Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

About this granth

The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.

This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.

The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.

Page 952Permalink

में शत्रुओं को काटते हो. (३)
स त्वं न इन्द्राकवाभिरूती सखा विश्वायुरविता वृधे भूः.
स्वर्षता यद्धवयामसि त्वा युध्यन्तो नेमधिता पृत्सु शूर.. (४)
हे सब जगह जाने वाले इंद्र! तुम दोषरहित रक्षा साधनों द्वारा उन्नति के लिए हमारी रक्षा
करो तथा हमारे मित्र बनो. हे शूर इंद्र! हम अपने कुछ सैनिकों के साथ संग्राम करते हुए धन
प्राप्त करने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. (४)
नूनं न इन्द्रापराय च स्या भवा मृळीक उत नो अभिष्टौ.
इत्था गृणन्तो महिनस्य शर्मन्दिवि ष्याम पार्ये गोषतमाः.. (५)
हे इंद्र! तुम आज एवं अन्य दिनों में निश्चितरूप से हमारे बनो एवं हमारे समीप आकर
हमें सुखी बनाओ. हम इस प्रकार की स्तुतियों द्वारा गायों के स्वामी बनकर तुम्हारे द्वारा प्रदत्त
तेजस्वी सुख में स्थित रहें. (५)
सूक्त—३४ देवता—इंद्र
सं च त्वे जग्मुर्गिर इन्द्र पूर्वीर्वि च त्वद्यन्ति विभ्वो मनीषाः.
पुरा नूनं च स्तुतय ऋषीणां परस्पृध्र इन्द्र अध्युक्थार्का.. (१)
हे इंद्र! तुम में बहुत से स्तुति-वचन मिलते हैं. स्तोताओं की विस्तृत विचारधाराएं तुम्हीं
से निकलती हैं. प्राचीन एवं वर्तमान ऋषियों की स्तुतियां, मंत्र एवं उपासना इंद्र के विषय में
एक-दूसरे से बढ़कर हैं. (१)
पुरुहूतो यः पुरुगूर्त ऋभ्वाँ एकः पुरुप्रशस्तो अस्ति यज्ञैः.
रथो न महे शवसे युजानो ३ स्माभिरिन्द्रो अनुमाद्यो भूत्.. (२)
हम लोग बहुतों द्वारा बुलाए गए, बहुतों द्वारा प्रोत्साहित महान्, अद्वितीय एवं बहुतों
द्वारा स्तुत इंद्र को यज्ञ द्वारा प्रसन्न करते हैं. इंद्र रथ के समान महान् शक्ति प्राप्त करने के
लिए हमारे द्वारा सदा स्तुति का विषय बनें. (२)
न यं हिंसन्ति धीतयो न वाणीरिन्द्रं नक्षन्तीदभि वर्धयन्तीः.
यदि स्तोतारः शतं यत्सहस्रं गृणन्ति गिर्वणसं शं तदस्मै.. (३)
सेवाकर्म एवं स्तुति-वचन इंद्र को बाधा नहीं पहुंचा सकते. इंद्र की वृद्धि करती हुई
स्तुतियां उनके सामने जाती हैं. सैकड़ों एवं हजारों स्तोता स्तुतिपात्र इंद्र की स्तुति करके उन्हें
प्रसन्न करते हैं. (३)
अस्मा एतद्दिव्य१ र्चेव मासा मिमिक्ष इन्द्रे न्ययामि सोमः.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 953Permalink

जनं न धन्वन्नभि सं यदापः सत्रा वावृधुर्हवनानि यज्ञैः.. (४)
आज यज्ञ में इंद्र को स्तोत्रों के साथ अर्पित करने हेतु मंत्रों-सहित सोमरस तैयार है.
जिस प्रकार मरुभूमि की ओर बहने वाला जल मनुष्यों का पालन करता है, उसी प्रकार यज्ञ
के साथ दिए गए हव्य इंद्र को पुष्ट करें. (४)
अस्मा एतन्मह्याङ्गूषमस्मा इन्द्राय स्तोत्रं मतिभिरवाचि.
असदद्यथा महति वृत्रतूर्य इन्द्रो विश्वायुरविता वृधश्च.. (५)
स्तोताओं द्वारा इंद्र के लिए यह स्तोत्र इसलिए बोला जाता है, जिससे संग्राम में वह
हमारे रक्षक एवं वृद्धिकर्त्ता हों. (५)
सूक्त—३५ देवता—इंद्र
कदा भुवन्रथक्षयाणि ब्रह्म कदा स्तोत्रे सहस्रपोष्यं दाः.
कदा स्तोमं वासयोऽस्य राया कदा धियः करसि वाजरत्नाः.. (१)
हे इंद्र! हमारी स्तुतियां तुम्हें पाकर कब रथ पर चढ़ेंगी? मुझ स्तोता को तुम हजार लोगों
का पोषण करने वाली गाएं कब दोगे? मेरे स्तोत्रों को धन से युक्त कब करोगे? तुम यज्ञकर्मों
को अन्न से सुशोभित कब करोगे? (१)
कर्हि स्वित्तिन्द्र यन्नृभिर्नॄन्वीरैर्वीरान्रान्नीळयासे जयाजीन्.
त्रिधातु गा अधि जयास गोष्विन्द्र द्युम्नं स्वर्वद्धेह्यस्मे.. (२)
हे इंद्र! तुम हमारे सैनिकों को शत्रु सैनिकों एवं हमारी संतान को शत्रुसंतान के साथ कब
भिड़ाओगे तथा युद्ध में शत्रुओं को कब जीतोगे? तुम शत्रुओं की दूध, दही एवं घी देने वाली
गायों को अधिक संख्या में कब जीतोगे? हे इंद्र! तुम हमें व्याप्त धन कब दोगे? (२)
कर्हि स्वित्तिन्द्र यज्जरित्रे विश्वप्सु ब्रह्म कृणवः शविष्ठ.
कदा धियो न नियुतो युवासे कदा गोमघा हवनानि गच्छाः.. (३)
हे अतिशय बलवान् इंद्र! तुम स्तुतिकर्त्ता को सभी प्रकार का अन्न कब दोगे? तुम
यज्ञकर्मों एवं स्तुतियों को अपने में कब मिलाओगे? तुम स्तोत्रों को गाय देने वाला कब
बनाओगे? (३)
स गोमघा जरित्रे अश्वश्चन्द्रा वाजश्रवसो अधि धेहि पृक्षः.
पीपिहीषः सुदुघामिन्द्र धेनुं भरद्वाजेषु सुरुचो रुरुच्याः.. (४)
हे इंद्र! हम स्तुति करने वाले भरद्वाजगोत्रीय ऋषियों को गाएं देने वाला एवं शक्तिशाली
घोड़ों से युक्त प्रसिद्ध अन्न दो. तुम अन्नों तथा सरलता से दुही जाती गायों को हमें दो एवं उन्हें
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 954Permalink

