माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ६६ ) माधवनिदान ।
( ६६ ) माधवनिदान ।
अब उपद्रवसे असाध्यत्व कहते हैं-
हस्ते पादे गुदे नाभ्यां मुखे वृषणयोस्तथा ।
शोथो हृत्पार्श्वशूलं च यस्यासाध्योऽर्शसो हि सः ॥ ४७ ॥
जिसके हाथ, पैर, गुदा, नाभि, मुख और अण्डकोश इनमें सूजन हो, हृदय और
पसवाडे दूखें वह रोगी असाध्य जानना ॥
हृत्पार्श्वशूलं संमोहश्छर्दिरङ्गस्य रुगुज्वरः ।
तृष्णा गुदस्य पाकश्च निहन्युर्गुदजातुरम् ॥ ४८ ॥
हृदय और पसवाडोंमें दर्द होय, इन्द्रिय और मन इनमें मोह होय, वमन,
अङ्गोंमें पीडा, ज्वर, प्यास, गुदाका पकना अर्थात् गुदाके ऊपर पीले फोडे ये
लक्षण होनेसे बवासीरवाला रोगी असाध्य जानना ॥
तृष्णारोचकशूलार्तमतिप्रसृतशोणितम् ।
शोथातिसारसंयुक्तमर्शॉसि क्षपयन्ति हि ॥ ४९ ॥
प्यास, अरुचि, शूल इनसे पीडित, जिसके अत्यन्त रुधिर बहे और सूजन अति-
सार ये होयँ उस रोगीका बवासीर नाश कर देता है ॥
मेढ्रादिष्वपि वक्ष्यन्ते यथास्वं नाभिजान्यपि ।
गण्डूपदास्यरूपाणि पिच्छिलानि मृदूनि च ॥ ५० ॥
मेढ्र कहिये लिंग, आदिशब्दकरके नाक कान इत्यादि स्थानोंमें दोषभेद करके
बवासीर होती है सो आगे कहेंगे । उसी प्रकार नाभिस्थानमें भी अर्शरोग होता है
वह केंचुआके मुखके समान गाढी और नरम होय ॥
चर्मकीलकी संप्राप्ति ।
व्यानो गृहीत्वा श्लेष्माणं करोत्यर्शस्त्वचो बहिः ।
कीलोपमः स्थिरखरं चर्मकीलं तु तद्विदुः ॥ ५१ ॥
व्यानवायु कफको लेकर त्वचामें कीलके सदृश स्थिर और खरदरी ऐसे बवा-
सीरको करे उसको चर्मकील कहते हैं । “त्वचो बहिः” इसके कहनेसे गुद
होठका त्याग कहा ॥
भाषाटीकासमेत । ( ६७ )
वातादिभेदकरके उसके लक्षण ।
वातेन तोदपारुष्ये पित्तादतिसरक्तता ।
श्लेष्मणा स्निग्धता चास्य ग्रथितत्वं सवर्णता ॥ ५२ ॥
वातसे सुईके चुभानेसे जैसे पीडा होती है ऐसी पीडा हो, पित्तसे कठोरता,
कफसे काला और कुछ तथा चिकनी गांठके समान वर्ण होवै ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरी-
भाषाटीकायामर्शोरोगः समाप्तः ॥
अथ मन्दाग्निरोगनिदानम् ।
अर्शरोगसे मन्दाग्नि होती हैं, इसीसे मन्दाग्निरोगको कहते हैं—
मन्दस्तीक्ष्णोऽथ विषमः समश्चेति चतुर्विधः ।
कफपित्तानिलाधिक्यात्तत्साम्याज्जाठरोऽनलः ॥ १ ॥
मनुष्यके कफकी प्रकृतिसे मंदाग्नि, पित्तकी प्रकृतिसे तीक्ष्णाग्नि, वातकी प्रकृ-
तिसे विषमाग्नि तथा वात, पित्त, कफ इनके समान होनेसे समाग्नि होवे है । ऐसी
