Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

अध्याय (पृष्ठ 646)

Page 646Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टनवतितमोऽध्यायः

द्रोणाचार्य और सात्यकिका अद्भुत युद्ध

धृतराष्ट्र उवाच

बाणे तस्मिन् निकृत्ते तु धृष्टद्युम्ने च मोक्षिते ।
तेन वृष्णिप्रवीरेण युयुधानेन संजय ॥ १ ॥
अमर्षितो महेष्वासः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
नरव्याघ्रः शिनेः पौत्रे द्रोणः किमकरोद् युधि ॥ २ ॥

**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जब वृष्णिवंशके प्रमुख वीर युयुधानेने आचार्य द्रोणके उस बाणको काट दिया और धृष्टद्युम्नको प्राणसंकटसे बचा लिया, तब अमर्षमें भरे हुए सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर नरव्याघ्र द्रोणाचार्यने उस युद्धस्थलमें सात्यकिके प्रति क्या किया? ॥ १-२ ॥

संजय उवाच

सम्पद्रुतः क्रोधविषो व्यादितास्यशरासनः ।
तीक्ष्णधारेषुदशनः शितनाराचदंष्ट्रवान् ॥ ३ ॥
संरम्भामर्षताम्राक्षो महोरग इव श्वसन् ।

**संजयने कहा—**महाराज! उस समय क्रोध और अमर्षसे लाल आँखें किये द्रोणाचार्यने फुफकारते हुए महानागके समान बड़े वेगसे सात्यकिपर धावा किया। क्रोध ही उस महानागका विष था, खींचा हुआ धनुष फैलाये हुए मुखके समान जान पड़ता था, तीखी धारवाले बाण दाँतोंके समान थे और तेज धारवाले नाराच दाढ़ोंका काम देते थे ॥ ३ ½ ॥

नरवीरः प्रमुदितः शोणैरश्वैर्महाजवैः ॥ ४ ॥
उत्पतद्भिरिवाकाशे क्रामद्भिरिव पर्वतम् ।
रुक्मपुङ्खाञ्छरानस्यन् युयुधानमुपाद्रवत् ॥ ५ ॥

हर्षमें भरे हुए नरवीर द्रोणाचार्यने अपने महान् वेगशाली लाल घोड़ोंद्वारा, जो मानो आकाशमें उड़ रहे और पर्वतको लाँघ रहे थे, सुवर्णमय पंखवाले बाणोंकी वर्षा करते हुए वहाँ युयुधानपर आक्रमण किया ॥ ४-५ ॥

शरपातमहावर्षं रथघोषबलाहकम् ।
कार्मुकाकर्षविक्षेपं नाराचबहुविद्युतम् ॥ ६ ॥
शक्तिखड्गाशनिधरं क्रोधवेगसमुत्थितम् ।
द्रोणमेघमनावार्यं हयमारुतचोदितम् ॥ ७ ॥

Page 647Permalink

उस समय द्रोणाचार्य अश्वरूपी वायुसे संचालित अनिवार्य मेघके समान हो रहे थे। बाणोंका प्रहार ही उनके द्वारा की जानेवाली महावृष्टि था। रथकी घर्घराहट ही मेघकी गर्जना थी, धनुषका खींचना ही धारावाहिक वृष्टिका साधन था, बहुत-से नाराच ही विद्युत्के समान प्रकाशित होते थे, उस मेघने खड्ग और शक्तिरूपी अशनिको धारण कर रखा था और क्रोधके वेगसे ही उसका उत्थान हुआ था ॥ ६-७ ॥

दृष्ट्वाभिपतन्तं तं शूरः परपुरंजयः ।
उवाच सूतं शैनेयः प्रहसन् युद्धदुर्मदः ॥ ८ ॥
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले रणदुर्मद शूरवीर सात्यकि द्रोणाचार्यको अपने ऊपर आक्रमण करते देख सारथिसे जोर-जोरसे हँसते हुए बोले— ॥ ८ ॥

