माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३३६ ) माधवनिदान ।
( ३३६ ) माधवनिदान ।
अथ शिरोरोगनिदानम् ।
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शिरोरोगाश्च जायन्ते वातपित्तकफैस्त्रिभिः ।
सन्निपातेन रक्तेन क्षयेण कृमिभिस्तथा ॥ १ ॥
सूर्यावर्त्तानंतवातार्द्धावभेदकशंखकैः ।
एकादशप्रकारस्य लक्षणं संप्रवक्ष्यते ॥ २ ॥
वात पित्त कफ इनसे ३, सन्निपातसे १, रुधिरसे १, क्षयसे १, कृमिसे १,
सूर्यावर्त १, अनंतवात १, अर्धावभेदक १ और शंखक १ सब मिलकर ११ प्रका-
रके शिरोरोग ( मस्तक शूल ) होते हैं । उनके लक्षण आग कहेंगे ॥
वातजके लक्षण ।
यस्यानिमित्तं शिरसो रुजश्च भवन्ति तीव्रा निशि चातिमात्रम् ।
बन्धोपतापैः प्रशमश्च यत्र शिरोभितापः स समीरणेन ॥ ३ ॥
जिसका मस्तक अकस्मात् दुखे और रात्रिमें विशेष दुखे, बांधनेसे अथवा सेक-
नेसे शांति हो, उसका वातज शिरोरोग जानना चाहिये ॥
पैत्तिक लक्षण ।
यस्योष्णमङ्गारचितं तथैव भवेच्छिरो दह्यति वाऽक्षिनासम् ।
शीतेन रात्रौ प्रशमं च याति शिरोभितापः स तु पित्तकोपात् ॥ ४ ॥
जिसका मस्तक अंगारसे तपायेके समान गरम होवे और नेत्रमें तथा नाकमें दाह
होय शीतल पदार्थसे रात्रिमें शांति होय, उस मस्तक शूलको पित्तकोपका जानना ॥
श्लैष्मिकके लक्षण ।
शिरो भवेद्यस्य कफोपदिग्धं गुरु प्रतिस्तब्धमतो हिमं च ।
शूनाक्षिकूटं वदनं च यस्य शिरोभितापः स कफप्रकोपात् ॥ ५ ॥
जिसका मस्तक भीतरसे कफकरके लिप्त ( लिहसासा ) होवे, भारी बँधासा शीतल
होवे तथा नेत्रके कोये सुजाकर मुखको सुजाय देवे, इस मस्तक रोगको कफके
कोपका जानना चाहिये ॥
सान्निपातिकके लक्षण ।
शिरोभितापे त्रितयप्रवृत्ते सर्वाणि लिंगानि समुद्भवंति ।
त्रिदोषसे उत्पन्न मस्तक रोगमें तीनों दोषोंके सब लक्षण होते हैं ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३३७ )
रक्तजके लक्षण ।
रक्तात्मकः पित्तसमानलिंगः स्पर्शासहत्वं शिरसो भवेच्च ।
रक्तजन्य मस्तकरोगमें पित्तकृत मस्तकरोगके सब लक्षण होते हैं तथा मस्तकके
स्पर्श सहा नहीं जाय, यह विशेष होता है ॥
क्षयजके लक्षण ।
असृग्वसाश्लेष्मसमीरणानां शिरोगतानामिह संक्षयेण ॥ ६ ॥
क्षवप्रवृत्तिः शिरसोऽभितापः कष्टो भवेदुग्ररुजोऽतिमात्रम् ।
संस्वेदनच्छर्द्दनधूम्रनस्यैरसृग्विमोक्षैश्च विवृद्धिमेति ॥ ७ ॥
मस्तकके रुधिर वसा कफ और वायु इनके क्षय होनेसे अत्यन्त भयंकर मस्तक-
शूल होता है, छींक बहुत आवें, मस्तक गरम होवे, कष्ट होय, अत्यन्त कठिन
( असह्य ) पीडा होय, उसमें स्वेदन, वमन, धूम्रपान, नस्य, रुधिर निकालना ये उप-
द्रव करनेसे मस्तक शूल वृद्धिको प्राप्त होता है, इसको क्षयज मस्तक शूल कहते हैं ॥
कृमिजके लक्षण ।
निस्तुद्यते यस्य शिरोऽतिमात्रं संभक्ष्यमाणं स्फुरतीव चान्तः ।
घ्राणाच्च गच्छेद्रुधिरं सपूयं शिरोभितापः कृमिभिः स घोरः ॥ ८ ॥
जिसके मस्तकमें सुईके चुभनेके समान पीडा होवे, तथा कृमि मस्तकको खा
रही हो तथा मस्तकके भीतरमें फडकत्ता हुआ मालूम हो तथा नाकमें रुधिर राध
और कीडे पडें यह कृमिरोग बडा भयंकर है ॥
सूर्यावर्तके लक्षण ।
सूर्योदयं या प्रति मन्दमन्दमाक्षिध्रुवं रुक्समुपैति गाढा ।
विवर्द्धते चांशुमता सहैव सूर्यापवृत्तौ विनिवर्तते च ॥ ९ ॥
शीतेन शांतिं लभते कदाचिदुष्णेन जंतुः सुखमाप्नुयाद्वा ।
सर्वात्मकं कष्टतमं विकारं सूर्यापवर्तं तमुदाहरंति ॥ १० ॥
सूर्यके उदय होनेसे धीरे धीरे मस्तक दुखनेका आरंभ होय और जैसे जैसे सूर्य
बढे तैसे तैसे वह शूल नेत्र और भृकुटी ( भौंह ) इत्तमें दो प्रहर दिन चढे तक
बढता जाय और सूर्यके साथ बढकर फिर जैसे २ सूर्य अस्त होय तैसे २ पीडा
मन्द होती जाय, शीतल और गरम उपचार करनेसे मनुष्यको सुख होय, इस सान्नि-
पातिक विकारको सूर्यावर्त्त कहते हैं ॥
अनंतवातके लक्षण ।
दोषास्तु दुष्टास्त्रय एव मन्यां संपीड्य गाढं सरुजां सुतीव्राम् ।
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