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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 230 of 759

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Page 230

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २७५
न्यायकन्दली
द्वित्वमारभ्यत इत्येककालनिर्देशः क्षणद्वयात्मकलवाख्यकालाभिप्रायेण । क्षणाभिप्रायेण तु
कालभेद एव, कार्यकारणयोः पूर्वापरकालभावात् । ज्ञानार्थस्योत्पाद इति नालौकिक-
मिदम्, सुखादीनां तस्मादुत्पत्तिदर्शनात् । बाह्यार्थस्योत्पादो न दृष्ट इति न वैधर्म्यमात्रम्,
तदन्वयव्यतिरेकानुविधायित्वस्योभयत्राविशेषात्। उभयगुणालम्बनस्य द्वित्वाभिव्यञ्जकत्वे
सिद्धे सति ज्ञानस्य तदा नानन्तर्यनियमोपपत्तिरिति चेत्, न, अनियमप्रसङ्गात् । यदि हि
द्वित्वम्बुद्धिर्जं स्याद्रूपादिवत्पुरुषान्तरेणापि प्रतीयते, नियमहेतोरभावात् । बुद्धिजन्ये तु
यस्य बुद्ध्या यज्जन्यते तत् तेनैवोपलभ्यत इति नियमोपपत्तिः । प्रयोगस्तु द्वित्वं बुद्धिर्जं
नियमेनैकप्रतिपत्तृवेद्यत्वात्, यन्नियमेनैकप्रतिपत्तृवेद्यं तद् बुद्धिर्जं यथा सुखादिकम् । नियमे-
नैकप्रतिपत्तृवेद्यं च द्वित्वं तस्मादिदमपि बुद्धिर्जम् ।
वायिकारण हैं । दोनों एकत्व रूप अनेकविषयक एकबुद्धि (अपेक्षाबुद्धि) निमित्त-
कारण हैं । जिस समय दोनों एकत्व संख्याओं की एकबुद्धि (अपेक्षाबुद्धि) उत्पन्न
होती है, उसी समय दोनों एकत्व संख्याओं से द्वित्व की उत्पत्ति होती है । इसी
अभिप्राय से 'इत्येकः कालः' इस वाक्य से एक काल का निर्देश किया गया है ।
इस निर्देश वाक्य के 'एक काल' शब्द से दो क्षणात्मक 'लव'रूप काल अभिप्रेत है ।
क्षणात्मक काल के अनुसार वस्तुतः वे क्रियायें क्रमशः ही होती हैं; क्योंकि कारण
को पहले एवं कार्य को पीछे रहना आवश्यक है । ज्ञान से वस्तु की उत्पत्ति कोई
अलौकिक घटना नहीं है; क्योंकि ज्ञान से सुखादि की उत्पत्ति देखी जाती है ।
'ज्ञान से बाह्य वस्तु की सृष्टि नहीं होती है' यह कहना केवल बाह्य और आन्तर
दोनों वस्तुओं के भेद को ही प्रकट करता है; क्योंकि दोनों ही प्रकार की
अवस्थाओं के साथ ज्ञान का अन्वय और व्यतिरेक दोनों ही समान रूप से देखे
जाते हैं । (प्र.) (द्वित्व के) दोनों आश्रयों में रहनेवाले दोनों एकत्वों से द्वित्व की
उत्पत्ति हो ही जायेगी, फिर उसके लिए अपेक्षाबुद्धि को भी कारण मानने की क्या
आवश्कता है ? (उ.) द्वित्व को अगर बुद्धिजन्य न मानें तो साधारण्यरूप अनियम
की आपत्ति होगी; क्योंकि रूपादि साधारण विषयों की तरह सभी द्वित्व सभी
पुरुषों से गृहीत नहीं होते, किन्तु जिस पुरुष की अपेक्षाबुद्धि से जिस द्वित्व की
उत्पत्ति होती है; वह द्वित्व उसी पुरुष से गृहीत होता है और किसी पुरुष से
नहीं । इस प्रकार द्वित्व असाधारण है, साधारण नहीं । अतः अपेक्षाबुद्धि भी
द्वित्व का कारण है । (इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि)
नियमतः सुखादि की तरह जो कोई भी वस्तु नियमतः किसी एक ही पुरुष के
द्वारा गृहीत होती है, उसकी उत्पत्ति अवश्य ही बुद्धि से होती है । द्वित्व का ग्रहण
भी किसी एक ही पुरुष से होता है, अतः द्वित्व भी बुद्धि से उत्पन्न होता है ।