एनं वै ब्राह्मणं शूरं स्वकर्मण्यनवस्थितम् ।
आश्रयं धार्तराष्ट्रस्य राज्ञो दुःखभयापहम् ॥ ९ ॥
शीघ्रं प्रजवितैरश्वैः प्रत्युद्याहि प्रहृष्टवत् ।
आचार्यं राजपुत्राणां सततं शूरमानिनम् ॥ १० ॥
‘सूत! ये शौर्यसम्पन्न ब्राह्मणदेवता अपने ब्राह्मणोचित कर्ममें स्थिर नहीं हैं। ये धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनके आश्रय होकर उसके दुःख और भयका निवारण करनेवाले हैं। समस्त राजकुमारोंके ये ही आचार्य हैं और सदा अपनेको शूरवीर मानते हैं। तुम प्रसन्नचित्त होकर अपने वेगशाली अश्वोंद्वारा शीघ्र इनका सामना करनेके लिये चलो’ ॥ ९-१० ॥

ततो रजतसंकाशा माधवस्य हयोत्तमाः ।
द्रोणस्याभिमुखाः शीघ्रमगच्छन् वातरंहसः ॥ ११ ॥
तदनन्तर चाँदीके समान श्वेत रंगवाले और वायुके समान वेगशाली सात्यकिके उत्तम घोड़े द्रोणाचार्यके सामने शीघ्रतापूर्वक जा पहुँचे ॥ ११ ॥

ततस्तौ द्रोणशैनेयौ युयुधाते परंतपौ ।
शरैरनेकसाहस्रैस्ताडयन्तौ परस्परम् ॥ १२ ॥
फिर तो शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्य और सात्यकि एक-दूसरेपर सहस्रों बाणोंका प्रहार करते हुए युद्ध करने लगे ॥ १२ ॥

इषुजालावृतं व्योम चक्रतुः पुरुषर्षभौ ।
पूरयामासतुर्वीरावुभौ दश दिशः शरैः ॥ १३ ॥
उन दोनों पुरुषशिरोमणि वीरोंने आकाशको बाणोंके समूहसे आच्छादित कर दिया और दसों दिशाओंको बाणोंसे भर दिया ॥ १३ ॥

मेघाविवातपापाये धाराभिरितरेतरम् ।
न स्म सूर्यस्तदा भाति न ववौ च समीरणः ॥ १४ ॥
जैसे वर्षाकालमें दो मेघ एक-दूसरेपर जलकी धाराएँ गिराते हों, उसी प्रकार वे परस्पर बाण-वर्षा कर रहे थे। उस समय न तो सूर्यका पता चलता था और न हवा ही चलती

Page 648Permalink

थी ।। १४ ।।
इषुजालावृतं घोरमन्धकारं समन्ततः ।
अनाधृष्यमिवान्येषां शूराणामभवत् तदा ।। १५ ।।
चारों ओर बाणोंका जाल-सा बिछ जानेके कारण वहाँ घोर अन्धकार छा गया था। उस समय अन्य शूरवीरोंका वहाँ पहुँचना असम्भव-सा हो गया ।। १५ ।।
अन्धकारीकृते लोके द्रोणशैनेययोः शरैः ।
तयोः शीघ्रास्त्रविदुषोर्द्रोणसात्वतयोस्तदा ।। १६ ।।
नान्तरं शरवृष्टीनां ददृशे नरसिंहयोः ।
शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेकी कलाको जाननेवाले द्रोणाचार्य तथा सात्वतवंशी सात्यकिके बाणोंसे लोकमें अन्धकार छा जानेपर भी उस समय उन दोनों पुरुषसिंहोंकी बाण-वर्षा में कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ।। १६<sup>१</sup>/<sub>२</sub> ।।
इषूणां संनिपातेन शब्दो धाराभिघातजः ।। १७ ।।
शुश्रुवे शक्रमुक्तानामशनीनामिव स्वनः ।
बाणोंके परस्पर टकरानेसे उनकी धारोंके आघात-प्रत्याघातसे जो शब्द होता था, वह इन्द्रके छोड़े हुए वज्रास्त्रोंकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी पड़ता था ।।
नाराचैर्व्यतिविद्धानां शराणां रूपमाबभौ ।। १८ ।।
आशीविषविदष्टानां सर्पाणामिव भारत ।
भरतनन्दन! नाराचोंसे अत्यन्त विद्ध हुए बाणोंका स्वरूप विषधर नागोंके डँसे हुए सर्पोंके समान जान पड़ता था ।। १८<sup>१</sup>/<sub>२</sub> ।।
तयोर्ज्यातलनिर्घोषः शुश्रुवे युद्धशौण्डयोः ।। १९ ।।
अजस्रं शैलशृङ्गाणां वज्रेणाहन्यतामिव ।
उन दोनों युद्धकुशल वीरोंके धनुषोंकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि ऐसी सुनायी देती थी, मानो पर्वतोंके शिखरोंपर निरन्तर वज्रसे आघात किया जा रहा हो ।।
उभयोस्तौ रथौ राजंस्ते चाश्वास्तौ च सारथी ।। २० ।।
रुक्मपुङ्खैः शरैश्छिन्नाश्चित्ररूपा बभूवुस्तदा ।
राजन्! उन दोनोंके वे रथ, वे घोड़े और वे सारथि सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे क्षत-विक्षत होकर उस समय विचित्ररूपसे सुशोभित हो रहे थे ।। २०<sup>१</sup>/<sub>२</sub> ।।
निर्मलानामजिह्मानां नाराचानां विशाम्पते ।। २१ ।।
निर्मुक्ताशीविषाभानां सम्पातोऽभूत् सुदारुणः ।
प्रजानाथ! केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान निर्मल और सीधे जानेवाले नाराचोंका प्रहार वहाँ बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ।। २१<sup>१</sup>/<sub>२</sub> ।।
उभयोः पतिते छत्रे तथैव पतितौ ध्वजौ ।। २२ ।।
उभौ रुधिरसिक्ताङ्गावुभौ च विजयैषिणौ ।

