सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

२४ कथासरित्सागर

२४ कथासरित्सागर
बभूव रुद्रशर्माख्यः कश्चन ब्राह्मणः पुरा ।
बभूवतुश्च तस्य द्वे गृहिण्यो गृहमेधिनः ॥३७॥
एका सुतं प्रसूयैव तस्य पञ्चत्वमाययौ ।
तत्सुतोऽपरमातुश्च हस्त शेनापिष्ठोऽभवत् सः ॥३८॥
सा च किञ्चिद्विविदूष्यस्य रूक्षं तस्याशनं ददौ ।
सोऽपि तनाभवद् बालो धूसराङ्गः पृथूदरः ॥३९॥
मातृहीनस्त्वयायं मे कथं शिशुरुपेक्षितः ।
इति तामपरां पत्नीं रुद्रशर्मापि सोऽभ्यधात् ॥४०॥
सेव्यमानोऽपि हि स्नेहैरोगेन किमप्यसौ ।
किं करोम्यहमस्येति साध्यथ पतिमब्रवीत् ॥४१॥
नूनमेवस्वभावोऽयमिति मेने च स द्विजः ।
स्त्रीणामलीकमुग्धं हि वचः को मन्यते मृषा ॥४२॥
बाल एव विमष्टोऽयमिति बालविनष्टकः ।
नाम्ना स बालस्तत्र संवृद्धोऽभूत्पितुर्गृहे ॥४३॥
असावपरमाता मां कदयत्यति सर्वदा ।
वरं प्रतिक्रिया कांश्चिद्यतवेत्तस्या करोम्यहम् ॥४४॥
इति सञ्चिन्तयामास सोऽथ बालविनष्टकः ।
व्यतीतपञ्चषड्वर्षोऽपि वयसा बत बुद्धिमान् ॥४५॥
अथागतं राजकुलाज्जगाद पितरं रहः ।
तात द्वौ मम तातौ स्त इत्यविस्पष्टया गिरा ॥४६॥
एवं प्रत्यहमाह स्म स बालः सोऽपि तत्पिता ।
तां सोपपतिमाशङ्क्य भार्यां स्पर्शेऽप्यवर्जयत् ॥४७॥
सापि दध्यौ विना दोषं कस्मान्मे कुपितः पतिः ।
किञ्चिद् बालविनष्टेन कृतं किञ्चिद् भवेदिति ॥४८॥
सादरं स्नापयित्वा च दत्वा स्निग्धं च भोजनम् ।
कृत्योत्सङ्गे च पप्रच्छ सा तं बालविनष्टकम् ॥४९॥
पुत्र किं रोपितस्तातो रुद्रशर्मा त्वया मयि ।
तच्छ्रुत्वैव स तां बालो जगादापरमातरम् ॥५०॥
अतोऽधिकं ते दास्यामि न चेदद्यापि शाम्यसि ।
स्वपुत्रपोषिणी कस्मान्मां क्लिदनासि सर्वदा ॥५१॥

