ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.
This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.
The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.
हे अश्विनीकुमारो! जिस स्तोत्र द्वारा मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं, वह भली प्रकार पूरा हो.
हे अलग-अलग उत्पन्न एवं पापरहित देवो! मुझे अधिक मात्रा में अन्न दो. (४)
आ यद्वां सूर्या रथं तिष्ठद्रघुष्यदं सदा.
परि वामरुषा वयो घृणा वरन्त आतपः.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी पत्नी सूर्या जब तुम्हारे साथ शीघ्र चलने वाले रथ पर बैठती
है, तब चमकीली, दीप्त एवं फैलने वाली किरणें तुम्हारे सब ओर बिखरती हैं. (५)
युवोरन्त्रिऋकेतति नरा सुम्नेन चेतसा.
घर्मं यद्वामरेपसं नासत्यास्ना भुरण्यति.. (६)
हे नेता अश्विनीकुमारो! हमारे पिता अत्रि ने आग बुझ जाने के सुख से कृतज्ञमन होकर
तुम दोनों की स्तुति की थी. तुम्हारे स्तोत्र द्वारा उन्होंने उस अग्नि को सुखकर समझा, जो
असुरों ने उन्हें जलाने को लगाई थी. (६)
उग्रो वां ककुहो ययिः शृण्वे यामेषु सन्वनिः.
यद्वां दंसोभिरश्विनात्रिर्नर्राववर्तति.. (७)
हे नेता अश्विनीकुमारो! तुम्हारा उग्र, ऊंचा, गतिशील एवं सदा घूमने वाला रथ यज्ञों में
प्रसिद्ध है. तुम्हारे रक्षा प्रयत्न द्वारा ही हमारे पिता अत्रि जीवित रहे थे. (७)
मध्व ऊ षु मधुयुवा रुद्रा सिषक्ति पिप्युषी.
यत्समुद्राति पर्षथः पक्वाः पृक्षो भरन्त वाम्.. (८)
हे सोमरस मिलाने वाले एवं दयालुचित्त अश्विनीकुमारो! हमारी मधुर रस से भिगोने
वाली स्तुति तुम्हारी सेवा करती है. तुम जब अंतरिक्ष के पार चले जाते हो तो हमारे द्वारा
प्रदत्त हव्य तुम्हारा भरण करता है. (८)
सत्यमिद्वा उ अश्विना युवामाहुर्मयोभुवा.
ता यामन्यामहूतमा यामन्ना मृळयत्तमा.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! प्राचीन लोगों ने जो तुम्हें सुख देने वाला कहा है, वह सत्य है. तुम
यज्ञ में बुलाने योग्य एवं सुख देने योग्य बनो. (९)
इमा ब्रह्माणि वर्धनाश्विभ्यां सन्तु शन्तमा.
या तक्षाम रथाँइवावोचाम बृहन्नमः.. (१०)
ये महान् स्तुतियां अश्विनीकुमारों को अतिशय सुख देने वाली हों. बढ़ई जिस प्रकार रथ
बनाता है, उसी प्रकार हमने ये महान् स्तुतियां कही हैं. (१०)
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सूक्त—७४ देवता—अश्विनीकुमार
कूष्ठो देवावश्विनाद्या दिवो मनावसू.
तच्छ्रवथो वृषण्वसू अत्रिर्वामा विवासति.. (१)
हे स्तुतिरूपी धन के स्वामी एवं कामवर्षी अश्विनीकुमारो! आज तुम धरती पर स्थित
होकर उस स्तुति समूह को सुनो, जिसके द्वारा अत्रि तुम्हारी सेवा करते हैं. (१)
कुह त्या कुह नु श्रुता दिवि देवा नासत्या.
कस्मिन्ना यतथो जने को वां नदीनां सचा.. (२)
वे देव अश्विनीकुमार आज कहां हैं? आज वे स्वर्ग में कहां निवास कर रहे हैं? तुम किस
यजमान के पास आते हो? कौन तुम्हारी स्तुतियों का सहायक होगा? (२)
कं याथः कं ह गच्छथः कमच्छा युञ्जाथे रथम्.
कस्य ब्रह्माणि रण्यथो वयं वामुश्मसीष्टये.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम किस यजमान के प्रति गमन करते हो, किसके पास पहुंचते हो
एवं किसके सामने जाने के लिए रथ में घोड़े जोड़ते हो? तुम किसकी स्तुतियों से प्रसन्न होते
हो? हम तुम्हें पाने की इच्छा करते हैं. (३)
पौरं चिद्ध्युदप्रुतं पौर पौराय जिन्वथः.
यदीं गृभीततातये सिंहमिव द्रुहस्पदे.. (४)
हे पौर द्वारा स्तुत अश्विनीकुमारो! तुम जल बरसाने वाले बादल को पौर ऋषि के पास
भेजो. शूर जिस प्रकार गरजते हुए सिंह को मार गिराता है, उसी प्रकार यज्ञकार्य में व्यस्त पौर
के निकट तुम बादल को बरसाओ. (४)
प्र च्यवानाज्जुजुरुषो वव्रिमत्कं न मुञ्चथः.
युवा यदी कृथः पुनरा काममृण्वे वध्वः.. (५)
तुमने जराजीर्ण च्यवन ऋषि के शरीर से त्याज्य बुढ़ापे को इस प्रकार अलग कर दिया
था, जिस प्रकार योद्धा अपना कवच उतार देता है. जब तुमने उन्हें दोबारा युवा बनाया तो
उन्होंने वधू द्वारा चाहने योग्य रूप पाया. (५)
अस्ति हि वामिह स्तोता स्मसि वां सन्दृशि श्रिये.
नू श्रुतं म आ गतमवोभिर्वाजिनीवसू.. (६)
हे देव अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे स्तोता तुम्हारे सामने रहें. हे अन्नयुक्त देवो! तुम हमारी
पुकार सुनकर रक्षासाधनों सहित आओ. (६)
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को वामद्य पुरूणामा वन्वे मर्त्यानाम्.
को विप्रो विप्रवाहसा को यज्ञैर्वाजिनीवसू.. (७)
हे अन्नस्वामी अश्विनीकुमारो! आज कौन मनुष्य तुम्हारी सबसे अधिक सेवा करता है?
हे ज्ञानियों द्वारा शिरोधार्य! तुम्हें यज्ञों द्वारा कौन प्रसन्न करता है. (७)
आ वां रथो रथानां येष्ठो यात्वश्विना.
पुरू चिदस्मयुस्तिर आङ्गूषो मर्त्येष्वा.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा रथ इस स्थान पर आवे. वह अन्य देवों के रथों से तेज चलने
वाला, हमारी हितकामना करने वाला, हमारे विरोधियों का तिरस्कार करने वाला एवं सभी
यजमानों में स्तुति का विषय है. (८)
शम् षु वां मध्यूयुवास्माकमस्तु चर्कृतिः.
अर्वाचीना विचेतसा विभिः श्येनेव दीयतम्.. (९)
हे सोमरस युक्त अश्विनीकुमारो! तुम्हारी बार-बार की गई स्तुति हमें सुख देने वाली हो.
हे विशिष्ट ज्ञान वालो! तुम हमारे सामने बाज पक्षी के समान आओ. (९)
अश्विना यद्ध कर्हि चिच्छ्रुयातमिमं हवम्.