Page 649Permalink

दोनोंके छत्र कटकर गिर गये, ध्वज धराशायी हो गये और दोनों ही विजयकी अभिलाषा रखते हुए खूनसे लथपथ हो रहे थे ।। २२ १/२ ।।
स्रवद्भिः शोणितं गात्रैः प्रसुताविव वारणौ ।। २३ ।।
अन्योन्यमभ्यविध्येतां जीवितान्तकरैः शरैः ।
सारे अंगोंसे रक्तकी धारा बहनेके कारण वे दोनों वीर मदवर्षी गजराजोंके समान जान पड़ते थे। वे एक-दूसरेको प्राणान्तकारी बाणोंसे बेध रहे थे ।। २३ १/२ ।।
गर्जितोत्कृष्टसंनादाः शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनाः ।। २४ ।।
उपारमन् महाराज व्याजहार न कश्चन ।
महाराज! उस समय गरजने, ललकारने और सिंहनादके शब्द तथा शंखों और दुन्दुभियोंके घोष बंद हो गये थे। कोई बातचीततक नहीं करता था ।। २४ १/२ ।।
तूष्णीम्भूतान्यनीकानि योधा युद्धादुपारमन् ।। २५ ।।
ददर्श द्वैरथं ताभ्यां जातकौतूहलो जनः ।
सारी सेनाएँ मौन थीं, योद्धा युद्धसे विरत हो गये थे, सब लोग कौतूहलवश उन दोनोंके द्वैरथ युद्धका दृश्य देखने लगे ।। २५ १/२ ।।
रथिनो हस्तिमन्तारो हयारोहाः पदातयः ।। २६ ।।
अवैक्षन्ताचलनैत्रैः परिवार्य नरर्षभौ ।
रथी, महावत, घुड़सवार और पैदल सभी उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंको घेरकर उन्हें एकटक नेत्रोंसे निहारने लगे ।।
हस्त्यनीकान्यतिष्ठन्त तथानीकानि वाजिनाम् ।। २७ ।।
तथैव रथवाहिन्यः प्रतिव्यूह्य व्यवस्थिताः ।
हाथियोंकी सेनाएँ चुपचाप खड़ी थीं, घुड़सवार सैनिकोंकी भी यही दशा थी तथा रथसेनाएँ भी व्यूह बनाकर वहाँ स्थिरभावसे खड़ी थीं ।। २७ १/२ ।।
मुक्ताविद्रुमचित्रैश्च मणिकाञ्चनभूषितैः ।। २८ ।।
ध्वजैराभरणैश्चित्रैः कवचैश्च हिरण्मयैः ।
वैजयन्तीपताकाभिः परिस्तोमाङ्ककम्बलैः ।। २९ ।।
विमलैर्निशितैः शस्त्रैर्हयानां च प्रकीर्णकैः ।
जातरूपमयीभिश्च राजतीभिश्च मूर्धसु ।। ३० ।।
गजानां कुम्भमालाभिर्दन्तवेष्टैश्च भारत ।
सबलाकाः सखद्योताः सैरावतशतह्रदाः ।। ३१ ।।
अदृश्यन्तोष्णपर्याये मेघानामिव वागुराः ।

