कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहे महिषासुरमर्दनी ! तुमने सारे संसार की रक्षा की है, इसलिए हे भक्तों पर स्नेह
करनेवाली ! शरण में आये हुए मेरी रक्षा करें ॥४६॥
अपने साथियो के साथ इस प्रकार देवी की स्तुति करके वह (वैश्य) भी थकान
के कारण सो गया ॥४७॥
‘उठो उठो जाओ तुम्हारे बन्धन कट गये।—इस प्रकार, देवी ने स्वप्न में उन्हें
आदेश दिया। जगने पर उठकर उन लोगों ने अपने को बन्धन-मुक्त पाया। वे आपस में स्वप्न
की बात करके प्रसन्न हुए और वहाँ से चल पड़े। राह में सुबह होने पर अन्य साथियों ने
निश्चयदत्त से कहा कि म्लेच्छों से भरी हुई उत्तर दिशा को छोड़ो दक्षिणापथ ही अच्छा है। अतः
हमलोग उधर ही जाते हैं। तुझे जो अच्छा लगे करो ॥४८—५१॥
उनसे इस प्रकार कहे गये निश्चयदत्त ने उन्हें इच्छानुसार जाने के लिए कहकर स्वयं
उसी उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ॥५२॥
अकेला निश्चयदत्त विवश होकर मन्द से जा रहा था क्योंकि अनुरागपरा नामक
विद्याधरी के प्रेम से उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो रही थी ॥५३॥
चलते-चलते मार्ग में उसे चार महाव्रती (कापालिक) मिले। उनके साथ वह वितस्ता
(झेलम) नदी को पार कर गया ॥५४॥
वितस्ता को पारकर और भोजन करके सूर्यास्त के समय वे लोग मार्ग में आये हुए एक
वन में घुसे ॥५५॥
उस वन से आये हुए कुछ लकड़हारे उन्हें पहले मिले और बोले— आगे कहाँ जा रहे हो
इधर कोई गाँव नहीं है ॥५६॥
इस सूने जंगल में सिर्फ एक शिवालय है। उस शिवालय के बाहर या भीतर जो ठहरता है
उसे शृङ्गालोत्पादिनी नाम की यक्षिणी पशु बनाकर, सिर में कील उत्सारण करके खा
जाती है ॥५७-५८॥
यह सुनकर भी उसकी परवाह न करनेवाले वे चारों कापालिक साथी निश्चय दत्त से
बोले— आओ जी ! वह बेचारी यक्षिणी हम लोगों का क्या कर सकती है ? हम लोग रात
में बड़े-बड़े श्मशानों में रह चुके हैं ॥५९ ॥