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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( ५० ) माधवनिदान ।

( ५० ) माधवनिदान ।
मतमें छठा अतिसार आमज है जो भयसे उत्पन्न हुआ और आचार्य मानते हैं वह,
हम नहीं मानते अतएव ‘ षष्ठमेनं ’ पुनः कहा है क्योंकि भयादि अतिसारोंका वात
पित्त कफ अतिसारोंके अन्तर्गतत्व है ॥
आमके लक्षण ।
संसृष्टमेभिर्दोषैस्तु न्यस्तमप्स्ववसीदति ।
पुरीषं भृशदुर्गन्धि पिच्छिलं चामसंज्ञितम् ॥ १२ ॥
पूर्व कहे वातादि अतिसारोंके मिलेहुए लक्षणसंयुक्त जो मल वह जलमें गेर-
नेसे डूब जाता है, क्योंकि आम वातजमें भारी है और उसमें बहुत दुर्गंध आती
है तथा अत्यन्त गाढा होता है उसकी आमसंज्ञा है ॥
पक्व लक्षण ।
एतान्येव तु लिङ्गानि विपरीतानि यस्य वै ।
लाघवं च विशेषेण तस्य पक्वं विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥
और ऊपरके श्लोकसे विपरीत लक्षण होवे अर्थात् शरीर हलका हो तथा मल जलमें
डूबे नहीं और दुर्गंधरहित हो, बबूलरहित हो उस रोगीका मल पक्व हुआ जाने ॥
असाध्य लक्षण ।
पक्वं जाम्बवसङ्काशं यकृत्पिण्डनिभं तनु । घृततैलवसामज्जावेस-
वारपयोदधि ॥ १४ ॥ मांसधावनतोयाभं कृष्णं नीलारुण-
प्रभम् । मेचकं कर्बुरं स्निग्धं चन्द्रकोपगतं घनम् ॥ १५॥ कुणपं
मातुलुङ्गाभं दुर्गन्धं कुथितं बहु । तृष्णादाहारुचिश्वासहिक्कापा-
र्श्वास्थिशूलिनम् ॥ १६॥ संमूर्च्छारतिसंमोहयुक्तं पक्ववलीगुदम् ।
प्रलापयुक्तं च भिषग् वर्जयेदातिसारिणम् ॥ १७ ॥
पके जामुनके रंगसदृश काला और चिकना तथा काला और लोहित रंग
पतला घृत तेल चरबी मज्जा वेशंवार दूध दही और मांसके धोनेसे जैसा जल निकले
है ऐसा रंग हो, काजलके रंगसमान अथवा नीलमिश्रित अरुण रंग अर्थात् पपैथा
पक्षीके पंखके रंगसमान अथवा खंजन पक्षीके वर्णसदृश तथा अनेक रंगका चिकना
मोरकी चंद्रिकाके सदृश रंग, दृढ, मुरदाकीसी दुर्गंध युक्त, मस्तककी मज्जाके समान
१ बेशवार नाम—मांसमेंसे हड्डी निकाल और कूटकर दही दूध काली मिरच डालकर
जो पदार्थ बनाते हैं तत्सदृश रंग हो ।

भाषाटीकासमेत । ( ५१ )
गन्धयुक्त बुरी दुर्गन्धके समान, प्यास, दाह, अरुचि, श्वास, हिचकी, पसवाडोंके
हाडोंमें पीडा, मनको मोह और इंद्रियोंको मोह, अरति ये लक्षण होयँ तथा गुदाके
आंटोंका पकना अनर्थ भाषण करे ऐसे अतिसारी रोगीको वैद्य छोडदे ॥
दूसरे असाध्य लक्षण ।
असंवृतगुदं क्षीणं दुराध्मानमुपद्रुतम् ।
गुदे पक्के गतोष्माणमतिसारिणमुत्सृजेत् ॥ १८ ॥
जिसकी गुदाका दस्तके पिछाडी संकोच न होवे, क्षीण पुरुष, अत्यन्त अफरा-
युक्त अथवा “ दुरात्मानं ” ऐसा भी पाठान्तर है अर्थात् जिसकी इंद्रिय वश न
होवे तथा अतिसारके शोथादिक उपद्रव करके युक्त और गुदाके स्थानमें पाककर्त्ता
पकानेवाला पित्त विद्यमान होते हुए जिसकी देहमें गरमीसी नहीं दीखे अर्थात् देह
शीतल हो अथवा जिसकी अग्नि नष्ट होजावे ऐसे अतिसारी रोगीको वैद्य त्याग देवे॥
अतिसारके उपद्रव ।
शोथं शूलं ज्वरं तृष्णां श्वासकासमरोचकम् ।
छर्दिं मूर्च्छां च हिक्कां च दृष्ट्वाऽतीसारिणं त्यजेत् ॥ १९ ॥
सूजन, शूल, ज्वर, तृषा, श्वास, खांसी, अरुचि, वमन, मूर्च्छा, हिचकी ऐसे
लक्षण जिस रोगीमें होयँ उसको वैद्य छोड दे ॥
असाध्य लक्षण ।
श्वासशूलपिपासार्त्तं क्षीणं ज्वरनिपीडितम् ।
विशेषेण नरं वृद्धमतिसारो विनाशयेत् ॥ २० ॥
श्वास, शूल, प्यास इनसे पीडित, क्षीण, ज्वरसे पीडित और वृद्ध मनुष्यके ये
लक्षण होयँ तो यह अतिसाररोग मनुष्यको विनाश करे ॥
रक्तातिसारके लक्षण ।
पित्तकृन्ति यदात्यर्थं द्रव्याण्यश्नाति पैत्तिके ।
तदोपजायतेऽभीक्ष्णं रक्तातीसार उल्बणः ॥ २१ ॥
पित्तातिसारवाला पुरुष अथवा पित्तातिसार होनेवाला पुरुष जब पित्त करने-
वाली वस्तु अधिक और निरन्तर भोजन करे तब भयंकर रक्तातिसार प्रगट होता
है । इसके लाल काले पीले आदि रंग वातादि दोषोंके दूषित होनेसे होते हैं, ये भी
पित्तातिसारके भेद हैं ॥