दीप्त बनाओ. (४)
तमा नूनं वृजनमन्यथा चिच्छूरो यच्छक्र वि दुरो गृणीषे.
मा निररं शुक्रदुघस्य धेनोराङ्गिरसान्ब्रह्मणा विप्र जिन्व.. (५)
हे इंद्र! तुम हमारे शत्रु को मृत्यु से मिलाओ. हे शूर एवं शत्रुहंता इंद्र! हम तुम्हारी स्तुति
करते हैं. हे श्वेत दूध देने वाली गो के दाता इंद्र! हम तुम्हारी स्तुतियों से कभी रुकें नहीं. हे
बुद्धिमान् इंद्र! अंगिरागोत्र वालों को अन्न से तृप्त करो. (५)
सूक्त—३६ देवता—इंद्र
सत्रा मदासस्तव विश्वजन्याः सत्रा रायोऽध ये पार्थिवासः.
सत्रा वाजानामभवो विभक्ता यद्देवेषु धारयथा असुर्यम्.. (१)
हे इंद्र! यह बात सत्य है कि तुम्हारी सोमपान से उत्पन्न प्रसन्नता सबको हितकारक होती
है. तीनों लोकों में स्थित तुम्हारी संपत्तियां भी लोगों का हित करती हैं. तुम निसंदेह अन्न देने
वाले एवं देवों में बल धारण करने वाले हो. (१)
अनु प्र येजे जन ओजो अस्य सत्रा दधिरे अनु वीर्याय.
स्यूमगृभे दुधयेऽर्वते च क्रतुं वृञ्जन्त्यपि वृत्रहत्ये.. (२)
यजमान इंद्र के बल की सदा विशेष प्रकार से पूजा करता है. यह सत्य है कि वीरता का
काम करने के लिए इंद्र को आगे रखता है. शत्रुओं की घनी पंक्ति के रोकने वाले, हिंसक एवं
उन पर आक्रमण करने वाले इंद्र वृत्र राक्षस को मारने के लिए जाते हैं. (२)
तं सध्रीचीरूतयो वृष्ण्यानि पौंस्यानि नियतः सश्चुरिन्द्रम्.
समुद्रं न सिन्धव उक्थशुष्मा उरुव्यचसं गिर आ विशन्ति.. (३)
परस्पर संगत मरुद्गण एवं वीर्यबल से युक्त तथा रथ में जुते हुए अश्व इंद्र की सेवा
करते हैं. नदियां जिस प्रकार समुद्र से मिलती हैं, उसी प्रकार मंत्र-प्रधान स्तुतियां सर्वत्र
व्यापक इंद्र से मिलती हैं. (३)
स रायस्खामुप सृजा गृणानः पुरुश्चन्द्रस्य त्वमिन्द्र वस्वः.
पतिर्बभूथासमो जनानामेको विश्वस्य भुवनस्य राजा.. (४)
हे इंद्र! तुम स्तुतियां सुनकर धन की सरिता बहा दो. धन बहुतों को प्रसन्नता एवं
निवासस्थान देने वाला है. तुम मनुष्यों के अद्वितीय स्वामी एवं सारे संसार के राजा हो. (४)
स तु श्रुधि श्रुत्या यो दुवोयुर्द्यौर्न भूमिभि रायो अर्यः.
असो यथा नः शवसा चकानो युगेयुगे वयसा चेकितानः.. (५)
ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—३७ देवता—इंद्र

Page 955Permalink

हे इंद्र! सुनने योग्य स्तोत्रों को जल्दी सुनो एवं हमारी सेवा की कामना करते हुए सूर्य के
समान शत्रुओं का धन जीतो. तुम समय-समय पर बल से स्तुति के विषय और हव्यान्र द्वारा
भली-भांति ज्ञात होकर पहले के समान हमारे पास रहो. (५)
सूक्त—३७ देवता—इंद्र
अर्वाग्रथं विश्ववारं त उग्रेन्द्र युक्तासो हरयो वहन्तु.
कीरिश्चिद्धि त्वा हवते स्वर्नान्नृधीमहि सधमादस्ते अद्य.. (१)
हे उग्र इंद्र! तुम्हारे रथ में जुड़े हुए घोड़े तुम्हारे सब लोगों द्वारा पूजा योग्य रथ को मेरे
सामने लावें. गुण वाले स्तोता अर्थात् भरद्वाज तुम्हें बुलाते हैं. हम आज तुम्हारे साथ प्रसन्न
होते हुए उन्नति करें. (१)
प्रो द्रोणे हरयः कर्माग्मन्पुनानास ऋज्यन्तो अभूवन्.
इन्द्रो नो अस्य पूर्व्यः पपीयाद्द्युक्षो मदस्य सोम्यस्य राजा.. (२)
हरे रंग का सोमरस हमारे यज्ञ में बहता है एवं पवित्र बनकर कलश में सीधी तरह जाता
है. पुरातन, दीप्तिशाली एवं इस नशीले सोमरस के राजा इंद्र इस सोमरस को पिएं. (२)
आसस्राणासः शवसानमच्छेन्द्रं सुचक्रे रथ्यासो अश्वाः.
अभि श्रव ऋज्यन्तो वहेयुर्नू चिन्नु वायोरमृतं वि दस्येत्.. (३)
चारों ओर चलने वाले एवं शोभन पहियों वाले रथ में जुड़े हुए घोड़े रथ पर बैठे हुए इंद्र
को हमारे सामने लावें. अमृत-तुल्य सोमरसरूपी हवि हवा से न सूखे. (३)
वरिष्ठो अस्य दक्षिणामिर्तीन्द्रो मघोनां तुविकूर्मितमः.
यया वज्रिवः परियास्यंहो मघा च धृष्णो दयसे वि सूरीन्.. (४)
अतिशय शक्तिशाली एवं भांति-भांति के काम करने वाले इंद्र हव्य-अन्न के स्वामी लोगों
के मध्य यजमान को दक्षिणा देते हैं. हे वज्रधारी इंद्र! तुम उसी दक्षिणा द्वारा पाप का नाश
करते हो. हे शत्रुनाशक इंद्र! उसी दक्षिणा से तुम स्तोताओं को धन तथा संतान देते हो. (४)
इन्द्रो वाजस्य स्थविरस्य दातेन्द्रो गीर्भिर्वर्धतां वृद्धमहाः.
इन्द्रो वृत्रं हनिष्ठो अस्तु सत्वा ता सूरिः पृणाति तूतुजानः.. (५)
इंद्र महान् बल के दाता हों. तेजस्वी इंद्र हमारी स्तुतियों के कारण वृद्धि प्राप्त करें.
शत्रुनाशक इंद्र जल रोकने वाले को मारें. इंद्र अत्यंत शीघ्रतापूर्वक वे धन हमें दें. (५)
सूक्त—३८ देवता—इंद्र
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 956Permalink

अपादित उदु नश्चित्रतमो महीं भर्षद्द्युमतीमिन्द्रहूतिम्.
पन्यसीं धीतिं दैव्यस्य यामञ्जनस्य रातिं वनते सुदानुः.. (१)
अतिशय विचित्र इंद्र हमारे चमस से सोमरस पिएं एवं अपने से संबंधित हमारी महती
एवं दीप्तिमती स्तुति स्वीकार करें. शोभन दान वाले इंद्रदेव कर्म करने वाले यजमान की यज्ञ
में प्रशंसा योग्य स्तुति एवं हव्य स्वीकार करें. (१)
दूराच्चिदा वसतो अस्य कर्णा घोषादिन्द्रस्य तन्यति ब्रुवाणः.
एयमेनं देवहूतिर्ववृत्यान्मद्र्य१ गिन्द्रमियमृच्यमाना.. (२)
इंद्र के कान दूर से ही स्तुतियां सुनने को आते हैं. स्तोता इंद्र की स्तुति करते हैं. देव के
आह्वान के रूप में यह स्तुति अपने आप प्रेरणा देती हुई इंद्र को मेरी ओर ले आवे. (२)
तं वो धिया परमया पुराजामजरमिन्द्रमभ्यनूष्यर्कैः.
ब्रह्मा च गिरो दधिरे समस्मिन्हाँश्च स्तोमो अधि वर्धदिन्द्रे.. (३)
हे प्राचीन काल में उत्पन्न एवं जरारहित इंद्र! हम अति उत्तम स्तुतियों एवं हव्यान्नों से
स्तुति करते हैं. स्तुतियों एवं हव्यान्नों को इंद्र स्वीकार करते हैं. इंद्र के प्रति कही गई स्तुति
बढ़ती है. (३)
वर्धाद्यं यज्ञ उत सोम इन्द्रं वर्धाद्ब्रह्म गिर उक्था च मन्म.
वर्धाहैनमुषसो यामन्नक्तोर्वर्धान्मासाः शरदो द्याव इन्द्रम्.. (४)
यज्ञ एवं सोमरस इंद्र को बढ़ाते हैं. हव्य, स्तुतियां, मंत्र एवं पूजाविधियां इंद्र को बढ़ाती
हैं. उषा, दिन एवं रात की गतियां इंद्र को बढ़ाती हैं. मास, संवत्सर एवं दिन इंद्र को बढ़ाते हैं.
(४)
एवा जज्ञानं सहसे असामि वावृधानं राधसे च श्रुताय.
महामुग्रमवसे विप्र नूनमा विवासैम वृत्रतूर्येषु.. (५)
हे बुद्धिमान्, उक्त प्रकार से उत्पन्न, शत्रुओं को हराने के लिए बहुत अधिक बढ़े हुए,
महान् एवं उग्र इंद्र! हम युद्धों में बल, धन एवं रक्षा पाने के लिए तुम्हारी सेवा करते हैं. (५)
सूक्त—३९ देवता—इंद्र
मन्द्रस्य कवेर्दिव्यस्य वह्नेर्विप्रमन्मनो वचनस्य मध्वः.
अपा नस्तस्य सचनस्य देवेषो युवस्व गृणते गोअग्राः.. (१)
हे इंद्र! तुम हमारे नशीले, वीरताप्रेरक, दिव्य, बुद्धिमानों द्वारा प्रशंसित, प्रसिद्ध एवं
प्रसन्नताकारक सोम को पिओ एवं हमें गाएं आदि धन दो. (१)

