माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
(२५६) माधवनिदान ।
(२५६) माधवनिदान ।
कच्छुकुष्ठ वही पामा मोटे फोडोंकरके तथा तीव्रदाहयुक्त होय और हाथोंमें हो,
उसको कच्छु कहते हैं । उग्रा यह चूतडमें होती है ॥
विस्फोटकुष्ठके लक्षण ।
स्फोटाः श्यावारुणाभासा विस्फोटाः स्युस्तनुत्वचः ।
विस्फोटिक फोडे काले व लाल रंगके होयँ और जिनकी त्वचा पतली होय
उसको विस्फोट कहते हैं ॥
शतारुकुष्ठके लक्षण ।
रक्तं श्यावं सदाहार्ति शतारु स्याद्बहुव्रणम् ॥ २३ ॥
शतारु लाल, होय, श्याम होय, जलन होय, शूल होय तथा जिनमें अनेक फोडे
होयँ उसको शतारुकुष्ठ कहते हैं ॥
विचर्चिकाके लक्षण ।
सकण्डूः पिडिका श्यावा बहुस्रावा विचर्चिका ।
विचर्चिका खुजलीयुक्त, काले रंगकी जो फुन्सी (माताके समान) होय तथा
उसमेंसे स्राव बहुत होय, उसको विचर्चिका कहते हैं। चर्मकुष्ठसे लेकर विचर्चिका-
कुष्ठ पर्यंत १२ कुष्ठ होते हैं और पीछे क्षुद्र कुष्ठ ११ कहैं हैं, ऐसी कोई शंका करे
उसके निमित्त कहते हैं । विचर्चिका पैरोंमें होकर फूटकर अर्थात् विपादिका होय हैं
ऐसे कहनेसे संख्या नहीं बढे इस विषयमें भोजका यह मत है ॥
वातजादि कुष्ठोंके लक्षण ।
खरं श्यावारुणं रूक्षं वातात्कुष्ठं सवेदनम् ॥ २४ ॥
पित्तात्प्रकुपितं दाहरागस्रावान्वितं स्मृतम् ।
कफात्क्लेदि घनं स्निग्धं सकण्डूशैत्यगौरवम् ।
द्विलिंगं द्वंद्वजं कुष्ठं त्रिलिंगं सान्निपातिकम् ॥ २५ ॥
वायुके योगसे कुष्ठ खरदरा, काले रंगका अथवा लालवर्ण रूखा और पीडा-
युक्त ऐसा होय है । पित्तके योगसे कुपित कुष्ठमें दाह, लाली और स्रावयुक्त
होय है । कफके योगसे क्लेदयुक्त, सघन, चिकना, खुजली, शीतलता युक्त और
भारी ऐसा होय है। द्वंदूज कुष्ठमें दो दोषोंके लक्षण होते हैं। सान्निपातिक कुष्ठमें
तीन दोषोंके लक्षण होते हैं ॥
१ दोषाः प्रदूष्य त्वङ्मांसं पाणिपादसमाश्रिताः । पिडिकां जनयंत्याशु दाहकण्डूसम-
न्विताम् ॥ दाल्यते त्वक् खरा रूक्षा पाण्योर्ज्ञेया विचर्चिका ॥ पादे विपादिका ज्ञेया स्थाना-
न्यत्वाद्विचर्चिका ॥
भाषाटीकासमेत । (२५७)
रसादिसप्तधातुगत कुष्ठोंके क्रमसे लक्षण ।
त्वक्स्थे वैवर्ण्यमंगेषु कुष्ठे रौक्ष्यं च जायते ।
त्वक्स्वापो रोमहर्षश्च स्वेदस्यातिप्रवर्तनम् ॥ २६ ॥
रसधातुगत कुष्ठ होनेसे अंगका वर्ण पलट जाय है, अंग रूखा होय, त्वचा
शून्य होय, रोमाञ्च हो और पसीना बहुत आवे ॥
रक्तगत कुष्ठके लक्षण ।
कण्डूर्विपूयकश्चैव कुष्ठे शोणितसंश्रये ॥ २७ ॥
रक्तगत कुष्ठमें खुजली और राध बहुत होय ॥
मांसगत कुष्ठके लक्षण ।
बाहुल्यं वक्त्रशोषश्च कार्कश्यं पिडिकोद्गमः ।
तोदः स्फोटः स्थिरत्वं च कुष्ठे मांससमाश्रिते ॥ २८ ॥
मांसगत कुष्ठ होनेसे मुख बहुत सूखे, अंगमें कर्कशपना होय, देहमें फुन्सी पैदा
होय, सुई नोचनेकीसी पीडा होय, फोडे होयँ वे बहुत दिन रहें ॥
मेदोगत कुष्ठके लक्षण ।
कौण्यं गतिकक्षयोऽङ्गानां संभेदः क्षतसर्पणम् ।
मेदःस्थानगते लिङ्गं प्रागुक्तानि तथैव च ॥ २९ ॥
मेंदमें कुष्ठ होनेसे कौण्य कहिये हाथ गिरपडे, चलनेकी शक्ति मारी जाय
हडफूटन होय, घाव फैल जाय और पूर्वोक्त लक्षण (रसरक्तमांसगतकुष्ठके
लक्षण) होयँ ॥
अस्थिमज्जागत कुष्ठके लक्षण ।
नासाभंगोऽक्षिरागश्च क्षतेषु कृमिसंभवः ।
स्वरोपघातश्च भवेदस्थिमज्जासमाश्रिते ॥ ३० ॥
अस्थि (हड्डी) और मज्जागत कुष्ठ होनेसे नाक गिरपडे, नेत्र लाल होयँ, घावमें
कीडे पड जाँय, स्वर बैठ जाय ये लक्षण होयँ ॥
शुक्रार्त्तवगत कुष्ठके लक्षण ।
दंपत्योः कुष्ठबाहुल्याद्दुष्टशोणितशुक्रयोः ।
यदपत्यं तयोर्जातं ज्ञेयं तदपि कुष्ठितम् ॥ ३१ ॥
जिन स्त्रीपुरुषोंके रुधिर शुक्र कुष्ठाधिक्यसे दुष्ट होयँ, उस दुष्ट हुए वीर्य और
रजसे प्रगट भई जो सन्तान सो भी कोढ़ी होती है, इस जगह दुष्टहुए शुक्र और
१ त्वक्शब्देनात्र रसोऽभिधीयते धातुप्रस्तावात् त्वक्शब्देन रसस्याभिधानं तात्स्थ्यात्
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