वस्वीरू षु वां भुजः पृच्छन्ति सु वां पृचः.. (१०)
हे अश्विनीकुमारो! तुम जहां कहीं भी हो, हमारी इस पुकार को सुनो. तुम्हारे समीप
जाने के इच्छुक उत्तम-हव्य तुम्हें प्राप्त हो. (१०)
सूक्त—७५ देवता—अश्विनीकुमार
प्रति प्रियतमं रथे वृषणं वसुवाहनम्.
स्तोता वामश्विनावृषिः स्तोमेन प्रति भूषति माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा स्तोता ऋषि तुम्हारे अतिशय प्रिय, कामवर्षी एवं धन ढोने
वाले रथ को स्तुतियों द्वारा सुशोभित करता है. हे मधु-विद्या जानने वाले! तुम हमारी पुकार
सुनो. (१)
अत्यायातमश्विना तिरो विश्वा अहं सना.
दस्रा हिरण्यवर्तनी सुषुम्ना सिन्धुवाहसा माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अन्य यजमानों को छोड़कर हमारे पास आओ, जिससे हम
अपने सभी विरोधियों का सदा तिरस्कार कर सकें. हे शत्रुओं का नाश करने वाले, सोने के
रथ वाले, शोभन-धन के स्वामी एवं नदियों को प्रवाहित करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम
मधुविद्या विशारद हो. तुम हमारी पुकार सुनो. (२)
आ नो रत्नानि बिभ्रतावश्विना गच्छतं युवम्.
रुद्रा हिरण्यवर्तनी जुषाणा वाजिनीवसू माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम रत्नों को धारण करते हुए हमारे पास आओ. हे स्तुति योग्य,
सोने के रथ के स्वामी, अन्नरूपी धन से युक्त एवं मधुविद्या जानने वाले अश्विनीकुमारो! तुम
हमारी पुकार सुनो. (३)
सुष्टुभो वां वृषण्वसू रथे वाणीच्याहिता.
उत वां ककुहो मृगः पृक्षः कृणोति वपुषो माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (४)
हे धन बरसाने वाले अश्विनीकुमारो! मुझ उत्तम स्तोता की वाणीरूपी स्तुति तुम्हारे लिए
बनाई गई है. तुम दोनों को खोजने वाला महान् यजमान तुम्हें हव्य प्रदान करता है. हे
मधुविद्या जानने वाले अश्विनीकुमारो! तुम मेरी पुकार सुनो. (४)
बोधिन्मनसा रथेषिरा हवनश्रुता.
विभिश्च्यवानमश्विना नि याथो अद्धयाविनं माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (५)
हे ज्ञानयुक्त मन वाले, रथस्वामी, शीघ्र गतिशील एवं आह्वान को जल्दी सुनने वाले
अश्विनीकुमारो! तुम अपने घोड़े पर चढ़कर कपटरहित च्यवन ऋषि के समीप पहुंचे थे. हे
मधुविद्या जानने वाले अश्विनीकुमारो! तुम मेरी पुकार सुनो. (५)
आ वां नरा मनोयुजोऽश्वासः पृषितप्सवः.
वयो वहन्तु पीतये सह सुम्नेभिरश्विना माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (६)
हे नेता अश्विनीकुमारो! तुम्हारी इच्छा मात्र से रथ में जुड़ने वाले, विचित्र रूप वाले एवं
शीघ्र चलने वाले घोड़े तुम्हें ठाट-बाट के साथ सोमरस पीने के लिए यहां लावें. हे मधुविद्या
जानने वाले अश्विनीकुमारो! तुम मेरी पुकार सुनो. (६)
अश्विनावेह गच्छतं नासत्या मा वि वेनतम्.
तिरश्चिदर्यया परि वर्तिर्यातमदाभ्या माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! इस यज्ञ में आओ. हे सत्य-स्वरूप वालो! तुम हमारे प्रति
अभिलाषारहित मत होना. हे अपराजितो एवं स्वामियो! तुम छिपे हुए स्थान से भी हमारे यज्ञ
में आओ. हे मधुविद्या जानने वालो! तुम हमारी पुकार सुनो. (७)
अस्मिन्यज्ञे अदाभ्या जरितारं शुभस्पती.
अवस्युमश्विना युवं गृणन्तमुप भूषथो माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (८)
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हे अपराजेय एवं जल के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम इस यज्ञ में स्तुति करने वाले
अवस्यु ऋषि पर कृपा करो। हे मधुविद्या जानने वालो! तुम हमारी पुकार सुनो। (८)
अभूदुषा रुशत्पशुरग्निरधाय्यृत्वियः।
अयोजि वां वृषण्वसू रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (९)
उषाकाल हो गया है। उज्ज्वल किरणों वाली अग्नि वेदी पर स्थापित कर दी गई है। हे
धन बरसाने वाले एवं शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! तुम्हारा नाशहीन रथ घोड़ों से युक्त है। हे
मधुविद्या जानने वालो! तुम मेरी पुकार सुनो। (९)
सूक्त—७६ देवता—अश्विनीकुमार
आ भात्यग्निरुषसामनीकमुद्विप्राणां देवया वाचो अस्थुः.
अर्वाञ्चा नूनं रथ्येह यातं पीपिवांसमश्विना घर्ममच्छ.. (१)
सुखदायक अग्नि प्रातःकाल प्रज्वलित होते हैं। मेधावी स्तोताओं की देवसंबंधी स्तुतियां
गाई जाती हैं। हे रथस्वामी अश्विनीकुमारो! तुम इस यज्ञ में मेरे सामने आओ एवं यज्ञ को
भली-भांति विस्तृत करो। (१)
न संस्कृतं प्र मिमीतो गमिष्ठान्ति नूनमश्विनोपस्तुतेह.
दिवाभिपित्वेडवसागमिष्ठा प्रत्यवर्तिं दाशुषे शम्भविष्ठा.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम मेरे सुरुचिसंपन्न यज्ञ का नाश मत करो, अपितु स्तुति सुनकर
इसके समीप आओ. तुम प्रातःकाल रक्षासाधनों सहित आओ एवं विरोधियों को समाप्त
करके हव्यदाताओं को सुखी बनाओ। (२)
उता यातं सङ्गवे प्रातरह्नो मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य.
दिवा नक्तमवसा शन्तमेन नेदानीं पीतिरश्विना ततान.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों ब्रह्ममुहूर्त में, प्रातः, दोपहर के समय, अपराह्णकाल में, रात
में, दिन में अथवा किसी भी सुविधाजनक समय में आकर सुख देने वाली रक्षा करो. इस
समय अश्विनीकुमारों के अतिरिक्त कोई सोमरस नहीं पी सकता। (३)
इदं हि वां प्रदिवि स्थानमोक इमे गृहा अश्विनेदं दुरोणम्.
आ नो दिवो बृहतः पर्वतादाद्भ्यो यातमिषमूर्जं वहन्ता.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! यह यज्ञवेदी का प्राचीन स्थान तुम्हारा घर है. हे अश्विनीकुमारो! यह
घर एवं निवास स्थान तुम्हारा ही है. तुम हमारे लिए अंतरिक्षचारी बादल से जल लेकर आओ.