Page 957Permalink

अयमुशानः पर्यद्रिमुस्रा ऋतधीतिभिर्ऋतयुग्युजानः.
रुजदरुग्णं वि वलस्य सानुं पर्णीर्वचोभिरभि योधदिन्द्रः.. (२)
इन इंद्र ने पर्वत के द्वारा घिरी हुई गायों के उद्धार की इच्छा से यज्ञ करने वाले
अंगिरागोत्रीय ऋषियों की सच्ची स्तुतियों से प्रभावित होकर असुर को सहायता करने वाले
पर्वत को तोड़ा एवं अपने प्रसिद्ध आयुधों से पणियों से युद्ध किया. (२)
अयं द्योतयदद्युतो व्य१क्तून्दोषा वस्तोः शरद इन्दुरिन्द्र.
इमं केतुमदधुर्नू चिदह्नां शुचिजन्मन उषसश्चकार.. (३)
हे इंद्र! इस सोमरस ने दीप्तिरहित रात, दिन, वर्ष आदि को प्रकाशित किया था. देवों ने
पहले सोम को दिवसों के झंडे के रूप में स्वीकार किया था. इसी सोमरस ने उषाओं को
शोभनजन्म वाली बनाया था. (३)
अयं रोचयदरुचो रुचानो३यं वासयदव्यृ१ तेन पूर्वीः.
अयमीयत ऋतयुग्भिरश्वैः स्वर्विदा नाभिना चर्षणिप्राः.. (४)
इन्हीं दीप्तिशून्य इंद्र ने सूर्य के रूप में प्रकाशित होकर सब लोकों को प्रकाशयुक्त एवं
तेज के द्वारा उषाओं को तेजपूर्ण किया था. प्रजाओं की अभिलाषाएं पूरी करने वाले इंद्र ने
स्तुतियों के अनुसार चलने वाले घोड़ों से खींचे गए एवं धन प्राप्त करने वाले रथ पर बैठकर
गमन किया था. (४)
नू गृणानो गृणते रत्न राजन्निषः पिन्व वसुदेयाय पूर्वीः.
अप ओषधीरविषा वनानि गा अर्वतो नॄन्चसे रिरीहि.. (५)
हे प्राचीन एवं तेजस्वी इंद्र! तुम स्तुति सुनकर धन के पात्र स्तोता को अधिक अन्न दो.
तुम उसे जल, ओषधियां, विषहीन वन, गाएं, घोड़े एवं सेवक प्रदान करो. (५)
सूक्त—४० देवता—इंद्र
इन्द्र पिब तुभ्यं सुतो मदायाव स्य हरी वि मुचा सखाया.
उत प्र गाय गण आ निषद्याथा यज्ञाय गृणते वयो धाः.. (१)
हे इंद्र! यह सोम तुम्हारा नशा बढ़ाने के लिए निचोड़ा गया है. तुम इसे पिओ. अपने
मित्ररूप घोड़ों को रथ में जोतो एवं यात्रा के बाद उन्हें छोड़ दो. तुम स्तोताओं के बीच बैठकर
स्तुतियां गाओ एवं अपने स्तोता को अन्न दो. (१)
अस्य पिब यस्य जज्ञान इन्द्र मदाय क्रत्वे अपिबो विरप्शिन्.
तमु ते गावो नर आपो अद्रिरिन्दुं समह्वन्पीतये समस्मै.. (२)

Page 958Permalink

हे महान् इंद्र! तुमने जन्म लेते ही जिस प्रकार सोमरस पिया था, उसी प्रकार प्रसन्नता
पाने के लिए यह सोम पिओ. तुम्हारे पीने के लिए गाएं, जल, पत्थर एवं सोमलता एकत्र की
गई हैं. (२)
समिद्धे अग्नौ सुत इन्द्र सोम आ त्वा वहन्तु हरयो वहिष्ठाः.
त्वायता मनसा जोहवीमीन्द्रा याहि सुविताय महे नः.. (३)
हे इंद्र! अग्नि प्रज्वलित एवं सोमरस निचुड़ जाने पर तुम्हारे वहनकुशल घोड़े तुम्हें इस
यज्ञ में लावें. हम अपना मन तुम में लगाकर बार-बार बुलाते हैं. तुम हमारी विशाल समृद्धि के
लिए आओ. (३)
आ याहि शश्वदुशता ययाथेन्द्रा महा मनसा सोमपेयम्.
उप ब्रह्माणि शृणव इमा नोऽथा ते यज्ञस्तन्वे३ वयो धात्.. (४)
हे इंद्र! तुम पहले सोमरस पीने के लिए कई बार आए थे. सोमपान करने की महती
अभिलाषा वाले मन से इस समय भी आओ एवं हमारी इन स्तुतियों को सुनो. यजमान तुम्हारे
शरीर को पुष्ट बनाने के लिए तुम्हें सोमरस प्रदान करें. (४)
यदिन्द्र दिवि पार्ये यद्ध्यग्यद्वा स्वे सदने यत्र वासि.
अतो नो यज्ञमवसे नियुत्वानत्सजोषाः पाहि गिर्वणो मरुद्भिः.. (५)
हे स्तुतिपात्र एवं अश्वों के स्वामी इंद्र! तुम दूरवर्ती स्वर्ग में, किसी अन्य स्थान में अथवा
अपने घर में कहीं भी होओ, मरुतों के साथ हमारी रक्षा के लिए इस यज्ञ में आओ. (५)
सूक्त—४१ देवता—इंद्र
अहेळमान उप याहि यज्ञं तुभ्यं पवन्त इन्दवः सुतासः.
गावो न वज्रिन्त्स्वमोको अच्छेन्द्रा गहि प्रथमो यज्ञियानाम्.. (१)
हे इंद्र! तुम क्रोधरहित होकर इस यज्ञ में आओ. तुम्हारे निमित्त ही पवित्र सोमलता को
निचोड़ा गया है. गाएं जिस प्रकार गोशाला में प्रवेश करती हैं, उसी प्रकार सोमरस कलश में
रखा है. हे यज्ञपात्रों में श्रेष्ठ इंद्र! तुम यहां आओ. (१)
या ते काकुत्सुकृता या वरिष्ठा यया शश्वत्पिबसि मध्व ऊर्मिम्.
तया पाहि प्र ते अध्वर्यु्रस्थात्सं ते वज्रो वर्ततामिन्द्र गव्युः.. (२)
हे इंद्र! तुम अपनी सुनिर्मित एवं लंबी जीभ के द्वारा जिस तरह अब तक सोमरस पीते
रहे हो, उसी प्रकार आज भी पिओ. सोमरस लेकर अध्वर्यु तुम्हारे सामने खड़ा है. हे इंद्र!
शत्रुओं की गायों को जीतने का इच्छुक तुम्हारा वज्र शत्रुओं का नाश करे. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 959Permalink

