष्ट होती हैं । (प्र.) कैसे ?
(उ.) (जिस स्थल विशेष में) जिस समय संख्यारूप एकत्व के आधारभूत
द्रव्य के अवयवों में क्रिया उत्पन्न होती है, उसी समय जातिरूप एकत्व का
ज्ञान भी होता है । क्रिया एक अवयव से दूसरे अवयव को विभक्त करती
है और अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति होती है । इससे जिस समय विभाग से
न्यायकन्दली
तत्र न केवलमपेक्षाबुद्धिविनाशादस्य विनाशः, क्वचिदाश्रयविनाशादपि स्यात् । एकस्य
द्रव्यस्य द्वयोर्वा द्रव्ययोरभावाद् द्वे इति प्रत्ययाभावादित्याह-क्वचिच्चाश्रयविनाशादिति ।
कथमित्यनेन पृष्टस्तदुपपादयन्नाह-यदेति । यस्मिन् काले एकगुणाश्रयस्य द्रव्यस्यावयवे
क्रियोत्पद्यते तस्मिन् काले एकगुणवर्तिन्येकत्वसामान्ये ज्ञानमुत्पद्यते, क्षणान्तरे
कर्मणावयवान्तराद्विभागः क्रियते, एकत्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेश्चोत्पत्तिः, यस्मिन्नेव
कालेऽवयवद्वयविभागाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशस्तदापेक्षाबुद्धेर्द्वित्वमुत्पद्यते, ततः संयोग-
विनाशाद् द्रव्यस्य विनाशः, द्वित्वसामान्यबुद्धेश्चोत्पाद इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्
में ही द्वित्व उत्पन्न होता है, ऐसे स्थलों में अपेक्षाबुद्धि के नाश से ही द्वित्व का
नाश नहीं होता है, ऐसे स्थलों में कहीं आश्रय के नाश से भी द्वित्व का नाश होता
है; क्योंकि एक ही द्रव्य के रहने पर या दोनों द्रव्यों के न रहने पर 'ये दो हैं'
इस प्रकार की प्रतीति नहीं हो सकती है । यही बात 'क्वचिच्चाश्रयविनाशात्'
इत्यादि से कहते हैं । कैसे ? इस विषय में किसी अनजान के इस प्रश्न का उत्तरं
देते हुए 'यदा' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । जिस समय 'एक संख्या' रूप गुण के
आश्रयीभूत द्रव्य के अवयव में क्रिया होती है, उसी समय एक संख्यारूप
गुण में रहनेवाला एकत्वरूप जातिविषयक ज्ञान भी उत्पन्न होता है । इसके
दूसरे क्षण में उस क्रिया से (क्रियाश्रय अवयव का) दूसरे अवयव से
विभाग उत्पन्न होता है; एवं जातिरूप एकत्व के ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि उत्पन्न
होती है । इसके बाद जिस समय अवयवरूप द्रव्यों के विभाग से (अवयवी) द्रव्य
के उत्पादक संयोग का विनाश होता है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि से द्वित्व की
उत्पत्ति होती है । उसके बाद द्रव्य के आरम्भक संयोग के नाश से द्रव्य का नाश
होता है एवं जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) विषयक बुद्धि की उत्पत्ति होती है । इतने
काम एक समय में होते हैं । इसके बाद जिस समय द्वित्वत्व जाति के ज्ञान से

