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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

३७० कथासरित्सागर

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३७० कथासरित्सागर
अवनम्य करे दत्ते कलिङ्गैरग्रगेस्ततः ।
आरुरोह महेन्द्राद्रिं यशस्तस्य यशस्विनः ॥९२॥
महेन्द्राभिभवाद् भीतैर्विन्ध्यकूटैरिवागतैः ।
गजैर्जित्वाटवीं राज्ञां स ययौ दक्षिणां दिशम् ॥९३॥
तत्र चक्रे स निःसारपाण्डुरामपगर्जितान् ।
पर्वताश्रयिणः शत्रून् शरत्काल इवाम्बुदान् ॥९४॥
उल्लङ्घ्यमाना कावेरी तन समवकारिणा ।
चोलकदम्बरकीर्तिश्च कालुष्यं ययतुः समम् ॥९५॥
न परं मुरलानां स सेहे मूर्धसु नोन्नतिम् ।
करैराहन्यमानेषु यावत्कान्ताकुचष्वपि ॥९६॥
यत्तस्य सप्तधा भिन्नं पपुर्गोदावरीपयः ।
मातङ्गास्तन्मदम्भाजाद् सप्तधवामुपक्षितम् १ ॥९७॥
अषोत्तीर्य स वत्सेशो रेवामुज्जयिनीमगात् ।
प्रविषेश च तां चण्डमहासेनपुरस्कृतः ॥९८॥
स मास्यदृलथधम्मिल्लशोभाद् वैगुण्यशालिनाम् ।
मालवस्त्रीकटाक्षाणां ययौ पात्रेषु लक्ष्यत्ताम् ॥९९॥
तस्थौ च निर्वृतस्तत्र तथा श्वशुरसत्कृतः ।
विसस्मार यथाभीष्टामपि भोगान् स्वदेशजान् ॥१००॥
आसीद् वासवदत्ता च पितुः पार्श्वविवर्त्तिनी ।
स्मरन्ती बालभावस्य सौख्येऽपि विमना इव ॥१०१॥
राजा चण्डमहासेनस्तया तनयया यथा ।
तथैव पद्मावत्यापि नन्दति स्म समागतः ॥१०२॥
विश्रम्य च निशाः काश्चित्प्रीतो वत्सश्वरस्ततः ।
अन्वितः श्वशुरैः सैन्यैः प्रययौ पश्चिमां दिशम् ॥१०३॥
१ अनुयथेव समाना तत्तथैव प्रमुस्तुबुः—रघु ४ सर्गे ।

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कलिङ्ग-देशों का राजाओं ने नम्र होकर कर दे देने पर (पराजित होकर अधीनता
स्वीकार कर लेने पर) उस यशस्वी वत्सराज का यश महेन्द्र पर्वत पर चढ़ गया ॥९२॥
महेन्द्र पर्वत के अपमान से डरे हुए, अतएव अनुगमन करते हुए विन्ध्य-पर्वत के
शिखरों के समान हाथियों से उस देश के राजाओं को जीतकर (वत्सराज) दक्षिण दिशा की
ओर गया ॥९३॥
दक्षिण दिशा में शरत्काल के समान राजा ने मेघों के समान शत्रुओं का (दक्षिण के
राजाओं को) निःसार और श्वेत बदनवाले गर्जना-रहित और पर्वतों पर आश्रय लेनेवाला
बना दिया ॥९४॥
भीषण संघर्ष करनेवाले उस राजा उदयन ने कावेरी का उल्लङ्घन करके उसे
और चोल देश के राजा की कीर्ति को कलुषित कर डाला अर्थात् चोल' राजा को पराजित
कर दिया ॥९५॥
राजा उदयन ने करा से मारे हुए मुरल देश के राजाओं के सिरों की उन्नति का ही सहन
नहीं किया प्रत्युत करा से विताड़ित उस देश की स्त्रियों की कुचोन्नति को भी सहन नहीं किया ॥९६॥
राजा उदयन के हाथियों ने सात धाराओं में विभक्त गोदावरी का जल पीया था उठ
उन्होंने उस जल को मद के बहाने सात स्थानों से निकाल दिया³ ॥९७॥
दक्षिण-विजय करने के अनन्तर वत्सराज नर्मदा नदी को पार करके उज्जयिनी में आया ।
वहाँ उसके श्वशुर (वासवदत्ता के पिता) ने उसकी अगवानी की ॥९८॥
वहाँ राजा उदयन मालाओं से शिथिल केशपाशों से दूनी शोभा धारण करते हुए मालव
रमणियों के कटाक्षों का लक्ष्य (शिकार) बन गया ॥९९॥
श्वशुर द्वारा सत्कार किया गया उदयन उज्जयिनी में कुछ दिनों तक ठहर गया । वहाँ
उसकी ऐसी आवभगत हुई कि वह अपने घर के सुखों को भी भूल गया ॥१००॥
पिता की गोद में लोटती हुई वासवदत्ता अपने बाल्यकाल का स्मरण करके महारानी
के सुख में भी निःस्पृह हो गई ॥१०१॥
राजा चण्डमहासेन भी जैसे वासवदत्ता से आनन्दित हुआ वैसे ही पद्मावती से भी आनन्द
अनुभव करता था ॥१०२॥
कुछ रातें उज्जयिनी में व्यतीत करके, ससुर की सेनाओं से युक्त वत्सराज पश्चिम
दिशा की ओर चला ॥१०३॥
१ देखिए परिशिष्ट । २ देखिए परिशिष्ट । ३ देखिए रघु० सर्ग ४—मसूयतेव
तन्माला सप्तधैव प्रसुस्रुवुः ।