माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६६ ) माधवनिदान ।
अब उपद्रवसे असाध्यत्व कहते हैं-
हस्ते पादे गुदे नाभ्यां मुखे वृषणयोस्तथा ।
शोथो हृत्पार्श्वशूलं च यस्यासाध्योऽर्शसो हि सः ॥ ४७ ॥
जिसके हाथ, पैर, गुदा, नाभि, मुख और अण्डकोश इनमें सूजन हो, हृदय और
पसवाडे दूखें वह रोगी असाध्य जानना ॥
हृत्पार्श्वशूलं संमोहश्छर्दिरङ्गस्य रुगुज्वरः ।
तृष्णा गुदस्य पाकश्च निहन्युर्गुदजातुरम् ॥ ४८ ॥
हृदय और पसवाडोंमें दर्द होय, इन्द्रिय और मन इनमें मोह होय, वमन,
अङ्गोंमें पीडा, ज्वर, प्यास, गुदाका पकना अर्थात् गुदाके ऊपर पीले फोडे ये
लक्षण होनेसे बवासीरवाला रोगी असाध्य जानना ॥
तृष्णारोचकशूलार्तमतिप्रसृतशोणितम् ।
शोथातिसारसंयुक्तमर्शॉसि क्षपयन्ति हि ॥ ४९ ॥
प्यास, अरुचि, शूल इनसे पीडित, जिसके अत्यन्त रुधिर बहे और सूजन अति-
सार ये होयँ उस रोगीका बवासीर नाश कर देता है ॥
मेढ्रादिष्वपि वक्ष्यन्ते यथास्वं नाभिजान्यपि ।
गण्डूपदास्यरूपाणि पिच्छिलानि मृदूनि च ॥ ५० ॥
मेढ्र कहिये लिंग, आदिशब्दकरके नाक कान इत्यादि स्थानोंमें दोषभेद करके
बवासीर होती है सो आगे कहेंगे । उसी प्रकार नाभिस्थानमें भी अर्शरोग होता है
वह केंचुआके मुखके समान गाढी और नरम होय ॥
चर्मकीलकी संप्राप्ति ।
व्यानो गृहीत्वा श्लेष्माणं करोत्यर्शस्त्वचो बहिः ।
कीलोपमः स्थिरखरं चर्मकीलं तु तद्विदुः ॥ ५१ ॥
व्यानवायु कफको लेकर त्वचामें कीलके सदृश स्थिर और खरदरी ऐसे बवा-
सीरको करे उसको चर्मकील कहते हैं । “त्वचो बहिः” इसके कहनेसे गुद
होठका त्याग कहा ॥