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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

About this granth

Sri Ramakrishna Vachanamrita (श्री रामकृष्ण वचनामृत) is the Hindi version of the Sri Sri Ramakrishna Kathamrita, the record of Sri Ramakrishna Paramahamsa's conversations kept by his householder disciple Mahendranath Gupta, who wrote as 'M'. Gupta noted the talks at Dakshineswar and Calcutta between 1882 and 1886 in his diary, with dates, which gives the work the feel of an eyewitness account.

This first part is the translation by the Hindi poet Suryakant Tripathi 'Nirala'. It is arranged in numbered sections, each tied to a date such as 11 March, 16 October or 28 October 1882, and covers Ramakrishna's teaching on God-realisation, devotion and knowledge, spiritual life for householders, maya and the harmony of religions, told through his everyday parables. A foreword and introduction open the volume.

The copy comes from the library of Gurukul Kangri University, Haridwar, and has about 711 pages.

१४ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६१ | ३७१

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१४ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६१३७१

श्रीरामकृष्ण (शिक्षक से) – मूर्तिपूजन में दोष क्या है? वेदान्त में हैं, जहाँ 'अस्ति, भाति और प्रिय' है, वहीं उनका प्रकाश है, इसलिए उनके सिवाय और किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है।

“और देखो, छोटी छोटी लड़कियाँ कितने दिन गुड़िया लेकर खेलती हैं? जितने दिन तक उनका विवाह नहीं होता और जितने दिन तक वे पति-सहवास नहीं करतीं। विवाह हो जाने पर गुड़ियाँ-गुड्डों को उठाकर सन्दूक में रख देती हैं। ईश्वरलाभ हो जाने पर फिर मूर्तिपूजन की क्या आवश्यकता है?”

मणि की ओर देखकर श्रीरामकृष्ण कहते हैं – “अनुराग होने पर ईश्वर मिलते हैं। खूब व्याकुलता होनी चाहिए। खूब व्याकुलता होने पर सम्पूर्ण मन उन्हें अर्पित हो जाता है।

“एक आदमी के एक लड़की थी। बहुत कम आयु में लड़की विधवा हो गयी थी। पति का मुख उसने कभी न देखा था। दूसरी स्त्रियों के पतियों को आते-जाते वह देखती थी। उसने एक दिन कहा, 'पिताजी, मेरा पति कहाँ है?' उसके पिता ने कहा, 'गोविन्दजी तेरे पति हैं। उन्हें पुकारने पर वे तुझे दर्शन देंगे।' यह सुनकर वह लड़की द्वार बन्द करके गोविन्द को पुकारती और रोती थी। वह कहती थी – 'गोविन्द! तुम आओ, मुझे दर्शन दो, तुम क्यों नहीं आते?' छोटी लड़की का यह रोना सुनकर गोविन्दजी स्थिर न रह सके। उसे उन्होंने दर्शन दिए।

“बालक जैसा विश्वास। बालक माँ को देखने के लिए जिस तरह व्याकुल होता है वैसी व्याकुलता चाहिए। इस व्याकुलता के होने पर समझना चाहिए कि अरुणोदय हुआ। इसके बाद सूर्योदय होगा ही। इस व्याकुलता के बाद ही ईश्वरदर्शन होता है।

“जटिल बालक की कथा आती है। वह पाठशाला जाता था। कुछ जंगल की राह से पाठशाला जाना पड़ता था; इसलिए वह डरता था। उसने अपनी माँ से यह कहा। माता ने कहा, 'डर क्या है? तू मधुसूदन को पुकारना।' बच्चे ने पूछा, 'मधुसूदन कौन है?' माता ने कहा, 'मधुसूदन तेरे दादा होते हैं।' जब अकेले में जाते समय वह डरा, तब एक आवाज लगायी – 'मधुसूदन दादा!' कहीं कोई न आया। तब वह, 'कहाँ हो मधुसूदन दादा! जल्दी आओ, मुझे बड़ा डर लग रहा है' कहकर जोर जोर से पुकारते हुए रोने लगा। मधुसूदन न रह सके। आकर कहा, 'यह हैं हम, तुझे भय क्या है?' यह कहकर उसे साथ लेकर वे पाठशाला के रास्ते तक छोड़ आए, और कहा, 'तू जब बुलाएगा तभी मैं दौड़ा जाऊँगा, भय क्या है?' यही बालक का विश्वास है! यही व्याकुलता है!

“एक ब्राह्मण के यहाँ भगवान् की सेवा होती थी। एक दिन किसी काम से उसे किसी दूसरी जगह जाना पड़ा। वह अपने छोटे बच्चे से कह गया, 'आज श्रीठाकुरजी का भोग लगाना, उन्हें खिलाना।' बच्चे ने ठाकुरजी का भोग लगाया, परन्तु ठाकुरजी चुपचाप

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३७२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ दिसम्बर, १८८३

बैठे ही रहे। न बोले और न कुछ खाया ही। बच्चे ने बड़ी देर तक बैठे बैठे देखा कि ठाकुरजी नहीं उठते। उसे दृढ़ विश्वास था कि ठाकुरजी आकर आसन पर बैठकर भोजन करेंगे। वह बार बार कहने लगा, 'ठाकुरजी, आओ, भोग पा लो, बड़ी देर हो गयी अब और मुझसे बैठा नहीं जाता।' ठाकुरजी क्यों उत्तर देने लगे? तब बच्चे ने रोना शुरू कर दिया; कहने लगा, 'ठाकुरजी, पिताजी तुम्हें खिलाने के लिए कह गए हैं, तुम क्यों नहीं आओगे? क्यों मेरे पास नहीं खाओगे?' व्याकुल होकर ज्यों ही कुछ देर तक वह रोया कि ठाकुरजी हँसते हँसते आकर हाजिर हो गए और आसन पर बैठकर भोग पाने लगे। ठाकुरजी को खिलाकर जब वह ठाकुरघर से निकला, तब घरवालों ने कहा, 'भोग हो गया तो वह सब उतार ले आ।' बच्चे ने कहा, 'हाँ, हो गया; ठाकुरजी ने सब भोग खा लिया।' उन लोगों ने कहा, 'अरे, यह तू क्या कहता है!' बच्चे ने सरलतापूर्वक कहा, क्यों खा तो गए हैं ठाकुरजी सब।' तब घरवालों ने ठाकुरघर में जाकर देखा तो छक्के छूट गए।"

सन्ध्या होने को अभी देर है। श्रीरामकृष्ण नौबतखाने के दक्षिण ओर खड़े हुए मणि के साथ बातचीत कर रहे हैं। सामने गंगा है। जाड़े का समय है। श्रीरामकृष्ण ऊनी कपड़ा पहने हुए हैं।

श्रीरामकृष्ण – पंचवटीवाले घर में सोओगे?

मणि – क्या ये लोग नौबतखाने के ऊपर का कमरा न देंगे?