एष द्रप्सो वृषभो विश्वरूप इन्द्राय वृष्णे समकारि सोमः.
एतं पिब हरिवः स्थातरुग्र यस्येशिषे प्रदिवि यस्ते अन्नम्.. (३)
यह तरल, अभिलाषापूरक एवं विविध रूपों वाला सोमरस मनोवांछित फल देने वाले
इंद्र के लिए तैयार किया गया है. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी, सबके अधिपति एवं दृढ़ इंद्र!
तुम उस सोम को पिओ, जिसके ऊपर तुम्हारा अधिकार है एवं जो तुम्हारा भोजन है. (३)
सुतः सोमो असुतादिन्द्र वस्यान्वयं श्रेयाञ्चिकितुषे रणाय.
एतं तितिर्व उप याहि यज्ञं तेन विश्वास्तविषीरा पृणस्व.. (४)
हे इंद्र! निचोड़ा हुआ सोमरस बिना निचुड़ी हुई सोमलता से उत्तम है. हे विचारशील इंद्र!
सोमरस तुम्हारे लिए प्रसन्न करने वाला है. हे शत्रुविजयी इंद्र! तुम यज्ञ के साधनरूप सोम के
समीप आओ तथा इसे पीकर अपनी शक्तियों को पूर्ण करो. (४)
ह्वयामसि त्वेन्द्र याह्यर्वाङ्डरं ते सोमस्तन्वे भवाति.
शतक्रतो मादयस्वा सुतेषु प्रास्माँ अव पृतनासु प्र विक्षु.. (५)
हे इंद्र! हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमारे सामने आओ. हमारा यह सोमरस तुम्हारी शरीर
वृद्धि के लिए पर्याप्त है. हे शतक्रतु इंद्र! तुम यह निचुड़ा हुआ सोमरस पीकर प्रसन्न बनो एवं
युद्धों में सभी ओर से हमारी रक्षा करो. (५)
सूक्त—४२ देवता—इंद्र
प्रत्यस्मै पिपीषते विश्वानि विदुषे भर.
अरङ्गमाय जग्मयेऽपश्चाद्दध्वने नरे.. (१)
हे अध्वर्युगण! पीने के इच्छुक, सब कुछ जानने वाले, अधिक गतिशील, यज्ञों में
उपस्थित रहने वाले, सबसे आगे चलने वाले एवं युद्ध के नेता इंद्र को सोमरस दो. (१)
एमेनं प्रत्येतन सोमेभिः सोमपातमम्. अमत्रेभिर्ऋजीषिणमिन्द्रं सुतेभिरिन्दुभिः.. (२)
हे अध्वर्युगण! तुम सोमरस लेकर अति अधिक सोम पीने वाले इंद्र के पास जाओ. तुम
निचोड़े हुए सोम से भरे पात्र को लेकर शत्रुजयी इंद्र के पास जाओ. (२)
यदि सुतेभिरिन्दुभिः सोमेभिः प्रतिभूषथ. वेदा विश्वस्य मेधिरो धृषत्तन्तमिदेषते.. (३)
हे अध्वर्युगण! निचोड़े हुए एवं दीप्तिशाली सोमरस के साथ तुम इंद्र के सामने जाओ.
मेधावी इंद्र तुम्हारी सभी इच्छाएं जानते हैं एवं शत्रुओं का नाश करते हुए अभिलाषाएं पूरी
करते हैं. (३)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 960Permalink

अस्माअस्मा इदन्धसोऽध्वर्यो प्र भरा सुतम्.
कुवित्समस्य जेन्यस्य शर्धतोऽभिशस्तेरवस्परत्.. (४)
हे अध्वर्युगण! एकमात्र इंद्र को ही निचोड़े हुए सोमरस को हव्य के रूप में दो. इंद्र सभी
जीतने योग्य एवं उत्साह भरे शत्रुओं के द्वेष से हमारी रक्षा करें. (४)
सूक्त—४३ देवता—इंद्र
यस्य त्यच्छम्बरं मदे दिवोदासाय रन्धयः. अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब.. (१)
हे इंद्र! जिस सोमरस को पीने से उत्पन्न मद के कारण तुमने राजा दिवोदास के कल्याण
के लिए शंबर असुर को मारा था, वही सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. तुम इसे पिओ.
(१)
यस्य तीव्रसुतं मदं मध्यमन्तं च रक्षसे. अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब.. (२)
हे इंद्र! सोमलता का नशीला रस प्रातः, मध्याह्न एवं संध्या के यज्ञों में निचोड़ा जाता है.
तुम उसे पीते हो. वही सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. तुम इसे पिओ. (२)
यस्य गा अन्तरश्मनो मदे दृळ्हा अवासृजः. अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब.. (३)
हे इंद्र! जिस सोमरस के नशे में तुमने पर्वत के घेरे में दृढ़तापूर्वक बंद गायों को छुड़ाया
था, वही सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. इसे तुम पिओ. (३)
यस्य मन्दानो अन्धसो माघोनं दधिषे शवः. अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब.. (४)
हे इंद्र! जिस सोमरसरूप अन्न के कारण प्रसन्न होकर तुम अतिशय बल धारण करते
हो, वही सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. इसे तुम पिओ. (४)
सूक्त—४४ देवता—इंद्र
यो रयिवो रयिन्तमो यो द्युम्नैर्द्युम्नवत्तमः.
सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः.. (१)
हे धन के स्वामी एवं स्वधारूप सोम के रक्षक इंद्र! जो सोमरस धन से अत्यंत युक्त एवं
दीप्त यशों के कारण परम तेजस्वी है, वह सोमरस निचुड़ने पर तुम्हें प्रसन्नता दे. (१)
यः शग्मस्तुविशग्म ते रायो दामा मतीनाम्.
सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः.. (२)

Page 961Permalink

हे अतिशय सुखदाता एवं स्वधारूप सोमरस के रक्षक इंद्र! जो सोम तुम्हें परम
सुखकारक एवं स्तोताओं को धन देने वाला है, वही सोमरस निचुड़ने पर तुम्हें प्रसन्नता दे.
(२)
येन वृद्धो न शवसा तुरो न स्वाभिरूतिभिः.
सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः.. (३)
हे सोमरूप अन्न के रक्षक इंद्र! तुम जिस सोमरस को पीकर परम बलवान् बनते हो एवं
अपने रक्षक मरुतों के साथ मिलकर शत्रुओं का नाश करते हो, वही सोमरस निचुड़ने पर
तुम्हें प्रसन्नता प्रदान करे. (३)
त्यमु वो अप्रहणं गृणीषे शवसस्पतिम्. इन्द्रं विश्वासाहं नरं मंहिष्ठं विश्वचर्षणिम्.. (४)
हे यजमानो! हम तुम्हारे कल्याण के निमित्त भक्तों पर अनुग्रह करने वाले, शक्ति के
स्वामी, सभी शत्रुओं को हराने वाले, यज्ञकर्म के नेता, अतिशय दाता एवं सबको देखने वाले
इंद्र की स्तुति करते हैं. (४)
यं वर्धयन्तीद्गिरः पतिं तुरस्य राधसः. तमिन्वस्य रोदसी देवी शुष्मं सपर्यतः.. (५)
इंद्र संबंधी स्तुतियों द्वारा इंद्र का शत्रुधनहर्त्ता बल बढ़ता है. दिव्य धरती-आकाश उसी
बल की सेवा करते हैं. (५)
तद्व उक्थस्य बर्हणेन्द्रायोपस्तृणीषणि. विपो न यस्योतयो वि यद्रोहन्ति सक्षितः.. (६)
हे स्तोताओ! इंद्र के लिए अपने स्तोत्र की महत्ता बढ़ाओ. इंद्र सर्वकार्य कुशल व्यक्ति के
समान सदा तुम्हारी रक्षा करते हैं. (६)
अविदद्दक्षं मित्रो नवीयान्यपानो देवेभ्यो वस्यो अचैत्.
ससवान्त्स्तौलाभिर्धौतरीभिरुष्या पायुरभवत्सखिभ्यः.. (७)
इंद्र यज्ञकर्म में कुशल यजमान को जानते हैं. मित्र एवं अत्यंत ताजा सोमरस पीने वाले
इंद्र स्तोताओं के लिए श्रेष्ठ धन देते हैं. हव्यरूप अन्न से युक्त एवं धरती को कंपित करने वाले
मरुतों के साथ रहने वाले इंद्र स्तोताओं की रक्षा की अभिलाषा से आते हैं एवं उनकी रक्षा
करते हैं. (७)
ऋतस्य पथि वेधा अपायि श्रिये मनांसि देवासो अक्रन्.
दधानो नाम महो वचोभिर्वपुर्दृशये वेन्यो व्यावः.. (८)
यज्ञ के मार्ग में सबको देखने वाला सोमरस पिया गया है. इंद्र का मन अपनी ओर
खींचने के लिए सोम ऋत्विजों द्वारा तैयार किया गया है. इंद्र शत्रुपराभवकारी एवं महान्
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 962Permalink

