ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 966 of 1855
Read in contextतमु त्वा यः पुरासिथ यो वा नूनं हिते धने. हव्यः स श्रुधी हवम्.. (११)
हे इंद्र! तुम प्राचीन काल में पुकारने योग्य थे एवं वर्तमान काल में शत्रुओं के छिपे हुए
धन को पाने के लिए बुलाए जाते हो. हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमारी पुकार सुनो. (११)
धीभिर्विद्भिरर्वतो वाजाँ इन्द्र श्रवाय्यान्. त्वया जेष्म हितं धनम्.. (१२)
हे इंद्र! हमारी स्तुतियां सुनकर तुम प्रसन्न होते हो. तुम्हारी कृपा से हम अपने घोड़ों द्वारा
शत्रुओं के घोड़ों, उत्तम अन्नों एवं छिपे हुए धन को जीतने योग्य बनते हैं. (१२)
अभूरू वीर गिर्वणो महाँ इन्द्र धने हिते. भरे वितन्तसाय्यः.. (१३)
हे वीर, स्तुति योग्य एवं महान् इंद्र! तुम शत्रुओं के छिपे हुए धन के निमित्त होने वाले
युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाले हो. (१३)
या त ऊतिरमित्रहन्मक्षूजवस्तमासति. तया नो हिनुही रथम्.. (१४)
हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम अपनी अतिशय तीव्रगति से हमारे रथ को शत्रुविजय के निमित्त
आगे बढ़ाओ. (१४)
स रथेन रथीतमॊऽस्माकेनाभियुग्वना. जेषि जिष्णो हितं धनम्.. (१५)
हे रथ स्वामियों में श्रेष्ठ एवं जयशील इंद्र! तुम हमारे शत्रुपराजयकारी रथ द्वारा शत्रुओं
के छिपे धन को जीतते हो. (१५)
य एक इत्तम ष्टुहि कृष्टीनां विचर्षणिः. पतिर्जज्ञे वृषक्रतुः.. (१६)
उन्हीं एकमात्र इंद्र की स्तुति करो जो प्रजाओं के स्वामी, विशेष द्रष्टा एवं वर्षा करने
वाले के रूप में उत्पन्न हुए थे. (१६)
यो गृणतामिदासिखापिरूती शिवः सखा. स त्वं न इन्द्र मृळय.. (१७)
हे रक्षा द्वारा सुखदाता एवं सखा इंद्र! प्राचीन काल में तुम हम स्तोताओं के बंधु थे. तुम
अब भी हमें सुखी करो. (१७)
धिष्व वज्रं गभस्त्यो रक्षोहत्याय वज्रिवः. सासहीष्ठा अभि स्पृधः.. (१८)
हे वज्रधारी इंद्र! तुम राक्षसों को मारने के हेतु वज्र धारण करते हो एवं विरोध करने
वाली असुर सेनाओं को हराते हो. (१८)
प्रत्नं रयीणां युजं सखायं कीरिचोदनम्. ब्रह्मवाहस्तमं हुवे.. (१९)
मैं सबके आदि, धन प्राप्त करने वाले, सखा, स्तोताओं को प्रोत्साहित करने वाले एवं
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