Page 243Permalink

२८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
काले विभागात् संयोगविनाशस्तस्मिन्नेव काले द्वित्वमुत्पद्यते । संयोगविनाशाद्
द्रव्यविनाशः, सामान्यबुद्धेश्चोत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव काले सामान्य-
ज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाशस्तस्मिन्नेव काले आश्रयविनाशाद् द्वित्वविनाश इति ।
पूर्वसंयोग का नाश होता है, उसी समय द्वित्व की उत्पत्ति होती है ।
संयोग के विनाश से द्रव्य का विनाश होता है एवं सामान्य रूप (द्वित्व-
विषयक) बुद्धि की उत्पत्ति होती है । इसके बाद जिस समय
सामान्यविषयक उक्त ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है, उसी समय
आश्रय के नाश से द्वित्व का नाश भी हो जाता है।
(यद्यपि) इस प्रकार द्वित्वनाश की यह प्रक्रिया 'वध्यघातक' रूप
विरोध पक्ष में तो ठीक है; किन्तु 'सहानवस्थान' रूप विरोध पक्ष में
न्यायकन्दली
काले द्वित्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाशस्तदैवाश्रयविनाशाद् द्वित्वविनाशः,
न त्वपेक्षाबुद्धेर्विनाशस्तत्कारणम्, सहभावित्वात् । अत्र यद्यपि द्वे द्रव्ये
इति ज्ञानमकृत्वैव प्रणष्टस्य द्वित्वस्योत्पत्त्या न किञ्चित् प्रयोजनम्, तथापि
कारणसामर्थ्यभावी कार्योत्पादो न प्रयोजनापेक्ष इति तदुत्पत्तिश्चिन्ता कृता । इह
खलु द्वित्वोत्पत्तिक्रमेण पूर्वपूर्वज्ञानस्योत्तरोत्तरज्ञानाद्विनाशो दर्शितः । स च
ज्ञानानां विरोधे सत्युपपद्यते । विरोधं च तेषां वध्यघातकस्वभावं केचिदिच्छन्ति, सहान-
अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है, उसी समय आश्रय के नाश से द्वित्व गुण का नाश
होता है । गुणरूप इस द्वित्व के विनाश का अपेक्षाबुद्धि का विनाश कारण नहीं है;
क्योंकि ये दोनों एक ही क्षण में उत्पन्न हुए हैं । 'द्वे द्रव्ये' इस बुद्धि को उत्पन्न
करना ही द्वित्वोत्पत्ति का प्रधान प्रयोजन है । यह प्रयोजन यद्यपि प्रकृत में सिद्ध
नहीं होता है (क्योंकि इसके पहले ही आश्रय के नाश से द्वित्व का नाश हो जाता
है), फिर भी कारणों के सामर्थ्य से उत्पन्न होने वाले कार्य (अपने उत्पादन में)
किसी प्रयोजन की अपेक्षा नहीं रखते (अतः वस्तुस्थिति के अनुसार आश्रयनाश
से नष्ट होने वाले द्वित्व का निरूपण व्यर्थ नहीं है), अतः इस द्वित्व का भी
विचार किया गया है । यहाँ द्वित्व की उत्पत्ति के क्रम में आगे-आगे के ज्ञान से
पहले-पहले के ज्ञान का विनाश दिखलाया गया है; किन्तु यह तभी सम्भव है
जब कि ज्ञानों में परस्पर विरोध रहे । ज्ञानों के विरोध को कोई
'वध्यघातक' रूप मानते हैं, एवं कोई 'सहानवस्थान' रूप । इन दोनों में से

