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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 964 of 1855

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Page 964

हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम्हारे जल बरसाने वाले युवा घोड़े पानी फैलाने वाली सागर
तरंगों के समान प्रसन्न होकर तुम्हारे रथ में जुड़े हुए हैं. हे कामवर्षी एवं युवा इंद्र! अध्वर्युगण
तुम्हें पत्थरों की सहायता से निचोड़ा गया सोमरस भेंट करते हैं. (२०)
वृषासि दिवो वृषभः पृथिव्या वृषा सिन्धूनां वृषभः स्तियानाम्.
वृष्णे ते इन्दुर्वृषभ पीपाय स्वादू रसो मधुपेयो वराय.. (२१)
हे इंद्र! तुम हव्यों द्वारा स्वर्ग को तृप्त करने वाले, धरती के अभिलाषापूरक, वर्षा द्वारा
नदियों को भरने वाले एवं स्थावरजंगम सकल विश्व के कामपूरक हो. हे अभिलाषापूरक एवं
वर्षाकारक इंद्र! तुम्हारे लिए ही मधुर सोमरस तैयार किया गया है. (२१)
अयं देवः सहसा जायमान इन्द्रेण युजा पणिमस्तभायत्.
अयं स्वस्य पितुरायुधानीन्दुरमुष्णादशिवस्य माया:.. (२२)
दीप्तिशाली सोम ने अपने मित्र इंद्र के साथ जन्म लेकर पणि को बलपूर्वक रोक लिया
था. इसी सोमरस ने गोरूप धन को पर्वतों में छिपाकर रखने वाले अकल्याणकारी पणियों की
माया एवं आयुध बेकार किए थे. (२२)
अयमकृणोदुषसः सुपत्नीरयं सूर्ये अदधाज्ज्योतिरन्तः.
अयं त्रिधातु दिवि रोचनेषु त्रितेषु विन्ददमृतं निगूळ्हम्.. (२३)
इसी सोमरस ने उषाओं के शोभनपालक सूर्य को सुशोभित किया था एवं सूर्य मंडल के
बीच में ज्योति की स्थापना की थी. तीनों सवनों में तीन प्रकार से वर्तमान इसी सोमरस ने
तेजस्वी तीनों लोकों के बीच छिपे हुए अमृत को पाया था. (२३)
अयं द्यावापृथिवी वि ष्कभायदयं रथमयुनक्सप्तरश्मिम्.
अयं गोषु शच्या पक्वमन्तः सोमो दाधार दशयन्त्रामुत्सम्.. (२४)
इसी सोमरस ने धरती-आकाश को अपने स्थान पर स्थित किया था. इसी ने सात
किरणों वाला रथ तैयार किया था. इस सोम ने ही गायों के मध्य अपने आप निर्मित होने वाले
एवं अनेक धाराओं वाले दूध को धारण किया था. (२४)
सूक्त—४५ देवता—इंद्र व बृहस्पति
य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम्. इन्द्रः स नो युवा सखा.. (१)
जो इंद्र! अपनी उत्तम नीति द्वारा तुर्वश एवं यदु नामक राजाओं को दूर से लाए, वे युवा
इंद्र हमारे मित्र हों. (१)
अविप्रे चिद्ध्यो दधदनाशुना चिदर्वता. इन्द्रो जेता हितं धनम्.. (२)
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