कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
वहाँ जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती थी उन्हें राजा आकाशगामी हाथी से
भेजता था। किसी पुरुष का विश्वास न करता था॥६५॥
स्वयं भी उसके प्रेम के कारण प्रति रात्रि को हाथी से वहाँ जाता था और दिन में फिर
रत्नकूट चला आता था॥६६॥
एक बार राजा ने बुरे स्वप्न की शान्ति के लिए प्रभात-काल में ही उसके (राजदत्ता
के) साथ मद्यपान कर लिया। मद्यपान से मत्त उस रानी के बार-बार मना करने पर भी
वह राजा राजकार्यों को देखने के लिए रत्नकूट चला आया। क्योंकि राजकार्य दैनिक प्रिय
कर्तव्य है॥६७-६८॥
वहाँ राजकार्य करते हुए भी राजा मदोन्मत्ता अकेली पत्नी की चिन्ता करते हुए, अनमने
भाव से कार्य कर रहा था॥६९॥
इतने में ही वह रानी राजदत्ता दासियों के भोजन-विश्राम आदि कार्यों में व्यस्त हो जाने
पर, उस दुर्गम द्वीप के भवन के द्वार पर अकेली ही निकल आई ॥७०॥
उसके द्वार पर आते ही उसकी रक्षा भंग करने के लिए मानों दैव से प्रेरित कोई पुरुष
आया उसे मदोन्मत्ता राजदत्ता ने देखा और पास आने पर पूछा—'तुम कहाँ से आये हो
कौन हो और इस दुर्गम स्थान पर किस प्रकार आ सके ? ॥७१-७२॥
अनेक कष्टों को झेले हुए उस पुरुष ने कहा—'हे सुन्दरी ! मैं मथुरावासी पवनसेन
नामक बनिये का पुत्र हूँ। पिता की मृत्यु होने पर कुटुम्बियों द्वारा सब धन हरण कर लेने पर
विदेश जाकर दीन चाकरी करने लगा॥७३-७४॥
तब बड़ी कठिनाई से व्यापार द्वारा धन कमाकर दूसरे देश को जाता हुआ राह में चोरों
से लूट लिया गया॥७५॥
तब अपने ऐसे लोगों के साथ रत्नों की खदानोंवाले कनक-क्षेत्र में गया॥७६॥
वहाँ पर राजा को हिस्सा देने का निर्णय करके एक साल तक रत्न-प्राप्ति के लिए जमीन
खोदता रहा। गहरे गड्ढों के खोदने पर भी रत्न न मिला॥७७॥
और, मेरे साथी रत्नों को पाकर प्रसन्न हो रहे थे इसलिए मैंने दुःख से पीड़ित होकर
समुद्र के किनारे लकड़ियाँ एकत्र करके जल मरने के लिए चिता बनाई। जब मैं चिता में प्रवेश
कर ही रहा था कि इतने में जीवदत्त नामक जहाजी बनिया दैवयोग से आया॥७८-७९॥
३६ कथासरित्सागर
३६ कथासरित्सागर
विचार्य मरजातेन दत्त्वा वृत्तिं दयालुना।
गृहीतोऽहं प्रवहणे स्वर्णद्वीप यियासता ॥८०॥
ततोऽकस्मात्प्रवहणेनाब्धिमध्येन गच्छताम्।
पञ्चस्वहस्सु यातेषु मेघोऽकस्माद्ववृष्यस ॥८१॥
प्रवृष्टे स्थूलधारामिर्मघेऽस्मिन्मारुतेन तत्।
अघूर्णत प्रवहणं मत्तहस्तिशिरो यथा ॥८२॥
क्षणाच्चिमज्ज भग्नेऽस्मिन्यानपात्रे विधेर्वशात्।
एकं फलकक प्राप्तस्तत्काल मज्जता मया ॥८३॥
तवाऽवस्तत शान्ते मेघाटोपे विधेर्वशात्।
इमं प्रदेशं प्राप्याहमुत्तीर्ण साम्प्रतं वने ॥८४॥
वीक्ष्य चेदं चतुश्शालं प्रविश्याभ्यन्तर मया ।
दृष्टा दृष्टिसुधावृष्टिस्त्व तापशमनी शुभे ॥८५॥
इत्युक्तवन्तं पर्यङ्के निवेश्यालिङ्गि तम्।
मोहिता राजवत्ता सा मदेन मदनेन च ॥८६॥
स्त्रीत्वं शीजत्वमेकान्तं पुंसो लामोऽनियन्त्रणा ।
यत्र पञ्चाम्यस्तत्र वार्त्ता शीलसूनस्य का॥८७॥
न चैवं क्षमते भारी विचारं मारमोहिता।
यदियं चकमे रात्री तमकाम्यं विपद्गतम् ॥८८॥
तावच्च रत्नाधिपतिः स राजा रत्नकूटतः।
आजगामोत्सुकस्तूर्णं शुचरद्विपवाहनः ॥८९॥
प्रविशंश्चात्र सोऽपश्यत्सादृश्येनापि तेन ताम्।
पुरुषेण समं भार्या राजवत्तां रतिस्थिताम् ॥९०॥
दृष्ट्वा जिघांसितमपि क्षितीशः पुरुष स तम्।
नाबधीत्पादपतितं युवानं कृपणा गिरः ॥९१॥
भार्या भीतां च मत्तां तां स वीक्ष्यैवमचिन्तयत् ।
मद्ये मारैकसुहृदि प्रसक्ता स्त्री सती कुतः ॥९२॥
श्चियन्तु चपला नारी रक्षमापि न शक्यते।
किं नामालोलवाताली बाहुभ्यां जातु बध्यते ॥९३॥
न कृत गणकोक्तं यत्तदिदं तस्य मे फलम्।
विपाककटुकं तस्य माप्तवाक्यावधीर णम् ॥९४॥
सप्तम लम्बक ३७
सप्तम लम्बक ३७
स्वर्णद्वीप जाते हुए उस दयालु बनिये ने मरने से रोककर और जीवन-निर्वाह का प्रबन्ध
करके मुझे जहाज पर चढ़ा दिया ॥८०॥
तब समुद्र के बीच जहाज से जाते हुए हम लोगों को पाँच दिन बीत गये छठे दिन
अकस्मात् बादल दीख पड़े और मूसलाधार पानी बरसने पर आँधी से जहाज हाथी के सिर
के समान झूमने लगा। और क्षण-भर में टूटकर डूब गया । डूबते हुए मैंने एक लकड़ी का
तख्ता पा लिया ॥८१-८३॥
उस पर बैठा हुआ मै आकाश साफ होने पर, इस द्वीप के किनारे वन में जा लगा। वहाँ
से इस चौसाले मकान को देखकर इधर आया और यहाँ आँख के लिए अमृत-वर्षा के समान
दुःख शमन करनेवाली तुम्हें देखा ॥८४-८५॥
ऐसा कहते हुए उस बनिये को मद और काम से उन्मत्त राजदत्ता ने पलंग पर बैठाकर
लिपटा लिया ॥८६॥
स्त्रीत्व मद का नशा एकान्त पुरुष का मिलना और पूर्ण स्वतन्त्रता जहाँ ये पाँच