शरीर धारण करते हुए हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर आविर्भूत हों. (८)
द्युमत्तमं दक्षं धेह्यस्मे सेधा जनानां पूर्वीररातीः.
वर्षीयो वय कृणुहि शचीभिर्धनस्य सातावस्माँ अविड्ढि.. (९)
हे इंद्र! हमें अत्यंत दीप्तिशाली बल दो. हम स्तोता लोगों के बहुत से शत्रुओं को हमसे
दूर करो, अपनी श्रेष्ठ बुद्धियों द्वारा हमें उत्तम धन दो एवं धन का भोग करने के लिए हमारी
रक्षा करो. (९)
इन्द्र तुभ्यमिन्मघवन्नभूम वयं दात्रे हरिवो मा वि वेनः.
नकिरापिर्ददृशे मर्त्यत्रा किमङ्ग रध्रचोदनं त्वाहुः.. (१०)
हे धनस्वामी इंद्र! हम तुम्हारे लिए ही हैं. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम
हव्यदाताओं के प्रतिकूल मत होना. तुम्हारे अतिरिक्त मनुष्यों में हमारा कोई भी बंधु नहीं है. हे
प्रिय इंद्र! इसीलिए प्राचीन लोगों ने तुम्हें धन का प्रेरक कहा है. (१०)
मा जस्वने वृषभ नो रीरीथा मा ते रेवतः सख्य रिषाम.
पूर्वीष्ट इन्द्र निष्षिधो जनेषु जह्यसुष्वीन्प्र वृहापृणतः.. (११)
हे अभिलाषापूरक इंद्र! हमें हानिकारक राक्षसों को मत सौंपना. तुझ धनस्वामी की
मित्रता पाकर हम दुःखी न हों. शत्रुओं तक तुम्हारी रस्सियां फैली हुई हैं. तुम सोम न निचोड़ने
वालों को मारो एवं हव्य न देने वालों को समाप्त करो. (११)
उद्भ्राणीव स्तनयन्नियर्तीन्द्रो राधांस्यश्व्यानि गव्या.
त्वमसि प्रदिवः कारुधाया मा त्वादामान आ दभन्मघोनः.. (१२)
गरजते हुए पर्जन्य जिस प्रकार मेघों को जन्म देते हैं, उसी प्रकार इंद्र होताओं को देने
के लिए घोड़े एवं गो-हितकारी धन उत्पन्न करते हैं. तुम प्राचीन काल से स्तोताओं के रक्षक
हो. धनी लोग दानहीन बनकर हमें कष्ट न दें. (१२)
अध्वर्यो वीर प्र महे सुतानामिन्द्राय भर स ह्यस्य राजा.
यः पूर्वार्याभिरुत नूतनाभिर्गीर्भिर्वावृधे गृणतामृषीणाम्.. (१३)
हे वीर अध्वर्युगण! महान् इंद्र को सोमरस भेंट दो. वे सोम के राजा हैं. ये स्तुतिकर्त्ता
ऋषियों की प्राचीन एवं नवीन स्तुतियों से वृद्धि को प्राप्त हुए हैं. (१३)
अस्य मदे पुरु वर्पांसि विद्वानिन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघान.
तमु प्र होषि मधुमन्तमस्मै सोमं वीराय शिप्रिणे पिबध्यै.. (१४)
विद्वान् एवं अद्वितीय इंद्र ने इस सोमरस के नशे में अनेक विरोधी शत्रुओं को मार
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 963Permalink

डाला. हे अध्वर्युगण! इसी शोभन हनु वाले एवं वीर इंद्र को वह माधुर्ययुक्त सोमरस पीने को
दो. (१४)
पाता सुतमिन्द्रो अस्तु सोमं हन्ता वृत्रं वज्रेण मन्दसानः.
गन्ता यज्ञं परावतश्चिदच्छा वसुर्धीनामविता कारुधायाः.. (१५)
इंद्र इस निचोड़े हुए सोमरस को पिएं एवं प्रसन्न होकर वज्र द्वारा वृत्र को मारें. सबको
घर देने वाले, स्तोताओं के यज्ञकर्म के रक्षक एवं यजमानों के पालक इंद्र दूर देश से भी हमारे
यज्ञ में आवें. (१५)
इदं त्यत्पात्रमिन्द्रपानमिन्द्रस्य प्रियममृतमपायि.
मत्सद्यथा सौमनसाय देवं व्य१स्मद्द्वेषो युयवद्वयंहः.. (१६)
सोमरस इंद्र का प्रिय, अनुकूल एवं पीने योग्य है. इस अमृतरूप सोमरस को पीकर इंद्र
प्रसन्न हों तथा हमारे ऊपर कृपा करके हमारे शत्रुओं एवं पापों को दूर भगावें. (१६)
एना मन्दानो जहि शूर शत्रूञ्जामिमजामिं मघवन्नमित्रान्.
अभिषेणाँ अभ्या३ देदिशानान्पराच इन्द्र प्र मृणा जही च.. (१७)
हे धनस्वामी इंद्र! इस सोमरस को पीकर तुम प्रसन्न बनो एवं हमारे निकटवर्ती एवं
दूरवर्ती शत्रुओं को नष्ट करो. हे इंद्र! जो शत्रु सैनिक हमारे सामने आकर बार-बार हथियार
डाल देते हैं, उन्हें हमसे दूर करके नष्ट करो. (१७)
आसु ष्मा णो मघवन्निन्द्र पृत्स्व१ स्मभ्यं महि वरिवः सुगं कः.
अपां तोकस्य तनयस्य जेष इन्द्र सूरीन्कृणुहि स्मा नो अर्धम्.. (१८)
हे धनस्वामी इंद्र! इन सभी संग्रामों में हमें महान् धन की प्राप्ति सरल बनाओ. तुम हम
स्तोताओं को जल, पुत्र, पौत्र की जय के निमित्त समृद्ध बनाओ एवं शत्रुनाश की शक्ति दो.
(१८)
आ त्वा हरयो वृषणो युजाना वृषरथासो वृषरश्मयोऽत्याः.
अस्मत्राञ्चो वृषणो वज्रवाहो वृष्णे मदाय सुयुजो वहन्तु.. (१९)
हे इंद्र! तुम्हारे अभिलाषापूरक अपने आप रथ में जुड़ने वाले, अभिलाषापूरक रथ को
ढोने वाले, ढीली लगामों वाले, नित्यगतिशील, हमारे सामने आने वाले, सदायूवा, वज्र ढोने
वाले एवं भली प्रकार रथ में जुड़े हुए घोड़े नशीले सोम को पीने के लिए तुम्हें यहां लावें. (१९)
आ ते वृषन्वृषणो द्रोणमस्थुर्धृतपृषो नोर्मयो मदन्तः.
इन्द्र प्र तुभ्यं वृषभिः सुतानां वृष्णे भरन्ति वृषभाय सोमम्.. (२०)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 964Permalink

हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम्हारे जल बरसाने वाले युवा घोड़े पानी फैलाने वाली सागर
तरंगों के समान प्रसन्न होकर तुम्हारे रथ में जुड़े हुए हैं. हे कामवर्षी एवं युवा इंद्र! अध्वर्युगण
तुम्हें पत्थरों की सहायता से निचोड़ा गया सोमरस भेंट करते हैं. (२०)
वृषासि दिवो वृषभः पृथिव्या वृषा सिन्धूनां वृषभः स्तियानाम्.
वृष्णे ते इन्दुर्वृषभ पीपाय स्वादू रसो मधुपेयो वराय.. (२१)
हे इंद्र! तुम हव्यों द्वारा स्वर्ग को तृप्त करने वाले, धरती के अभिलाषापूरक, वर्षा द्वारा
नदियों को भरने वाले एवं स्थावरजंगम सकल विश्व के कामपूरक हो. हे अभिलाषापूरक एवं
वर्षाकारक इंद्र! तुम्हारे लिए ही मधुर सोमरस तैयार किया गया है. (२१)
अयं देवः सहसा जायमान इन्द्रेण युजा पणिमस्तभायत्.
अयं स्वस्य पितुरायुधानीन्दुरमुष्णादशिवस्य माया:.. (२२)
दीप्तिशाली सोम ने अपने मित्र इंद्र के साथ जन्म लेकर पणि को बलपूर्वक रोक लिया
था. इसी सोमरस ने गोरूप धन को पर्वतों में छिपाकर रखने वाले अकल्याणकारी पणियों की
माया एवं आयुध बेकार किए थे. (२२)
अयमकृणोदुषसः सुपत्नीरयं सूर्ये अदधाज्ज्योतिरन्तः.
अयं त्रिधातु दिवि रोचनेषु त्रितेषु विन्ददमृतं निगूळ्हम्.. (२३)
इसी सोमरस ने उषाओं के शोभनपालक सूर्य को सुशोभित किया था एवं सूर्य मंडल के
बीच में ज्योति की स्थापना की थी. तीनों सवनों में तीन प्रकार से वर्तमान इसी सोमरस ने
तेजस्वी तीनों लोकों के बीच छिपे हुए अमृत को पाया था. (२३)
अयं द्यावापृथिवी वि ष्कभायदयं रथमयुनक्सप्तरश्मिम्.
अयं गोषु शच्या पक्वमन्तः सोमो दाधार दशयन्त्रामुत्सम्.. (२४)
इसी सोमरस ने धरती-आकाश को अपने स्थान पर स्थित किया था. इसी ने सात
किरणों वाला रथ तैयार किया था. इस सोम ने ही गायों के मध्य अपने आप निर्मित होने वाले
एवं अनेक धाराओं वाले दूध को धारण किया था. (२४)
सूक्त—४५ देवता—इंद्र व बृहस्पति
य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम्. इन्द्रः स नो युवा सखा.. (१)
जो इंद्र! अपनी उत्तम नीति द्वारा तुर्वश एवं यदु नामक राजाओं को दूर से लाए, वे युवा
इंद्र हमारे मित्र हों. (१)
अविप्रे चिद्ध्यो दधदनाशुना चिदर्वता. इन्द्रो जेता हितं धनम्.. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 965Permalink

इंद्र स्तुति न करने वाले को भी अन्न देते हैं एवं धीमी चाल वाले घोड़े पर चढ़कर शत्रुओं
के छिपे धन को जीतते हैं. (२)
महीरस्य प्रणीतयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः. नास्य क्षीयन्त ऊतयः.. (३)
इंद्र की उत्तम नीतियां महान् एवं स्तुतियां अनेक हैं. इंद्र के रक्षासाधन कभी समाप्त नहीं
होते. (३)
सखायो ब्रह्मवाहसेऽर्चत प्र च गायत. स हि नः प्रमतिर्मही.. (४)
हे मित्ररूप स्तोताओ! मंत्रों द्वारा बुलाने योग्य इंद्र की पूजा एवं स्तुति करो. वे हमें उत्तम
बुद्धि देते हैं. (४)
त्वमेकस्य वृत्रहन्नविता द्वयोरसि. उतेदृशे यथा वयम्.. (५)
हे वृत्रनाशक इंद्र! तुम एक या दो स्तोताओं के रक्षक हो. हमारे जैसे लोगों की तुम्हीं
रक्षा करते हो. (५)
नयसीद्वति द्विषः कृणोष्युक्थशंसिनः. नृभिः सुवीर उच्यसे.. (६)
हे इंद्र! द्वेष करने वालों को हमसे दूर करो एवं हम स्तोताओं को समृद्ध बनाओ. मनुष्य
शोभनपुत्र देने वाले इंद्र की स्तुति करते हैं. (६)
ब्रह्माणं ब्रह्मवाहसं गीर्भिः सखायमृग्मियम्. गां न दोहसे हुवे.. (७)
मैं गाय के समान अभिलाषारूप दूध दुहने के लिए इंद्र को स्तुतियों द्वारा बुलाता हूं. इंद्र
महान्, स्तुतियां स्वीकार करने वाले एवं मित्र हैं. (७)
यस्य विश्वानि हस्तयोरूचुर्वसूनि नि द्विता. वीरस्य पृतनाषहः.. (८)
ऋषि लोगों ने कहा था कि शत्रुसेना को हराने वाले वीर इंद्र के दोनों हाथों में सभी
प्रकार की संपत्तियां हैं. (८)
वि दृळ्हानि चिदद्रिवो जनानां शचीपते. वृह माया अनानत.. (९)
हे वज्रधारी एवं यज्ञ के स्वामी इंद्र! तुम शत्रुओं के दृढ़ नगरों को भग्न करो. हे न झुकने
वाले इंद्र! तुम शत्रुओं की माया को समाप्त करो. (९)
तमु त्वा सत्य सोमपा इन्द्र वाजानां पते. अहुमहि श्रवस्यवः.. (१०)
हे सत्यस्वभाव, सोम पीनेवाले एवं धनों के स्वामी इंद्र! हम अन्न की अभिलाषा से तुम्हें
बुलाते हैं. (१०)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 966Permalink

तमु त्वा यः पुरासिथ यो वा नूनं हिते धने. हव्यः स श्रुधी हवम्.. (११)
हे इंद्र! तुम प्राचीन काल में पुकारने योग्य थे एवं वर्तमान काल में शत्रुओं के छिपे हुए
धन को पाने के लिए बुलाए जाते हो. हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमारी पुकार सुनो. (११)
धीभिर्विद्भिरर्वतो वाजाँ इन्द्र श्रवाय्यान्. त्वया जेष्म हितं धनम्.. (१२)
हे इंद्र! हमारी स्तुतियां सुनकर तुम प्रसन्न होते हो. तुम्हारी कृपा से हम अपने घोड़ों द्वारा
शत्रुओं के घोड़ों, उत्तम अन्नों एवं छिपे हुए धन को जीतने योग्य बनते हैं. (१२)
अभूरू वीर गिर्वणो महाँ इन्द्र धने हिते. भरे वितन्तसाय्यः.. (१३)
हे वीर, स्तुति योग्य एवं महान् इंद्र! तुम शत्रुओं के छिपे हुए धन के निमित्त होने वाले
युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाले हो. (१३)
या त ऊतिरमित्रहन्मक्षूजवस्तमासति. तया नो हिनुही रथम्.. (१४)
हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम अपनी अतिशय तीव्रगति से हमारे रथ को शत्रुविजय के निमित्त
आगे बढ़ाओ. (१४)
स रथेन रथीतमॊऽस्माकेनाभियुग्वना. जेषि जिष्णो हितं धनम्.. (१५)
हे रथ स्वामियों में श्रेष्ठ एवं जयशील इंद्र! तुम हमारे शत्रुपराजयकारी रथ द्वारा शत्रुओं
के छिपे धन को जीतते हो. (१५)
य एक इत्तम ष्टुहि कृष्टीनां विचर्षणिः. पतिर्जज्ञे वृषक्रतुः.. (१६)
उन्हीं एकमात्र इंद्र की स्तुति करो जो प्रजाओं के स्वामी, विशेष द्रष्टा एवं वर्षा करने
वाले के रूप में उत्पन्न हुए थे. (१६)
यो गृणतामिदासिखापिरूती शिवः सखा. स त्वं न इन्द्र मृळय.. (१७)
हे रक्षा द्वारा सुखदाता एवं सखा इंद्र! प्राचीन काल में तुम हम स्तोताओं के बंधु थे. तुम
अब भी हमें सुखी करो. (१७)
धिष्व वज्रं गभस्त्यो रक्षोहत्याय वज्रिवः. सासहीष्ठा अभि स्पृधः.. (१८)
हे वज्रधारी इंद्र! तुम राक्षसों को मारने के हेतु वज्र धारण करते हो एवं विरोध करने
वाली असुर सेनाओं को हराते हो. (१८)
प्रत्नं रयीणां युजं सखायं कीरिचोदनम्. ब्रह्मवाहस्तमं हुवे.. (१९)
मैं सबके आदि, धन प्राप्त करने वाले, सखा, स्तोताओं को प्रोत्साहित करने वाले एवं
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 967Permalink

