माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ६४ ) माधवनिदान ।
( ६४ ) माधवनिदान ।
असाध्यके लक्षण ।
सहजानि त्रिदोषाणि यानि चाभ्यन्तरावलिम् ।
जायन्तेऽर्शांसि संश्रित्य तान्यसाध्यानि निर्दिशेत् ॥ ३७॥
सहज कहिये जन्म होनेके समयसे जो होय अथवा तीन दोषोंसे प्रगट भई हो
और जो तीसरा अन्तका आंटा है उसमें भई हो सो बवासीर असाध्य जानना ॥
याप्यलक्षण ।
शेषत्वादायुषस्तानी चतुष्पादसमन्विते ।
याप्यन्ते दीप्तकायाग्नेः प्रत्याख्येयान्यतोऽन्यथा ॥ ३८॥
यदि असाध्य बवासीर होय और उस रोगीका आयुष्य बाकी हो और चतुष्पाद
सम्पत्ति ( वैद्य, औषध, परिचारक और रोगी ये जैसे चाहिये वैसे ) होवे और
रोगीकी जठराग्नि प्रदीप्त होवे तो रोग याप्य जानना । इसीसे विपरीत होवे तो
रोगीको वैद्य छोड़ देवे ॥
प्रसंगवशसे रोगी, वैद्य, औषध और सेवकके लक्षण कहते हैं-
वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः ।
एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः ॥ ३९ ॥
वैद्य, रोगी, औषध और सेवक ये कर्मसाधन हेतु चिकित्साके ( चार ) पाद हैं ॥
तत्रादौ वैद्यलक्षण ।
तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयं कृती । लघुहस्तः शुचिः
शूरः सज्जोपस्कृतभेषजः ॥४०॥ प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यव-
सायी प्रियंवदः । सत्यधर्मपरो यश्च वैद्य ईदृक् प्रशस्यते ॥४१॥
गुरुसे भले प्रकार शास्त्रको पढा हो और दूसरे वृद्ध वैद्यकी चिकित्सा अर्थात् इलाज
जिसने देखा हो और आप चिकित्सा करनेमें चतुर हो तथा सिद्धहस्त अर्थात् जिस
रोगीका इलाज करे सो शीघ्र अच्छा हो जावे, पवित्र रहे, शूर हो, श्रेष्ठ औषधि
चन्द्रोदय आदि रसादिक सामग्री जिसके समीप रहा करे, तत्काल जिसकी बुद्धि
स्फुरणवाली होय, बुद्धिमान्, संसारके व्यवहारको जाननेवाला हो, प्रियवचन बोलने-
वाला, सत्य और धर्मका आचरण करनेवाला ऐसा वैद्य प्रशंसाके योग्य होता है ॥
निषिद्धवैद्यके लक्षण ।
कुचैलः कर्कशः स्तब्धः कुग्रामी स्वयमागतः ।
पञ्च वैद्या न पूज्यन्ते धन्वन्तरिसमा अपि ॥ ४२ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ६५ )
मैले वस्त्रवाला, बुरा बोलनेवाला, अभिमानी, व्यवहारमें न समझे और जो
बिना बुलाये आवे ये पांच वैद्य श्रीधन्वन्तरिके समान भी हों तो भी पूजने
योग्य नहीं हैं ॥
रोगीके लक्षण ।
आयुष्मान् सत्त्ववान् साध्यो द्रव्यवानात्मवानपि ।
उच्यते व्याधितः पादो वैद्यवाक्यकृदास्तिकः ॥ ४३ ॥
आयुवाला, बलयुक्त साध्य, द्रव्यवान्, ज्ञानी, वैद्यका आज्ञाकारी और आस्तिक
ऐसा रोगी होना चाहिये ॥
उत्तम औषधिके लक्षण ।
प्रशस्तदेशसंभूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम् ।
अल्पमात्रं बहुगुणं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥ ४४ ॥
उत्तम स्थानोंमें प्रगट हुई हो और शुभ दिनमें उसको उखाडी हो, थोडी
मात्रा देनेसे बहुत गुण करे, दुर्गंधरहित, उत्तम स्वरूप और रसयुक्त हो सो
औषधि उत्तम है ॥
दुष्ट औषधिके लक्षण ।
वल्मीककुत्सितानूपश्मशानोषरमार्गजाः ।
जन्तुवह्निहिमव्याप्ता नौषध्यः कार्यसाधकाः ॥ ४५ ॥
इतने स्थानकी औषधें कार्य करनेवाली नहीं होती हैं-बांबीकी, खोटी धरतीकी,
जलके समीपकी, इमशानकी, ऊषरकी, जहां रेहं चूना निकलता होय तहांकी और
रास्तेकी, कीडोंकी खाई, अग्निसे जली हुई, जाडेकी मारी ऐसी औषधें कार्य करने-
वाली नहीं हैं ॥
दूतके लक्षण ।
स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे ।
वैद्यवाक्यकृदश्रान्तः पादः परिचरः स्मृतः ॥ ४६ ॥
नवीन अवस्थाका, बलवान्, रोगीकी रक्षा करनेमें तत्पर होवे, वैद्यके वचनका
करनेवाला होवे, आलस्यरहित ऐसा परिचारक अर्थात् दूत होय । इन पूर्वोक्तको
चतुष्पाद सम्पत्ति कहते हैं सो यह आयु शेषके बिना नहीं मिलते ॥
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