अनियाँ एकत्र हों वहाँ चरित्र-रूपी तृण की बात ही क्या ? ॥८७॥
काम से उत्तेजित नारी किसी प्रकार का विचार नहीं कर सकती। इसीलिए उसने
विपत्ति में पड़े हुए उस दरिद्र और कुरूप को भी अपना किया ॥८८॥
इतने में ही वह राजा रत्नाधिपति उत्सुकता के साथ आकाशगामी हाथी पर बैठकर
शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचा ॥८९॥
उसने आते ही उस दीन दरिद्र के साथ सोयी हुई रानी राजदत्ता को अपनी आँखों से
देखा ॥९०॥
उसने मार डालने योग्य व्यक्ति को भी दीनतापूर्वक प्रार्थना करने पर नहीं मारा।
डरी हुई और मद्य से चूर पत्नी को देखकर वह इस प्रकार सोचने लगा कि काम का एकमात्र
मित्र मद्य के पी लेने पर स्त्री सती कैसे रह सकती है? ॥९१ ९२॥
चंचला (दुराचारिणी) स्त्री रक्षा से भी रोकी नहीं जा सकती। क्या प्रलयकालीन आँधी
हाथ से रोकी जा सकती है ? ॥९३॥
मैंने जो गणक का कहना नहीं माना उसी का यह फल है। विश्वस्त और हितैषी
पुरुष की बात का अनादर करना किसके लिए परिणाम में अच्छा नहीं होता ॥९४॥
३३ कथासरित्सागर
यहाँ पृष्ठ का देवनागरी लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
३३ कथासरित्सागर
निवार्य मरणात्तन् दत्त्वा वृत्तिं दयालुना।
गृहीतोऽहं प्रवहणे स्वर्णद्वीपं यियासता ॥८०॥
ततोऽकस्मान्नवहनेनाब्धिमध्येन गच्छताम्।
पञ्चस्वहस्सु यातेषु मेघोऽकस्माद्व्यबुध्यत ॥८१॥
प्रमृष्टे स्थूलधाराभिर्भवेऽस्मिन्मारुतेन तत्।
व्यघूर्णत प्रवहणं मत्तहस्तिशिरो यथा ॥८२॥
क्षणाच्चिमग्न्य भग्नेऽस्मिन्वानपात्रे विधेर्वशात्।
एकं फलकम् प्राप्तस्तत्कालं मज्जता मया ॥८३॥
तदारूढस्ततः शान्ते मेघाटोपे विधेर्वशात्।
इमं प्रदेशं प्राप्यहमुत्तीर्णः साम्प्रतं वने ॥८४॥
वीक्ष्य चेदं धनुश्शास्त्रं प्रविष्टाम्यन्तरं मया।
दृष्टा दृष्टिसुधावृष्टिस्त्वं तापशमनी भुमे ॥८५॥
इत्युक्तवन्तं पर्यङ्के निषद्यैवाश्लिषत्तु तम्।
मोहिता राजवत्ता सा मदेन मदनेन च ॥८६॥
स्त्रीत्वं जीवितमेकान्तः पुंसो कामोऽनियन्त्रणा।
यत्र पञ्चाम्नयस्तत्र वार्ता शीलतृणस्य का ॥८७॥
न चैव क्षमते नारी विचारं मारमोहिता।
यदिदं चकमे राज्ञी तमकाम्यं विपद्गतम् ॥८८॥
तावच्च रत्नाधिपतिः स राजा रत्नकूटकः।
आजगामोत्सुकस्तूर्णं शुपरद्विपवाहनः ॥८९॥
प्रविशदात्र सोऽपश्यत्सादृशेनापि तन ताम्।
पुरुषेण समं भार्यां राजवत्तां रतिस्थिताम् ॥९०॥
दृष्ट्वा निष्कासितमपि क्षितीशः पुरुषं स तम्।
त्रासभीत्यादपतितं ब्रुवाणं कृपणा गिरः ॥९१॥
भार्यां मौढां च मत्तां तां स वीक्ष्यैवमचिन्तयत्।
अद्य मारेङ्मुहृदि प्रसक्ता स्त्री सती कुत ॥९२॥
नियन्तुं चपला नारी रक्षयापि न शक्यते।
किं नामोत्पातवाताली बाहुभ्यां जातु बध्यते ॥९३॥
न श्रुतं गणकोक्तं यत्तन्दि तस्य मे फलम्।
विपाककटुब तस्य भाप्तवाकयावधीरणम् ॥९४॥
सप्तम लम्बक १९
सप्तम लम्बक १९
यह शीलवती की बहन है—यह देखते हुए मैं यह भूल गया कि हलाहल विष भी अमृत
का सहोदर ही है ॥१९५॥
यह भी ठीक है कि दैव की आश्चर्यजनक चेष्टा को कौन व्यक्ति पुरुषार्थ से जीत
सकता है ॥१९६॥
ऐसा सोचकर राजा ने क्रोध नहीं किया और वृत्तान्त पूछकर उस वैश्य-पुत्र को छोड़
दिया ॥१९७॥
छूटा हुआ वैश्य-पुत्र अपने जाने का मार्ग खोजता हुआ भवन से निकलकर समुद्र के तट
पर गया और उसने दूर से जाते हुए एक जहाज को देखा ॥१९८॥
तब उसी तख्ते पर चढ़कर, जिससे पहले आया था समुद्र में कूद पड़ा और चिल्लाकर
रोने लगा कि मुझे बचाओ। उसका रोना-चिल्लाना सुनकर उस जहाज में बैठे हुए उसके स्वामी
क्रोधवर्मा ने उसे जहाज में चढ़ाकर अपने पास रख लिया ॥१९९ ॥
दैव ने जिसके नाश के लिए जो विधान रच रखा है वह, दौड़कर भागते हुए का भी
पीछा करता है ॥१ ९॥
यही कारण था कि वह मूर्ख बनिया जहाज में चलते हुए एकान्त में क्रोधवर्मा की स्त्री के
साथ पकड़ा गया। क्रोधवर्मा उसके इस कुकृत्य को देखकर क्रुद्ध हो उठा और उसे समुद्र में फेंक
दिया जिससे वह डूबकर मर गया ॥१०२॥
इधर राजा रत्नाधिपति क्रोध न करके राजदत्ता (अपनी स्त्री) को सेवकों और सामान
के साथ श्वेतराश्मि हाथी पर बैठाकर रत्नकूट ले आया ॥१ ३॥
रत्नकूट में पहुँचकर राजा ने उसे उसकी बहन शीलवती को सौंप दिया और शीलवती
तथा मन्त्रियों को उसका सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥१ ४॥
और बोला—'आश्चर्य है कि सार-रहित और नीरस सांसारिक भोगों में आसक्त रहकर
मैंने कितना कष्ट पाया ॥१ ५॥
इसलिए, अब वन में जाकर भगवान की शरण लेता हूँ जिससे फिर ऐसे कष्टों का
भोग न करूँ ॥१ ६॥
ऐसा कहते हुए, राजा सुधी मन्त्रियों और शीलवती द्वारा बहुत रोके जाने पर भी
वैराग्य पर दृढ़ रहा ॥१ ७॥