Page 650Permalink

भारत! मोती और मूँगोंसे चित्रित तथा मणियों और सुवर्णोंसे विभूषित ध्वज, विचित्र आभूषण, सुवर्णमय कवच, वैजयन्ती, पताका, हाथियोंके झूल और कम्बल, चमचमाते हुए तीखे शस्त्र, घोड़ोंकी पीठपर बिछाये जानेवाले वस्त्र, हाथियोंके कुम्भस्थलमें और मस्तकोंपर सुशोभित होनेवाली सोने-चाँदीकी मालाएँ तथा दन्तवेष्टन—इन सब वस्तुओंके कारण उभयपक्षकी सेनाएँ वर्षाकालमें बगलोंकी पाँति, खद्योत, ऐरावत और बिजलियोंसे युक्त मेघसमूहोंके समान दृष्टिगोचर हो रही थीं ।। २८—३१ १/२ ।।

अपश्यन्नस्मदीयाश्च ते च यौधिष्ठिराः स्थिताः ।। ३२ ।।
तद् युद्धं युयुधानस्य द्रोणस्य च महात्मनः ।
राजन्! हमारी और युधिष्ठिरकी सेनाके सैनिक वहाँ खड़े होकर महामना द्रोण और सात्यकिका वह युद्ध देख रहे थे ।। ३२ १/२ ।।

विमानाग्रगता देवा ब्रह्मसोमपुरोगमाः ।। ३३ ।।
सिद्धचारणसंघाश्च विद्याधरमहोरगाः ।
ब्रह्मा और चन्द्रमा आदि सब देवता विमानोंपर बैठकर वहाँ युद्ध देखनेके लिये आये थे। उनके साथ ही सिद्धों और चारणोंके समूह, विद्याधर और बड़े-बड़े नागगण भी थे ।। ३३ १/२ ।।

गतप्रत्यागताक्षेपैश्चित्रैरस्त्रविघातिभिः ।। ३४ ।।
विविधैर्विस्मयं जग्मुस्तयोः पुरुषसिंहयोः ।
वे सब लोग उन दोनों पुरुषसिंहोंके विचित्र गमन-प्रत्यागमन, आक्षेप तथा नाना प्रकारके अस्त्रनिवारक व्यापारोंसे आश्चर्यचकित हो रहे थे ।। ३४ १/२ ।।

हस्तलाघवमस्त्रेषु दर्शयन्तौ महाबलौ ।। ३५ ।।
अन्योन्यमभिविध्येतां शरैस्तौ द्रोणसात्यकी ।
महावीर द्रोणाचार्य और सात्यकि अस्त्र चलानेमें अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए बाणोंद्वारा एक-दूसरेको बेध रहे थे ।। ३५ १/२ ।।

ततो द्रोणस्य दाशार्हः शरांश्चिच्छेद संयुगे ।। ३६ ।।
पत्रिभिः सुदृढैराशु धनुश्चैव महाद्युतेः ।
इसी बीचमें सात्यकिने महातेजस्वी द्रोणाचार्यके धनुष और बाणोंको पंखयुक्त सुदृढ़ बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें शीघ्र ही काट डाला ।। ३६ १/२ ।।

निमेषान्तरमात्रेण भारद्वाजोऽपरं धनुः ।। ३७ ।।
सज्यं चकार तदपि चिच्छेदास्य च सात्यकिः ।
तब भरद्वाजनन्दन द्रोणने पलक मारते-मारते दूसरा धनुष हाथमें लेकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ायी; परंतु सात्यकिने उनके उस धनुषको भी काट डाला ।। ३७ १/२ ।।

