माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३२४ ) माधवनिदान ।
( ३२४ ) माधवनिदान ।
रक्तके तेजसे मिश्रित हुए परिम्लायीरोग होय, इसके योगसे रोगीको दिशा
आकाश और सूर्य ये पीले दीखें और सर्वत्र सूर्य उगेसे दीखे तथा वृक्ष भी तेज-
स्वरूपसे दीखे, परिम्लायी पित्तको नील कहते हैं सो सात्यकिने लिखा है, इस
रोगको कोई आचार्य रक्तपित्तसे होता है ऐसे कहते हैं सो भी लिखा है ॥
रागभेदसे लिंगनाशको षड्विधत्व कहते हैं-
वक्ष्यामि षड्विधं रागैर्लिङ्गनाशमतः परम् ॥ ५० ॥
रागोऽरुणो मारुतजः प्रदिष्टो म्लायी च नीलश्च तथैव पित्तात् ।
कफात्सितः शोणितजः सरक्तः समस्तदोषप्रभवो विचित्रः ॥ ५१ ॥
इसके अनन्तर रागभेदसे छः प्रकारका लिंगनाश होता है, सो इस प्रकार है-वात-
जन्य रंग लाल होय है, पित्तसे म्लायी पीला, नीला अथवा नीलाही रंग होय, कफसे
सफेद और रुधिरसे लाल तथा सब दोषोंसे अनेक प्रकारका रंग होता है ॥
वातिकरोगके विशेष लक्षण ।
अरुणं मण्डलं दृष्ट्यां स्थूलकाचारुणप्रभम् ।
परिम्लायिनि रोगे स्यान्म्लायि नीलं च मण्डलम् ॥
दोषक्षयात्कदाचित्स्यात्स्वयं तत्र प्रदर्शनम् ॥ ५२ ॥
परिम्लायि रोगमें दृष्टिके ऊपर मोटा कांचके समान लाल मण्डल होता है, वह
म्लान लाल पीला अथवा नील होता है, उसमें दोष घटनेसे कदाचित् देखनेकी
शक्ति होय । इस जगह दोषशब्दकरके कोई कर्मका ग्रहण करते हैं ॥
दृष्टिमण्डलगत रोगके लक्षण ।
अरुणं मण्डलं वाताच्चंचलं परुषं तथा ।
पित्तान्मण्डलमानीलं कांस्याभं पीतमेव च ॥ ५३ ॥
श्लेष्मणा बहलं स्निग्धं शंखकुन्देन्दुपाण्डुरम् ।
चलत्पद्मपलाशस्थः शुक्लो बिन्दुरिवांभसः ॥ ५४ ॥
मर्द्यमाने च नयने मण्डलं तद्विसर्पति ।
प्रवालपद्मपत्राभं मण्डलं शोणितात्मकम् ॥ ५५ ॥
१ एवमेव तु विज्ञेया नीलाः पित्तसमुद्भवाः । रक्तपित्तोत्थिताः पीताः ॥ इति ॥
२ विदधाति परिम्लायि पित्तं रक्तेन संगतम् । तेन पीता दिशः पश्येद्युद्यन्तमिव भास्करम् ॥ इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३२६ )
दृष्टिरागो भवेच्चित्रो लिंगनाशे त्रिदोषजे ।
यथास्वं दोषलिङ्गानि सर्वेष्वेव भवंति हि ॥ ५६ ॥
वादीसे दृष्टिमण्डल लाल, चञ्चल और खरदरा होता है । पित्तसे दृष्टिमण्डल
किञ्चित् नीला तथा काँसेके समान पीला होवे । कफसे भारी चिकना शंख कुन्द-
फूल और चन्द्र इनके समान सफेद होय और उसके नेत्रमें हलनेवाली कमलपत्रके
ऊपर पानीकी बूँदके समान टेढी तिरछी सफेद बून्द फैलीसी दिखलाई दे । रुधिरसे
दृष्टिमण्डल मूंगाके समान अथवा लाल कमलके समान लाल होवे और त्रिदोषज
लिंगनाशमें तरह तरहके मण्डल होयँ तथा सर्व दोषोंके लिंगमण्डलमें वातादि दोषोंके
न्यारे २ लक्षण होयँ ॥
आगे कहेगये और पीछे कहे ऐसे दृष्टिरोगोंकी संख्या ।
षड्लिङ्गनाशाः षडिमे च रोगा दृष्ट्याश्रयाः षट् च षडेव च स्युः ५७
पूर्व कहे लिंगनाश रोग छः और आगे विदग्धदृष्ट्यादि कहे गये वे छः ऐसे मिल-
कर बारह दृष्टिरोग होते हैं ॥
पित्तविदग्धके लक्षण ।
पित्तेन दुष्टेन गतेन वृद्धिं पीता भवेद्यस्य नरस्य दृष्टिः ।
पीतानि रूपाणि च तेन पश्येत्स वै नरः पित्तविदग्धदृष्टिः ॥ ५८ ॥
पित्त दुष्ट होकर बढनेसे जिस मनुष्यकी दृष्टि पीली होय तथा उसके योगसे उस
मनुष्यको सब पदार्थ पीले रंगके दीखें, उस दृष्टिको पित्तविदग्ध कहते हैं ॥
दिवांध्यके लक्षण ।
प्राप्ते तृतीयं पटलं च दोषे दिवा न पश्येन्निशि वीक्षते सः ।
रात्रौ स शीतानुगृहीतदृष्टिः पित्ताल्पभावादपि तानि पश्येत् ॥ ५९ ॥
तीसरे पटलमें दोष ( पित्त ) जानेसे दिनमें रोगीको नहीं दीखे, रात्रिमें शीतल-
ताके कारण पित्त कम होनेसे दीखे ॥
कफविदग्धदृष्टिके लक्षण ।
तथा नरः श्लेष्मविदग्धदृष्टिस्तान्येव शुक्लानि हि मन्यते तु ।
इसी प्रकार कफविदग्ध पुरुषको सफेद रूप दीखे ॥
नक्तांध्य ( रतौंध ) के लक्षण ।
त्रिषु स्थितो यः पटलेषु दोषो नक्तांध्यमापादयति प्रसय ।
दिवा स सूर्यानुगृहीतदृष्टिः पश्येत्तु रूपाणि कफाल्पभावात् ॥ ६० ॥
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