(४)
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सूक्त—७७ देवता—अश्विनीकुमार
समश्विनोरवसा नूतनेन मयोभुवा सुप्रणीती गमेम.
आ नो रयिं वहतमोत वीराना विश्वान्यमृता सौभगानि.. (५)
हम अश्विनीकुमारों की रक्षा एवं शोभन आगमन को प्राप्त करें. हे मरणरहितो! तुम हमें
सब संपत्ति, संतान तथा सभी प्रकार का सौभाग्य दो. (५)
सूक्त—७७ देवता—अश्विनीकुमार
प्रातर्यावाणा प्रथमा यजध्वं पुरा गृध्रादरुषः पिबात:.
प्रातर्हि यज्ञमश्विना दधाते प्र शंसन्ति कवयः पूर्वभाज:.. (१)
हे ऋत्विजो! यज्ञ में प्रातःकाल उपस्थित होने वाले अश्विनीकुमारों का सबसे पहले
यजन करो. वे लालची एवं दान न करने वाले राक्षसों से पहले ही सोम पीते हैं. अश्विनीकुमार
प्रातःकाल ही यज्ञ धारण करते हैं, इसलिए प्राचीन ऋषिगण उनकी प्रशंसा करते थे. (१)
प्रातर्यजध्वमश्विना हिनोत न सायमस्ति देवया अजुष्टम्.
उतान्यो अस्मद्यजते वि चावः पूर्वः पूर्वो यजमानो वनीयान्.. (२)
हे ऋत्विजो! तुम प्रातःकाल ही अश्विनीकुमारों की पूजा करो एवं उन्हें हव्य दो.
संध्याकाल दिया गया हव्य असेव्य होता है, इसलिए देव उसे स्वीकार नहीं करते. हमसे पहले
जो भी यज्ञ करता है अथवा सोम से उन्हें तृप्त करता है, वही यजमान देवों का अधिक प्रिय
होता है. (२)
हिरण्यत्वङ्मधुवर्णो घृतस्नुः पृक्षो वहन्ना रथो वर्तते वाम्.
मनोजवा अश्विना वातरंहा येनातियाथो दुरितानि विश्वा.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा सोने से मढ़ा हुआ, आकर्षक रंग वाला, जल बरसाने वाला,
मन के समान शीघ्रगामी एवं वायु के सदृश चलने वाला रथ अन्न धारण करके आता है. उस
रथ द्वारा तुम सभी दुर्गम मार्गों को पार करते हो. (३)
यो भूयिष्ठं नासत्याभ्यां विवेष चनिष्ठं पित्वो ररते विभागे.
स तोकमस्य पीपरच्छमीभिरनूर्ध्वभासः सदमित्तुतुर्यात्.. (४)
जो यजमान यज्ञ का हव्य विभक्त करते समय अश्विनीकुमारों को अधिक अन्न देता है,
वह यज्ञकर्मों द्वारा अपनी संतान का पालन करता है. अग्नि अप्रज्वलित रहने पर सदा हिंसा
करते हैं. (४)
समश्विनोरवसा नूतनेन मयोभुवा सुप्रणीती गमेम.
आ नो रयिं वहतमोत वीराना विश्वान्यमृता सौभगानि.. (५)
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सूक्त—७८ देवता—अश्विनीकुमार
हम अश्विनीकुमारों की रक्षा एवं शोभन आगमन को प्राप्त करें. हे मरणरहितो! तुम हमें
सब संपत्ति, संतान तथा सभी प्रकार का सौभाग्य दो. (५)
सूक्त—७८ देवता—अश्विनीकुमार
अश्विनावेह गच्छतं नासत्य मा वि वेनतम्.
हंसाविव पततमा सुताँ उप.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! इस यज्ञ में आओ. हे नासत्यो! तुम हमारे प्रति उदासीन मत बनो.
हंस जिस प्रकार निर्मल पानी के पास आता है, उसी प्रकार तुम हमारे सोमरस के पास
आओ. (१)
अश्विना हरिणाविव गौराविवानु यवसम्. हंसाविव पततमा सुताँ उप.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार हिरण एवं गौरमृग घास तथा हंस साफ पानी के पास
आते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे सोमरस के पास आओ. (२)
अश्विना वाजिनीवसू जुषेथां यज्ञमिष्टये. हंसाविव पततमा सुताँ उप.. (३)
हे अन्नप्राप्ति के लिए घर देने वाले अश्विनीकुमारो! हमारी इच्छा पूरी करने के लिए इस
यज्ञ में आओ. हंस जैसे साफ पानी के पास जाते हैं, वैसे ही तुम हमारे सोमरस के पास
आओ. (३)
अत्रिर्यद्वामवरोहन्नृबीसमजोहवीन्नाधमानेव योषा.
श्येनस्य चिज्जवसा नूतनेनागच्छतमश्विना शन्तमेन.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! हमारे पिता अत्रि ने तुम्हारी स्तुति की. यदि स्त्री की मनुहार की जाए
तो वह पति की इच्छा पूर्ण करती है, उसी प्रकार अत्रि ऋषि ने अग्निदाह से छुटकारा पाया. हे
अश्विनीकुमारो! तुम अपने सुखदायक रथ द्वारा बाज पक्षी की अद्वितीय चाल द्वारा हमारी
रक्षा करने आओ. (४)
वि जिहीष्व वनस्पते योनिः सूष्यन्त्वा इव.
श्रुतं मे अश्विना हवं सप्तवध्रिं च मुञ्चतम्.. (५)
हे लकड़ी के बने संदूक! तुम बच्चा जन्मती नारी की योनि के समान खुल जाओ. हे
अश्विनीकुमारो! तुम मुझ सप्तवध्रि ऋषि की पुकार सुनकर इस संदूक से मुझे छुड़ाओ. (५)
भीताय नाधमानाय ऋषये सप्तवध्रये.
मायाभिरश्विना युवं वृक्षं सं च वि चाचथः.. (६)
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हे अश्विनीकुमारो! तुम भयभीत एवं प्रार्थना करते हुए सप्तवध्रि ऋषि के छुटकारे के
लिए बंद संदूक को खोलो. (६)
यथा वातः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः.
एवा ते गर्भ एजतु निरैतु दशमास्यः.. (७)
सप्तवध्रि ऋषि अपनी पत्नी से कहते हैं—"हवा जिस प्रकार सरोवर के जल को सब
ओर से कंपित करती है, उसी प्रकार तुम्हारा दस महीने का गर्भ गतिशील हो." (७)
यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र एजति.
एवा त्वं दशमास्य सहावेहि जरायुणा.. (८)
“वायु, वन एवं समुद्र जिस प्रकार कांपते हैं, उसी प्रकार तुम्हारा दस मास का गर्भ
जरायु के साथ बाहर आवे.” (८)
दश मासाञ्छशयानः कुमारो अधि मातरि.
निरैतु जीवो अक्षतो जीवो जीवन्त्या अधि.. (९)
“माता के गर्भ में दस मास तक सोने वाला कुमार संपूर्ण जीवधारी के रूप में जीवित
माता के गर्भ से बाहर आवे.” (९)
सूक्त—७९ देवता—उषा
महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती.
