माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । (१३९)
मृगीरोगकी पाली ।
पक्षाद्वा द्वादशाहाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः ।
अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किंचिदथोत्तरम् ॥ ८ ॥
कोपको प्राप्त भये जो दोष सो पंद्रहवें दिन अथवा बारहवें दिन अथवा महीने
भरमें मिरगीरोग प्रकट करें । तिनमें पैत्तिक १५ दिन, वातिक १२ दिन और
श्लैष्मिक ३० दिनमें आती है । इस जगह बारहवें दिनके पिछाडी पक्ष कहना
ठीक था फिर पहिले पक्ष धरनेका यह प्रयोजन है कि, अधिक कालकरके ही
दोष वेग करते हैं यह कहा । “किंचिदथोत्तरम्” इस पदसे यह सूचना करी है
कि, जिस जिस दोषका जो जो काल कहा है उससे पहिले भी दोषोंके तारतम्यसे
मिरगीरोग होय है ऐसे जानना । शंका-वेग उत्पन्न करके अपस्मारके प्रगट कर्त्ता
दोष देहमें सदा रहते हैं, फिर वे सर्वकालमें वेग क्यों नहीं करते, द्वादशादि दिनमें
क्यों करते हैं ? इन विषयमें दृष्टांतरूप समाधान कहते हैं-
देवे वर्षत्यपि यथा भूमौ बीजानि कानिचित् ।
शरदि प्रतिरोहन्ति तथा व्याधिसमुच्छ्रयः ॥ ९ ॥
जैसे चातुर्मासमें इन्द्र वर्षे भी है परन्तु कोई जव, गेहूँ, चना आदि बीज शरद्
ऋतुमें ही ऊगते हैं तैसेही सर्वरोगके बीजरूप वातादिक दोष कदाचित् किसी अप-
स्मारादिक व्याधिविशेष निदानादिकका संगम होनेसे उस रोगको प्रगट करे हैं ।
अथवा इसका मुख्य प्रयोजन यह है कि, बीजके अंकुर फूटनेमें तेज, वायु, पृथ्वी,
जल ये सहायक भी हैं, परन्तु वे सब कालविशेषकी प्रतीक्षा ( इच्छा ) करते हैं ।
अंकुर आनेको काल ही सहाय चाहिये अर्थात् जिस कालमें जिस बीजको अंकुर
आता है वह उसी कालमें आवेगा बीचमें कभी नहीं आनेवाला, यही न्याय चातु-
र्थिक ज्वरादिकोंमें भी जानना ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकायां माधुरीभाषाटीकाया-
मपस्मारनिदानं समाप्तम् ॥
अथ वातव्याधिनिदानम् ।
वातव्याधिकी सम्प्राप्ति ।
रूक्षशीताल्पलघ्वन्नव्यवायातिप्रजागरैः । विषमादुपचाराच्च
दोषास्रक्स्रावणादपि ॥ १ ॥ लङ्घनप्लवनात्यध्वव्यायामाति-