ततस्त्वरन् पुनर्द्रोणो धनुर्हस्तो व्यतिष्ठत ।। ३८ ।।

Page 651Permalink

सज्यं सज्यं धनुश्चास्य चिच्छेद निशितैः शरैः ।
तब द्रोणाचार्य पुनः बड़ी उतावलीके साथ दूसरा धनुष हाथमें लेकर खड़े हो गये; परंतु ज्यों ही वे धनुषपर डोरी चढ़ाते, त्यों ही सात्यकि अपने तीखे बाणोंद्वारा उसे काट देते थे ।। ३८ १/२ ।।
एवमेकशतं छिन्नं धनुषां दृढधन्विना ।। ३९ ।।
न चान्तरं तयोर्दृष्टं संधाने छेदनेऽपि च ।
इस प्रकार सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले सात्यकिने आचार्यके एक सौ धनुष काट डाले; परंतु कब वे संधान करते हैं और सात्यकि कब उस धनुषको काट देते हैं, उन दोनोंके इस कार्यमें किसीको कोई अन्तर नहीं दिखायी दिया ।। ३९ १/२ ।।
ततोऽस्य संयुगे द्रोणो दृष्ट्वा कर्मातिमानुषम् ।। ४० ।।
युयुधानस्य राजेन्द्र मनसैतदचिन्तयत् ।
राजेन्द्र! तदनन्तर रणक्षेत्रमें सात्यकिके उस अमानुषिक पराक्रमको देखकर द्रोणाचार्यने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया ।। ४० १/२ ।।
एतदस्त्रबलं रामे कार्तवीर्ये धनंजये ।। ४१ ।।
भीष्मे च पुरुषव्याघ्रे यदिदं सात्वतां वरे ।
तं चास्य मनसा द्रोणः पूजयामास विक्रमम् ।। ४२ ।।
सात्वतकुलके श्रेष्ठ वीर सात्यकिमें जो यह अस्त्रबल दिखायी देता है, ऐसा तो केवल परशुराममें, कार्तवीर्य अर्जुनमें, धनंजयमें तथा पुरुषसिंह भीष्ममें ही देखा-सुना गया है। द्रोणाचार्यने मन-ही-मन उनके पराक्रमकी बड़ी प्रशंसा की ।। ४१-४२ ।।
लाघवं वासवस्येव सम्प्रेक्ष्य द्विजसत्तमः ।
तुतोषास्त्रविदां श्रेष्ठस्तथा देवाः सवासवाः ।। ४३ ।।
इन्द्रके समान सात्यकिके उस हस्तलाघव तथा पराक्रमको देखकर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर द्रोणाचार्य और इन्द्र आदि देवता भी बड़े प्रसन्न हुए ।। ४३ ।।
न तामालक्षयामासुर्लघुतां शीघ्रचारिणः ।
देवाश्च युयुधानस्य गन्धर्वाश्च विशाम्पते ।। ४४ ।।
सिद्धचारणसंघाश्च विदुद्रोणस्य कर्म तत् ।
प्रजानाथ! रणभूमिमें शीघ्रतापूर्वक विचरनेवाले सात्यकिकी उस फुर्तीको देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों और चारणसमूहोंने पहले कभी नहीं देखा था। वे जानते थे कि केवल द्रोणाचार्य ही वैसा पराक्रम कर सकते हैं (परंतु उस दिन उन्होंने सात्यकिका पराक्रम भी प्रत्यक्ष देख लिया) ।। ४४ १/२ ।।
ततोऽन्यद् धनुरादाय द्रोणः क्षत्रियमर्दनः ।। ४५ ।।
अस्त्रैरस्त्रविदां श्रेष्ठो योधयामास भारत ।