श्रीरामकृष्ण खजांची से मणि की बात कहेंगे। रहने के लिए एक कमरा ठीक कर देंगे। मणि को नौबतखाने के ऊपर का कमरा पसन्द आया है। वे हैं भी कविता प्रिय मनुष्य। नौबतखाने से आकाश, गंगा, चाँदनी, फूलों के पेड़ ये सब दीख पड़ते हैं।

श्रीरामकृष्ण – देंगे क्यों नहीं? मैं पंचवटीवाला घर इसलिए कह रहा हूँ कि वहाँ बहुत रामनाम और ईश्वरचिन्तन किया गया है।

(३)

जीवन का अन्तिम लक्ष्य - ईश्वर से प्रेम

श्रीरामकृष्ण के कमरे में धूप दिया गया है। उसी छोटे तख्त पर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण ईश्वरचिन्तन कर रहे हैं। मणि जमीन पर बैठे हुए हैं। राखाल, लाटू, रामलाल ये भी कमरे के अन्दर हैं।

श्रीरामकृष्ण मणि से कह रहे हैं, – “बात है उन पर भक्ति करना – उन्हें प्यार करना।” फिर उन्होंने रामलाल से गाने के लिए कहा। रामलाल मधुर कण्ठ से गाने लगे। श्रीरामकृष्ण हर गाने का पहला चरण कह दे रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण के कहने पर रामलाल पहले श्रीगौरांग का संन्यास गा रहे हैं।

(भावार्थ) – “केशवभारती के कुटीर में मैंने कैसी अपूर्वज्योति गौरांगमूर्ति देखी!

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उनके दोनों नेत्रों में शत धाराओं से होकर प्रेम बह रहा है। मत्त मातंग के सदृश श्रीगौरांग कभी तो प्रेमावेश में नाचते हुए गाते हैं, कभी धूल में लोटते हैं, कभी आँसुओं में बहते हैं। वे रोते हुए हरि को पुकार रहे हैं। उनका उच्च स्वर स्वर्ग और मत्यलोक को भी हिला रहा है। कभी वे दाँतों में तृण दबाकर, हाथ जोड़, बार बार दासता से मुक्त कर देने के लिए परमात्मा से प्रार्थना कर रहे हैं। अपने घुँघराले बालों को मुँड़ाकर उन्होंने योगी का वेश धारण किया है। उनकी भक्ति और प्रेमावेश को देखकर जी रो उठता है। जीवों के दुःख से दुःखी होकर, सर्वस्व त्यागकर वे प्रेम प्रदान करने के लिए आए हैं। 'प्रेमदास' की यही अभिलाषा है कि वह श्रीचैतन्यदेव के चरणों का दास होकर उनके साथ दर दर घूमे।”

रामलाल ने फिर एक गाना गाया। इसमें श्रीगौरांगदेव की माता शची का विलाप है।

इसके बाद श्रीरामकृष्ण के आदेशानुसार रामलाल ने कुछ और गाने गाए।

श्रीरामकृष्ण रामलाल से फिर 'गौरांग और नित्यानंद' वाला गाना गाने के लिए कह रहे हैं। इस बार रामलाल के साथ श्रीरामकृष्ण भी गा रहे हैं।

(भावार्थ) – “हे प्रभु श्रीगौरांग और नित्यानन्द, तुम दोनों भाई बड़े ही दयालु हो! यही सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। मैं काशी गया था। वहाँ विश्वेश्वरजी ने मुझसे कहा है, वे परब्रह्म इस समय शचीदेवी के घर में हैं। हे परब्रह्म! मैंने तुम्हें पहचान लिया है। मैं कितनी ही जगह गया, परन्तु इस तरह के दयासागर और कहीं मेरी दृष्टि में नहीं पड़े। तुम दोनों ब्रजमण्डल में कृष्ण बलराम थे। अब नदिया में आकर श्रीगौरांग और नित्यानन्द हुए हो! तुम्हारी ब्रज की क्रीड़ा थी दौड़धूप और अब यह नदिया में तुम्हारी क्रीड़ा है धूल में लोटपोट हो जाना। ब्रज में तुम्हारी क्रीड़ा जोर जोर की किलकारियाँ थीं और आज नदिया में तुम्हारी क्रीड़ा है, हरिनाम-कीर्तन। तुम्हारे सब और अंग तो छिप गए हैं, परन्तु दोनों बंकिम नेत्र अब भी हैं। तुम्हारा पतितपावन नाम सुनकर मेरे हृदय में बहुत बड़ा भरोसा हो गया है। मैं बड़ी आशा से यहाँ दौड़ा हुआ आया हूँ। तुम अपने चरणों की शीतल छाया में मुझे स्थान दो। जगाई और मधाई जैसे पाखण्डी भी तर गए हैं; प्रभो, यही भरोसा मुझे भी है। मैंने सुना है, तुम दोनों चाण्डालों को भी हृदय से लगा लेते हो, हृदय से लगाकर हरिनाम-कीर्तन करते हो।”

निर्जन में भक्तों की साधना

रात बहुत हो चुकी है। नौबतखाने के ऊपरवाले कमरे में मणि अकेले बैठे हुए हैं। आज अगहन की पूर्णिमा है। आकाश, गंगा, कालीमन्दिर, मन्दिरों के शिखर, उद्यानपथ, पंचवटी – सभी चन्द्रलोक से आलोकित हैं। मणि एकाकी श्रीरामकृष्ण का चिन्तन कर रहे हैं।

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३७४ श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ दिसम्बर, १८८३

रात के करीब तीन बज गए। मणि उठे और उत्तराभिमुख हो पंचवटी की ओर जाने लगे। श्रीरामकृष्ण ने पंचवटी की बात कही है। नौबतखाना अब अच्छा नहीं लग रहा है। मणि ने पंचवटीवाले घर में रहने का निश्चय किया।

चारों ओर नीरवता है। रात के ग्यारह बजे गंगा में ज्वार आया था। बीच बीच में पानी की आवाज सुनायी दे रही है। मणि पंचवटी की ओर बढ़ने लगे। इतने में उन्हें दूर से एक आवाज सुनायी पड़ी। मानो कोई पंचवटी के वृक्षमण्डप के भीतर से आर्त स्वर से पुकार रहा है – 'कहाँ हो दादा मधुसूदन!'

आज पूर्णिमा होने के कारण वटवृक्ष की शाखा-प्रशाखाओं को भेदकर चन्द्र की किरणें प्रकाशित हो रहीं हैं।

कुछ और अग्रसर होकर मणि ने दूर से देखा कि पंचवटी में श्रीरामकृष्ण के एक भक्त बैठे हुए निर्जन में एकाकी पुकार रहे हैं – 'कहाँ हो दादा मधुसूदन!' मणि निःस्तब्ध हो देखते रहे।

परिच्छेद ६२

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परिच्छेद ६२

दक्षिणेश्वर में अंतरंग भक्तों के साथ

प्रह्लादचरित्र-श्रवण तथा भावावेश। स्त्रीसंग-निन्दा

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में उसी पूर्वपरिचित कमरे में फर्श पर बैठे हुए प्रह्लाद-चरित्र सुन रहे हैं। दिन के आठ बजे होंगे। रामलाल 'भक्तमाल' ग्रन्थ से प्रह्लाद-चरित्र पढ़ रहे हैं।

आज शनिवार, अगहन की कृष्णा प्रतिपदा है, १५ दिसम्बर १८८३ ई.। मणि दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण की पदच्छाया में ही रहते हैं। वे भी श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए प्रह्लाद-चरित्र सुन रहे हैं। कमरे में राखाल, लाटू, हरीश भी हैं, – कोई बैठे हुए सुन रहे हैं, कोई आना-जाना कर रहे हैं। हाजरा बरामदे में हैं।