द्वितीय लम्बक २३१

द्वितीय लम्बक २३१
बाल-विनष्टक की कथा
प्राचीन समय में रुद्रशर्मा नामक एक ब्राह्मण था। उस गृहस्थ की दो स्त्रियाँ थीं।
उनमें से एक पुत्र प्रसव करके मर गई अतः रुद्रशर्मा ने उसके बालक को दूसरी माता के हाथ
सौंप दिया ॥३७-३८॥
जब वह बालक कुछ बड़ा हुआ तब उसकी माता उसे रूखा-सूखा भोजन देने लगी। इसी
कारण वह बालक धूमिल शरीरवाला और बड़े पेट (तोंद) वाला हो गया ॥३९॥
बालक की शारीरिक स्थिति देखकर रुद्रशर्मा ने उस पत्नी से कहा कि 'तूने इस मातृहीन
बच्चे की उपेक्षा की है। उत्तर में उसने पति से कहा कि 'स्नेह से लालन-पालन करने पर भी
यह ऐसा ही रहता है। इसके लिए मैं क्या करूँ? उसके ऐसा कहने पर रुद्रशर्मा ने समझा कि
यह इस बालक की प्रकृति ही है। स्त्रियों के झूठे और मोहकारी वचनों को कौन नहीं मान जाता ?
यह बालक ही विनष्ट है—वह बालक पिता के घर में बढ़ने लगा इसलिए उसका नाम ही
बाल-विनष्टक पड़ गया। एक बार बालक ने सोचा कि यह मेरी माता मेरी दुर्दशा करती है
और अपने पुत्र का भलीभाँति लालन-पालन करती है अतः मैं इसका बदला लूँगा। बाल-
विनष्टक की अवस्था यद्यपि पाँच वर्ष की ही थी किन्तु बहुत बुद्धिमान् था ॥४०—४५॥
एक बार राजगृह से आये हुए अपने पिता को एकान्त में उसने अस्पष्ट स्वर में कहा—
'पिता ! मेरे दो पिता हैं। उसके कहने पर रुद्रशर्मा ने अपनी पत्नी को जारिणीवाला समझकर
उससे स्पर्श करना भी छोड़ दिया। वह भी चिन्ता करने लगी कि 'मेरा पति सहसा कुपित क्यों
है ? अवश्य ही इस बाल-विनष्टक ने कुछ किया होगा' ॥४६—४८॥
एक बार उसने बड़े ही प्रेम से बाल-विनष्टक को स्नान करा और सुन्दर तथा स्निग्ध
आहार खिलाकर, उसे गोद में बैठाकर प्यार के साथ कहा— 'बेटा ! तुमने अपने पिता रुद्रशर्मा
को मुझपर कुपित क्यों करा दिया है ? यह सुनते ही बालक विमाता से कहने लगा। अभी मैं उनमें
भी अधिक युद्ध करूँगा क्योंकि तुम अपने लड़के के ही पालन-पोषण में ध्यान देती हो और मुझे
सदा कष्ट देती हो ॥४९-५१॥

तच्छ्रुत्वा प्रणता सा च क्षमापे शपथोत्तरम् ।
पुनर्नेवं करिष्यामि तत्प्रसादाय मे पतिम् ॥५२॥
ततः स बालोऽवादीत्तां तदार्थातस्य मत्पितुः ।
व्यादर्शं दर्शयत्वेका स्वञ्चेटी वेद्म्यहं परम् ॥५३॥
तथेत्युक्त्वा तया चेटी नियुक्ता रुद्रशर्मणः ।
आगतस्य क्षणात्तस्य दद्यामास दर्पणम् ॥५४॥
तत्र तस्य तत्काल प्रतिबिम्ब स दश्यन् ।
सोऽय द्वितीयस्तातो मे तातेत्याह स्म बालकः ॥५५॥
तच्छ्रुत्वा विगतशङ्कस्तामकारणदूषिताम् ।
पत्नीं प्रति प्रसन्नोऽभूद्रुद्रशर्मा तदैव सः ॥५६॥
एवमुत्पादयेद्दोष बालोऽपिविकृतिं गतः ।
तदय रञ्जनीयो न सम्यक्परिकरोऽखिलः ॥५७॥
इत्युक्त्वा सरुमण्वन्तः सोऽथ यौगन्धरायणः ।
सर्वं सम्मानयामास वत्सराजोत्सवे जनम् ॥५८॥
तथा च राजलोक तौ रञ्जयामासतुर्यथा ।
मदेकप्रवणावेताविति सर्वोऽप्यमन्यत ॥५९॥
तौ चाप्यपूजयद्राजा सचिवो स्वकरापितैः ।
वस्त्राङ्गरागाभरणद्रव्यैरिष्टैश्च सबसत्सकौ ॥६०॥
कृतोद्वाहोत्सवः सोऽथ युक्तो वत्सेश्वरस्तया ।
मनोरथफलान्येव मेने वासवदत्तया ॥६१॥
चिरादुद्गमित स्नेहात्सोऽप्यभूत्सततं तयोः ।
निशान्ताखिलचेष्टच्चक्रवर्त्तीतितुष्टयो रसक्रमः ॥६२॥
यथा यथा च दम्पत्यो प्रौढि परिणयो ययौ ।
तयोस्तथा तथा प्रेम नवीभावमिवाययौ ॥६३॥
गोपालकोऽथ थीवाहकतुं सन्देशतः पितुः ।
प्रययौ शीघ्रमभ्येति वत्सराजेन याचितः ॥६४॥
सोऽपि वत्सेश्वरो जातु चपलः पूर्वसङ्गताम् ।
गुप्तां विरचितां नाम मेनेऽन्तःपुरचारिकाम् ॥६५॥
तद्गोत्रस्खलितो देवी पादलग्न प्रसादयन् ।
ममे सुभगसाम्राज्यमभिषिक्तस्तदश्रुभिः ॥६६॥

