माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३३६ ) माधवनिदान ।
अथ शिरोरोगनिदानम् ।
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शिरोरोगाश्च जायन्ते वातपित्तकफैस्त्रिभिः ।
सन्निपातेन रक्तेन क्षयेण कृमिभिस्तथा ॥ १ ॥
सूर्यावर्त्तानंतवातार्द्धावभेदकशंखकैः ।
एकादशप्रकारस्य लक्षणं संप्रवक्ष्यते ॥ २ ॥
वात पित्त कफ इनसे ३, सन्निपातसे १, रुधिरसे १, क्षयसे १, कृमिसे १,
सूर्यावर्त १, अनंतवात १, अर्धावभेदक १ और शंखक १ सब मिलकर ११ प्रका-
रके शिरोरोग ( मस्तक शूल ) होते हैं । उनके लक्षण आग कहेंगे ॥
वातजके लक्षण ।
यस्यानिमित्तं शिरसो रुजश्च भवन्ति तीव्रा निशि चातिमात्रम् ।
बन्धोपतापैः प्रशमश्च यत्र शिरोभितापः स समीरणेन ॥ ३ ॥
जिसका मस्तक अकस्मात् दुखे और रात्रिमें विशेष दुखे, बांधनेसे अथवा सेक-
नेसे शांति हो, उसका वातज शिरोरोग जानना चाहिये ॥
पैत्तिक लक्षण ।
यस्योष्णमङ्गारचितं तथैव भवेच्छिरो दह्यति वाऽक्षिनासम् ।
शीतेन रात्रौ प्रशमं च याति शिरोभितापः स तु पित्तकोपात् ॥ ४ ॥
जिसका मस्तक अंगारसे तपायेके समान गरम होवे और नेत्रमें तथा नाकमें दाह
होय शीतल पदार्थसे रात्रिमें शांति होय, उस मस्तक शूलको पित्तकोपका जानना ॥
श्लैष्मिकके लक्षण ।
शिरो भवेद्यस्य कफोपदिग्धं गुरु प्रतिस्तब्धमतो हिमं च ।
शूनाक्षिकूटं वदनं च यस्य शिरोभितापः स कफप्रकोपात् ॥ ५ ॥
जिसका मस्तक भीतरसे कफकरके लिप्त ( लिहसासा ) होवे, भारी बँधासा शीतल
होवे तथा नेत्रके कोये सुजाकर मुखको सुजाय देवे, इस मस्तक रोगको कफके
कोपका जानना चाहिये ॥
सान्निपातिकके लक्षण ।
शिरोभितापे त्रितयप्रवृत्ते सर्वाणि लिंगानि समुद्भवंति ।
त्रिदोषसे उत्पन्न मस्तक रोगमें तीनों दोषोंके सब लक्षण होते हैं ॥
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