और उसने अपना सारा राज्य पापभंजन नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को विधिपूर्वक दान
कर दिया और शेष धन शीलवती तथा अन्यान्य ब्राह्मणों को देकर भोगों से सर्वथा विरक्त
हो गया ॥१ ८ । ९॥
५८ कथासरित्सागर
५८ कथासरित्सागर
शीलवत्याः स्वसेतीमां जानतो बत विस्मृता।
सुधायाः सहजा सा मे कालकूटविषच्छला॥९५॥
अथवा कः समर्थः स्यादसम्माव्यं विचेष्टितम्।
जेतुं पुरुषकारेण विधेरद्भुतकर्मणः॥९६॥
इत्यालोच्य न चुक्रोश कस्मैचित् जहौ च सः।
पृष्टोदन्तं वणिक्पुत्रं राजा प्रच्छन्नकामुकम्॥९७॥
सोऽपि मुक्तस्ततोऽभ्यन्तति काञ्चिद्वणिक्सुतः।
निर्गत्याब्धौ प्रवहणं दूरादागच्छदैक्षत॥९८॥
ततः फलकम् भूयस्तमेवारुह्य सोऽम्बुधौ।
भ्रमन्नूत्कृत्य चक्रन्द मामुद्धरत भो इति॥९९॥
तेन स क्रोधवर्माख्यो वणिक्प्रधानपाथगः।
समुद्धृत्य वणिक्पुत्रं चकारास्तिकवसिनम्॥१००॥
मस्य यद्विहितं धात्रा कर्म नाशाय तस्य तत्।
पदवीं यत्र तत्रापि धावतोऽप्यनुधावति॥१०१॥
यथा तत्र स्थितो मूढस्तत्पत्न्या सङ्गतो रहः।
विलोक्य वणिजा तेन क्षेपितोऽब्धौ व्यपद्यत॥१०२॥
तावच्च रत्नाधिपतिः स राजा सपरिच्छदाम्।
आरोप्य श्वतरथमो तां राजवत्तामकोपतः॥१०३॥
प्रापय्य रत्नकटकं शीलवत्याः समर्प्य च।
तस्यै च सचिवेभ्यश्च सवृत्तान्तमवर्णयत्॥१०४॥
जगाद च कियद्दुःखमनुभूतमहो मया।
असारविरसेष्वेषु भोगेष्वामुक्तचेतसा ॥१०५॥
तदिदानीं वनं गत्वा हरिं शरणमाश्रये।
येन स्यां नैष दुःखानां भाजनं पुनरीदृशाम्॥१०६॥
इत्युक्तवान् स मचिबर्वार्यमाणोऽपि दुःखितः।
शीलवत्या च वैराग्यान्निश्चयं नैव तज्जहौ॥१०७॥
ततोऽधमपरित्रादावत्रं साध्ये स्वकोशतः।
दीनवर्यै द्विजभ्योऽथ दत्वान्यद् भोगनिस्पृहः॥१०८॥
पात्रभूतप्रनगजाय ब्राह्मगाय यथाविधि।
न्दो गुणमरिष्टाय नित्यं गव्यं स भूपतिः॥१०९॥
सप्तम लम्बक ३९
सप्तम लम्बक ३९
यह धीमवती की बहन है—यह देखते हुए मैं यह भूल गया कि हलाहल विष भी अमृत
का सहोदर ही है॥९५॥
यह भी ठीक है कि दैव की आश्चर्यजनक चेष्टा को कौन व्यक्ति पुरुषार्थ से जीत
सकता है॥९६॥
ऐसा सोचकर राजा ने क्रोध नहीं किया और वृत्तान्त पूछकर उस वैश्य-पुत्र को छोड़
दिया ॥९७॥
छूटा हुआ वैश्य-पुत्र अपने जाने का मार्ग खोजता हुआ भवन से निकलकर समुद्र के तट
पर गया और उसने दूर से आते हुए एक जहाज को देखा ॥९८॥
तब उसी तख्ते पर चढ़कर, जिससे पहले आया था समुद्र में कूद पड़ा और चिल्लाकर
रोने लगा कि मुझे बचाओ। उसका रोना-चिल्लाना सुनकर उस जहाज में बैठ हुए उसके स्वामी
क्रोशवर्मा ने उसे जहाज में चढ़ाकर अपने पास रख लिया ॥९९ १ ॥
दैव ने जिसके नाश के लिए जो विधान रच रखा है, वह, दौड़कर भागते हुए का भी
पीछा करता है॥१ १॥
यही कारण था कि वह मूर्ख बनिया जहाज में चलते हुए एकान्त में क्रोशवर्मा की स्त्री के
साथ पकड़ा गया। क्रोशवर्मा उसके इस कुकृत्य को देखकर क्रुद्ध हो उठा और उसे समुद्र में फेंक
दिया जिससे वह डूबकर मर गया ॥१ २॥
इधर राजा रत्नाधिपति क्रोध न करके राजन्ता (अपनी स्त्री) को सेवकों और सामान
के साथ श्वेतरश्मि हाथी पर बैठाकर रत्नकूट ले आया ॥१ ३॥
रत्नकूट में पहुँचकर राजा ने उसे उसकी बहन धीमवती को सौंप दिया और धीमवती
तथा मन्त्रियों को उसका सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥१ ४॥
और बोला—'आश्चर्य है कि सार रहित और नीरस सांसारिक भोगों में आसक्त रहकर
मैंने कितना कष्ट पाया ॥१ ५॥
इसलिए, अब वन में जाकर भगवान् की शरण लेता हूँ जिससे फिर ऐसे कष्ट का
भोग न करूँ॥१ ६॥
ऐसा कहते हुए, राजा दुःखी मन्त्रियों और धीमवती द्वारा बहुत रोके जाने पर भी
वैराग्य पर दृढ़ रहा ॥१ ७॥
और उसने अपना सारा राज्य पापभंजन नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को विधिपूर्वक दान
कर दिया और शेष धन धीमवती तथा अन्यान्य ब्राह्मणों को देकर माया से सर्वथा विरक्त
हो गया ॥१ ८ १ ९॥
४० कथासरित्सागर
४० कथासरित्सागर
दत्तराज्यश्च नभसा स गमिष्यंस्तपोवनम्।
आनाययञ्श्वेतरश्मिं पौराणां साधु पश्यताम् ॥११०॥
आनीतमात्रं स करी शरीरं प्रविमुच्य तत्।
पुरुषो दिव्यरूपोऽभूद्धारकेयूरराजितः ॥१११॥
श्वेतरश्मिकथितः पूर्वजन्मवृत्तान्तः
को भवान्किमिदं चेति पृष्टो राज्ञा जगाद सः।
गन्धर्वौ भ्रातरावावामुभौ मलयवासिनौ ॥११२॥
अह सोमप्रभो नाम ज्येष्ठो देवप्रभश्च सः।
तस्य चैकैव मद्भातुरभार्या सा चातिवल्लभा ॥११३॥
स तां राजवतीं नाम कृतवोत्सङ्गं परिभ्रमन्।
एकदा सिद्धवासस्य स्थानं प्रायानया सह ॥११४॥
केशवायतने तत्र वयमभ्यर्चिताच्युताः।
प्रावर्त्तामहि सर्वेऽपि गातुं भगवतः पुरः ॥११५॥
तावदागत्य तत्रैकः सिद्धस्तां श्रव्यगायिनीम्।
दृष्ट्वा राजवतीं पश्यन्नतिष्ठदनिमेषया ॥११६॥
सिद्धोऽपि सानिलाषः किं परनारीं निरीक्षसे।
