चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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रस्सी से बँधी गोह बलवान पुरुष द्वारा खींचने पर मर जाती है—ऐसे ही वह
भी मर जाता है । इसलिये जो व्यक्ति सुख चाहे वह रोगों के उत्पन्न होने से
पूर्व, ( संचयावस्था में, रोगों की तरुणदशा में ) ही दोषों का औषधियों से
प्रतीकार करे ॥ ५७ ६४ ॥
तत्र श्लोकौ ।
एषणाश्चाप्युपस्तम्भा बलं कारणमामयाः ।
तिस्रैषणीये मार्गाश्च भिषजो भेषजानि च ॥ ६५ ॥
त्रित्वेनाष्टौ समुद्दिष्टाः कृष्णात्रेयेण धीमता ।
भावा भावेष्वसक्तेन येषु सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ६६ ॥ इति । -
तिस्रैषणीय अध्याय में बुद्धिमान् ऋषि कृष्णात्रेयने तीन एषणायें, उपस्तम्भ,
बल, रोगों के कारण, रोगमार्ग, वैद्य, भेषज्य, औषध, इन आठों के तीन तीन
भेद कर कल्पना सहित उपदेश किये हैं ॥ ६५-६६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के
तिस्रैषणीयो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः ।
अथातो वातकलाकलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'वातकलाकलीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
वातकलाकलज्ञानमधिकृत्य परस्परमतानि जिज्ञासमानाः समु-
पविश्य महर्षयः पप्रच्छुरन्योन्यं किंगुणो वायुः, किमस्य प्रकोपनम्,
उपशमनानि वाऽस्य कानि, कथं चैनमसंघातवन्तमनवस्थितमनासाद्य
प्रकोपनप्रशमनानि प्रकोपयन्ति प्रशमयन्ति वा, कानि चास्य कुपिता-
कुपितस्य शरीराशरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि बहिःशरीरेभ्यो
वेति ॥ ३ ॥
वायु के अंगांश विकल्पना के सम्बन्ध में महर्षि लोग एकत्र होकर परस्पर
एक दूसरे के मत जानने के लिये पूछने लगे कि—वायु के क्या गुण हैं ?
वायु को प्रकुपित करने वाले कौन से कारण हैं ? कुपित वायु को शान्त करने