द्वितीय लम्बक २३३

द्वितीय लम्बक २३३
उसका यह उत्तर सुनकर ब्राह्मणी सौगन्ध खाकर नम्रतापूर्वक उससे बोली—'अब
मैं ऐसा न करूँगी। तुम मेरे पति को प्रसन्न करा दो। तब वह बालक बोला—'जब मेरे पिता
आयें तब तुम्हारी दासी उसे एक शीशा दिखाये उसके बाद मैं सब कर दूँगा ॥५२-५३॥
उसकी विमाता ने दासी को इसके लिए तैयार किया। फलतः उसने यज्ञशर्मा के आते
ही उसे शीशा दिखलाया ॥५४॥
उसी समय शीशे में अपने पिता के प्रतिबिम्ब को दिखाते हुए बालक ने कहा—'यही
मेरा दूसरा पिता है' ॥५५॥
बालक की बात सुनकर ब्राह्मण शंका-रहित हो गया और निष्कारण दूषित अपनी पत्नी
के प्रति प्रसन्न हो गया ॥५६॥
'इस प्रकार एक बच्चा भी बिगड़कर दोष उत्पन्न कर सकता है'। अतः हम लोगों को इन
सभी बालकों को प्रसन्न रखना चाहिए ॥५७॥
ऐसा कहकर रुमण्वान् के साथ यौगन्धरायण ने वत्सराज के विवाहोत्सव में सम्मिलित
समस्त जनों का सावधानी से ऐसा स्वागत किया कि प्रत्येक व्यक्ति यही समझता कि सारा प्रबन्ध
मेरे ही लिए हो रहा है ॥५८॥
अन्त में राजा ने यौगन्धरायण रुमण्वान् और वसन्तक को स्वयं उत्तमोत्तम वस्त्र
आभूषण इत्र पान और ग्राम दान (जागीर) करके सादर पुरस्कृत किया (इनाम
बाँटे) ॥५९॥
विवाह हो जाने पर वासवदत्ता से युक्त वत्सराज ने इसे अपने मनोरथों का फल
समझा ॥६०॥
चिरकाल की प्रतीक्षा के उपरान्त उमड़ा हुआ उनका प्रेम प्रातःकाल के समय रात-भर
के सन्तप्त चकवा-चकवी के समान सुखद हुआ ॥६१॥
उस दम्पती का प्रेम जैसे-जैसे प्रौढ़ होता गया वैसे-वैसे उसमें नवीनता आती गई ॥६२॥
गोपालक भी विवाहकर्त्ता पिता का सन्देश पाकर वत्सराज से पुनः आने का निश्चय
करके उज्जयिनी चला गया ॥६३॥
चंचल वृत्तिवाला वत्सराज रतिवास की विरचिता नाम की दासी से गुप्त प्रेम करता
था। अतः कभी भ्रम में उसका नाम लेने के कारण कुपित वासवदत्ता के चरणों पर गिरकर उसे
प्रसन्न करता हुआ और उसके आँसुओं से सींचा जाता हुआ अपने को सौभाग्य-साम्राज्य में
अभिषिक्त समझता था ॥६५-६६॥
३