इति रोष्यात्स मद्भाता क्रुधा सिद्धं तमब्रवीत् ॥११७॥
ततः स सिद्धः कुपितः शप्तुमेव तमभ्यधात्।
गीताश्चर्यान्मया मूढ वीक्षितेयं न कामतः ॥११८॥
तन्मर्त्ययोनावीर्ष्यालुः पत त्वमनया सह।
पश्येतामेव भार्यां त्वं साक्षात्तत्रान्यसङ्गताम् ॥११९॥
इत्युचिवान् मया सोऽथ बाल्यात्तच्छापकोपतः।
हस्तस्थेनाहृतः क्रीडामुग्ध्येन श्वेतहस्तिना ॥१२०॥
ततः स मां समशपद्येनाहं भवताहृतः।
तादृक्श्वेतो गजो भूमौ भवानुत्पद्यतामिति ॥१२१॥
अथानुनीतो मद्भात्रा तेन देवप्रभेण सः।
सिद्धः कृपालुः शापान्तमेवमस्माकमब्रवीत् ॥१२२॥
हरेः प्रसादान्मर्त्योऽपि भूत्वा द्वीपेश्र्वरो भवान्।
गजीभूतमिमं प्राप्स्यत्यनुजं दिव्यवाहनम् ॥१२३॥
मन्तपुरसहस्राणि त्वमशीतिमवाप्स्यसि।
तैषां वेत्स्यसि दौःशील्पं सर्वेषां जनसन्निधौ ॥१२४॥
सप्तम लम्बक ४१
सप्तम लम्बक ४१
राज्य और धन का दान करके राजा ने रोते हुए नागरिकों के सामने ही तपोवन में जाने
की इच्छा से श्वेतरश्मि हाथी को बुलाया ॥११० ॥
सामने प्रस्तुत श्वेतरश्मि हाथी ने तुरन्त अपना हाथी का शरीर छोड़कर हार-केयूर
धारी दिव्य पुरुष गन्धर्व का रूप धारण किया ॥१११॥
श्वेतरश्मि हाथी के पूर्वजन्म की कथा
'तुम कौन हो और यह क्या किया ? —राजा के इस प्रकार पूछने पर हाथी बोला—
मैं और तुम—हम दोनों पूर्वजन्म में मलयाचल-निवासी गन्धर्वजातीय भाई हैं। मैं छोटा
भाई सोमप्रभ हूँ और दूसरा बड़ा भाई देवप्रभ था । उसकी राजवती नाम की अत्यन्त
प्यारी पत्नी थी जिसे वह गोद में लेकर घूमते हुए सिद्धवास नामक स्थान में मेरे साथ
गया ॥११२–११४॥
वहीं पर विष्णु भगवान् के एक मन्दिर में उनकी पूजा करके हम लोग गाने के लिए
प्रवृत्त हुए ॥११५॥
उस मन्दिर में एक सिद्ध आया और वह अतिमनोहर गान करते हुए राजवती को एकटक
से देखने लगा ॥११६॥
मेरे बड़े भाई ने उसे इस प्रकार घूरते हुए देखकर उस सिद्ध से क्रुद्ध होकर कहा कि तू
सिद्ध होकर भी दूसरे की स्त्री को इस प्रकार की लालसा से क्यों देखता है ? ॥११७॥
तब सिद्ध ने भी क्रुद्ध होकर उसे शाप देने के लिए इस प्रकार कहा—'रे मूर्ख ! गाने के
आश्चर्य से मैंने इसे देखा वासना से नहीं। इसलिए, हे ईर्ष्याभासे ! तुम दोनों इसके साथ मनुष्य
की योनि में जा गिरागे और तुम इसी पत्नी को दूसरे से समागम करते हुए अपनी आँखों से
देखोगे' । ऐसा कहते हुए उस सिद्ध को मैंने क्रोध से हाथ में लिये हुए मिट्टी के सफेद हाथी
(खिलौने) से मारा ॥११८–१२०॥
तब उसने मुझे शाप दिया कि 'तूने मुझे मिट्टी के सफेद हाथी से मारा है इसलिए तू अगले
जन्म में सफेद हाथी की योनि में जन्म लेगा' ॥१२१॥
तदनन्तर मेरे भाई द्वारा किये गये अनुनय-विनय पर प्रसन्न उस सिद्ध ने दयालु होकर
हम दोनों का शापान्त इस प्रकार किया ॥१२२॥
देवप्रभ से कहा कि 'तू विष्णु भगवान् की कृपा से मनुष्य होकर भी एक द्वीप का राजा
होगा और हाथी बने हुए अपने भाई को दिव्य वाहन के रूप में प्राप्त करेगा। तेरी अस्सी
हजार रानियाँ होगी। उन सभी रानियों की दुश्चरित्रता तुझे जनता के सामने मालूम
होगी ॥१२३ १२४॥
६
४२ कथासरित्सागर
४२ कथासरित्सागर
अथैतां मानुषीभूतां स्वभार्यां परिणेष्यसि ।
प्रत्यक्षमेनामपि च द्रक्ष्यस्यन्येन सङ्गताम् ॥१२५॥
ततो विरक्तहृदयो दत्त्वा राज्यं द्विजन्मने ।
देवप्रभ यदा शान्तो वनं गन्तुं प्रपत्स्यसि ॥१२६॥
तदा प्रथममुक्तेऽस्मिन्गजरत्नावुजे तव ।
अनया भार्यया साकं शापात्त्वमपि मोक्ष्यसे ॥१२७॥
इति सिद्धोक्तशापान्ता वय प्राक्कर्मभवत् ।
एवं जाता पृथग्भोगाच्छापान्तं सैष चाद्य नः॥१२८॥
एवं सोमप्रभेणोक्ते स रत्नाधिपतिर्नृप ।
जातिं स्मृत्वाग्रवीद्धन्त सैष देवप्रभो ऽहम् ॥१२९॥
एषापि राजदत्ता मा पत्नी राजवती मम ।
इत्युक्त्वा स तया साकं भार्यया तां तनु जहौ ॥१३० ॥
क्षणात्सर्वेऽपि गन्धर्वा भूत्वा लोकस्य पश्यतः ।
समुत्पत्य निजं धाम ययुस्ते मरुद्याधस्रम् ॥१३१॥
धीरुवरयपि शीलस्य माहात्म्यात्प्राप्य सम्पदम् ।
ताम्रलिप्तीं पुरीं गत्वा तस्थौ धर्मोपसेविनी ॥१३२॥
इति जगति न रक्षितुं समर्थः क्वचिदपि कश्चिदपि प्रसह्य नारीम् ।
अवति तु सततं विशुद्ध एकः कुलयुवतीं निजमरूपाशबन्धः ॥१३३॥
एवं सर्ष्या नाम दुःशङ्कहेतुर्ह्येष पुंसां क्लेशदायी परेषाम् ।
योऽयं मा मुद्रक्षणायाङ्गनानामर्थोत्सुक्यं प्रत्युतासां करोति ॥१३४॥
इति नरवाहनदत्तो रत्नप्रभया स्वभार्यया कथिताम् ।
स निशम्य कथामभ्यां सचिवैः सार्धं परं मुमुदे ॥१३५॥
इति महाकविश्रीमत्सोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके
द्वितीयस्तरङ्गः ।
तृतीयस्तरङ्गः
निश्चयदत्तस्य अनुरागपरावरूपाश्च कथा
एवं रत्नप्रभाख्यानकपात्रमत्त इवापरम् ।