यथा चिन्नो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (१)
हे दीप्तिशालिनी, शोभन जन्म वाली, स्तुति सुनकर अश्व प्रदान करने वाली एवं सत्य
यश वाली उषादेवी! हमें अधिक धन पाने के लिए, जैसे पहले जगाया था, वैसे ही जागृत
करो. (१)
या सुनीथे शौचद्रथे व्यौच्छो दुहितर्दिवः.
सा व्युच्छ सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (२)
हे स्वर्ग की पुत्री उषा! तुमने शुचद्रथ के पुत्र सुनीथि का अंधकार भगाया था. हे
शक्तिशालिनी, शोभन जन्म वाली एवं अश्वप्रद स्तुतियुक्त उषा! तुम सत्यश्रवा का अंधकार
मिटाओ. (२)
सा नो अद्याभरद्वसुर्व्युच्छा दुहितर्दिवः.
यो व्यौच्छः सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (३)
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हे स्वर्ग की पुत्री एवं धन लाने वाली उषादेवी! तुम हमारा अंधकार समाप्त करो. हे
शक्तिशालिनी, शोभन जन्म वाली एवं अश्वप्रद स्तुतिवाली उषा! तुमने व्ययपुत्र सत्यश्रवा का
अंधकार मिटाया था. (३)
अभि ये त्वा विभावरि स्तोमैर्गृणन्ति वह्नयः.
मघैर्मघोनि सुश्रियो दामन्वन्तः सुरातयः सुजाते अश्वसूनृते.. (४)
हे प्रकाशवाली एवं धनस्वामिनी उषा! जो ऋत्विज् स्तुतियों द्वारा तुम्हारी प्रार्थना करते
हैं, वे संपत्तिशाली एवं ऐश्वर्यसंपन्न होते हैं. हे शोभन-जन्म वाली एवं अश्वप्रद स्तुति वाली
उषा! लोग दानशील बनने को तुम्हें याद करते हैं. (४)
यच्चिद्धि ते गणा इमे छदयन्ति मघत्तये.
परि चिद्द्वष्टयो दधुर्ददतो राधो अह्रयं सुजाते अश्वसूनृते.. (५)
हे उषा! तुम्हारे जो भक्त धनप्राप्ति के लिए तुम्हारी प्रार्थना कर रहे हैं, वे सब क्षयरहित
हव्य देने के लिए हमारे अनुकूल बने हैं. हे शोभन जन्म वाली उषा! लोग अश्व पाने के लिए
तुम्हारी स्तुति करते हैं. (५)
ऐषु धा वीरवद्यश उषो मघोनि सूरिषु.
ये नो राधांस्यह्रया मघवानो अरासत सुजाते अश्वसूनृते.. (६)
हे धनस्वामिनी उषा! इन यजमान स्तोताओं को वीर संतान के साथ अन्न दो. वे
धनस्वामी बनकर अक्षय धन देंगे. हे शोभन जन्म वाली उषा! लोग अश्व पाने के लिए तुम्हारी
स्तुति करते हैं. (६)
तेभ्यो द्युम्नं बृहद्यश उषो मघोन्या वह.
ये नो राधांस्यश्व्या गव्या भजन्त सूरयः सुजाते अश्वसूनृते.. (७)
हे धनस्वामिनी उषा! उस यजमान के लिए उत्तम धन एवं पर्याप्त अन्न दो जो हमें घोड़ों
और गायों के साथ धन देता है. हे शोभन जन्म वाली उषा! लोग घोड़ा पाने के लिए तुम्हारी
स्तुति करते हैं. (७)
उत नो गोमतीरिष आ वहा दुहितर्दिवः.
साकं सूर्यस्य रश्मिभिः शुक्रैः शोचद्भिरर्चिभिः सुजाते अश्वसूनृते.. (८)
हे स्वर्गपुत्री उषा! तुम हमारे लिए सूर्य किरणों एवं अग्नि की उज्ज्वल लपटों के साथ
गाएं और धन दो. हे शोभन-जन्म वाली उषा! लोग अश्व पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं.
(८)
व्युच्छा दुहितर्दिवो मा चिरं तनुथा अपः.
नेत्त्वा स्तेनं यथा रिपुं तपाति सूरो अर्चिषा सुजाते अश्वसूनृते.. (९)
हे स्वर्गपुत्री उषा! तुम प्रकाश फैलाओ. हमारे यज्ञकर्म में आने में विलंब मत करो. राजा
जिस प्रकार अपने शत्रु एवं चोर को दुःखी करता है, उसी प्रकार सूर्य तुम्हें ताप न दे. हे शोभन
जन्म वाली उषा! लोग अश्व पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं. (९)
एतावद्द्वेदुषस्त्वं भूयो वा दातुमर्हसि.
या स्तोतृभ्यो विभावर्युच्छन्ती न प्रमीयसे सुजाते अश्वसुनृते.. (१०)
हे उषा! तुम हमें प्रार्थित या अप्रार्थित सभी प्रकार का धन दे सकती हो. हे दीप्तिवाली
उषा! तुम स्तोताओं के लिए अंधकार मिटाती हो एवं उनकी हिंसा नहीं करतीं. हे शोभन जन्म
वाली उषा! लोग अश्व पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१०)
सूक्त—८० देवता—उषा
द्युतद्यामानं बृहतीमृतेन ऋतावरीमरुणप्सुं विभातीम्.
देवीमुषसं स्वरावहन्तीं प्रति विप्रासो मतिभिर्जरन्ते.. (१)
मेधावी ऋत्विज् स्तोत्रों द्वारा दीप्तियुक्त रथ वाली, महती, यज्ञ में आदरणीया, लाल रंग
वाली, अंधकारनाशिनी एवं सूर्य के आगे रहने वाली उषा देवी की स्तुति करते हैं. (१)
एषा जनं दर्शता बोधयन्ती सुगान्पथः कृण्वती यात्यग्रे.
बृहद्रथा बृहती विश्वमिन्वोषा ज्योतिर्यच्छत्यग्रे अह्नाम्.. (२)
दर्शनीया उषा सोने वालों को जगाती है एवं मार्गों को सरल बनाती हुई सूर्य के आगे
चलती है. विशाल रथ वाली, महान् एवं विश्वव्यापिनी उषा दिवस से पहले ही प्रकाश फैलाती
है. (२)
एषा गोभिररुणेभिर्युजानासेधन्ती रयिमप्रायु चक्रे.
पथो रदन्ती सुविताय देवी पुरुष्टुता विश्ववारा वि भाति.. (३)
दीप्तिशालिनी, बहुतों द्वारा आहूत एवं सबके द्वारा अभिलषित उषादेवी रथ में लाल रंग
के बैलों को जोड़कर अनश्वर धन को स्थायी करती है. (३)
एषा व्येनी भवति द्विबर्हा आविष्कृण्वाना तन्वं पुरस्तात्.
ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति.. (४)
अंतरिक्ष के दो भागों में स्थित यह उज्ज्वल उषा पूर्वदिशा से अपना शरीर प्रकट कर
रही है. वह जगत् को अपना ज्ञान कराती हुई सूर्य के मार्ग पर भली प्रकार चल रही है. यह
दिशाओं की हिंसा नहीं करती. (४)
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एषा शुभ्रा न तन्वो विदानोधर्वेव स्नाती दृशये नो अस्थात्.
अप द्वेषो बाधमाना तमांस्युषा दिवो दुहिता ज्योतिषागात्.. (५)
उषा स्नान करके उठी हुई एवं अलंकृत नारी के समान हमारे सामने उपस्थित होती है.