२३४ कथासरित्सागर

२३४ कथासरित्सागर
किं च बन्धुमतीं नाम राजपुत्रीं भुजार्जिताम्।
गोपालकेन प्रहितां कन्यां देव्या उपायनम् ॥६७॥
तया मञ्जुलिकेत्येव नाम्नान्येनैव गोपिताम्।
अपरामिव लावण्यमलङ्घरद्गतां श्रियम् ॥६८॥
वसन्तकसहायः संवृष्टदोषानलसागृहः।
गान्धर्वविधिना गुप्तमुपयेमे स भूपतिः ॥६९॥
तच्च वासवदत्तास्य ददर्श निभृतस्थिता।
प्रचुकोप च रूढया च सा निनाय वसन्तकम् ॥७०॥
तत प्रव्राजिकां तस्याः सखीं पितृकुलागताम्।
स सांकृत्यायनीं१ नाम शरणं शिश्रिये नृपः ॥७१॥
सा तां प्रसाद्य महिषीं तया नैव कृताज्ञया।
ददौ बन्धुमतीं राज्ञे पेशलं हि सतीमनः ॥७२॥
ततस्तं बन्धनाद्देवी सा मुमोच वसन्तकम्।
स चागत्याग्रतो राज्ञीं हसन्निति जगाद ताम् ॥७३॥
बन्धुमत्यापराधः च किं मया देवि तः कृतम्।
डुण्डुभेषु प्रहरथ क्रुद्धः यूयमहीन्प्रति ॥७४॥
एतद्द्वजमुपमानं मे व्याचक्ष्वेति कुतूहलात्।
देव्या पृष्टस्तया सोऽथ पुनराह वसन्तकः ॥७५॥
पुरा कोऽपि रुरुर्नाम मुनिपुत्रो यदृच्छया।
परिभ्रमन्ददर्शैकां कन्यामद्भूतदर्शनाम् ॥७६॥
विद्याधरात्समुत्पन्नां मेनकायां द्युयोषिति।
स्थूलकेशेन मुनिना बर्धितामाश्रमे निजे ॥७७॥
सा च प्रमद्वरा नाम दृष्टा तस्य रुरोर्मनः।
जहार सोऽथ गत्वा तां स्थूलकेशादयाचत ॥७८॥
स्थूलकेशोऽपि तां तस्मै प्रतिशुश्राव कन्यकाम्।
आसन्नः च विवाहः साकस्माद्दष्टवामहिः ॥७९॥
तत्रो विषण्णहृदयः शुश्रावर्मा गिरं दिवि।
एतां क्षीणामुप प्राहान् म्न्यायुषोऽद्धैः जीवय ॥८०॥
१ राजान्तःपुरे राज्ञीनां धर्मोपदेशाय प्रव्राजिकावचेनप्रौढाः, काषायावसनाः, विधवा
स्त्रियः तिष्ठन्तिस्म्यति प्रायो दृश्यते।

