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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

द्वितीय लम्बक २३१

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द्वितीय लम्बक २३१
बाल-विनष्टक की कथा
प्राचीन समय में रुद्रशर्मा नामक एक ब्राह्मण था। उस गृहस्थ की दो स्त्रियाँ थीं।
उनमें से एक पुत्र प्रसव करके मर गई अतः रुद्रशर्मा ने उसके बालक को दूसरी माता के हाथ
सौंप दिया ॥३७-३८॥
जब वह बालक कुछ बड़ा हुआ तब उसकी माता उसे रूखा-सूखा भोजन देने लगी। इसी
कारण वह बालक धूमिल शरीरवाला और बड़े पेट (तोंद) वाला हो गया ॥३९॥
बालक की शारीरिक स्थिति देखकर रुद्रशर्मा ने उस पत्नी से कहा कि 'तूने इस मातृहीन
बच्चे की उपेक्षा की है। उत्तर में उसने पति से कहा कि 'स्नेह से लालन-पालन करने पर भी
यह ऐसा ही रहता है। इसके लिए मैं क्या करूँ? उसके ऐसा कहने पर रुद्रशर्मा ने समझा कि
यह इस बालक की प्रकृति ही है। स्त्रियों के झूठे और मोहकारी वचनों को कौन नहीं मान जाता ?
यह बालक ही विनष्ट है—वह बालक पिता के घर में बढ़ने लगा इसलिए उसका नाम ही
बाल-विनष्टक पड़ गया। एक बार बालक ने सोचा कि यह मेरी माता मेरी दुर्दशा करती है
और अपने पुत्र का भलीभाँति लालन-पालन करती है अतः मैं इसका बदला लूँगा। बाल-
विनष्टक की अवस्था यद्यपि पाँच वर्ष की ही थी किन्तु बहुत बुद्धिमान् था ॥४०—४५॥
एक बार राजगृह से आये हुए अपने पिता को एकान्त में उसने अस्पष्ट स्वर में कहा—
'पिता ! मेरे दो पिता हैं। उसके कहने पर रुद्रशर्मा ने अपनी पत्नी को जारिणीवाला समझकर
उससे स्पर्श करना भी छोड़ दिया। वह भी चिन्ता करने लगी कि 'मेरा पति सहसा कुपित क्यों
है ? अवश्य ही इस बाल-विनष्टक ने कुछ किया होगा' ॥४६—४८॥
एक बार उसने बड़े ही प्रेम से बाल-विनष्टक को स्नान करा और सुन्दर तथा स्निग्ध
आहार खिलाकर, उसे गोद में बैठाकर प्यार के साथ कहा— 'बेटा ! तुमने अपने पिता रुद्रशर्मा
को मुझपर कुपित क्यों करा दिया है ? यह सुनते ही बालक विमाता से कहने लगा। अभी मैं उनमें
भी अधिक युद्ध करूँगा क्योंकि तुम अपने लड़के के ही पालन-पोषण में ध्यान देती हो और मुझे
सदा कष्ट देती हो ॥४९-५१॥

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तच्छ्रुत्वा प्रणता सा च क्षमापे शपथोत्तरम् ।
पुनर्नेवं करिष्यामि तत्प्रसादाय मे पतिम् ॥५२॥
ततः स बालोऽवादीत्तां तदार्थातस्य मत्पितुः ।
व्यादर्शं दर्शयत्वेका स्वञ्चेटी वेद्म्यहं परम् ॥५३॥
तथेत्युक्त्वा तया चेटी नियुक्ता रुद्रशर्मणः ।
आगतस्य क्षणात्तस्य दद्यामास दर्पणम् ॥५४॥
तत्र तस्य तत्काल प्रतिबिम्ब स दश्यन् ।
सोऽय द्वितीयस्तातो मे तातेत्याह स्म बालकः ॥५५॥
तच्छ्रुत्वा विगतशङ्कस्तामकारणदूषिताम् ।
पत्नीं प्रति प्रसन्नोऽभूद्रुद्रशर्मा तदैव सः ॥५६॥
एवमुत्पादयेद्दोष बालोऽपिविकृतिं गतः ।
तदय रञ्जनीयो न सम्यक्परिकरोऽखिलः ॥५७॥
इत्युक्त्वा सरुमण्वन्तः सोऽथ यौगन्धरायणः ।
सर्वं सम्मानयामास वत्सराजोत्सवे जनम् ॥५८॥
तथा च राजलोक तौ रञ्जयामासतुर्यथा ।
मदेकप्रवणावेताविति सर्वोऽप्यमन्यत ॥५९॥
तौ चाप्यपूजयद्राजा सचिवो स्वकरापितैः ।
वस्त्राङ्गरागाभरणद्रव्यैरिष्टैश्च सबसत्सकौ ॥६०॥
कृतोद्वाहोत्सवः सोऽथ युक्तो वत्सेश्वरस्तया ।
मनोरथफलान्येव मेने वासवदत्तया ॥६१॥
चिरादुद्गमित स्नेहात्सोऽप्यभूत्सततं तयोः ।
निशान्ताखिलचेष्टच्चक्रवर्त्तीतितुष्टयो रसक्रमः ॥६२॥
यथा यथा च दम्पत्यो प्रौढि परिणयो ययौ ।
तयोस्तथा तथा प्रेम नवीभावमिवाययौ ॥६३॥
गोपालकोऽथ थीवाहकतुं सन्देशतः पितुः ।
प्रययौ शीघ्रमभ्येति वत्सराजेन याचितः ॥६४॥
सोऽपि वत्सेश्वरो जातु चपलः पूर्वसङ्गताम् ।
गुप्तां विरचितां नाम मेनेऽन्तःपुरचारिकाम् ॥६५॥
तद्गोत्रस्खलितो देवी पादलग्न प्रसादयन् ।
ममे सुभगसाम्राज्यमभिषिक्तस्तदश्रुभिः ॥६६॥