श्रीरामकृष्ण प्रह्लाद-चरित्र की कथा सुनते सुनते भावावेश में आ रहे हैं। जब हिरण्यकशिपु का वध हुआ, तब नृसिंह की रुद्र मूर्ति देख और उनका सिंहनाद सुनकर ब्रह्मादि देवताओं ने प्रलय की आशंका से प्रह्लाद को ही उनके पास भेज दिया। प्रह्लाद बालक की तरह स्तव कर रहे हैं। भक्तवत्सल नृसिंह बड़े प्रेम से प्रह्लाद की देह पर जीभ फिरा रहे हैं। 'अहा! भक्त पर कैसा प्यार है!' कहते हुए श्रीरामकृष्ण भावसमाधि में लीन हो गए। देह निःस्पन्द हो गयी है, आँखों की कोरों में प्रेमाश्रु दिखायी पड़ रहे हैं। भाव का उपशम हो जाने पर श्रीरामकृष्ण उसी छोटे तख्त पर जा बैठे। मणि फर्श पर उनके चरणों के पास बैठे। श्रीरामकृष्ण उनसे बातचीत कर रहे हैं। ईश्वर के मार्ग पर रहकर जो लोग स्त्रीसंग करते हैं, उनके प्रति श्रीरामकृष्ण घृणा और क्रोध प्रकट कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – लाज भी नहीं आती – लड़के हो गए फिर भी स्त्रीसंग! घृणा भी नहीं होती, – पशुओं का-सा व्यवहार! लार, खून, मल, मूत्र – इन पर घृणा भी नहीं होती! जो ईश्वर के पादपद्मों की चिन्ता करता है, उसे परम सुन्दरी स्त्री भी चिताभस्म के समान जान पड़ती हैं। जो शरीर नहीं रहेगा, जिसके भीतर कृमि, क्लेद, श्लेष्मा – सब तरह की नापाक चीजें भरी हुई हैं, उसी को लेकर आनन्द! लज्जा भी नहीं आती!

मणि चुपचाप सिर झुकाए हुए हैं। श्रीरामकृष्ण फिर कहने लगे – “उनके प्रेम का एक बिन्दु भी यदि किसी को मिल गया तो कामिनी-कांचन अत्यन्त तुच्छ जान पड़ते हैं। जब मिश्री का शरबत मिल जाता है, तब गुड़ का शरबत नहीं सुहाता। व्याकुल होकर

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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३७६श्रीरामकृष्णवचनामृत१५ दिसम्बर, १८८३

उनसे प्रार्थना करने पर, उनके नामगुण का सदा कीर्तन करने पर, क्रमश: उन पर वैसा ही प्यार हो जाता है।”

यह कहकर श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त हो कमरे के भीतर नाचते हुए टहलने और गाने लगे –

(भावार्थ) – “सुरधुनी के तट पर कौन हरिनाम ले रहा है? शायद प्रेमदाता नित्यानन्द आए हैं। उनके बिना प्राण कैसे शीतल हों?”

करीब दस बजे होंगे। रामलाल ने कालीमन्दिर की नित्यपूजा समाप्त कर दी है। श्रीरामकृष्ण माता के दर्शन करने के लिए कालीमन्दिर जा रहे हैं। साथ मणि भी हैं। मन्दिर में प्रवेश कर श्रीरामकृष्ण आसन पर बैठ गए। माता के चरणों पर दो-एक फूल उन्होंने अर्पित किए। अपने मस्तक पर फूल रखकर ध्यान कर रहे हैं। अब गीत गाकर माता की स्तुति करने लगे –

“हे शंकरि, मैंने सुना है तुम्हारा नाम भवहरा भी है। इसीलिए माँ, मैंने तुम्हें अपना भार दे दिया है, – तुम तारो चाहे न तारो।” ...

श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर से लौटकर अपने कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे में बैठे। दिन के दस बजे का समय होगा। अब भी देवताओं का भोग या भोग-आरती नहीं हुई। माता काली और श्रीराधाकान्त के प्रसादी फल-मूल आदि से कुछ लेकर श्रीरामकृष्ण ने थोड़ा जलपान किया। राखाल आदि भक्तों को भी थोड़ा थोड़ा प्रसाद मिल चुका है।

श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए राखाल स्माइल की ‘सेल्फ-हेल्प’? (Smile's Self-help) पढ़ रहे हैं – लार्ड अर्सिकन (Lord Erskine) के सम्बन्ध में।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – इसमें क्या लिखा है?

मास्टर – साहब फल की आकांक्षा न करके कर्तव्य-कर्म करते थे – यही लिखा है। निष्काम-कर्म।

श्रीरामकृष्ण – तब तो अच्छा है। परन्तु पूर्ण ज्ञान का लक्षण है कि एक भी पुस्तक साथ न रहेगी। जैसे शुकदेव – उनका सब कुछ जिह्वा पर।

“पुस्तकों और शास्त्रों में शक्कर के साथ बालू भी मिली हुई है। साधु शक्कर भर का हिस्सा ले लेता है, बालू छोड़ देता है। साधु सार पदार्थ लेता है।”

शुकदेवादि का नाम लेकर क्या ठाकुर अपनी अवस्था समझाना चाहते हैं?

वैष्णवचरण कीर्तनिया (कीर्तन गानेवाले) आये हुए हैं; उन्होंने ‘सुबोल-मिलन’ नाम का कीर्तन गाकर सुनाया।

कुछ देर बाद रामलाल ने थाली में श्रीरामकृष्ण के लिए प्रसाद ला दिया। प्रसाद पाकर श्रीरामकृष्ण थोड़ा विश्राम करने लगे।

रात में मणि नौबतखाने में सोये। श्रीमाताजी जब श्रीरामकृष्ण की सेवा के लिए आती थीं तब इसी नौबतखाने में रहती थीं। कुछ मास हुए वे कामारपुकुर गयी हैं।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

परिच्छेद ६३

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परिच्छेद ६३

ईश्वरदर्शन के उपाय

(१)

श्रीरामकृष्ण मणि के साथ पश्चिमवाले गोल बरामदे में बैठे हैं। सामने दक्षिणवाहिनी भागीरथी है। पास ही कनेर, बेला, जूही, गुलाब, कृष्णचूड़ा आदि अनेक प्रकार के फूले हुए पेड़ हैं। दिन के दस बजे होंगे।

आज रविवार, अगहन की कृष्णा द्वितीया है – १६ दिसम्बर १८८३।

श्रीरामकृष्ण मणि को देख रहे हैं और गा रहे हैं –

(भावार्थ) – “माँ तारा, मुझे तारना होगा, मैं शरणागत हूँ। पिंजड़े के पक्षी जैसी मेरी दशा हो रही है। मैंने असंख्य अपराध किए हैं। मैं ज्ञानहीन हूँ। मैं माया में मोहित हुआ व्यर्थ भटकता फिर रहा हूँ। बछड़ा खो जाने पर गाय की जो दशा होती है, वही दशा मेरी भी है।”

सीता की तरह व्याकुलता

श्रीरामकृष्ण – क्यों? – पिंजड़े की चिड़िया की तरह क्यों होगे? छि:!”