नरवाहनदत्तं तं सचिवो गोमुखोऽब्रवीत् ॥१॥
तदनन्तर तू मनुष्य-योनि में उत्पन्न इसी पत्नी को प्राप्त करेगा इसे और दूसरे पुरुष के
साथ अपनी आँखों से देखेगा। तब तू विरक्त होकर ब्राह्मण को राज्य देकर वन जाने का
यत्न करेगा। उस समय तेरा छोटा भाई सोमप्रभ भी हाथी की योनि से मुक्त हो जायगा
और तू भी इसी पत्नी के साथ मानव-योनि से मुक्त होकर अपने गन्धर्व-रूप को प्राप्त
करेगा' ॥१२६-१२७॥
हाथी ने फिर कहा—'इस प्रकार, हम लोग सिद्ध के शाप से मुक्त हो गये। अपने-अपने
कर्म के भेद से हम लोग पृथक् पृथक् योनि में उत्पन्न हुए थे। अब हम लोगों के शाप का आज अन्त
हो गया' ॥१२८॥
सोमप्रभ के ऐसा कहने पर वह राजा नलाधिपति बोला—'मैं अपने पूर्व जन्म का स्मरण
करता हूँ। वह देवप्रभ मैं ही तो था और यह राजदत्ता मेरी राजवती नाम की पत्नी है। ऐसा
कहकर राजा और रानी राजवती राजदत्ता ने अपना मनुष्य का चोला त्याग दिया। उसी समय
वे तीनों (राजा रानी और हाथी) गन्धर्व-देह धारण करके लीला के देखते-देखते आकाश में
उड़कर मरुदाचल-स्थित अपने धाम को चले गये ॥१२९-१३१॥
शीलावती भी अपने शुद्ध चरित्र के प्रभाव से प्रचुर धन प्राप्त करके ताम्रलिप्ती नगर में
जाकर धार्मिक जीवन व्यतीत करने लगी ॥१३२॥
इस प्रकार, संसार में कहीं भी कोई स्त्री को नियन्त्रण में रखकर रक्षा करने में समर्थ
नहीं हो सकता। कुलीन स्त्री को उसका अपना ही एकमात्र प्रबल और विशुद्ध मन उसकी रक्षा
कर सकता है ॥१३३॥
इस प्रकार दूसरों से ईर्ष्या करना और उन पर दोष लगाना यह मानव-स्वभाव का दोष है।
यहाँ अधिक नियन्त्रण स्त्रियों की उन्मुक्तता को अत्यधिक बढ़ा देता है ॥१३४॥
नरवाहनदत्त इस प्रकार अपनी पत्नी रत्नप्रभा से कही गई कथा को सुनकर अपने
मन्त्रियों के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥१३५॥
महाकविश्रीमत्सोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का
द्वितीय तरंग समाप्त
तृतीय तरंग
निश्चयबल और अनुरागपरा की कथा
इस प्रकार रत्नप्रभा से कही गई कथा के अन्त में नरवाहनदत्त का मन्त्री गोमुख उससे
कहने लगा—॥१॥
४४ कथासरित्सागर
४४ कथासरित्सागर
सत्यं साध्व्यः प्रविरालाश्चपलास्तु सर्वा स्त्रियः ।
अविश्वास्त्यास्तथा श्वेतामपि श्व कथां शृणु ॥२॥
इहास्त्युज्जयिनी नाम नगरी विश्वविश्रुता ।
तस्यां निश्चयदत्ताख्यो वणिक्पुत्रोऽभवत्पुरा ॥३॥
स द्यूतकारे द्यूतेन धनं जित्वा दिने दिने ।
स्नात्वा सिप्राजलेऽभ्यर्च्य महाकालमुदारधीः ॥४॥
दत्त्वा दानं द्विजातिभ्यो दीनानाथेभ्य एव च ।
व्यधाद्विलेपनाहारताम्बूलाद्यविशेषतः ॥५॥
सदा स्नानार्चनाद्यन्ते महाकालारुयान्तिके ।
गत्वा व्यलिम्पदारामं श्मशाने चन्दनादिना ॥६॥
तत्रस्थे च शिलास्तम्भे स विन्यस्य विलेपनम् ।
विमलिंप कथम्पृष्ठं युवा प्रत्यहमेककः ॥७॥
तेन स्तम्भः स सुश्लक्ष्णः कालेनाभवदेकतः ।
अथागाच्चित्रकृत्तेन पथा रूपकृता सह ॥८॥
स स्तम्भं वीक्ष्य सुश्लक्ष्णं तत्र गौरीं समालिखत् ।
रूपकारोऽपि शास्त्रेण प्रौढयेवोल्लिखेत् ताम् ॥९॥
ततस्तयोगतवतोर्महाकालार्चनागता ।
विद्याधरसुतैकात्र स्तम्भे देवीं ददर्श ताम् ॥१०॥
सुलक्ष्णत्वात्साप्रविश्य तस्यां गत्वा कृतार्थताम् ।
अदृश्या विद्ययार्यैतं शिलास्तम्भं विवेश सा ॥११॥
तावन्निश्चयदत्त स तत्रागत्य वणिक्सुतः ।
साश्चर्यं स्तम्भमध्ये तां ददर्शोल्लिखितामुमाम् ॥१२॥
विलिप्याङ्गानि तत्स्तम्भागेऽन्यत्रानुरूपनम् ।
न्यस्य पृष्ठं समालब्धुं प्रारभे निरुपद्रवः स ॥१३॥
तद्विलोक्ष्य विलोलाक्षी सा विद्याधरकन्यका ।
स्तम्भान्तरस्था तद्रूपहृतचित्ता व्यचिन्तयत् ॥१४॥
ईदृशस्यापि शोभ्यस्य नास्ति पृष्ठानुलेपकः ।
तदहं तावदद्यास्य पृष्ठमेषा समालभे ॥१५॥
इत्यालोच्य प्रसार्यैव करं स्तम्भान्तरात्सती ।
व्यलिंपत्तस्य सा पृष्ठं स्नेहाद्विद्याधरी तदा ॥१६॥
सप्तम लम्बक ४५
सप्तम लम्बक ४५
सच है सदाचारिणी स्त्रियां विरल होती हैं। प्रायः स्त्रियाँ चंचला (दुराचारिणी)
ही होती हैं और विश्वास के योग्य भी नहीं होतीं। इस प्रसंग में यह भी एक कथा
सुनें ॥२॥
संसार में प्रसिद्ध उज्जयिनी नाम की नगरी है। प्राचीन समय में वहाँ निश्चयदत्त नाम का
बनिया का बेटा रहता था ॥३॥
वह जुआरी था और प्रतिदिन जुए से धन जीतकर, क्षिप्रा नदी में स्नान और महाकालेश्वर
शिव की पूजा करके ब्राह्मणों दीना एवं अनाथों को दान देकर चन्दन इत्र भोजन ताम्बूल आदि
का व्यवहार करता था। (वह बहुत खर्चीला और शौकीन था) ॥४-५॥
वह निश्चयदत्त प्रतिदिन स्नान पूजा आदि करके महाकाल-मन्दिर के समीप श्मशान
में जाकर शरीर में चन्दन लगाता था ॥६॥
वह युवक वैश्य उस श्मशान में खड़े एक पत्थर के खम्भे पर, चन्दन लगाकर उस पर
