ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextवनेषु व्य१न्तरिक्षं ततान वाजमर्वत्सु पय उस्रियासु.
हृत्सु क्रतुं वरुणो अप्स्व१ग्निं दिवि सूर्यमदधात्सोममद्रौ.. (२)
वरुण ने वनों के ऊपर अंतरिक्ष को फैलाया है. वे घोड़ों में बल, गायों में दूध, हृदयों में
यज्ञकार्य का संकल्प, जलों में अग्नि, स्वर्ग में सूर्य एवं पर्वतों पर सोमलता का विस्तार करते
हैं. (२)
नीचीनबारं वरुणः कवन्धं प्र ससर्ज रोदसी अन्तरिक्षम्.
तेन विश्वस्य भुवनस्य राजा यवं न वृष्टिर्व्युनत्ति भूम.. (३)
वरुण धरती, स्वर्ग और अंतरिक्ष के कल्याण के लिए मेघ के नीचे की ओर जल
निकलने का मार्ग बनाते हैं. वर्षा जैसे जौ आदि अन्नों को गीला करती है, उसी प्रकार विश्व के
राजा वरुण धरती को गीला करते हैं. (३)
उनत्ति भूमिं पृथिवीमुत द्यां यदा दुग्धं वरुणो वष्ट्यदित्.
समभ्रेण वसत पर्वतासस्तविर्षीयन्तः श्रथयन्त वीराः.. (४)
वरुण जब वर्षारूपी दूध की अभिलाषा करते हैं तो वे धरती, अंतरिक्ष एवं स्वर्ग को
गीला करते हैं. पर्वत बादलों द्वारा घेर लिए जाते हैं एवं शक्तिशाली मरुत् बादलों को शिथिल
करते हैं. (४)
इमामू ष्वासुरस्य श्रुतस्य महीं मायां वरुणस्य प्र वोचम्.
मानेनेव तस्थिवाँ अन्तरिक्षे वि यो ममे पृथिवीं सूर्येण.. (५)
हम वरुण की असुरघातिनी माया का वर्णन करते हैं. वरुण ने अंतरिक्ष में रहकर सूर्य के
द्वारा धरती-आकाश को इस प्रकार नापा है, जैसे कोई डंडे से नापता है. (५)
इमामू नु कवितमस्य मायां महीं देवस्य नकिरा दधर्ष.
एकं यदुद्ना न पृणन्त्येनीरासिञ्चन्तीरवनयः समुद्रम्.. (६)
अत्यंत मेधावी वरुणदेव की स्तुति का कोई विरोध नहीं कर सकता. जलपूर्ण अनेक
नदियां अकेले सागर को नहीं भर पातीं. (६)
अर्यम्यं वरुण मित्र्यं वा सखायं वा सदमिद् भ्रातरं वा.
वेशं वा नित्यं वरुणारणं वा यत्सीमागाश्चकृमा शिश्रथस्तत्.. (७)
हे वरुण! दान देने वाले, मित्र, सखा, भ्राता, पड़ोसी एवं गूंगे के प्रति किए गए हमारे
अपराध को नष्ट करो. (७)
कितवासो यद्रिरिपुर्न दीवि यद्घा घा सत्यमुत यन्न विद्म.
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