कहते ही कहते भावावेश में आ गए। शरीर, मन, सब स्थिर है; आँखों से धारा बह चली है।

कुछ देर बाद कह रहे हैं, “माँ, सीता की तरह कर दो। बिलकुल सब भूल गयी हैं – देह का ख्याल नहीं; हाथ, पैर, स्तन, योनि – किसी का होश नहीं! एकमात्र चिन्ता – 'राम कहाँ!' ”

किस तरह व्याकुल होने पर ईश्वरलाभ होता है, मणि को इसकी शिक्षा देने के लिए ही मानो श्रीरामकृष्ण के मन में सीता का उद्दीपन हुआ था। सीता राममयजीविता थीं, – श्रीरामचन्द्र की चिन्ता में ही वे पागल हो रही थीं, – इतनी प्रिय वस्तु जो देह है उसे भी वे भूल गयी थीं!

दिन के तीसरे प्रहर के चार बजे का समय है। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ उसी कमरे में बैठे हुए हैं। जनाई के मुखर्जीबाबू आए हुए हैं, – ये श्री प्राणकृष्ण के आत्मीय हैं। उनके

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३७८श्रीरामकृष्णवचनामृत१६ दिसम्बर, १८८३

साथ एक शास्त्रज्ञ ब्राह्म मित्र हैं। मणि, राखाल, लाटू, हरीश, योगीन्द्रादि भक्त भी हैं।

योगीन्द्र दक्षिणेश्वर के सावर्ण चौधरियों के यहाँ के हैं। ये आजकल प्रायः रोज दिन ढलने पर श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आते हैं और रात को चले जाते हैं। योगीन्द्र ने अभी विवाह नहीं किया।

मुखर्जी (प्रणाम करके) – आपके दर्शन से बड़ा आनन्द हुआ।

श्रीरामकृष्ण – वे सभी के भीतर हैं, वही सोना सब के भीतर है, कहीं प्रकाश अधिक है। संसार में उस सोने पर बहुत मिट्टी पड़ी रहती है।

मुखर्जी (सहास्य) – महाराज, ऐहिक और पारमार्थिक में अन्तर क्या है?

श्रीरामकृष्ण – साधना के समय 'नेति' 'नेति' करके त्याग करना पड़ता है। उन्हें पा लेने पर समझ में आता है, सब कुछ वही हुए हैं।

“जब श्रीरामचन्द्र को वैराग्य हुआ, तब दशरथ को बड़ी चिन्ता हुई। वे वशिष्ठजी की शरण में गए, जिससे राम संसार का त्याग न करें। वशिष्ठजी ने श्रीरामचन्द्र के पास जाकर देखा, वे विमनस्क हुए बैठे हैं – अन्तर तीव्र वैराग्य से भरा हुआ है। वशिष्ठजी ने कहा, 'राम, तुम संसार का त्याग क्यों करोगे? संसार क्या कोई उनसे अलग वस्तु है? मेरे साथ विचार करो।' राम ने देखा, संसार भी उसी परब्रह्म से हुआ है, इसलिए चुपचाप बैठे रहे।

“जैसे जिस चीज से मट्ठा होता है, उसी से मक्खन भी होता है। अतएव मट्ठे का ही मक्खन और मक्खन का ही मट्ठा कहना चाहिए। बड़ी कठिनाइयों से मक्खन उठा लेने पर (अर्थात् ब्रह्मज्ञान होने पर) देखोगे, मक्खन रहने से मट्ठा भी है; जहाँ मक्खन है वहीं मट्ठा है। ब्रह्म है, इस ज्ञान के रहने से जीव, जगत्, चतुर्विंशति तत्त्व भी हैं।

“ब्रह्म क्या वस्तु है, यह कोई मुँह से नहीं कह सकता। सब वस्तुएँ जूठी हो गयी हैं, (अर्थात् मुँह से कही जा चुकी हैं) परन्तु ब्रह्म क्या है, यह कोई मुँह से नहीं कह सका, इसीलिए वह जूठा नहीं हुआ। यह बात मैंने विद्यासागर से कही थी। विद्यासागर सुनकर बड़े प्रसन्न हुए।

“विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते भी यह ब्रह्मज्ञान नहीं होता। कामिनी-कांचन का भाव जब मन में बिलकुल न रहेगा, तब होगा। पार्वतीजी ने पर्वतराज से कहा, 'पिताजी, अगर आप ब्रह्मज्ञान चाहते हैं तो साधुओं का संग कीजिए।'”

क्या श्रीरामकृष्ण के कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य चाहे संसारी हो या संन्यासी, कामिनी-कांचन में मग्न रहने पर उसे ब्रह्मज्ञान नहीं होता?

श्रीरामकृष्ण फिर मुखर्जी से कह रहे हैं –

“तुम्हारे धन-सम्पत्ति है फिर भी तुम ईश्वर को भी पुकारते हो, यह बहुत अच्छा है। गीता में है – जो लोग योगभ्रष्ट हो जाते हैं वही भक्त होकर धनी के घर जन्म लेते हैं।”

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१६ दिसम्बर, १८८३ परिच्छेद ६३ ३७९

मुखर्जी (अपने मित्र से सहास्य) – “शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।”

श्रीरामकृष्ण – वे चाहे तो ज्ञानी को संसार में भी रख सकते हैं। उन्हीं की इच्छा से यह जीव-प्रपंच हुआ है। वे इच्छामय हैं।

मुखर्जी (सहास्य) – उनकी फिर कैसी इच्छा? क्या उन्हें भी कोई अभाव है?

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – इसमें दोष ही क्या है? पानी स्थिर रहे तो भी वह पानी है और जीव-जगत क्या मिथ्या है? तरंगें उठने पर भी वह पानी ही है।

“साँप चुपचाप कुण्डली बाँधकर बैठा रहे, तो भी वह साँप है और तिर्यग्-गति हो, टेढ़ा-मेढ़ा रेंगने से भी वह साँप ही है।

“बाबू जब चुपचाप बैठे रहते हैं, तब वे जो मनुष्य हैं, वही मनुष्य वे उस समय भी हैं जब वे काम करते हैं।

“जीव-प्रपंच को अलग कैसे कर सकते हो? इस तरह वजन तो घट जाएगा! बेल के बीज और खोपड़ा निकाल देने से पूरे बेल का वजन ठीक नहीं उतरता।

“ब्रह्म निर्लिप्त है। सुगन्ध और दुर्गन्ध वायु से मिलती है, परन्तु वायु निर्लिप्त है। ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं। उसी आद्याशक्ति से जीव-प्रपंच बना है।”

मुखर्जी – योगभ्रष्ट क्यों होते हैं?

श्रीरामकृष्ण – कहते हैं न ‘जब मैं गर्भ में था तब योग में था, पृथ्वी पर गिरते ही मिट्टी खायी। धाई ने तो मेरा नार काटा; पर यह माया की बेड़ी कैसे काटूँ?’

“कामिनी-कांचन ही माया है। मन से इन दोनों के जाते ही योग होता है। आत्मा – परमात्मा – चुम्बक पत्थर है, जीवात्मा एक सूई है – उनके खींच लेने ही से योग हो गया। परन्तु सूई में अगर मिट्टी लगी हुई हो, तो चुम्बक नहीं खींचता – मिट्टी साफ कर देने से फिर खींचता है। कामिनी-कांचन मिट्टी है, इसे साफ करना चाहिए।”

मुखर्जी – यह किस तरह साफ हो?