Page 652Permalink

भारत! तत्पश्चात् अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ क्षत्रियसंहारक द्रोणाचार्यने दूसरा धनुष हाथमें लेकर विभिन्न अस्त्रोंद्वारा युद्ध आरम्भ किया ॥ ४५ १/२ ॥
तस्यास्त्राण्यस्त्रमायाभिः प्रतिहत्य स सात्यकिः ॥ ४६ ॥
जघान निशितैर्बाणैस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
सात्यकिने अपने अस्त्रोंकी मायासे आचार्यके अस्त्रोंका निवारण करके उन्हें तीखे बाणोंसे घायल कर दिया। वह अद्भुत-सी घटना हुई ॥ ४६ १/२ ॥
तस्यातिमानुषं कर्म दृष्ट्वान्यैरसमं रणे ॥ ४७ ॥
युक्तं योगेन योगज्ञास्तावकाः समपूजयन् ।
उस रणक्षेत्रमें सात्यकिके उस युक्तियुक्त अलौकिक कर्मको, जिसकी दूसरोंसे कोई तुलना नहीं थी, देखकर आपके रणकौशलवेत्ता सैनिक उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ४७ १/२ ॥
यदस्त्रमस्यति द्रोणस्तदेवास्यति सात्यकिः ॥ ४८ ॥
तमाचार्योऽप्यसम्भ्रान्तोऽयोधयच्छत्रुतापनः ।
द्रोणाचार्य जिस अस्त्रका प्रयोग करते, उसीका सात्यकि भी करते थे। शत्रुओंको संताप देनेवाले आचार्य द्रोण भी घबराहट छोड़कर सात्यकिसे युद्ध करते रहे ॥ ४८ १/२ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज धनुर्वेदस्य पारगः ॥ ४९ ॥
वधाय युयुधानस्य दिव्यमस्त्रमुदैरयत् ।
महाराज! तदनन्तर धनुर्वेदके पारंगत विद्वान् द्रोणाचार्यने कुपित हो सात्यकिके वधके लिये एक दिव्यास्त्र प्रकट किया ॥ ४९ १/२ ॥
तदाग्नेयं महाघोरं रिपुघ्नमुपलक्ष्य सः ॥ ५० ॥
दिव्यमस्त्रं महेष्वासो वारुणं समुदैरयत् ।
शत्रुओंका नाश करनेवाले उस अत्यन्त भयंकर आग्नेयास्त्रको देखकर महाधनुर्धर सात्यकिने भी वारुण नामक दिव्यास्त्रका प्रयोग किया ॥ ५० १/२ ॥
हाहाकारो महानासीद् दृष्ट्वा दिव्यास्त्रधारिणौ ॥ ५१ ॥
न विचेरुस्तदाकाशे भूतान्याकाशगाम्यपि ।
उन दोनोंको दिव्यास्त्र धारण किये देख वहाँ महान् हाहाकार मच गया। उस समय आकाशचारी प्राणी भी आकाशमें विचरण नहीं करते थे ॥ ५१ १/२ ॥
अस्त्रे ते वारुणाग्नेये ताभ्यां बाणसमाहिते ॥ ५२ ॥
न यावदभ्यपद्येतां व्यावर्तदथ भास्करः ।
वे वारुण और आग्नेय दोनों अस्त्र उन दोनोंके द्वारा अपने बाणोंमें स्थापित होकर जबतक एक-दूसरेके प्रभावसे प्रतिहत नहीं हो गये, तभीतक भगवान् सूर्य दक्षिणसे पश्चिमके आकाशमें ढल गये ॥ ५२ १/२ ॥

Page 653Permalink

ततो युधिष्ठिरो राजा भीमसेनश्च पाण्डवः ॥ ५३ ॥
नकुलः सहदेवश्च पर्य्यरक्षन्त सात्यकिम् ।
तब राजा युधिष्ठिर, पाण्डुकुमार भीमसेन, नकुल और सहदेव सब ओरसे सात्यकिकी रक्षा करने लगे ॥ ५३ १/२ ॥
धृष्टद्युम्नमुखैः सार्धं विराटश्च सकेकयः ॥ ५४ ॥
मत्स्याः शाल्वेयसेनाश्च द्रोणमाजग्मुरञ्जसा ।
धृष्टद्युम्न आदि वीरोंके साथ विराट, केकयराजकुमार, मत्स्यदेशीय सैनिक तथा शाल्वदेशकी सेनाएँ—ये सब-के-सब अनायास ही द्रोणाचार्यपर चढ़ आये ॥ ५४ १/२ ॥
दुःशासनं पुरस्कृत्य राजपुत्राः सहस्रशः ॥ ५५ ॥
द्रोणमभ्युपपद्यन्त सपत्नैः परिवारितम् ।
उधरसे सहस्रों राजकुमार दुःशासनको आगे करके शत्रुओंसे घिरे हुए द्रोणाचार्यके पास उनकी रक्षाके लिये आ पहुँचे ॥ ५५ १/२ ॥
ततो युद्धमभूद् राजंस्तेषां तव च धन्विनाम् ॥ ५६ ॥
रजसा संवृते लोके शरजालसमावृते ।
राजन्! तदनन्तर पाण्डवोंके और आपके धनुर्धरोंका परस्पर युद्ध होने लगा। उस समय सब लोग धूलसे आवृत और बाणसमूहसे आच्छादित हो गये थे ॥ ५६ १/२ ॥
सर्वमाविग्नमभवन्न प्राज्ञायत किंचन ।
सैन्येन रजसा ध्वस्ते निर्मर्यादमवर्तत ॥ ५७ ॥
वहाँका सब कुछ उद्विग्न हो रहा था। सेनाद्वारा उड़ायी हुई धूलसे ध्वस्त होनेके कारण किसीको कुछ ज्ञात नहीं होता था। वहाँ मर्यादाशून्य युद्ध चल रहा था ॥ ५७ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि द्रोणसात्यकियुद्धे
अष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें द्रोण और सात्यकिका
युद्धविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