अपनी पीठ रगड़ता था ॥७॥
प्रतिदिन पीठ के रगड़ने से वह खम्भा अत्यन्त चिकना और सुन्दर हो गया था। एक बार
उस मार्ग से एक चित्रकार एक मूर्तिकार (संगतराश) के साथ उधर से आया ॥८॥
उसने खम्भे को खूब चिकना देखकर उस पर गौरी का चित्र बना दिया। मूर्तिकार ने
भी क्रीड़ावश छेनी और हथौड़ी से उस खोदकर मूर्ति का रूप दे दिया ॥ ॥
उन दोनों के चले जाने पर महाकाल की पूजा के लिए आई एक विद्याधर-कन्या उधर
आ निकली और उसने खम्भे पर पार्वती की खुदी हुई मूर्ति देखी ॥ ९ ॥
उसे बहुत चिकना देखकर और पार्वती का वास समझकर वह विद्याधरी महाकाल की
पूजा करके उसी खम्भे में अदृश्य रूप से प्रवेश कर गई ॥११॥
इतने में ही वैश्य-पुत्र प्रतिदिन के नियमानुसार उस खम्भे पर आया और गौरी की खुदी
हुई मूर्ति उसने देखी ॥१२॥
तब उसने शरीर पर चन्दन का लेप करके खम्भे की दूसरी ओर पीठ रगड़ना प्रारम्भ
किया ॥१३॥
उसे पीठ रगड़ते हुए देखकर वह चंचलाक्षी विद्याधरी खम्भ के अन्दर बैठी हुई उस वैश्य
की सुन्दरता से मोहित हो गई और सोचने लगी ऐसे सुन्दर युवक की पीठ पर चन्दन लगानेवाला
कोई नहीं है। तब मैं ही इसकी पीठ पर चन्दन लगाती हूँ ॥१४ १५॥
ऐसा सोचकर और खम्भे के अन्दर से ही हाथ फैलाकर स्नेह से उसकी पीठ मलने
लगी ॥१६॥
४६ कथासरित्सागर
४६ कथासरित्सागर
तत्क्षणं लब्धसंस्पर्शं व्यक्तकङ्कणनिस्वनं ।
जग्राह हस्तं हस्तेन स तस्यास्त्वं वणिक्सुतः ॥१७॥
महाभागापराद्धं ते किं मया मुञ्च मे करम् ।
इत्यदृश्यैव तं विद्याधरी स्तम्भादुवाच सा ॥१८॥
प्रत्यक्षा ब्रूहि मे का त्वं ततो मोक्ष्यामि ते करम् ।
इति निश्चयदत्तोऽपि प्रत्युवाच स तां ततः ॥१९॥
प्रत्यक्षभूत्वा सर्वं ते वच्मीति शपथोत्तरम् ।
विद्याधर्या तथोक्ताञ्च करं तस्या मुमोच सः ॥२०॥
अथ स्तम्भाद्विनिर्गत्य साक्षात्सर्वाङ्गसुन्दरी ।
तन्मुखासक्तनयना तं जगादोपविश्य सा ॥२१॥
अस्ति प्रालेयशैलान्ते नगरी पुष्करावती ।
नाम्ना विन्ध्यपरस्तस्यामास्ते विद्याधराधिपः ॥२२॥
अनुरागपरा नाम तस्याहं कन्यका सुता ।
महाकालार्चनायाता विश्रान्तास्मीह सम्प्रति ॥२३॥
तावच्च त्वमिहागत्य कुर्वन्पृष्ठविलेपनम् ।
दृष्टः स्तम्भेऽत्र मारीय¹ मोहागान्त्रोपमो मया ॥२४॥
तव प्रागनुरागेण रञ्जितं स्वान्तरात्मनः ।
पश्चात्पृष्ठविलेपिन्या अङ्गरागेण ते करः ॥२५॥
अतः परं त्वां विदित्वा चलितुमीहे सम्प्रति ।
गच्छामीति तयोक्तोऽथ वणिक्पुत्रो जगाद सः ॥२६॥
स्वीकृतं तन्मया चण्डि न स्वान्तं भवतीकृतम् ।
अमुक्तस्वीकृतान्तान्तः कथमद्य तु गच्छसि ॥२७॥
इति तेनोदिता सा च मधुरागणवशीकृता ।
सङ्गमिष्ये त्वया काममप्यस्यामस्मत्पुरी यदि ॥२८॥
दुर्गमा सा न ते नाथ सेत्स्यते ते समीहितम् ।
नहि दुष्करमस्तीह किञ्चिद्व्यवसायिनाम् ॥२९॥
इत्युदीर्य गमुत्पत्य चानुरागपरा ययौ ।
अगाद्रिश्चयदत्तोऽपि ग तद्गतमना गृहम् ॥३१॥
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१ माराय कामप्राय इदं मारीयं काम सम्बन्धि।
सप्तम लम्बक ४७
सप्तम लम्बक ४७
सुन्दर कोमल स्पर्श का अनुभव करते हुए और कंगन के शब्द को सुनते हुए निश्चयदत्त ने
पीछे हाथ घुमाकर उसके हाथ को पकड़ लिया ॥१७॥
उसके हाथ पकड़ने पर वह अदृश्य विद्याधरी खम्भे के भीतर से बोली— हे महाभाग !
मैंने तेरा कौन-सा अपराध किया है कि मेरा हाथ पकड़ रखा है। इसे छोड़ो' ॥१८॥
वैश्य पुत्र ने कहा— 'मेरे सामने आकर बताओ कि तुम कौन हो तब तुम्हारा हाथ
छोड़ूँगा। विद्याधरी ने शपथ खाकर कहा कि मैं प्रत्यक्ष होकर तुम्हें सब कहूँगी। उसके ऐसा
कहने पर उसने हाथ छोड़ दिया ॥१९ २ ॥
तदनन्तर वह सर्वांगसुन्दरी विद्याधरी वैश्य-पुत्र के मुख पर आँखें गड़ाए हुए, बैठकर
बोली—॥२१॥
'हिमालय पर्वत के शिखर पर पुष्करावती नाम की नगरी है। वहाँ विन्ध्यपर नाम का
विद्याधरों का राजा है ॥२२॥
उनकी मैं अनुरागपरा नाम की कन्या हूँ। यहाँ महाकाल भगवान् की पूजा के लिए
आई थी। इस खम्भे में कुछ देर के लिए विश्राम कर रही हूँ ॥२३॥
तबतक कामदेव के मोहन-मन्त्र के समान यहाँ आकर चन्दन को शरीर में घिसते हुए
तुम्हें देखा ॥२४॥
तुम्हारी पीठ पर चन्दन का लेप करती हुई मेरा हाथ तुमने प्रथम अनुराग के समान पकड़ा।
अब मैं जाती हूँ। उस कन्या के इस प्रकार कहने पर वैश्य-पुत्र ने कहा—'अब मुझे तुम्हारे पिता का
स्थान मालूम हो गया है। अभी तक तुम से हरण किये गये अपने हृदय को मैंने वापस नहीं लिया
है। लिय हुए हृदय के बिना वापस किय तुम कैसे जाओगी ? ॥२५-२७॥
उससे इस प्रकार कही गई और स्वस्थ प्रेम के वशीभूत वह विद्याधरी बोली— यदि
तुम मेरी नगरी में आ जाओगे तो फिर मिलूँगी ॥२८॥
किन्तु हे नाथ ! वह नगरी अत्यन्त दुर्गम है इसलिए तुम्हारी अभिलाषा पूरी न हो