श्रीरामकृष्ण – उनके लिए व्याकुल होकर रोओ। वही जल मिट्टी पर गिरने से मिट्टी धुल जाएगी। जब खूब साफ हो जाएगी तब चुम्बक खींच लेगा। योग तभी होगा।

मुखर्जी – अहा! कैसी बात है!

श्रीरामकृष्ण – उनके लिए रो सकने पर उनके दर्शन होते हैं – समाधि होती है। योग में सिद्ध होने से ही समाधि होती है। रोने से कुम्भक आप ही आप होता है। – उसके बाद समाधि।

“एक उपाय और है – ध्यान। सहस्त्रार कमल (मस्तक) में विशेष रूप से शिव का अधिष्ठान है – उसका ध्यान। शरीर आधार है और मन-बुद्धि जल। इस पानी पर उस सच्चिदानन्द सूर्य का बिम्ब गिरता है! उसी बिम्बसूर्य का ध्यान करते करते उनकी कृपा से यथार्थ सूर्य के भी दर्शन होते हैं।

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३८० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १६ दिसम्बर, १८८३

साधुसंग करो और आम-मुखतारी दे दो

“परन्तु संसारी मनुष्यों के लिए तो सदा ही साधुसंग की आवश्यकता है। यह सभी के लिए आवश्यक है; संन्यासियों के लिए भी। परन्तु संसारियों के लिए यह विशेषकर आवश्यक है। उन्हें रोग लगा ही हुआ है – कामिनी-कांचन में सदा ही रहना पड़ता है।”

मुखर्जी – जी हाँ, रोग लगा ही हुआ है।

श्रीरामकृष्ण – उन्हें आम-मुखतारी दे दो – वे जो चाहे सो करें। तुम बिल्ली के बच्चे की तरह उन्हें पुकारते भर रहो – व्याकुल होकर। उसकी माँ उसे चाहे जहाँ रखे – वह कुछ भी नहीं जानता; – कभी बिस्तर पर रखती है तो कभी रसोईघर में!

मुखर्जी – गीता आदि शास्त्र पढ़ना अच्छा है।

श्रीरामकृष्ण – केवल पढ़ने-सुनने से क्या होगा? किसी ने दूध का नाम मात्र सुना है, किसी ने दूध देखा है और किसी ने दूध पिया है। ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं और उनसे वार्तालाप भी किया जा सकता है।

“पहले प्रवर्तक है – वह पढ़ता-सुनता है। उसके बाद साधक हैं, – उन्हें पुकारता है, ध्यान-चिन्तन और नामगुण-कीर्तन करता है। इसके बाद सिद्ध – उसे हृदय में उनका अनुभव हुआ है, उनके दर्शन हुए हैं। इसके बाद है सिद्ध का सिद्ध – जैसे चैतन्यदेव की अवस्था – कभी वात्सल्य और कभी मधुर भाव।”

मणि, राखाल, योगीन्द्र, लाटू आदि भक्तगण ये सब देवदुर्लभ तत्त्वपूर्ण कथाएँ आश्चर्यचकित होकर सुन रहे हैं।

अब मुखर्जी और उनके साथवाले विदा होंगे। वे सब प्रणाम करके उठ खड़े हुए। श्रीरामकृष्ण भी, शायद उन्हें सम्मान दिखाने के उद्देश्य से खड़े हो गये।

मुखर्जी (सहास्य) – आपके लिए उठना और बैठना!

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – उठने और बैठने में हानि क्या है? पानी स्थिर होने पर भी पानी है और हिलने-डुलने पर भी पानी ही है। आँधी में जूठी पत्तल, हवा चाहे जिस ओर उड़ा ले जाय। मैं यन्त्र हूँ, वे यन्त्री हैं।

(२)

श्रीरामकृष्ण का दर्शन और वेदान्ततत्त्वों की गूढ़ व्याख्या

जनाई के मुखर्जी चले गए। मणि सोच रहे हैं, वेदान्तदर्शन के मत से सब स्वप्नवत् है। तो क्या जीव, जगत्, मैं – यह सब मिथ्या है?

मणि ने थोड़ा-बहुत वेदान्त पढ़ा है। फिर जिनके विचार मानो वेदान्त की ही अस्फुट प्रतिध्वनि है, उन कान्ट, हेगेल आदि जर्मन पण्डितों के भी कुछ ग्रन्थ पढ़े हैं।

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परन्तु श्रीरामकृष्ण ने दुर्बल मानव की तरह विचार के द्वारा ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, उन्हें तो स्वयं जगज्जननी ने सब कुछ दर्शन करा दिया है। मणि इसी के बारे में सोच रहे हैं।

कुछ ही देर बाद श्रीरामकृष्ण मणि के साथ अकेले पश्चिमवाले गोल बरामदे में बातचीत कर रहे हैं। सामने गंगाजी कलकल नाद करती हुई दक्षिण की ओर बह रही हैं। शीत ऋतु है। नैऋत्य दिशा में सूर्यनारायण अभी भी दिखायी दे रहे हैं। जिनका जीवन वेदमय है, जिनके श्रीमुख से निकली वाणी वेदान्तवाक्य है, जिनके श्रीमुख से स्वयं भगवान् ही बोलते हैं, जिनके वचनरूपी अमृत से वेद, वेदान्त, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों का निर्माण हुआ है, वही अहेतुककृपासिन्धु पुरुष गुरुरूप धारण कर वार्तालाप कर रहे हैं।

मणि – क्या संसार मिथ्या है?

श्रीरामकृष्ण – मिथ्या क्यों है? वह सब विचार की बात है।

“पहले-पहल ‘नेति’ ‘नेति’ विचार करते समय, वे न जीव हैं, न जगत् हैं, न चौबीस तत्त्व हैं, ऐसा हो जाता है, – यह सब स्वप्नवत् हो जाता है। इसके बाद अनुलोम विलोम होता है, तब वही जीव-जगत् हुए हैं, यह ज्ञान हो जाता है।

“तुम एक-एक करके सीढ़ियों से छत पर गए। परन्तु जब तक तुम्हें छत का ज्ञान है, तब तक सीढ़ियों का ज्ञान भी है। जिसे ऊँचे का ज्ञान है उसे नीचे का भी ज्ञान है।

“फिर छत पर चढ़कर तुमने देखा, जिस चीज से छत बनी हुई है – ईंट, चूना, मसाला – उसी चीज से सीढ़ियाँ भी बनी हैं।

“और जैसे बेल की बात कही थी।

“जिसका ‘अटल’ है, उसका ‘टल’ भी है।

“‘मैं’ नहीं जाने का। ‘मैं-घट’ जब तक है, तब तक जीव-प्रपंच भी है। उन्हें प्राप्त कर लेने पर देखा जाता है, जीव-प्रपंच वही हुए हैं। – केवल विचार से ही नहीं होता।

“शिव की दो अवस्थाएँ हैं। जब वे समाधिस्थ हैं – महायोग में बैठे हुए हैं – तब आत्माराम हैं। फिर जब उस अवस्था से उतर आते हैं – थोड़ासा ‘मैं’ रहता है – तब ‘राम राम’ कहकर नृत्य करते हैं।”

क्या शिव की अवस्था का वर्णन कर श्रीरामकृष्ण अपनी ही अवस्था सूचित कर रहे हैं?