स्वर्गपुत्री उषा अपने अंधकार रूपी शत्रु को समाप्त करती हुई प्रकाश फैलाती है. (५)
एषा प्रतीची दुहिता दिवो नॄन्योषेव भद्रा नि रिणीते अप्सः.
व्यूण्वती दाशुषे वार्याणि पुनर्ज्योतिर्युवतिः पूर्वथाकः.. (६)
स्वर्ग की पुत्री उषा कल्याण करने वाली नारी के समान हमारे सामने अपना रूप प्रकट
करती है. उषा हव्यदाता यजमान को धन देती हुई सदा युवती रहकर प्रकाश बिखेरती है. (६)
सूक्त—८१ देवता—सविता
युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः.
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः.. (१)
मेधावी लोग बुद्धिशाली, महान् एवं प्रशंसनीय सविता देव की आज्ञा से यज्ञकार्यों में
अपना मन लगाते हैं. सविता होताओं के कार्य को जानते हुए उन्हें अपने-अपने कार्यों में
लगाते हैं. सविता देव की स्तुति महती है. (१)
विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः प्रासावीद्भद्रं द्विपदे चतुष्पदे.
वि नाकमख्यत्सविता वरेण्योऽनु प्रयाणमुषसो वि राजति.. (२)
मेधावी सविता विविधरूप धारण करते हैं एवं पशुओं व मानवों के लिए कल्याण की
आज्ञा देते हैं. श्रेष्ठ सविता देव स्वर्ग को प्रकाशित करते हैं एवं उषा के उदित होने के पश्चात्
प्रकाश फैलाते हैं. (२)
यस्य प्रयाणमन्वन्य इद्ययुर्देवा देवस्य महिमानमोजसा.
यः पार्थिवानि विममे स एतशो रजांसि देवः सविता महित्वना.. (३)
अन्य देव जिन सविता देव के पीछे चलकर महत्त्व एवं शक्ति प्राप्त करते हैं एवं जो
पृथ्वी आदि लोकों को अपनी महिमा से सीमित करके सुशोभित होते हैं, वे सविता देव
शोभित होकर विराजमान हों. (३)
उत यासि सवितस्त्रीणि रोचनोत सूर्यस्य रश्मिभिः समुच्यसि.
उत रात्रीमुभयतः परीयस उत मित्रो भवसि देव धर्मभिः.. (४)
हे सविता! तुम तीनों प्रकाशयुक्त लोकों में जाकर सूर्य की किरणों से मिलते हो एवं रात
के दोनों ओर चलते हो. तुम जगत् को धारण करने वाले कर्मों द्वारा मित्र बन जाते हो. (४)
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उतेशिषे प्रसवस्य त्वमेक इदुत पूषा भवसि देव यामभिः.
उतेदं विश्वं भुवनं वि रजासि श्यावाश्वस्ते सवितः स्तोममानशे.. (५)
हे सविता! तुम अकेले ही सब कर्मों की अनुज्ञा देते हो एवं अपनी किरणों द्वारा तुम ही
पूषा बनते हो. तुम इस समस्त विश्व को धारण करके सुशोभित हो. श्यावाश्व ऋषि तुम्हारी
स्तुति करता है. (५)
सूक्त—८२ देवता—सविता
तत्सवितुर्वृणीमहे वयं देवस्य भोजनम्.
श्रेष्ठं सर्वधातमं तुरं भगस्य धीमहि.. (१)
हम सविता देव के उस प्रसिद्ध एवं भोगयोग्य धन की प्रार्थना करते हैं. हम भग नामक
देव से श्रेष्ठ, सबको धारण करने वाला एवं शत्रुनाशक धन प्राप्त करें. (१)
अस्य हि स्वयशस्तरं सवितुः कच्चन प्रियम्.
न मिनन्ति स्वराज्यम्.. (२)
सविता देव के स्वयंसिद्ध, परम प्रसिद्ध एवं सर्वप्रिय ऐश्वर्य को कोई नष्ट नहीं कर
सकता. (२)
स हि रत्नानि दाशुषे सुवाति सविता भगः.
तं भागं चित्रमीमहे.. (३)
सविता एवं भग नामक देव हव्यदाता यजमान को धन प्रदान करते हैं. हम उनसे विचित्र
धन की कामना करते हैं. (३)
अद्या नो देव सवितः प्रजावत्सावीः सौभगम्.
परा दुःष्वप्न्यं सुव.. (४)
हे सविता देव! आज हमें पुत्र, पौत्र व धन प्रदान करो एवं दुःख बढ़ाने वाली दरिद्रता को
नष्ट करो. (४)
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव.
यद्भद्रं तन्न आ सुव.. (५)
हे सविता देव! हमारे अमंगल को दूर भगाओ एवं सभी कल्याणों को हमारे समीप
लाओ. (५)
अनागसो अदितये देवस्य सवितुः सवे.
विश्वा वामानि धीमहि.. (६)
हम यज्ञकर्त्ता सविता देव की आज्ञा में रहकर अदिति देवी के प्रति अपराधहीन रहें एवं
समस्त धनों को धारण करें. (६)
आ विश्वदेवं सत्पतिं सूक्तैरद्या वृणीमहे. सत्यसवं सवितारम्.. (७)
हम यज्ञकर्त्ता आज सब देवों के प्रतिनिधि, सज्जनों के पालक एवं सत्य के शासक
सविता देव की सेवा करते हैं. (७)
य इमे उभे अहनी पुर एत्यप्रयुच्छन्.
स्वाधीर्देवः सविता.. (८)
शोभन-कर्म वाले सविता देव प्रमादरहित होकर रात और दिन दोनों के आगे-आगे
चलते हैं. (८)
य इमा विश्वा जातान्याश्रावयति श्लोकेन.
प्र च सुवाति सविता.. (९)
सविता देव सभी प्राणियों को अपनी स्तुति सुनाते हैं एवं उन्हें प्रेरणा देते हैं. (९)
सूक्त—८३ देवता—पर्जन्य
अच्छा वद तवसं गीर्भिराभिः स्तुहि पर्जन्यं नमसा विवास.
कनिक्रदद्वृषभो जीरदानू रेतो दधात्योषधीषु गर्भम्.. (१)
हे स्तोता! सामने जाकर बलवान् पर्जन्य को अपना अभिप्राय ठीक से बताओ, स्तुति
वचनों से उनकी प्रशंसा करो एवं हव्य अन्न द्वारा उनकी सेवा करो. गर्जन शब्द करने वाले,
वर्षाकारक एवं शीघ्र दान करने वाले पर्जन्य ओषधियों में गर्भ धारण करते हैं. (१)
वि वृक्षान् हन्त्युत हन्ति रक्षसो विश्वं बिभाय भुवनं महावधात्.
उतानागा ईषते वृष्ण्यावतो यत्पर्जन्यः स्तनयन् हन्ति दुष्कृतः.. (२)
पर्जन्य वृक्षों और राक्षसों का नाश करते हैं. सारा संसार इनके महान् वध से डरता है.