सकेगी। फिर भी उद्योगी पुरुषों के लिए दुष्कर क्या है ? ऐसा कहकर वह अनुरागपरा
आकाश-मार्ग से उड़कर चली गई निश्चयदत्त भी उमीप हृदय को लगाये हुए भवन पर लौट
आया ॥३ ॥
४८ कथासरित्सागर
४८ कथासरित्सागर
स्मरन्दुमादिव स्तम्भादुद्भिन्नं करपल्लवम्।
हा धिक्तस्या गृहीत्वापि नाप्तः पाणिग्रहो मया ॥३१॥
तद्व्रजाम्यन्तिकं तस्याः पुरीं तां पुष्करावतीम्।
प्राणांस्त्यक्ष्यामि दैवं वा साहाय्यं मे करिष्यति ॥३२॥
इति सञ्चिन्तयन् नीत्वा स्मरार्तः सोऽत्र तद्दिनम्।
प्रातिष्ठत ततः प्रातरवलम्ब्योत्तरां दिशम् ॥३३॥
ततः प्रक्रमतस्तस्य क्रमोऽन्ये सहयायिनः।
मिलन्ति स्म वणिक्पुत्रा उत्तरापथगामिनः ॥३४॥
तैः समं समतिक्रमन् पुरग्रामाटवीनदीः।
क्रमादुत्तरदिग्भूमिं प्राप स म्लेच्छभूयसीम् ॥३५॥
तत्र तैरेव सहितः पथि प्राप्यव ताजिकैः।
गीत्वा परस्मै मूल्येन दत्तोऽभूत्ताजिकाय सः ॥३६॥
तेनाऽपि तावद् भृत्यानां हस्ते कोशालिकाकृते।
मुखराभिधानस्य सुहृत्तस्य व्यसृज्यत ॥३७॥
तत्र नीतः स तद्भृत्यैर्युक्तैस्तैरपरैस्त्रिभिः।
मुखरं मृतं बुद्ध्वा तत्पुत्राय न्यवेदयत् ॥३८॥
पितुः कोशालिका ह्येषा मित्रेण प्रेषिता मम।
तत्तस्यैवान्तिकं प्रातः प्राते क्षेप्या इमे मया ॥३९॥
इत्यात्मना चतुर्थं तं तत्पुत्रोऽपि स तां निशाम्।
संयम्य स्थापयामास तुरुष्को निगडैर्दृढम् ॥४०॥
ततोऽत्र बन्धने रात्रौ मरणत्रासकातरान्।
सङ्क्षोभिदक्षयदंस्तस्तान् स जगाद वणिक्सुतान् ॥४१॥
का विषादेन वः सिद्धिर्धैर्यमारुह्य तिष्ठत।
भीता इव हि धीराणां दूरे यान्ति विपत्तयः ॥४२॥
स्मरतैकां भगवतीं दुर्गामापद्विमोचनीम्।
इति तान् धीरयन् भक्त्या देवीं तुष्टाव सोऽथ ताम् ॥४३॥
'नमस्तेऽस्तु महादेवि पादौ ते यावकाङ्कितौ।
मुदितासुरमन्थास्त्रपङ्काविव नमाम्यहम् ॥४४॥
जितं शक्त्या शिवस्यापि विदवद्वैर्यकृता त्वया।
त्वदनुप्राणितं चेदं भ्रष्टतं भुवनत्रयम् ॥४५॥
सप्तम लम्बक ४९
सप्तम लम्बक ४९
और पेड़ के समान कन्धे से निकले हुए उसके पाणि-पल्लव का स्मरण करते हुए सोचने
लगा 'कि मैंने उसका हाथ पकड़ने पर भी विवाह नहीं किया यह बहुत बुरा किया' ॥३१॥
अतः अब मैं पुष्करावती पुरी में उसी के समीप जाता हूँ। या तो प्राणों का त्याग करूँगा
अथवा दैव ही मेरी सहायता करेगा ॥३२॥
ऐसा सोचते हुए उस काम-पीड़ित वैश्य ने उस दिन को किसी प्रकार व्यतीत किया और
प्रातःकाल उठते ही उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ॥३३॥
उस ओर जाते हुए उसे मार्ग में और भी तीन बनिया सहयात्री मिले, जो उत्तरापथ की
ओर जा रहे थे ॥३४॥
उनके साथ नगरों ग्रामों जंगलों और नदियों को पार करके वह म्लेच्छों से भरी हुई
उत्तर दिशा में पहुँचा ॥३५॥
वहाँ पर वह उन अन्य यात्रियों के साथ ताजिक (म्लेच्छ) लोगों से पकड़ा जाकर दूसरे
ताजिक के हाथ दामा पर बेच दिया गया ॥३६॥
उसने भी उन चारों को खरीद कर नौकर के हाथों उपहार-स्वरूप मुरवार नामक तुर्क
के पास भिजवा दिया ॥३७॥
जब उस ताजिक के नौकर, उन तीनों के साथ निश्चयदत्त को लेकर मुरवार के पास
पहुँचे तब वह (मुरवार) मर चुका था। अतः उन्हें उसके पुत्र को सौंप दिया गया ॥३८॥
'यह मेरे मित्र ने पिता के लिए उपहार भेजा है अतः इन्हें कल प्रातः उन्हीं के पास
कब्र में गाड़ दिया जायेगा'—ऐसा कहकर उस तुर्क के पुत्र ने उन्हें कसकर बाँधा और एक तरफ
रख दिया ॥३९-४०॥
तदनन्तर जकड़कर बाँधे गये उन अन्य तीन वैश्य-पुत्रों का मृत्यु के भय से व्याकुल देखकर
निश्चयदत्त ने उनसे कहा—॥४१॥
'शोक और दुःख मनाने से तुम्हारा क्या बनेगा। धीरज धरकर पड़े रहो। धैर्यशाली लोगों
की विपत्तियाँ माता डरकर दूर भागती हैं ॥४२॥
उस एकमात्र संकट को दूर करनेवाली जगदम्बा भगवती का स्मरण करो। इस प्रकार
साथियों का धीरज बँधाकर निश्चयदत्त भगवती की स्तुति करने लगा—॥४३॥
हे महादेवि ! तुम्हारे उन चरणों में प्रणाम करता हूँ जिनमें मारे हुए असुरों का रक्त
अलता (महावर) के समान शोभित होता है ॥४४॥
विश्व का ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली तुमने शिव को भी जीत लिया। ये तीनों लोक
तुम्हारी ही जीवित या सक्रिय प्रेरणा हैं ॥४५॥
७
५० कथासरित्सागर
५० कथासरित्सागर
परित्रातास्त्वया ह्येका महिषासुरसूदिनि ।
परित्रायस्व मां भक्तवत्सले शरणागतम् ॥४६॥
इत्यादि सम्यग्देवीं तां स्तुत्वा सहचरैः सह।
सोऽथ निश्चयदत्तोऽत्र श्रान्तो निद्रामगाद्द्रुतम् ॥४७॥
उत्तिष्ठत सुता यात विगत बन्धन हि वः।
इत्यादिदेश सा स्वप्ने देवी तं चापरांश्च तान् ॥४८॥
प्रबुध्य च तदा रात्री दृष्ट्वा बन्धान् स्वतश्च्युतान्।
अन्योन्यं स्वप्नमाख्याय हृष्टास्ते निर्ययुस्ततः ॥४९॥