मंत्रों के द्वारा बुलाने योग्य इंद्र को बुलाता हूं. (१९)
स हि विश्वानि पार्थिवाँ एको वसूनि पत्यते. गिर्वणस्तमो अध्रिगुः.. (२०)
अतिशय स्तुतिपात्र एवं अबाध गति वाले इंद्र ही धरती के सब धनों के एकमात्र स्वामी
हैं. (२०)
स नो नियुद्भि पृण कामं वाजेभिरश्विभिः. गोमद्भिर्गोपते धृषत्.. (२१)
हे गोपालक इंद्र! तुम घोड़ियों के साथ आकर हमारी अभिलाषा अन्न, घोड़ों एवं गायों से
भली-भांति पूरी करो. (२१)
तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने. शं यद्गवे न शाकिने.. (२२)
हे स्तोताओ! गाय को जैसे घास सुख देती है, उसी प्रकार सोमरस इंद्र को सुखी बनाता
है. सोमरस निचुड़ जाने पर यह स्तोत्र बहुतों द्वारा बुलाए गए, शत्रुनाशक एवं दानशील इंद्र के
लिए सुखकर होता है. तुम लोग इंद्र को बुलाओ. (२२)
न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः. यत्सीमुप श्रवद्गिरः.. (२३)
निवासस्थान देने वाले इंद्र तब हमें अनेक गायों सहित अन्न देते हैं, जब वे हमारी
स्तुतियां सुनते हैं. (२३)
कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा गमत्. शचीभिरप नो वरत्.. (२४)
दस्युवधकर्त्ता इंद्र कुवित्स की अनगिनत गायों वाली गोशाला में गए. इंद्र ने अपनी बुद्धि
से उन छिपी हुई गायों को प्रकट किया. (२४)
इमा उ त्वा शतक्रतोऽभि प्र णोनुवुर्गिरः. इन्द्र वत्सं न मातरः.. (२५)
हे सैकड़ों प्रकार के यज्ञ करने वाले इंद्र! जिस प्रकार गाएं बछड़ों के पास बार-बार
जाती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां तुम्हारे समीप पहुंचें. (२५)
दूणाशं सख्यं तव गौरसि वीर गव्यते. अश्वो अश्वायते भव.. (२६)
हे इंद्र! तुम्हारी मित्रता नष्ट नहीं हो सकती. तुम गाय चाहने वाले को गाय देने वाले एवं
घोड़ा चाहने वालों को घोड़ा देने वाले बनो. (२६)
स मन्दस्वा ह्यन्धसो राधसे तन्वा महे. न स्तोतारं निदे करः.. (२७)
हे इंद्र! महान् धन के उद्देश्य से दिए हुए सोमरस से तुम प्रसन्न बनो तथा अपने स्तोता
को निंदक के अधिकार में मत करो. (२७)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 968Permalink

इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरः. वत्सं गावो न धेनवः.. (२८)
हे स्तुतियों द्वारा प्रशंसनीय इंद्र! प्रत्येक बार सोमरस निचुड़ जाने पर हमारी स्तुतियां
उसी प्रकार तुम्हारे पास पहुंचती हैं, जिस प्रकार दुधारू गाएं बछड़ों के पास जाती हैं. (२८)
पुरूतमं पुरूणां स्तोतॄणां विवाचि. वाजेभिर्वाजयताम्.. (२९)
हे अनेक शत्रुओं के नाशक इंद्र! विविध स्तुतियों वाले यज्ञ में हम स्तोताओं की स्तुतियां
हव्यान्नों द्वारा तुम्हें बलवान् बनावें. (२९)
अस्माकमिन्द्र भूतु ते स्तोमो वाहिष्ठो अन्तमः. अस्मान्प्रये महे हिनु.. (३०)
हे इंद्र! हमारी परम उन्नतिकारक स्तुतियां तुम्हारे समीप पहुंचें. तुम हमें महान् धन पाने
के लिए प्रेरित करो. (३०)
अधि बृबुः पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात्. उरुः कक्षो न गाङ्गयः.. (३१)
बृबु पणियों के बीच इतने ऊंचे स्थान पर बैठा था, जितना ऊंचा गंगा का तट होता है.
(३१)
यस्य वायोरिव द्रवद्भद्रा रातिः सहस्रिणी. सद्यो दानाय मंहते.. (३२)
बृबु ने मुझ धन चाहने वाले को एक हजार गाएं हवा के समान तेज गति से प्रदान की
थीं. (३२)
तत्सु नो विश्वे अर्य आ सदा गृणन्ति कारवः.
बृबुं सहस्रदातमं सूरिं सहस्रसातमम्.. (३३)
हम स्तोता सदा उन्हीं श्रेष्ठ बृबु की स्तुति करते हैं. वे हमें हजार गाएं देने वाले, विद्वान्
एवं हजारों स्तुतियों के पात्र हैं. (३३)
सूक्त—४६ देवता—इंद्र
त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः.
त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः.. (१)
हे इंद्र! हम स्तोता अन्न प्राप्ति के कारण तुम्हें बुलाते हैं. अन्य लोग तुझ सज्जन पालक
को घोड़ों वाले संग्राम में विजय पाने के लिए बुलाते हैं. (१)
स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया महः स्तवानो अद्रिवः.
गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे.. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 969Permalink