शाम हो गयी है। श्रीरामकृष्ण जगन्माता का नाम और उनका चिन्तन कर रहे हैं। भक्तगण भी निर्जन में जाकर अपना अपना ध्यान-जप करने लगे। इधर कालीमाई के मन्दिर में, श्रीराधाकान्तजी के मन्दिर में और बारहौं शिवालयों में आरती होने लगी।

आज कृष्णपक्ष की द्वितीया है। सन्ध्या के कुछ समय बाद चन्द्रोदय हुआ। वह चाँदनी, मन्दिरशीर्ष, चारों ओर के पेड़-पौधे और मन्दिर के पश्चिम ओर भागीरथी के वक्षःस्थल पर पड़कर अपूर्व शोभा धारण कर रही है। इस समय उसी पूर्वपरिचित कमरे

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३८२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ दिसम्बर, १८८३

में श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं। फर्श पर मणि बैठे हुए हैं। शाम होते होते वेदान्त के सम्बन्ध की जो बात मणि ने उठायी थी उसी के बारे में श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – संसार मिथ्या क्यों होने लगा? यह सब विचार की बात है। उनके दर्शन हो जाने पर ही समझ में आता है कि जीव-प्रपंच सब वही हुए हैं।

“मुझे माँ ने कालीमन्दिर में दिखलाया कि माँ ही सब कुछ हुई हैं। दिखाया, सब चिन्मय है। प्रतिमा चिन्मय है! वेदी चिन्मय है! अर्घ्यपात्र चिन्मय है! चौखट, संगमर्मर पत्थर – सब कुछ चिन्मय है!

“मन्दिर के भीतर मैंने देखा, सब मानो रस से सराबोर हैं – सच्चिदानन्द-रस से।

“कालीमन्दिर के सामने एक दुष्ट आदमी को देखा – परन्तु उसके भीतर भी उनकी शक्ति जाज्वल्यमान देखी!

“इसीलिए तो मैंने बिल्ली को उनके भोग की पूड़ियाँ खिलायी थीं। देखा, माँ ही सब कुछ हुई हैं। - बिल्ली भी। तब खजांची ने मथुरबाबू को लिखा कि भट्टाचार्य महाशय भोग की पूड़ियाँ बिल्लियों को खिलाते हैं। मथुरबाबू मेरी अवस्था समझते थे। चिट्ठी के उत्तर में उन्होंने लिखा, ‘वे जो कुछ करें, उसमें कुछ बाधा न देना।’

“उन्हें पा जाने पर यह सब ठीक ठीक दीख पड़ता है; वही जीव, जगत्, चौबीसों तत्त्व – यह सब हुए हैं।

“परन्तु, यदि वे ‘मैं’ को बिलकुल मिटा दें, तब क्या होता है, यह मुँह से नहीं कहा जा सकता। जैसे रामप्रसाद ने कहा है – ‘तब तुम अच्छी हो या मैं अच्छा हूँ यह तुम्हीं समझोगी।’

“वह अवस्था भी मुझे कभी कभी होती है।

“विचार करने से एक तरह का दर्शन होता है और जब वे दिखा देते हैं तब एक दूसरे तरह का।”

परिच्छेद ६४

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परिच्छेद ६४

जीवनोद्देश्य – ईश्वरदर्शन

दूसरे दिन सोमवार, १७ दिसम्बर १८८३, सबेरे आठ बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण उसी कमरे में बैठे हुए हैं। राखाल, लाटू आदि भक्त भी हैं। मणि फर्श पर बैठे हैं। मधु डाक्टर भी आये हुए हैं। वे श्रीरामकृष्ण के पास उसी छोटी खाट पर बैठे हैं। मधु डाक्टर वयोवृद्ध हैं – श्रीरामकृष्ण को कोई बीमारी होने पर प्रायः ये आकर देख जाया करते हैं। स्वभाव के बड़े रसिक हैं।

श्रीरामकृष्ण – बात है सच्चिदानन्द पर प्रेम। कैसा प्रेम? – ईश्वर को किस तरह प्यार करना चाहिए? गौरी पण्डित कहता था, राम को जानना हो तो सीता की तरह होना चाहिए। भगवान् को जानने के लिए भगवती की तरह होना चाहिए। भगवती ने शिव के लिए जैसी कठोर तपस्या की थी, वैसी ही तपस्या करनी चाहिए। पुरुष को जानने का अभिप्राय हो तो प्रकृतिभाव का आश्रय लेना पड़ता है – सखीभाव, दासीभाव, मातृभाव।

“मैंने सीतामूर्ति के दर्शन किए थे। देखा, सब मन राम में ही लगा हुआ है। योनि, हाथ, पैर, कपड़े-लत्ते, किसी पर दृष्टि नहीं है। मानो जीवन ही राममय है – राम के बिना रहे, राम को बिना पाए, जी नहीं सकती।”

मणि – जी हाँ, जैसे पगली!

श्रीरामकृष्ण – उन्मादिनी! – अहा! ईश्वर को प्राप्त करना हो तो पागल होना पड़ता है।

“कामिनी-कांचन पर मन के रहने से नहीं होता। कामिनी के साथ रमण - इसमें क्या सुख है? ईश्वरदर्शन होने पर रमण सुख से करोड़गुना आनन्द होता है। गौरी कहता था, महाभाव होने पर शरीर के सब छिद्र – रोमकूप भी – महायोनि हो जाते हैं। एक-एक छिद्र में आत्मा के साथ आत्मा का रमण-सुख होता है!

“व्याकुल होकर उन्हें पुकारना चाहिए। गुरु के श्रीमुख से सुन लेना चाहिए कि वे क्या करने से मिलेंगे।

“गुरु तभी मार्ग बतला सकेंगे जब वे स्वयं पूर्णज्ञानी होंगे। पूर्णज्ञान होने पर वासना चली जाती है। पाँच वर्ष के बालक का-सा स्वभाव हो जाता है। दत्तात्रेय और जड़भरत, ये बालस्वभाव के थे।”

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३८४श्रीरामकृष्णवचनामृत१७ दिसम्बर, १८८३

मणि – जी हाँ, इनके बारे में लोगों को ज्ञात है, पर इनके अलावा और भी कितने ही ज्ञानी इनकी तरह के हो गए होंगे।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, ज्ञानी की सब वासना चली जाती है। – जो कुछ रह जाती है, उसमें कोई हानि नहीं होती। पारस पत्थर के छू जाने पर तलवार सोने की हो जाती है, फिर उस तलवार से हिंसा का काम नहीं होता। इसी तरह ज्ञानी में कामक्रोध का आकार मात्र रहता है, – नाममात्र – उससे कोई अनर्थ नहीं होता।

मणि – आप जैसा कहा करते हैं, ज्ञानी तीनों गुणों से परे हो जाता है। सत्त्व, रज, और तम – किसी गुण के वश में वह नहीं रहता। ये तीनों गुण डकैत हैं।

श्रीरामकृष्ण – इस बात की धारणा करनी चाहिए।

मणि – पूर्णज्ञानी संसार में शायद तीन-चार मनुष्यों से अधिक न होंगे।

श्रीरामकृष्ण – क्यों? पश्चिम के मठों में तो बहुत से साधुसंन्यासी दीख पड़ते हैं।

मणि – जी, इस तरह का संन्यासी तो मैं भी हो जाऊँ!