गत्वा दूरमथाध्वानं क्षीणायां निशि तेऽपरे।
ऊचुर्निश्चयदत्तं तं दृष्टत्रासा वणिक्सुताः ॥५०॥
मास्तां बहुम्लेच्छतया दिगेषा दक्षिणापथम्।
वय यामः सखे त्वं तु यथाभिमतमाचर ॥५१॥
इत्युक्तस्तैरनुज्ञाय यथेष्टागमनाय तान्।
उदीचीमेव तामाशामवलम्ब्य पुनश्च सः ॥५२॥
एको निश्चयदत्तोऽथ प्रतस्थे प्रसभं पथि।
अनुरागपराप्रेमपाशाकृष्टो निरस्तधीः ॥५३॥
क्रमशः गच्छन् मिलितैः स महाव्रतिकैः सह।
चतुर्भिः प्राप्य सरितं वितस्तामुत्ततार सः ॥५४॥
उत्तीर्य च कृताहारः सूर्येऽस्ताचलचुम्बिनि।
विवेश तैरेव समं वनं मार्गवशागतम् ॥५५।
तत्र चाप्यागता केचित्समूचुः काष्ठभारिकाः।
क्व गच्छथ दिने याते ग्रामः कोऽप्यस्ति नाग्रतः ॥५६॥
एकस्तु विपिनेऽमुष्मिन्नस्ति शून्यं शिवालयम्।
तत्र तिष्ठति यो रात्रावन्तर्वा बहिरैव वा ॥५७॥
तं शृङ्गोत्पादिनी नाम शृङ्गोत्पादनपूर्वकम्।
मोहयित्वा पशूकृत्य भक्षयत्येव यक्षिणी ॥५८॥
एतच्छ्रुत्वापि सामर्षास्ते महाव्रतिनस्तदा।
ऊचुर्निश्चयदत्तं ते चत्वारः सहगामिनः ॥५९॥
एहि किं कुरुतेऽस्माकं वराकी साऽत्र यक्षिणी।
तेषु तेषु श्मशानेषु निशासु हि वयं स्थिताः ॥६०॥
हे महिषासुरमर्दनी ! तुमने सारे संसार की रक्षा की है, इसलिए हे भक्तों पर स्नेह
करनेवाली ! शरण में आये हुए मेरी रक्षा करें ॥४६॥
अपने साथियो के साथ इस प्रकार देवी की स्तुति करके वह (वैश्य) भी थकान
के कारण सो गया ॥४७॥
‘उठो उठो जाओ तुम्हारे बन्धन कट गये।—इस प्रकार, देवी ने स्वप्न में उन्हें
आदेश दिया। जगने पर उठकर उन लोगों ने अपने को बन्धन-मुक्त पाया। वे आपस में स्वप्न
की बात करके प्रसन्न हुए और वहाँ से चल पड़े। राह में सुबह होने पर अन्य साथियों ने
निश्चयदत्त से कहा कि म्लेच्छों से भरी हुई उत्तर दिशा को छोड़ो दक्षिणापथ ही अच्छा है। अतः
हमलोग उधर ही जाते हैं। तुझे जो अच्छा लगे करो ॥४८—५१॥
उनसे इस प्रकार कहे गये निश्चयदत्त ने उन्हें इच्छानुसार जाने के लिए कहकर स्वयं
उसी उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ॥५२॥
अकेला निश्चयदत्त विवश होकर मन्द से जा रहा था क्योंकि अनुरागपरा नामक
विद्याधरी के प्रेम से उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो रही थी ॥५३॥
चलते-चलते मार्ग में उसे चार महाव्रती (कापालिक) मिले। उनके साथ वह वितस्ता
(झेलम) नदी को पार कर गया ॥५४॥
वितस्ता को पारकर और भोजन करके सूर्यास्त के समय वे लोग मार्ग में आये हुए एक
वन में घुसे ॥५५॥
उस वन से आये हुए कुछ लकड़हारे उन्हें पहले मिले और बोले— आगे कहाँ जा रहे हो
इधर कोई गाँव नहीं है ॥५६॥
इस सूने जंगल में सिर्फ एक शिवालय है। उस शिवालय के बाहर या भीतर जो ठहरता है
उसे शृङ्गालोत्पादिनी नाम की यक्षिणी पशु बनाकर, सिर में कील उत्सारण करके खा
जाती है ॥५७-५८॥
यह सुनकर भी उसकी परवाह न करनेवाले वे चारों कापालिक साथी निश्चय दत्त से
बोले— आओ जी ! वह बेचारी यक्षिणी हम लोगों का क्या कर सकती है ? हम लोग रात
में बड़े-बड़े श्मशानों में रह चुके हैं ॥५९ ॥
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर
इत्युक्तवद्भिस्तैः साकं गत्वा प्राप्य शिवालयम्।
शून्यं निश्चयदस्तत्त्वां रात्रि नेतुं विवेश सः॥६१॥
तत्राङ्गणे विधायाशु भस्मना मण्डलं महत्।
प्रविश्य चान्तरे तस्य प्रज्वाल्याग्निं सहेन्धनैः॥६२॥
धीरो निश्चयदत्त स तं महाव्रतिनस्तथा।
मन्त्रं जपन्तो रक्षार्थं सर्वे एवावतस्थिरे॥६३॥
अथाययौ वादयन्ती दूरात् कङ्कालकिङ्किरीम्।
नृत्यन्ती यक्षिणी तत्र सा शृङ्गोत्पादिनी निशि॥६४॥
एत्य तपु चतुर्ष्वेकं सा महाव्रतिनं प्रति।
वतडुकं समपठन्नृत्त मण्डलाद्बहिः॥६५॥
तेन मन्त्रेण सञ्जातशृङ्गो मोहित उत्थितः।
नृत्यंस्तस्मिन्ज्वलत्यग्नौ स महाव्रतिकोऽभवत्॥६६॥
पतितं सार्धदग्धं तमाकृष्यावाग्निमध्यतः।
सा शृङ्गोत्पादिनी हृष्टा भक्षयामास यक्षिणी॥६७॥
ततो द्वितीये व्रतिनि न्यस्तदृष्टिस्तथैव सा।
तं शृङ्गोत्पादनं मन्त्रं पपाठ च ननर्त च॥६८॥
सोऽपि द्वितीयस्तन्मन्त्रजातशृङ्गः प्रनर्तितः।
पतितोऽग्नौ तयाकृष्य पश्यत्स्वन्येष्वभक्ष्यत॥६९॥
एवं क्रमेण संमोह्य तान् महाव्रतिनो निशि।
समाभक्ष्यन्त यक्षिण्या चत्वारोऽपि सशृङ्गकाः॥७०॥
चतुर्थं भक्षयन्त्या च तया मांसासृङ्मत्तया।
स्वयं किङ्करिकातोद्यं दैवाद् भूमौ न्यधीयत॥७१॥
तावच्च क्षिप्रमुत्थाय तद्गृहीत्वैव वादयन्।
धीरो निश्चयदत्तोऽपि प्रनृत्यन् विहसन् भ्रमन्॥७२॥
तं शृङ्गोत्पावनं मन्त्रमसकृच्छ्रुतशिक्षितम्।
पापठ्यते स्म यक्षिण्यास्तस्या मस्तकेऽक्षणो भुजे॥७३॥
तत्प्रयोगप्रभावण विवशा मुग्धुङ्कुणी।
उत्पातुकामशृङ्गी सा प्रह्ला तं प्राह यक्षिणी॥७४॥
१ सार्धं दग्धं = बधिरं, ताभ्यां मत्यया।