वर्षा करने वाले पर्जन्य जब गर्जन करते हुए दुष्कर्मियों का नाश करते हैं तो पापरहित लोग
भी इनके डर से भागते हैं. (२)
रथीव कशयाश्वाँ अभिक्षिपन्नाविर्दूतान्कृणुते वर्षाँ३ अह.
दूरात्सिंहस्य स्तनथा उदीरते यत्पर्जन्यः कृणुते वर्ष्यं१ नभः.. (३)
रथी योद्धा जिस प्रकार कोड़े से घोड़ों को मारता हुआ योद्धाओं को प्रकट करता है,
उसी प्रकार पर्जन्य बरसने वाले बादलों को प्रकट करते हैं. पर्जन्य जब आकाश को वर्षा से
युक्त करते हैं, तब उनका गर्जन सिंह के समान दूर से उत्पन्न होता है. (३)
प्र वाता वान्ति पतयन्ति विद्युत उदोषधीर्जिहते पिन्वते स्वः.
इरा विश्वस्मै भुवनाय जायते यत्पर्जन्यः पृथिवीं रेतसावति.. (४)
जब पर्जन्य वर्षा के जल से धरती की रक्षा करते हैं, तब हवाएं जोर से चलती हैं,
बिजलियां गिरती हैं, ओषधियां उगती हैं एवं आकाश टपकने लगता है. उस समय धरती सारे
जगत् का कल्याण करने वाली बनती है. (४)
यस्य व्रते पृथिवी नन्नमीति यस्य व्रते शफवज्जर्भुरीति.
यस्य व्रत ओषधीर्विश्वरूपाः सः नः पर्जन्य महि शर्म यच्छ.. (५)
वे पर्जन्य हमें महान् सुख दें. जिनके कर्म से पृथ्वी बार-बार झुकती है, खुरों वाले पशु
पाले जाते हैं एवं ओषधियां नानारूप धारण करती हैं. (५)
दिवो नो वृष्टिं मरुतो ररीध्वं प्र पिन्वत वृष्णो अश्वस्य धाराः.
अर्वाडेतेन स्तनयित्नुनेह्यापो निषिञ्चन्नसुरः पिता नः.. (६)
हे मरुतो! आकाश से हमारे लिए वर्षा करो एवं व्यापक मेघ की धाराएं नीचे गिराओ. हे
पर्जन्य! जल बरसाते हुए तुम इस गरजने वाले बादल के साथ हमारे सामने आओ. पर्जन्यदेव
जल बरसाते हुए भी हमारे पालक हैं. (६)
अभि क्रन्द स्तनय गर्भमा धा उदन्वता परि दीया रथेन.
दृतिं सु कर्ष विषितं न्यञ्चं समा भवन्तूद्वतो निपादाः.. (७)
हे पर्जन्य! शब्द एवं गर्जन करो, ओषधियों में गर्भ रूपी जल धारण करो, जलयुक्त रथ
द्वारा सब ओर जाओ एवं चमड़े की मशक के समान बंधे हुए मेघ को नीचे की ओर खोलो,
जिससे ऊंचे-नीचे स्थान बराबर हो जावें. (७)
महान्तं कोशमुदचा नि षिञ्च स्यदन्तां कुल्य विषिताः पुरस्तात्.
घृतेन द्यावापृथिवी व्युन्धि सुप्रपाणं भवत्वघ्न्याभ्यः.. (८)
हे पर्जन्य! तुम जल के कोशरूप मेघ को ऊपर ले जाकर नीचे की ओर बरसाओ.
नदियां जल से भरकर पूर्व की ओर बहें. धरती-आकाश को जल से गीला बनाओ. गायों के
लिए भली प्रकार पीने योग्य जल हो जाए. (८)
यत्पर्जन्य कनिक्रदत्स्तनयन् हंसि दुष्कृतः.
प्रतीदं विश्वं मोदते यत्किं च पृथिव्यामधि.. (९)
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हे पर्जन्य! जब तुम गर्जन करते हुए पापी मेघों को नष्ट करते हो, उस समय यह सारा
संसार प्रसन्न होता है तथा जगत् की सब वस्तुएं मुदित होती हैं. (९)
अवर्षीर्वर्षमुदु षू गृभायाकर्धन्वान्यत्येतवा उ.
अजीजन ओषधीर्भोजनाय कमुत प्रजाभ्योऽविदो मनीषाम्.. (१०)
हे पर्जन्य! तुमने जल बरसाया. अब जल रोक लो. तुमने सूखे स्थानों को जलपूर्ण कर
दिया है, जिन्हें बचाकर चलना पड़ता है. तुमने प्रजाओं के भोजन के लिए ओषधियां एवं जल
उत्पन्न किया, इस कारण तुम्हें उनकी स्तुतियां प्राप्त हुईं. (१०)
सूक्त—८४ देवता—पृथ्वी
बळित्था पर्वतानां खिद्रं बिभर्षि पृथिवि.
प्र या भूमिं प्रवत्वति मह्ना जिनोषि महिनि.. (१)
हे महती एवं शक्तिशालिनी पृथ्वी! तुम सभी प्राणियों को प्रसन्न करती हो एवं धारण
करती हो. (१)
स्तोमासस्त्वा विचारिणि प्रति क्षोभन्त्यक्तुभि:.
प्र या वाजं न हेषन्तं पेरुमस्यस्यर्जुनि.. (२)
हे विचरण करने वाली पृथ्वी! स्तोता गतिशील स्तोत्रों से तुम्हारी प्रशंसा करते हैं. हे
श्वेतरंग वाली! तुम घोड़े के समान गरजने वाले बादल को दूर फेंकती हो. (२)
दृळ्हा चिद्या वनस्पतीन्क्ष्मया दर्धर्ष्र्योजसा.
यत्ते अभ्रस्य विद्युतो दिवो वर्षन्ति वृष्टय:.. (३)
हे पृथ्वी! तुम्हारे बादल जब चमकते हुए जल बरसाते हैं, तब तुम अपनी शक्ति द्वारा
वनस्पतियों को धारण करती हो. (३)
सूक्त—८५ देवता—वरुण
प्र सम्राजे बृहदर्चा गभीरं ब्रह्म प्रियं वरुणाय श्रुताय.
वि यो जघान शमितेव चर्मोपस्तिरे पृथिवीं सूर्याय.. (१)
हे अत्रि! तुम भली प्रकार राजमान, सर्वत्रप्रसिद्ध व उपद्रव नष्ट करने वाले वरुण के प्रति
गंभीर एवं प्रिय वचन बोलो. कसाई जिस प्रकार मरे हुए पशुओं का चमड़ा फैलाता है, उसी
प्रकार वरुण सूर्य के भ्रमण हेतु अंतरिक्ष को विस्तृत करते हैं. (१)
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वनेषु व्य१न्तरिक्षं ततान वाजमर्वत्सु पय उस्रियासु.
हृत्सु क्रतुं वरुणो अप्स्व१ग्निं दिवि सूर्यमदधात्सोममद्रौ.. (२)
वरुण ने वनों के ऊपर अंतरिक्ष को फैलाया है. वे घोड़ों में बल, गायों में दूध, हृदयों में
यज्ञकार्य का संकल्प, जलों में अग्नि, स्वर्ग में सूर्य एवं पर्वतों पर सोमलता का विस्तार करते
हैं. (२)
नीचीनबारं वरुणः कवन्धं प्र ससर्ज रोदसी अन्तरिक्षम्.