इस बात पर श्रीरामकृष्ण कुछ देर तक मणि की ओर देखते रहे।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – क्या? सब त्यागकर?

मणि – माया के बिना गए क्या होगा? माया को जीत न पाया तो केवल संन्यासी होकर क्या होगा?

सब लोग कुछ समय तक चुप रहे।

त्रिगुणातीत भक्त बालक के समान

मणि – अच्छा त्रिगुणातीत भक्ति किसे कहते हैं?

श्रीरामकृष्ण – उस भक्ति के होने पर भक्त सब चिन्मय देखता है। चिन्मय श्याम, चिन्मय धाम – भक्त भी चिन्मय – सब चिन्मय! ऐसी भक्ति कम लोगों की होती है।

डाक्टर मधु (सहास्य) – त्रिगुणातीत भक्ति, अर्थात् भक्त किसी गुण के वश नहीं।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – हाँ, जैसे पाँच साल का लड़का – किसी गुण के वश नहीं।

दोपहर को, भोजन के बाद, श्रीरामकृष्ण थोड़ा विश्राम कर रहे हैं। श्री मणिलाल मल्लिक ने आकर प्रणाम किया; फिर जमीन पर बैठ गए। मणि भी जमीन पर बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण लेटे लेटे ही मणि मल्लिक के साथ बीच बीच में एक एक बात कह रहे हैं।

मणि मल्लिक – आप केशव सेन को देखने गए थे?

श्रीरामकृष्ण – हाँ। अब वे कैसे हैं?

मणि मल्लिक – रोग कुछ घटता हुआ नहीं दीख पड़ता।

श्रीरामकृष्ण – मैंने देखा, बड़ा राजसिक है। मुझे बड़ी देर तक बैठा रखा, तब भेंट

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हुईं।

श्रीरामकृष्ण उठकर बैठ गए और भक्तों के साथ बातचीत करने लगे।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – मैं ‘राम राम’ कहकर पागल हो गया था। संन्यासी के देवता रामलला को लेकर घूमता फिरता था – उसे नहलाता था, खिलाता था, सुलाता था। जहाँ कहीं जाता, साथ ले जाता था। ‘रामलला’ ‘रामलला’ कहकर पागल हो गया था।

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परिच्छेद ६५

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परिच्छेद ६५

भक्तों के साथ

(१)

श्रीकृष्णभक्ति

श्रीरामकृष्ण सदा ही समाधिमग्न रहते हैं; केवल राखाल आदि भक्तों की शिक्षा के लिए उन्हें लेकर व्यस्त रहते हैं - जिससे उन्हें चैतन्य प्राप्त हो।

वे अपने कमरे के पश्चिमवाले बरामदे में बैठे हैं। प्रातःकाल का समय, मंगलवार, १८ दिसम्बर १८८३ ई.। स्वर्गीय देवेन्द्रनाथ ठाकुर की भक्ति और वैराग्य की बात पर वे उनकी प्रशंसा कर रहे हैं। राखाल आदि बालक भक्तों से वे कह रहे हैं, - “वे सज्जन व्यक्ति हैं। परन्तु जो गृहस्थाश्रम में प्रवेश न कर बचपन से ही शुकदेव आदि की तरह दिनरात ईश्वर का चिन्तन करते हैं, कौमार अवस्था में वैराग्यवान् हैं, वे धन्य हैं।

“गृहस्थ की कोई न कोई कामना-वासना रहती ही है, यद्यपि उसमें कभी कभी भक्ति - अच्छी भक्ति - दिखायी देती है। मथुरबाबू न जाने किस एक मुकदमे में फँस गए थे; मन्दिर में माँ काली के पास आकर मुझसे कहते हैं, ‘बाबा, माँ को यह अर्घ्य दीजिए न!’ मैंने उदार मन से दिया। परन्तु कैसा विश्वास है कि मेरे देने से ही ठीक होगा।

“रति की माँ की इधर कितनी भक्ति है! अक्सर आकर कितनी सेवा-टहल करती है! रति की माँ वैष्णव है। कुछ दिनों के बाद ज्योंही देखा कि मैं माँ काली का प्रसाद खाता हूँ - त्योंही उसने आना बन्द कर दिया। कैसा एकांगी दृष्टिकोण है। लोगों को पहले-पहल देखने से पहचाना नहीं जाता।”

श्रीरामकृष्ण कमरे के भीतर पूर्व की ओर के दरवाजे के पास बैठे हैं। जाड़े का समय। बदन पर एक ऊनी चद्दर है। एकाएक सूर्य देखते ही समाधिमग्न हो गये। आँखें स्थिर! बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं।

क्या यही गायत्रीमन्त्र की सार्थकता है - ‘तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि’?

बहुत देर बाद समाधि भंग हुई। राखाल, हाजरा, मास्टर आदि पास बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण (हाजरा के प्रति) - समाधि या भाव-अवस्था की प्रेरणा प्रेम से ही होती है। श्यामबाजार में नटवर गोस्वामी के मकान पर कीर्तन हो रहा था - श्रीकृष्ण और

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

१८ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६५ | ३८७

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गोपियों का दर्शन कर मैं समाधिमग्न हो गया! ऐसा लगा कि मेरा लिंगशरीर (सूक्ष्मशरीर) श्रीकृष्ण के पैरों के पीछे पीछे जा रहा है।

“जोड़ासाँकू हरिसभा में उसी प्रकार कीर्तन के समय समाधिस्थ होकर बाह्यशून्य हो गया था। उस दिन देहत्याग की सम्भावना थी!”

श्रीरामकृष्ण स्नान करने गए। स्नान के बाद उसी गोपीप्रेम की ही बात कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मणि आदि के प्रति) – “गोपियों के केवल उस आकर्षण को लेना चाहिए। इस प्रकार के गाने गाया करो –

(भावार्थ) – “सखि, वह वन कितनी दूर है, जहाँ मेरे श्यामसुन्दर हैं। मैं तो और चल नहीं सकती।”

(भावार्थ) – “सखि, जिस घर में कृष्णनाम लेना कठिन है उस घर में तो मैं किसी भी तरह नहीं जाऊँगी!”

(२)

यदु मल्लिक के मकान पर

श्रीरामकृष्ण ने राखाल के लिए सिद्धेश्वरी के नाम पर कच्चे नारियल और चीनी की मन्नत की है। मणि से कह रहे हैं, “तुम नारियल और चीनी का दाम दोगे।”

दोपहर के बाद श्रीरामकृष्ण राखाल, मणि आदि के साथ कलकत्ते के श्री सिद्धेश्वरी-मन्दिर की ओर गाड़ी पर सवार होकर आ रहे हैं। रास्ते में सिमुलियाबाजार से कच्चा नारियल और चीनी खरीदी गयी।

मन्दिर में आकर भक्तों से कह रहे हैं, “एक नारियल फोड़कर चीनी मिलाकर माँ को अर्पण करो।”

जिस समय मन्दिर में आ पहुँचे, उस समय पुजारी लोग मित्रों के साथ माँ काली के सामने ताश खेल रहे थे। यह देखकर श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं, “देखो, ऐसे स्थानों में भी ताश! यहाँ पर तो ईश्वर का चिन्तन करना चाहिए!”