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २८७

Page 244Permalink

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २८७
प्रशस्तपादभाष्यम्
शोभनमेतद्विधानं वध्यघातकपक्षे, सहानवस्थानलक्षणे तु विरोधे
द्रव्यज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्गः । कथम् ? गुणबुद्धिसमकालमपेक्षाबुद्धि-
विनाशाद् द्वित्वविनाशो तदपेक्षस्य द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्यानुत्पत्तिप्रसङ्ग इति ।
लैङ्गिकवज्ज्ञानमात्रादिति चेत् ? स्यान्मतम्, यथाऽभूतं भूतस्येत्यत्र
(इस प्रक्रिया को स्वीकार करने पर 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के)
द्रव्य ज्ञान की उत्पत्ति न हो सकेगी । (प्र.) कैसे ? (उ.) चूँकि
गुणरूप द्वित्वविषयक बुद्धि के समय ही द्वित्व का नाश हो जाएगा,
अतः द्वित्व के द्वारा उत्पन्न होनेवाले 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के द्रव्यज्ञान
की उत्पत्ति न हो सकेगी । इस विषय में यह कह सकते थे कि (प्र.)
अनुमिति की तरह (हेतुविषयक ज्ञान से ही) उक्त 'द्वे द्रव्ये' इस
द्रव्यविषयक ज्ञान की उत्पत्ति होगी । (अभिप्राय यह है कि) जैसे
'अभूतं भूतस्य' इस सूत्र के द्वारा महर्षि ने हेतु के न रहने पर भी हेतु
न्यायकन्दली
वस्थानं चापरे । तत्राचार्यो वध्यघातकपक्षपरिग्रहं कुर्वन्नाह-शोभनमेतद्विधानमिति ।
एतद्विधानमेष द्वित्वप्रकारः । वध्यघातकपक्षे द्वितीयं ज्ञानमुत्पद्य क्षणान्तरे पूर्वं विज्ञानं
नाशयतीति पक्षे शोभनं युक्तमित्यर्थः । सहानवस्थानलक्षणे तु विरोध एकस्य ज्ञानस्यो-
त्पादोऽपरस्य विनाश इति पक्षे द्वे द्रव्ये इति ज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्गः, तस्मात् सहानवस्थान-
लक्षणो न युक्त इत्यभिप्रायः । एतदेवोपपादयति-कथमित्यादिना । सहानवस्थानपक्षे हि
द्वित्वकाल एवापेक्षाबुद्धेर्विनाशाद् द्वित्वस्य विनश्यता, गुणबुद्धिसमकालं च द्वित्वस्य
विनाश इति क्षणान्तरे द्वित्वापेक्षस्य द्वे द्रव्ये इति ज्ञानस्योत्पत्तिर्न भवेत् कारणाभावात् ।
आचार्य (प्रशस्तपाद) वध्यघातक पक्ष को ग्रहण करते हुए 'शोभनमेतद्विधानम्' यह
वाक्य लिखते हैं । 'एतद्विधानम्' अर्थात् द्वित्व की उत्पत्ति का यह क्रम 'वध्यघातकपक्षे'
अर्थात् 'पहला ज्ञान उत्पन्न होकर दूसरे ज्ञान को अपने उत्पत्तिक्षण के आगे
के क्षण में ही नाश कर देता है' इस पक्ष में 'शोभन' है । 'सहानवस्थानलक्षणे तु
विरोधे' अर्थात् 'एक क्षण में ज्ञान की उत्पत्ति ही उससे पूर्व के क्षण में
उत्पन्न ज्ञान का विनाश है' इस पक्ष में 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं
होगी । अतः 'सहानवस्थान' रूप विरोध पक्ष ठीक नहीं है । 'कथम्' इस पद से
प्रश्न कर इसका उपपादन करते हैं । (अर्थात्) सहानवस्थान पक्ष में द्वित्व के
उत्पत्तिकाल में ही अपेक्षाबुद्धि के विनाश से द्वित्वविनाश की सामग्री एकत्र हो
जाती है अतः द्वित्वविषयक (निर्विकल्पक) बुद्धि की जिस क्षण में उत्पत्ति
होती है, उस क्षण में द्वित्व का नाश हो जाता है, सुतराम् इसके अगले क्षण
में 'द्वे द्रव्ये' इस विशिष्ट बुद्धि की उत्पत्ति नहीं होगी; क्योंकि द्वित्व रूप उस

