चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १४७
अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १४७
सीवन ( सीना ), एषण ( नाड़ी या गति व्रण को ढूंढना ), क्षार ( द्रव्यों को
भस्मकर क्षरण होने वाला सार भाग ), जलौका ( जोंक ) इनके उपयोग को
शस्त्र-प्रणिधान कहते हैं ॥ ५६ ॥
प्राज्ञो रोगे समुत्पन्ने बाह्येनाऽऽभ्यन्तरेण वा ।
कर्मणा लभते शम शस्त्रोपक्रमणेन वा ॥ ५७ ॥
बालस्तु खलु मोहाद्वा प्रमादाद्वा न बुध्यते ।
उत्पद्यमानं प्रथमं रोगं शत्रुमिवाबुधः ॥ ५८ ॥
अणुर्हि प्रथमं भूत्वा रोगः पश्चाद्विवर्धते ।
स जातमूलो मुष्णाति बलमायुश्च दुर्मतेः ॥ ५९ ॥
न मूढो लभते संज्ञां तावद्यावन्न पीड्यते ।
पांडितस्तु मति पश्चात्कुरुते व्याधिनिग्रहे ॥ ६० ॥
अथ पुत्रांश्च दारांश्च ज्ञातींश्चाऽऽहूय भाषते ।
सर्वस्वेनापि मे कश्चिद्भिषगानीयतामिति ॥ ६१ ॥
तथाविधं च कः शक्तो दुर्बलं व्याधिपीडितम् ।
कृशं क्षीणेन्द्रियं दीनं परित्रातुं गतायुषम् ॥ ६२ ॥
स त्रातारमनासाद्य बालस्त्यजति जीवितम् ।
गोधा लाङ्गूलबद्धेवाऽऽकृष्यमाणा बलीयसा ६३ ॥
तस्मात्प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु वा ।
भेषजैः प्रतिकुर्वीत य इच्छेत्सुखमात्मनः ॥ ६४ ॥
बुद्धिमान् रोग के होने पर 'बहिःपरिमार्जन' अथवा 'अन्तःपरिमार्जन' या
'शस्त्र-क्रिया' से शान्ति प्राप्त करता है। परन्तु बाल, अनभिज्ञ पुरुष मोह वश
अथवा प्रमाद से उत्पन्न होते हुए रोग को पहिले से उसी प्रकार नहीं जानता;
जिस प्रकार मूर्ख अपने उत्पन्न होते हुए शत्रु को नहीं पहिचानता । रोग प्रथम
सूक्ष्म रूप में होता है, और पीछे बढ़ जाता है। बढ़ने पर इस रोग की जड़
जम जाती है, जड़ पकड़ लेने पर रोग मूढ़ व्यक्ति की आयु और बल दोनों को
हर लेता है । जब तक मनुष्य रोग से पीड़ित नहीं होता, तब तक प्रतीकार का
विचार नहीं करता और जब दुःखित हो जाता है, तब रोग के निराकरण
सोचा करता है। सब पुत्रों, स्त्रियों और जाति सम्बन्धियों को बुला कर कहता
है कि 'मेरा सर्वस्व देकर भी किसी वैद्य को लाओ' इस प्रकार के रोगग्रस्त,
दुर्बल, क्षीणेन्द्रिय, दीन, मरणासन्न व्यक्ति की कौन वैद्य रक्षा कर सकता है ?
वह मूढ़ रक्षा करने वाले को न पाकर प्राण त्याग देता है, जिस प्रकार पूंछ में
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रस्सी से बँधी गोह बलवान पुरुष द्वारा खींचने पर मर जाती है—ऐसे ही वह
भी मर जाता है । इसलिये जो व्यक्ति सुख चाहे वह रोगों के उत्पन्न होने से
पूर्व, ( संचयावस्था में, रोगों की तरुणदशा में ) ही दोषों का औषधियों से
प्रतीकार करे ॥ ५७ ६४ ॥
तत्र श्लोकौ ।
एषणाश्चाप्युपस्तम्भा बलं कारणमामयाः ।
तिस्रैषणीये मार्गाश्च भिषजो भेषजानि च ॥ ६५ ॥
त्रित्वेनाष्टौ समुद्दिष्टाः कृष्णात्रेयेण धीमता ।
भावा भावेष्वसक्तेन येषु सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ६६ ॥ इति । -
तिस्रैषणीय अध्याय में बुद्धिमान् ऋषि कृष्णात्रेयने तीन एषणायें, उपस्तम्भ,
बल, रोगों के कारण, रोगमार्ग, वैद्य, भेषज्य, औषध, इन आठों के तीन तीन
भेद कर कल्पना सहित उपदेश किये हैं ॥ ६५-६६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के
तिस्रैषणीयो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः ।
अथातो वातकलाकलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'वातकलाकलीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
वातकलाकलज्ञानमधिकृत्य परस्परमतानि जिज्ञासमानाः समु-
पविश्य महर्षयः पप्रच्छुरन्योन्यं किंगुणो वायुः, किमस्य प्रकोपनम्,
उपशमनानि वाऽस्य कानि, कथं चैनमसंघातवन्तमनवस्थितमनासाद्य
प्रकोपनप्रशमनानि प्रकोपयन्ति प्रशमयन्ति वा, कानि चास्य कुपिता-
कुपितस्य शरीराशरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि बहिःशरीरेभ्यो
वेति ॥ ३ ॥
वायु के अंगांश विकल्पना के सम्बन्ध में महर्षि लोग एकत्र होकर परस्पर
एक दूसरे के मत जानने के लिये पूछने लगे कि—वायु के क्या गुण हैं ?
वायु को प्रकुपित करने वाले कौन से कारण हैं ? कुपित वायु को शान्त करने