हे विचित्र, हाथ में वज्र धारण करने वाले, वज्र के स्वामी, शत्रुनाशक एवं महान् इंद्र!
युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाले को तुम जिस प्रकार बहुत सा अन्न देते हो, उसी प्रकार तुम
हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमें गाएं व रथ खींचने में कुशल घोड़े दो. (२)
यः सत्राहा विचर्षणिरिन्द्रं तं हूमहे वयम्.
सहस्रमुष्क तुविनृम्ण सत्पते भवा समत्सु नो वृधे.. (३)
जो इंद्र प्रबल शत्रुओं को मारने वाले एवं सबको देखने वाले हैं, उन्हें हम बुलाते हैं. हे
हजार शेपों (लिंगों) वाले, बहुधनसंपन्न एवं सज्जन पालक इंद्र! युद्धों में तुम हमें समृद्ध
बनाओ. (३)
बाधसे जनान् वृषभेव मन्युना घृषौ मीळ्ह ऋचीषम.
अस्माकं बोधयविता महाधने तनूष्वप्सु सूर्ये.. (४)
हे ऋचाओं के अनुकूल रूप वाले इंद्र! तुम शत्रुबाधक युद्ध में बैल के समान क्रोध में
भरकर हमारे शत्रुओं को पीड़ित करो. धन-निमित्तक महायुद्ध में तुम हमारे रक्षक बनो. हम
संतान, जल एवं सूर्यदर्शन प्राप्त करें. (४)
इन्द्र ज्येष्ठं न आ भरँ ओजिष्ठं पपुरि श्रवः.
येनेमे चित्र वज्रहस्त रोदसी ओभे सुशिप्र प्रा:.. (५)
हे विचित्र, हाथ में वज्र धारण करने वाले एवं सुंदर ठोड़ी वाले इंद्र! जिस अन्न के द्वारा
तुम स्वर्ग एवं धरती का पोषण करते हो, हमें वही अधिक प्रशंसनीय, परम बलकारक एवं
पुष्टिकारक अन्न दो. (५)
त्वामुग्रमवसे चर्षणीसहं राजन्देवेषु हूमहे.
विश्वा सु नो विथुरा पिब्दना वसोऽमित्रान्सुसहान्कृधि.. (६)
हे तेजस्वी, देवों में सर्वाधिक उग्र एवं शत्रुओं को हराने वाले इंद्र! हम अपनी रक्षा के
निमित्त तुम्हें बुलाते हैं. हे निवासस्थान देने वाले इंद्र! तुम सब राक्षसों को दूर भगाओ एवं
हमारे शत्रुओं को सरलता से हराने योग्य बनाओ. (६)
यदिन्द्र नाहुषीष्वाँ ओजो नृम्णं च कृष्टिषु.
यद्वा पञ्च क्षितीनां द्युम्नमा भर सत्रा विश्वानि पौंस्या.. (७)
हे इंद्र! मानव प्रजाओं में जो बल एवं धन है अथवा पांच वर्णों में जो अन्न है, वह सब
महान् शक्तियों के साथ हमें दो. (७)
यद्वा तुक्षौ मघवन् द्रुह्यावा जने यत्पूरौ कच्च वृष्ण्यम्.
अस्मभ्यं तद्रिरीहि सं नृषाह्येऽमित्रान्पृत्सु तुर्वणे.. (८)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 970Permalink

हे धनस्वामी इंद्र! तुम हमें तृक्षु, द्रुह्यु एवं पुरु नामक राजाओं का समस्त बल दो. इस
प्रकार हम युद्ध आरंभ होने पर शत्रुओं को जीत सकेंगे. (८)
इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत्.
छर्दियच्छ मघवद्द्रयश्व मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः.. (९)
हे इंद्र! हव्यरूप धन वाले लोगों तथा हमारे लिए तीन धातुओं से बना हुआ, तीन कष्टों
से बचाने वाला, विनाशरहित एवं छाया करने वाला घर दो. शत्रुओं के आयुध हमसे दूर करो.
(९)
ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभिप्रघ्नन्ति धृष्णुया.
अध स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव.. (१०)
हे धनस्वामी एवं स्तुतियां सुनने वाले इंद्र! जिन शत्रुओं ने हमारी गाएं छीनने की इच्छा
से आक्रमण किया है अथवा जो बलपूर्वक हम पर प्रहार करते हैं, तुम उनसे हमारे एकमात्र
रक्षक बनो. (१०)
अध स्मा नो वृधे भवेन्द्र नायमवा युधि.
यदन्तरिक्षे पतयन्ति पर्णिनो दिद्यवस्तिग्ममूर्धानः.. (११)
हे इंद्र! इस समय तुम हमारे वृद्धिकर्त्ता बनो. जब आकाश में पंखों वाले, तेज नोक वाले
एवं चमकीले बाण गिरते हैं, उस समय जो हमारी रक्षा करता है, तुम उसकी रक्षा करो. (११)
यत्र शूरासस्तन्वो वितन्वते प्रिया शर्म पितॄणाम्.
अध स्मा यच्छ तन्वे३ तने च छर्दिरचित्तं यावय द्वेषः.. (१२)
जब युद्ध में शूर शत्रुओं को अपने शरीर का बल दिखाते हैं एवं शत्रुओं से उनके पूर्वजों
के प्रिय स्थान को छीनते हैं, उस समय तुम हमारी और हमारी संतान की शरीर-रक्षा के लिए
आयुध-रक्षक कवच चुपचाप दे देना. तुम हमारे शत्रुओं को भगाओ. (१२)
यदिन्द्र सर्गे अर्वतश्चोदयासे महाधने.
असमने अध्वनि वृजिने पथि श्येनाँ इव श्रवस्यतः.. (१३)
हे इंद्र! महान् धन के निमित्त संग्राम आरंभ होने पर हमारे घोड़ों को ऊंचे-नीचे रास्ते पर
इस प्रकार आगे बढ़ाना, जिस प्रकार कुटिल पथ पर मांस का इच्छुक बाज बढ़ता है. (१३)
सिन्धूँरिव प्रवण आशुया यतो यदि क्लोशमनु ष्वणि.
आ ये वयो न वर्वृत्तत्यामिषि गृभीता बाह्वोर्गवि.. (१४)
हे इंद्र! जब हमारे घोड़े भय के कारण जोर से हिनहिनाएं, उस समय तुम भुजाओं द्वारा
eBook converter DEMO Watermarks*

Page 971Permalink

लगाम के सहारे पकड़े हुए हमारे घोड़ों को प्रेरित करो. जिससे वे गो निमित्तक संग्राम में नीचे
बहने वाली सरिताओं अथवा मांस के अभिलाषी बाज के समान आगे बढ़ें. (१४)
सूक्त—४७ देवता—सोम, पृथ्‍वी आदि
स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवाँ उतायम्.
उतो न्व१स्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु.. (१)
यह निचोड़ा हुआ सोमरस स्वादिष्ट, मधुर, तीव्र एवं रसवाला है. इसे पीने वाले इंद्र के
सामने युद्धों में कोई ठहर नहीं सकता. (१)
अयं स्वादुरिह मदिष्ठ आस यस्येन्द्रो वृत्रहत्ये ममाद.
पुरूणि यश्च्यौत्ना शम्बरस्य वि नवतिं नव च देह्यो३ हन्.. (२)
यह सोमरस इस यज्ञ में बहुत मदकारक था. वृत्रहनन के समय इंद्र इसी से मदमत्त हुए
थे. इसी ने शंबर की निन्यानवे नगरियों तथा सेनाओं का नाश किया था. (२)
अयं मे पीत उदियर्ति वाचमयं मनीषामुशतीमजीगः.
अयं षळुर्वीरमिमीत धीरो न याभ्यो भुवनं कच्चनारे.. (३)
यह सोमरस पीने पर मेरी वाणी को तेज करता है एवं मनचाही बुद्धि प्रदान करता है.
इसी धीर सोमरस ने छः अवस्थाओं को बनाया है. कोई भी प्राणी इससे दूर नहीं रह सकता.
(३)
अयं स यो वरिमाणं पृथिव्या वर्ष्माणं दिवो अकृणोदयं सः.
अयं पीयूषं तिसृषु प्रवत्सु सोमो दाधारोर्व१न्तरिक्षम्.. (४)
इस सोमरस ने धरती का विस्तार और स्वर्ग की दृढ़ता की है. इसी ने ओषधि, जल और
गो—तीन उत्तम आधारों में रस धारण किया है. यही विस्तृत आकाश को धारण करता है.
(४)
अयं विदच्चित्रदृशीकमर्णः शुक्रसद्मनामुषसामनीके.
अयं महान्महता स्कम्भनेनोद् द्यामास्तभ्नाद् वृषभो मरुत्वान्.. (५)
उज्ज्वल आकाश में रहने वाली उषाओं से पहले सोमरस ही विचित्र प्रकाश वाले सूर्य
का प्रकाश प्राप्त करता है. यह जल बरसाने वाला सोम मरुतों से मिलकर महान् बल के द्वारा
मजबूत खंभों के सहारे स्वर्ग को धारण करता है. (५)
धृषत्पिब कलशे सोममिन्द्र वृत्रहा शूर समरे वसूनाम्.
माध्यन्दिने सवन आ वृषस्व रयिस्थानो रयिमस्मासु धेहि.. (६)
ebook converter DEMO Watermarks*