तेन विश्वस्य भुवनस्य राजा यवं न वृष्टिर्व्युनत्ति भूम.. (३)
वरुण धरती, स्वर्ग और अंतरिक्ष के कल्याण के लिए मेघ के नीचे की ओर जल
निकलने का मार्ग बनाते हैं. वर्षा जैसे जौ आदि अन्नों को गीला करती है, उसी प्रकार विश्व के
राजा वरुण धरती को गीला करते हैं. (३)
उनत्ति भूमिं पृथिवीमुत द्यां यदा दुग्धं वरुणो वष्ट्यदित्.
समभ्रेण वसत पर्वतासस्तविर्षीयन्तः श्रथयन्त वीराः.. (४)
वरुण जब वर्षारूपी दूध की अभिलाषा करते हैं तो वे धरती, अंतरिक्ष एवं स्वर्ग को
गीला करते हैं. पर्वत बादलों द्वारा घेर लिए जाते हैं एवं शक्तिशाली मरुत् बादलों को शिथिल
करते हैं. (४)
इमामू ष्वासुरस्य श्रुतस्य महीं मायां वरुणस्य प्र वोचम्.
मानेनेव तस्थिवाँ अन्तरिक्षे वि यो ममे पृथिवीं सूर्येण.. (५)
हम वरुण की असुरघातिनी माया का वर्णन करते हैं. वरुण ने अंतरिक्ष में रहकर सूर्य के
द्वारा धरती-आकाश को इस प्रकार नापा है, जैसे कोई डंडे से नापता है. (५)
इमामू नु कवितमस्य मायां महीं देवस्य नकिरा दधर्ष.
एकं यदुद्ना न पृणन्त्येनीरासिञ्चन्तीरवनयः समुद्रम्.. (६)
अत्यंत मेधावी वरुणदेव की स्तुति का कोई विरोध नहीं कर सकता. जलपूर्ण अनेक
नदियां अकेले सागर को नहीं भर पातीं. (६)
अर्यम्यं वरुण मित्र्यं वा सखायं वा सदमिद् भ्रातरं वा.
वेशं वा नित्यं वरुणारणं वा यत्सीमागाश्चकृमा शिश्रथस्तत्.. (७)
हे वरुण! दान देने वाले, मित्र, सखा, भ्राता, पड़ोसी एवं गूंगे के प्रति किए गए हमारे
अपराध को नष्ट करो. (७)
कितवासो यद्रिरिपुर्न दीवि यद्घा घा सत्यमुत यन्न विद्म.
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सूक्त—८६ देवता—इंद्र व अग्नि
सर्वा ता वि ष्य शिथिरेव देवाधा ते स्याम वरुण प्रियासः.. (८)
हे वरुण! बेईमान जुआरी जिस प्रकार जानबूझ कर अपराध करता है, उसी प्रकार
हमने जानकर या अनजाने में जो पाप किया है, उसे तुम पके फलों के समान हमसे दूर करो.
हे वरुण! हम तुम्हारे प्रिय बनें. (८)
सूक्त—८६ देवता—इंद्र व अग्नि
इन्द्राग्नी यमवथ उभा वाजेषु मर्त्यम्.
दृळ्हा चित्स प्र भेदति द्युम्ना वाणीरिव त्रितः.. (१)
हे इंद्र एवं अग्नि! संग्राम में तुम्हारे द्वारा रक्षित लोग उसी प्रकार शत्रु के सुरक्षित धन का
नाश करते हैं, जिस प्रकार विद्वान् अपने विरोधी के तर्क को काटता है. (१)
या पृतनासु दुष्टरा या वाजेषु श्रवाय्या.
या पञ्च चर्षणीरभीन्द्राग्नी ता हवामहे.. (२)
जो युद्ध में हराए नहीं जा सकते, जो युद्धों में प्रशंसा के पात्र हैं एवं जो पांचों वर्णों की
रक्षा करते हैं, उन इंद्र एवं अग्नि की हम स्तुति करते हैं. (२)
तयोरिदमवच्छंवस्तिग्मा दिद्युन्मघोनोः.
प्रति दृणा गभस्त्योर्गवां वृत्रघ्न एषते.. (३)
शत्रुपराभवकारी बलयुक्त इंद्र एवं अग्नि जब एक रथ में बैठकर गायों को चुराने वाले
वृत्र का नाश करने हेतु चलते हैं तब उन धनस्वामियों के हाथ में तेज धार वाला एवं चमकीला
वज्र होता है. (३)
ता वामेषे रथानामिन्द्राग्नी हवामहे.
पती तुरस्य राधसो विद्वांसा गीर्वणस्तमा.. (४)
हम वेग के स्वामी, दान के अधिपति, सब कुछ जानने वाले तथा स्तुतियों द्वारा अतिशय
प्रशंसनीय इंद्र व अग्नि की स्तुति इसलिए करते हैं कि वे युद्ध में हमारे रथ को आगे बढ़ावें.
(४)
ता वृधन्तावनु द्यूनमर्ताय देवावदभा.
अर्हन्ता चित्पुरो दधेंऽशेव देवावर्वते.. (५)
हे मनुष्यों के समान सदा बढ़ने वाले तेजस्वी एवं पूज्य इंद्र व अग्नि देव! हम अश्व पाने
के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं. (५)
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सूक्त—८७ देवता—मरुद्गण
एवेन्द्राग्निभ्यामहावि हव्यं शूष्यं घृतं न पूतमद्रिभिः.
ता सूरिषु श्रवो बृहद्रयिं गृणत्सु धिधृतमिषं गृणत्सु धिधृतम्.. (६)
हे इंद्र एवं अग्नि! तुम्हारे लिए पत्थरों द्वारा पीस कर निचोड़े गए सोमरस के समान हव्य
दिया गया है. तुम ज्ञानीजनों के लिए महान् अन्न तथा स्तुतिकर्त्ताओं को पर्याप्त अन्न दो. (६)
सूक्त—८७ देवता—मरुद्गण
प्र वो महे मतयो यन्तु विष्णवे मरुत्वते गिरिजा एवयामरुत्.
प्र शर्धाय प्रयज्यवे सुखादये तवसे भन्ददिष्टये धुनिव्रताय शवसे.. (१)
एवयामरुत् नामक ऋषि की स्तुतियां मरुतों के स्वामी एवं शक्तिशाली, अतिशय
यज्ञपात्र, शोभन आभरणों वाले, तेजस्वी, स्तुति-अभिलाषी एवं शीघ्रगामी मरुतों के पास
जावें. (१)
प्र ये जाता महिना ये च नु स्वयं प्र विद्वाना ब्रुवत एवयामरुत्.
क्रत्वा तद्द्रो मरुतो नाधृषे शवो दाना मह्ना तदेषामधृष्टासो नाद्रयः.. (२)
एवयामरुत् ऋषि महान् विष्णु के साथ उत्पन्न होने वाले एवं यज्ञज्ञान के स्वयं ज्ञाता
मरुतों की स्तुति करते हैं. हे मरुतो! तुम्हारा बल कर्मफल देने वाला एवं अपराजेय है. तुम
पर्वतों के समान स्थिर हो. (२)
प्र ये दिवो बृहतः शृण्विरे गिरा सुशुक्वानः सुभ्व एवयामरुत्.
