माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 342, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३२४ ) माधवनिदान ।
रक्तके तेजसे मिश्रित हुए परिम्लायीरोग होय, इसके योगसे रोगीको दिशा
आकाश और सूर्य ये पीले दीखें और सर्वत्र सूर्य उगेसे दीखे तथा वृक्ष भी तेज-
स्वरूपसे दीखे, परिम्लायी पित्तको नील कहते हैं सो सात्यकिने लिखा है, इस
रोगको कोई आचार्य रक्तपित्तसे होता है ऐसे कहते हैं सो भी लिखा है ॥
रागभेदसे लिंगनाशको षड्विधत्व कहते हैं-
वक्ष्यामि षड्विधं रागैर्लिङ्गनाशमतः परम् ॥ ५० ॥
रागोऽरुणो मारुतजः प्रदिष्टो म्लायी च नीलश्च तथैव पित्तात् ।
कफात्सितः शोणितजः सरक्तः समस्तदोषप्रभवो विचित्रः ॥ ५१ ॥
इसके अनन्तर रागभेदसे छः प्रकारका लिंगनाश होता है, सो इस प्रकार है-वात-
जन्य रंग लाल होय है, पित्तसे म्लायी पीला, नीला अथवा नीलाही रंग होय, कफसे
सफेद और रुधिरसे लाल तथा सब दोषोंसे अनेक प्रकारका रंग होता है ॥
वातिकरोगके विशेष लक्षण ।
अरुणं मण्डलं दृष्ट्यां स्थूलकाचारुणप्रभम् ।
परिम्लायिनि रोगे स्यान्म्लायि नीलं च मण्डलम् ॥
दोषक्षयात्कदाचित्स्यात्स्वयं तत्र प्रदर्शनम् ॥ ५२ ॥
परिम्लायि रोगमें दृष्टिके ऊपर मोटा कांचके समान लाल मण्डल होता है, वह
म्लान लाल पीला अथवा नील होता है, उसमें दोष घटनेसे कदाचित् देखनेकी
शक्ति होय । इस जगह दोषशब्दकरके कोई कर्मका ग्रहण करते हैं ॥
दृष्टिमण्डलगत रोगके लक्षण ।
अरुणं मण्डलं वाताच्चंचलं परुषं तथा ।
पित्तान्मण्डलमानीलं कांस्याभं पीतमेव च ॥ ५३ ॥
श्लेष्मणा बहलं स्निग्धं शंखकुन्देन्दुपाण्डुरम् ।
चलत्पद्मपलाशस्थः शुक्लो बिन्दुरिवांभसः ॥ ५४ ॥
मर्द्यमाने च नयने मण्डलं तद्विसर्पति ।
प्रवालपद्मपत्राभं मण्डलं शोणितात्मकम् ॥ ५५ ॥
१ एवमेव तु विज्ञेया नीलाः पित्तसमुद्भवाः । रक्तपित्तोत्थिताः पीताः ॥ इति ॥
२ विदधाति परिम्लायि पित्तं रक्तेन संगतम् । तेन पीता दिशः पश्येद्युद्यन्तमिव भास्करम् ॥ इति ॥