Page 245Permalink

२८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
लिङ्गाभावेऽपि ज्ञानमात्रादनुमानम्, तथा गुणविनाशेऽपि गुणबुद्धिमात्राद्
द्रव्यप्रत्ययः स्यादिति, न, विशेष्यज्ञानत्वात् । न हि विशेष्यज्ञानं सारूप्या-
के ज्ञान से अनुमिति का उपपादन किया है, वैसे ही यहाँ भी
(द्वित्व) गुण का नाश हो जाने पर भी उसके ज्ञान से ही द्रव्यविषयक
उक्त ज्ञान की उत्पत्ति होगी । (उ.) किन्तु यह कहना सम्भव
नहीं है; क्योंकि वह (द्रव्यविषयक) ज्ञान 'विशेष्यज्ञान' अर्थात्
विशिष्ट ज्ञान है। (विशिष्ट ज्ञान) विशेष्य में विशेषण के सम्बन्ध के बिना
(फलतः विशेष्य में विशेषण की सत्ता के बिना) केवल 'सारूप्य' से,
न्यायकन्दली
अत्राशङ्कते-लैङ्गिकवदिति । एतद्विस्पष्टयति-स्यान्मतमित्यादिना । एवं ते मतं
स्यादिदमभिप्रेतं भवेत् । यथा ध्वनिविशेषेण पुरुषानुमाने ज्ञातमेव ध्वनिलक्षणं
लिङ्गमभूतमविद्यमानं विनष्टमेव भूतस्य विद्यमानस्य पुरुषविशेषस्य लिङ्गं भवतीति
लिङ्गस्याभावेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेव लैङ्गिकं ज्ञानं जायते, तथा गुणबुद्धिसमकालं द्वित्वे
विनष्टेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेव द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं स्यादिति । अन्यस्तु-अभूतं वर्षकर्म भूतस्य
वाय्वभ्रसंयोगस्य लिङ्गमित्यत्र वर्षकर्मणो लिङ्गस्याभावेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेवानुमानमिति
व्याचष्टे । तदसङ्गतम्, न ह्यत्र वर्षकर्म लिङ्गम्, अपि तु तस्याभावः । स च तदानीमस्त्येव,
स्वरूपेण वस्त्वनुत्पादे प्रागभावस्याविनाशात् । तस्मादस्मदुक्तैव रीतिरनुसरणीया ।
बुद्धि का कारण उस समय नहीं है। 'लैङ्गिकवत्' इस वाक्य के द्वारा सहानवस्थान
रूप विरोधपक्ष के समर्थन का उपक्रम करते हैं एवं 'स्यान्मतम्' इत्यादि से इसी
पक्ष को स्पष्ट करते हैं । अर्थात् सहानवस्थान रूप विरोध मानने वालों का यह
अभिप्राय हो सकता है कि जैसे विशेष प्रकार की ध्वनि से पुरुष का अनुमान होने
में ध्वनिरूप हेतु केवल ज्ञात ही रहता है (पुरुष की अनुमिति के अव्यवहित
पूर्वक्षण में उसकी सत्ता नहीं रहती है), अतः 'अभूत' अविद्यमान फलतः विनष्ट
(ध्वनिरूप हेतु) ही 'भूत' अर्थात् विद्यमान उस पुरुषविशेष का (ज्ञापक) हेतु होता
है । जिस प्रकार हेतु के न रहने पर भी हेतु के केवल ज्ञान से ही पुरुष की उक्त
अनुमिति होती है, उसी प्रकार गुणरूप द्वित्वविषयक ज्ञान के समय ही द्वित्व के
नष्ट हो जाने पर भी (विनष्ट) द्वित्व के ज्ञान से 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान भी होगा ।
'अभूतं भूतस्य' इस (वैशेषिक) सूत्र की व्याख्या कोई इस प्रकार करते हैं कि
'अभूतम्' अर्थात् अविद्यमान वर्षारूप क्रिया 'भूतस्य' अर्थात् वायु एवं मेघ के
विद्यमान संयोग का (ज्ञापक) लिङ्ग है; किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है;
क्योंकि प्रकृत में वर्षारूप क्रिया (वायु और मेघ के संयोग का ज्ञापक) हेतु
नहीं है; किन्तु वर्षारूप क्रिया का (प्राक्) अभाव ही (उक्त संयोग का) हेतु है । वह