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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक ४५
सच है सदाचारिणी स्त्रियां विरल होती हैं। प्रायः स्त्रियाँ चंचला (दुराचारिणी)
ही होती हैं और विश्वास के योग्य भी नहीं होतीं। इस प्रसंग में यह भी एक कथा
सुनें ॥२॥
संसार में प्रसिद्ध उज्जयिनी नाम की नगरी है। प्राचीन समय में वहाँ निश्चयदत्त नाम का
बनिया का बेटा रहता था ॥३॥
वह जुआरी था और प्रतिदिन जुए से धन जीतकर, क्षिप्रा नदी में स्नान और महाकालेश्वर
शिव की पूजा करके ब्राह्मणों दीना एवं अनाथों को दान देकर चन्दन इत्र भोजन ताम्बूल आदि
का व्यवहार करता था। (वह बहुत खर्चीला और शौकीन था) ॥४-५॥
वह निश्चयदत्त प्रतिदिन स्नान पूजा आदि करके महाकाल-मन्दिर के समीप श्मशान
में जाकर शरीर में चन्दन लगाता था ॥६॥
वह युवक वैश्य उस श्मशान में खड़े एक पत्थर के खम्भे पर, चन्दन लगाकर उस पर
अपनी पीठ रगड़ता था ॥७॥
प्रतिदिन पीठ के रगड़ने से वह खम्भा अत्यन्त चिकना और सुन्दर हो गया था। एक बार
उस मार्ग से एक चित्रकार एक मूर्तिकार (संगतराश) के साथ उधर से आया ॥८॥
उसने खम्भे को खूब चिकना देखकर उस पर गौरी का चित्र बना दिया। मूर्तिकार ने
भी क्रीड़ावश छेनी और हथौड़ी से उस खोदकर मूर्ति का रूप दे दिया ॥ ॥
उन दोनों के चले जाने पर महाकाल की पूजा के लिए आई एक विद्याधर-कन्या उधर
आ निकली और उसने खम्भे पर पार्वती की खुदी हुई मूर्ति देखी ॥ ९ ॥
उसे बहुत चिकना देखकर और पार्वती का वास समझकर वह विद्याधरी महाकाल की
पूजा करके उसी खम्भे में अदृश्य रूप से प्रवेश कर गई ॥११॥
इतने में ही वैश्य-पुत्र प्रतिदिन के नियमानुसार उस खम्भे पर आया और गौरी की खुदी
हुई मूर्ति उसने देखी ॥१२॥
तब उसने शरीर पर चन्दन का लेप करके खम्भे की दूसरी ओर पीठ रगड़ना प्रारम्भ
किया ॥१३॥
उसे पीठ रगड़ते हुए देखकर वह चंचलाक्षी विद्याधरी खम्भ के अन्दर बैठी हुई उस वैश्य
की सुन्दरता से मोहित हो गई और सोचने लगी ऐसे सुन्दर युवक की पीठ पर चन्दन लगानेवाला
कोई नहीं है। तब मैं ही इसकी पीठ पर चन्दन लगाती हूँ ॥१४ १५॥
ऐसा सोचकर और खम्भे के अन्दर से ही हाथ फैलाकर स्नेह से उसकी पीठ मलने
लगी ॥१६॥