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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 229 of 759

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Page 229

२७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धिरुत्पद्यते तदा तामपेक्ष्यैकत्वाभ्यां स्वाश्रययोर्द्वित्वमारभ्यते । ततः
पुनस्तस्मिन् द्वित्वसामान्यज्ञानमुत्पद्यते । तस्माद् द्वित्वसामान्यज्ञानाद-
है (इसे ही अपेक्षाबुद्धि कहते हैं)। उस समय उसी बुद्धि की 'अपेक्षा' करके
उन दोनों एकत्व नाम के गुणों से उनके आश्रयरूप दोनों द्रव्यों में द्वित्व
संख्या की उत्पत्ति होती है । इसके बाद द्वित्व संख्या में द्वित्वसामान्य
(द्वित्वत्व) का ज्ञान उत्पन्न होता है । द्वित्वसामान्यविषयक इस ज्ञान से
न्यायकन्दली
च तस्य सम्बन्धा ज्ञानोत्पत्तिहेतवः । एवं च सति युगपदनेकेषु विषयेषु ज्ञानं
भवेत्येव, कारणसामर्थ्यात् । तच्च भवदेकमेव प्रभवति, आत्मान्तःकरण-
संयोगस्यैकस्यैकज्ञानोत्पत्तावेव सामर्थ्यात् । अत एव सविकल्पोत्पत्तिरपि,
युगपदभिव्यक्तेष्वनेकसङ्केतविषयेषु संस्कारेष्वस्मृतिहेतुष्वात्मान्तःकरणसंयोगस्य सामर्थ्या-
दिकस्यानेकविषयस्मरण स्योत्पादात् । यदि नामानेकगुणालम्बनैका बुद्धिरुपजाता
ततः किमेतायता ? तदैतां बुद्धिमपेक्ष्यैकत्वाभ्यामेकगुणाभ्यां स्वाश्रययोर्द्रव्ययो-
र्द्वित्वमारभ्यते । स्वाश्रययोः समवायिकारणत्वम्, एकगुणयोरसमवायिकारणत्वम्,
अनेकविषयाया बुद्धेर्निमित्तकारणत्वम् । यदैकगुणयोरेका बुद्धिरुत्पद्यते तदैकत्वाभ्यां
अधिष्ठान के साथ अन्तःकरण का सम्बन्ध ही ज्ञान का कारण है । ऐसी स्थिति
में अनेक विषयों का ज्ञान सुलभ होगा; क्योंकि अनुरूप कारणों का संवलन है ।
अनेक विषयों का यह एक ही ज्ञान हो सकता है; क्योंकि आत्मा और अन्तःकरण
के एक संयोग में एक ही ज्ञान को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है । इसी हेतु से
सविकल्पोत्पत्ति अर्थात् अनेक विषयों की स्मृति की उत्पत्ति भी सङ्गत होती है;
क्योंकि पहले का अनुभव जितने विषयों का होगा, उससे संस्कार भी उतने ही
विषयक उत्पन्न होंगे । इसके अनुसार अनेकविषयक या एकविषयक अनुभव से
जहाँ स्मृति में कारणीभूत अनेकविषयक संस्कार उत्पन्न होते हैं, एवं एक ही समय
उद्बुद्ध होते हैं, वहाँ अनेक विषयों की एक ही स्मृति उत्पन्न हो सकती है, चूँकि
आत्मा और अन्तःकरण के उक्त संयोग में उक्त प्रकार के स्मरण को भी उत्पन्न
करने का सामर्थ्य है । (प्र.) अनेकविषयक एक बुद्धि की यदि उत्पत्ति मान ली
गयी तो प्रकृत में इसका क्या उपयोग है ? (उ.) यही उपयोग है कि
अनेकविषयक एक बुद्धि की सहायता से दो संख्याविषयक एक बुद्धि
('अयमेकः,' 'अयमेकः' इस प्रकार की एक बुद्धि) उत्पन्न होती है । उक्त
रीति से ज्ञात इन्हीं दो एकत्वों से द्वित्व की उत्पत्ति होती है । दोनों एकत्वों के
आश्रयीभूत दोनों द्रव्य द्वित्व के समवायिकारण हैं । दोनों एकत्व संख्यायें असम-

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