अब श्रीरामकृष्ण यदु मल्लिक के घर पर पधारे हैं। उनके पास अनेक बाबू लोग बैठे हुए हैं।

यदुबाबू कह रहे हैं, “पधारिए, पधारिए।” आपस में कुशल प्रश्न के बाद श्रीरामकृष्ण बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (हँसकर) – तुम इतने चापलूसों को क्यों रखते हो?

यदु (हँसते हुए) – इसलिए कि आप उनका उद्धार करें। (सभी हँसने लगे।)

श्रीरामकृष्ण – चापलूस लोग समझते हैं कि बाबू उन्हें खुले हाथ धन दे देंगे; परन्तु बाबू से धन निकालना बड़ा कठिन काम है। एक सियार एक बैल को देख उसका फिर साथ

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३८८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १८ दिसम्बर, १८८३

न छोड़े। बैल चरता फिरता है, सियार भी साथ साथ है। सियार ने समझा कि बैल का जो अण्डकोष लटक रहा है, वह कभी न कभी गिरेगा और उसे वह खायेगा! बैल कभी सोता है तो वह भी उसके पास ही लेटकर सो जाता है और जब बैल उठकर घूम-फिरकर चरता है तो वह भी साथ साथ रहता है। कितनेही दिन इसी प्रकार बीते, परन्तु वह कोष न गिरा, तब सियार निराश होकर चला गया! (सभी हँसने लगे।) इन चापलूसों की ऐसी ही दशा है!

यदुबाबू और उनकी माँ ने श्रीरामकृष्ण तथा भक्तों को जलपान कराया।

□ □ □

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

परिच्छेद ६६

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परिच्छेद ६६

बिल्ववृक्ष और पंचवटी के नीचे

(१)

निराकार साधना

श्रीरामकृष्ण बेल के पेड़ के पास खड़े हुए मणि से बातचीत कर रहे हैं। दिन के नौ बजे होंगे।

आज बुधवार है, १९ दिसम्बर १८८३ अगहन की कृष्णापंचमी है।

इस बेल के पेड़ के नीचे श्रीरामकृष्ण ने साधना की थी। यह स्थान अत्यन्त निर्जन है। इसके उत्तर तरफ बारूदखाना और चारदीवार है। पश्चिम तरफ झाऊ के पेड़, जो हवा के झोकों से हृदय में उदासीनता भर देनेवाली सनसनाहट पैदा करते हैं। आगे हैं भागीरथी। दक्षिण की ओर पंचवटी दिखायी पड़ रही है। चारों ओर इतने पेड़-पत्ते हैं कि देवालय पूर्ण तरह से दिखायी नहीं आते।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – पर कामिनी-कांचन का त्याग किये बिना कुछ होने का नहीं।

मणि – क्यों? वशिष्ठदेव ने तो श्रीरामचन्द्र से कहा था – राम, संसार अगर ईश्वर से अलग हो तो संसार का त्याग कर सकते हो।'

श्रीरामकृष्ण (जरा हँसकर) – वह रावणवध के लिए कहा था। इसीलिए राम को संसार में रहना पड़ा और विवाह भी करना पड़ा।

मणि काठ की मूर्ति की तरह चुपचाप खड़े रहे।

श्रीरामकृष्ण यह कहकर अपने कमरे में लौट जाने के लिए पंचवटी की ओर जाने लगे।

मणि – साधना करने पर क्या ज्ञान और भक्ति दोनों ही नहीं हो सकते?

श्रीरामकृष्ण – भक्ति लेकर रहने पर दोनों ही होते हैं। जरूरत होने पर वही ब्रह्मज्ञान देते हैं। खूब ऊँचा आधार हुआ तो एक साथ दोनों हो सकते हैं। ईश्वरकोटियों का होता है, – जैसे चैतन्यदेव का। जीवकोटियों की अलग बात है।

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३९० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १९ दिसम्बर, १८८३

“आलोक (ज्योति) पाँच प्रकार के हैं। दीपक का प्रकाश, भिन्न भिन्न प्रकार की अग्नि का प्रकाश, चन्द्रमा का प्रकाश, सूर्य का प्रकाश तथा चन्द्र और सूर्य का सम्मिलित प्रकाश। भक्ति है चन्द्रमा और ज्ञान है सूर्य।

“कभी कभी आकाश में सूर्यास्त होने से पहले ही चन्द्र का उदय हो जाता है, अवतार आदि में भक्तिरूपी चन्द्रमा तथा ज्ञानरूपी सूर्य एकाधार में देखे जाते हैं।

“क्या इच्छा करने से ही सभी को एक ही समय ज्ञान और भक्ति दोनों प्राप्त होते हैं? आधारों की भी विशेषता है। कोई बाँस अधिक पोला रहता है और कोई कम पोला। सभी आधारों में ईश्वर की धारणा थोड़े ही होती है। सेर भर के लोटे में क्या दो सेर दूध आ सकता है?

मणि – क्यों, उनकी कृपा से यदि वे कृपा करें तब तो सूई के छेद से ऊँट भी पार हो सकता है।

श्रीरामकृष्ण – परन्तु कृपा क्या यों ही होती है? भिखारी यदि एक पैसा माँगे तो दिया जा सकता है। परन्तु एकदम यदि रेल का भाड़ा माँग बैठे तो?

मणि चुपचाप खड़े हैं, श्रीरामकृष्ण भी चुप हैं। एकाएक बोल उठे, “हाँ, अवश्य, किसी किसी पर उनकी कृपा होने से हो सकता है, दोनों बातें हो सकती हैं।”

पंचवटी के नीचे आप मणि से फिर वार्तालाप करने लगे। दस बजे का समय होगा।

मणि – अच्छा, क्या निराकार की साधना नहीं होती?

श्रीरामकृष्ण – होती क्यों नही? वह रास्ता बड़ा कठिन है। पहले के ऋषि कठिन तपस्या करके तब कहीं ब्रह्मवस्तु का अनुभव कर पाते थे। ऋषियों को कितनी मेहनत करनी पड़ती थी – अपनी कुटिया से सुबह को निकल जाते थे। दिनभर तपस्या करके सन्ध्या के बाद लौटते थे। तब आकर कुछ फल-मूल खाते थे।

“इस साधना में विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते सफलता न होगी। रूप, रस, गन्ध, स्पर्श – ये सब विषय मन में जब बिलकुल न रह जाएँ, तब मन शुद्ध होता है। वह शुद्ध मन जो कुछ है, शुद्ध आत्मा भी वही है। मन में कामिनी-कांचन बिलकुल न रह जाएँ।

“तब एक और अवस्था होती है – ‘ईश्वर ही कर्ता हैं, मैं अकर्ता हूँ।’ ‘मेरे बिना काम नहीं चल सकता’ ऐसा भाव तब बिलकुल नहीं रहता – सुख में भी और दुःख में भी।

“किसी मठ के साधु को दुष्टों ने मारा था। मार खाकर वह बेहोश हो गया। चेतना आने पर जब उससे पूछा गया, ‘तुम्हें कौन दूध पिला रहा है?’ तब उसने कहा था, ‘जिन्होंने मुझे मारा था वे ही मुझे अब दूध पिला रहे हैं।’ ”

मणि – जी हाँ, यह जानता हूँ।