अग्नि चार प्रकारकी है । इसमें मन्दाग्निको दुर्जय होनेसे प्रथम कही और जाठर
शब्द कहनेसे धातुकी अग्निका त्याग जानना ॥
अजीर्णरोग ।
विषमो वातजान् रोगांस्तीक्ष्णः पित्तनिमित्तजान् ।
करोत्यग्निस्तथा मन्दो विकारान् कफसंभवान् ॥ २ ॥
विषमाग्नि वातजन्य ८० रोगोंमेंसे किसी रोगको प्रगट करे और सामान्य ज्वरा-
तिसारादिकको प्रगट करे, तीक्ष्णाग्नि पित्तके ४० रोगोंमेंसे किसी रोगको प्रगट
करे । उसी प्रकार मन्दाग्नि कफजन्य २० रोगोंमेंसे किसी रोगको पैदा कर आल-
स्यादिकोंको उत्पन्न करती है ॥
समाग्न्यादिकोंके लक्षण ।
समा समाग्नेरशिता मात्रा सम्यग्विपाच्यते । स्वल्पापि नैव
मन्दाग्नेर्विषमाग्नेस्तु देहिनः ॥ ३ ॥ कदाचित्पच्यते सम्यक्
कदाचिन्न विपच्यते। मात्रातिमात्राप्याशिता सुखं यस्य विप-
च्यते ॥ ४ ॥ तीक्ष्णाग्निरिति तं विद्यात्समाग्निः श्रेष्ठ उच्यते ॥
समाग्निवाले पुरुषके यथोचित आहार भले प्रकार पाचन होता है और मन्दाग्नि-
वाले पुरुषको थोडा भी आहार यथार्थ नहीं पचता और विषमाग्निवाले मनुष्यको
कभी अच्छी तरहसे अन्न पचे और कभी नहीं पचे और बहुत भोजन करा हुआ
भी जिसके सुखपूर्वक पचजावे उसको तीक्ष्णाग्नि कहते हैं । इन चारों प्रकारकी
अग्निमें समाग्नि उत्तम है । तीक्ष्णाग्निके कहनेसे भस्मकका ग्रहण नहीं करना चाहिये
क्योंकि अत्यन्त तीक्ष्णाग्निको भस्मक कहते हैं उसके लक्षण चरकमें कहे हैं ॥ यथा-
नरे क्षीणकफे पित्तं कुपितं मारुतानुगम् ॥ ५ ॥ सोष्मणा
पाचकस्थाने बलमग्नेः प्रयच्छति । तदा लब्धबलो देहं रूक्षं
यत्सानिलोऽनलः ॥ ६ ॥ अभिभूय पचत्यन्नं तैक्ष्ण्यादाशु
मुहुर्मुहुः । पक्त्वाऽन्नं स ततो धातूञ्शोणितादीन्पचत्यपि ॥ ७ ॥
ततो दौर्बल्यमातङ्कं मृत्युं चोपनयेत् परम् । भुक्तेऽन्ने लभते
शान्तिं जीर्णमात्रे प्रताम्यति । तृट्कासदाहमोहाः स्यु-
र्व्याधयोऽत्यग्निसंभवाः ॥ ८ ॥
क्षीणकफवाले पुरुषके कफ कुपित हो वायुसे मिलकर ऊष्माके साथ पाचक-
स्थानमें जाकर अग्निको बल देवे तब जठराग्नि वातकी सहायता पाकर प्रबल होकर
देहको रूखा कर देवे और उसके जोरसे बारंबार अन्नको पचावे । अन्नको पचाय
पीछे रुधिरादि धातुओंको पचावे, रुधिर आदिके पचनेसे देहमें दुर्बलताका रोग
और मृत्युको मनुष्य प्राप्त होवे, जब अन्नको खावे तब तो शांति हो जाय और जब
अन्न पचजाय तब मूर्च्छित होय । प्यास, खांसी, दाह, मोह, (कुछ सुध न रहै)
ये रोग अत्यन्त अग्निसे होते हैं !
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा-
टीकायामग्निमांद्यनिदानं समाप्तम् ॥