न येषामिरी सधस्थ ईष्ट आँ अग्नयो न स्वविद्युतः प्र स्पन्द्रासो धुनीनाम्.. (३)
एवयामरुत् ने स्तुतियों द्वारा उन मरुतों की उपासना की जो विस्तृत स्वर्ग से उपासकों
की पुकार सुनते हैं, दीप्त एवं शोभन हैं, जिन्हें अपने स्थान से निकालने में कोई समर्थ नहीं है
तथा अपने आप प्रकाशित होने वाली नदियों को जो प्रवाहशील बनाते हैं. (३)
स चक्रमे महतो निरुरुक्रमः समानस्मात्सदस एवयामरुत्.
यदायुक्त त्मना स्वादधि ष्णुभिर्विष्पर्धसो विमहसो जिगाति शेवृधो नृभिः.. (४)
विशाल गति वाले मरुद्गण विस्तृत एवं साधारण अंतरिक्ष से निकले हैं. एवयामरुत्
उनसे आने की प्रार्थना करते हैं. मरुत् जब अपने आप चलने वाले घोड़े रथ में जोड़ते हैं, तब
वे अद्वितीय, विशिष्ट बलयुक्त एवं सुख बढ़ाने वाले जान पड़ते हैं. (४)
स्वनो न वोऽमवान्नेजयद्वृषा त्वेषो ययिस्तविक्ष एवयामरुत्.
येना सहन्त ऋञ्जत स्वरोचिषः स्थारश्मानो हिरण्ययाः स्वायुधास इष्मिणः.. (५)
हे स्वाधीन तेजयुक्त, स्थिर रश्मियों वाले, सोने के गहनों वाले, शोभन आयुधधारी एवं
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अन्तस्वामी मरुतो! तुम्हारा शक्तिशाली, जल बरसाने वाला, तेजस्वी, गतिशील, बढ़ा हुआ एवं
शत्रुओं को पराजित करने वाला शब्द एवयामरुत् को कंपित न करे. (५)
अपारो वो महिमा वृद्धशवसस्त्वेषां शवोऽवत्वेवयामरुत्.
स्थातारो हि प्रसितौ संदृशि स्थन ते न उरुष्यता निदः शुशुक्वांसो नाग्नयः.. (६)
हे अपार महिमा वाले एवं अतिशय शक्तिशाली मरुतो! तुम्हारा बल एवयामरुत् की रक्षा
करे. नियमबद्ध यज्ञ का ज्ञान कराने में तुम्हीं समर्थ हो एवं अग्नि के समान प्रज्वलित हो. तुम
शत्रुओं से हमारी रक्षा करो. (६)
ते रुद्रासः सुमखा अग्नयो यथा तुविद्युम्ना अवन्त्वेवयामरुत्.
दीर्घं पृथु पप्रथे सद्म पार्थिवं येषामज्मेष्वा महः शर्धांस्यद्भुतैनसाम्.. (७)
वे रुद्रपुत्र एवं अग्नि के समान शोभन यज्ञों वाले मरुत् एवयामरुत् की रक्षा करें, जिनके
कारण अंतरिक्षरूपी दीर्घ एवं विस्तृत गृह प्रसिद्ध हुआ है एवं जिन पापरहित मरुतों की गति
में महान् बल है. (७)
अद्वेषो नो मरुतो गातुमेतन श्रोता हवं जरितुरेवयामरुत्.
विष्णोर्महः समन्यवो युयोतन स्मद्रथ्यो३ न दंसनाप द्वेषांसि सनुतः.. (८)
हे द्वेषरहित मरुतो! तुम स्तोता एवं एवयामरुत् के गतिशील स्तोत्र को सुनने हेतु आओ
और उसे सुनो. हे विष्णु के साथ यज्ञभाग पाने वाले मरुतो! योद्धा जिस प्रकार शत्रुओं को
भगाता है, उसी प्रकार तुम हमारे मन में छिपे पापों को दूर करो. (८)
गन्ता नो यज्ञं यज्ञियाः सुशमि श्रोता हवमरक्ष एवयामरुत्.
ज्येष्ठासो न पर्वतासो व्योमनि यूयं तस्य प्रचेतसः स्यात दुर्धर्तवो निदः.. (९)
हे यज्ञपात्र मरुतो! तुम हमारे यज्ञ को पूर्ण करने हेतु यहां आओ. हे विघ्नरहित मरुतो!
तुम एवयामरुत् की पुकार सुनो. हे उत्तम धन संपन्न मरुतो! तुम अत्यंत विशाल पर्वत के
समान अंतरिक्ष में रहकर निंदकों को वश में करो. (९)
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सूक्त—१ देवता—अग्नि
षष्ठम मंडल
सूक्त—१ देवता—अग्नि
त्वं ह्यग्ने प्रथमो मनोतास्या धियो अभवो दस्म होता.
त्वं सीं वृषन्नकृणोर्दुष्टरीतु संहो विश्वस्मै सहसे सहध्यै.. (१)
हे अग्नि! तुम्हीं देवों में श्रेष्ठ हो. उनका मन तुमसे संबद्ध है. हे दर्शनीय! तुम ही इस यज्ञ में देवों को बुलाने वाले हो. हे कामवर्षी! सभी शत्रुओं को पराजित करने के लिए तुम हमें अद्वितीय शक्ति दो. (१)
अधा होता न्यसीदो यजीयानिल्ळस्पद इषयन्नीड्यः सन्.
तं त्वा नरः प्रथमं देवयन्तो महो राये चितयन्तो अनु ग्मन्.. (२)
हे अतिशय यज्ञपात्र व होता अग्नि! तुम हव्य ग्रहण करके प्रशंसनीय बनते हुए यज्ञवेदी पर बैठो. देव बनने की कामना करते हुए ऋत्विज् आदि विशाल धन पाने के लिए तुझ देवोत्तम अग्नि का अनुगमन करते हैं. (२)
वृतेव यन्तं बहुभिर्वसव्यै३ स्त्वे रयिं जागृवांसो अनु ग्मन्.
रुशन्तमग्निं दर्शतं बृहन्तं वपावन्तं विश्वहा दीदिवांसम्.. (३)
हे दीप्तिशाली, दर्शनीय, महान्, हव्य के स्वामी, सभी कालों में प्रकाशयुक्त एवं वसुओं के मार्ग से गमन करने वाले अग्नि! धन के अभिलाषी यजमान तुम्हारा अनुगमन करते हैं. (३)
पदं देवस्य नमसा व्यन्तः श्रवस्यवः श्रव आपन्नमृक्तम्.
नामानि चिद्दधिरे यज्ञियानि भद्रायां ते रणयन्त सन्दृष्टौ.. (४)
अन्न चाहने वाले यजमान स्तुतियों के साथ अग्नि के स्थान में जाकर दूसरों द्वारा बाधारहित धन पाते हैं. हे अग्नि! तुम्हारा दर्शन हो जाने पर वे तुम्हारी स्तुतियों में आनंद पाते हैं एवं तुम्हारे यज्ञसंबंधी नामों को बोलते हैं. (४)
त्वां वर्धन्ति क्षितयः पृथिव्यां त्वां राय उभयासो जनानाम्.
त्वं त्राता तरणे चेत्यो भूः पिता माता सदमिन्मानुषाणाम्.. (५)