द्वितीय लम्बक ११५

द्वितीय लम्बक ११५
इसके अतिरिक्त गोपालक द्वारा वासवदत्ता के लिए उपहार में भेजी हुई बन्धुमती नाम
की राजकुमारी को वत्सराज ने गान्धर्व विधि से विवाहित किया। उसे मंजुक्षिका के नाम से
छिपाकर भेजा गया था। वह लावण्य-समुद्र से निकली हुई लक्ष्मी के समान सुन्दर थी। इस
गुप्त विवाह को वासवदत्ता ने छिपकर देख लिया था। फलतः उस कार्य के प्रधान आयोजक
वसन्तक पर वह अत्यन्त क्रुद्ध हुई और उसे बँधवाकर ले गई॥६७-७० ॥
तब राजा ने वासवदत्ता के पितृकुल से आई हुई सांकृत्यायनी नाम की परिव्राजिका की
शरण ली॥७१॥
राजा ने परिव्राजिका को प्रसन्न करके महारानी को मनाया। परिव्राजिका की आज्ञा
से वासवदत्ता ने बन्धुमती को राजा के लिए दे दिया और वसन्तक को कैद से मुक्त कर दिया।
सती स्त्रियों का हृदय कोमल होता है॥७२॥
बन्धन से छूटने पर विदूषक वसन्तक ने हँसते हुए कहा कि अपराध तो बन्धुमती ने
(विवाह कराकर) किया मैंने क्या किया (जो कैद किया गया) ? विषधर साँपों का
क्रोध बेचारे डेंडहों (पानी के निर्विष साँपों) पर निकालती हो ॥७३-७४॥
उसके यह कहने पर वासवदत्ता ने कौतुक से पूछा—इस उदाहरण को विस्तृत रूप से
समझाओ ॥७५॥
रुरु और प्रमद्वरा की कथा
वसन्तक ने समझाते हुए फिर कहा—प्राचीन समय में रुरुकुमार नाम का एक मुनिकुमार
था। उसने भ्रमण करते हुए एक अद्भुत सुन्दरी कन्या को देखा॥७६॥
वह कन्या किसी विद्याधर द्वारा स्वर्गीय अप्सरा मेनका से उत्पन्न की गई थी और
स्थूलकेशा नाम के ऋषि ने अपने आश्रम में उसका पालन-पोषण किया था॥७७॥
उस रुरुनामक ऋषिकुमार ने उस प्रमद्वरा नाम की कन्या को स्थूलकेशा ऋषि से माँगा
क्योंकि उस कन्या ने उसका मन हर लिया था॥७८॥
स्थूलकेशा ने भी उसे कन्या देना स्वीकार कर लिया था। किन्तु विवाह-समय के निकट
ही उस कन्या को सर्प ने काट लिया था॥७९॥
तब दुःखी ऋषिकुमार ने आकाशवाणी सुनी कि 'तुम अपनी आयुष्य का आधा भाग
देकर इसे जीवि करो अन्यथा इसकी आयु क्षीण हो चुकी है' ॥८० ॥

२३६ कथासरित्सागर

२३६ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा स ददौ तस्य तत्रार्द्धं निजायुषः ।
प्रत्युज्जिजीव सा तेन सोऽपि तां परिणीतवान् ॥८१॥
अथ क्रुद्धो रुरुर्नित्यं यं यं सर्पं ददर्श सः।
तं तं जघान भार्या मे दष्टाऽमीभिर्भवेदिति ॥८२॥
अथैकस्तं जिघांसन्तं मर्त्यवानाह डुण्डुभः ।
अहिंस्यः कुपितो ब्रह्मन्हंसि त्वं डुण्डुभानकथम् ॥८३॥
अहिना ते प्रिया दष्टा विभिन्नो ह्यहिडुण्डुभौ ।
अहयः सविषाः सर्वे निर्विषा डुण्डुभा इति ॥८४॥
तच्छ्रुत्वा प्रत्यवादीत्स सखे को नु भवानिति ।
डुण्डुभोऽप्यवदद्ब्राह्मह शापच्युतो मुनिः ॥८५॥
भवत्संवादपर्यन्तः शापोऽयमभवच्च मे ।
इत्युक्त्वान्तर्हिते तस्मिन्भूयस्तामब्रवीद्गुरुः ॥८६॥
तदेतदुपमानाय तव देवि मयोदितम् ।
डुण्डुभेषु प्रहरथ ऋद्धा यूयमहिष्विति ॥८७॥
एवमभिधाय वचनं सन्नर्माहास वसन्तके विरते ।
वासवदत्ता च प्रति तुतोष पार्श्वे स्थिता पत्युः ॥८८॥
इति मधुमधुराणि वत्सराजश्चरणगतः कुपितानुयापनानि ।
ससतमुदयनश्चकार देव्या विविधवसन्तकोक्तशतानि कामी ॥८९॥
रसना मदिरारसैकसिक्ता कलवीणारवरागिणी श्रुतिश्च ।
दयितामुखनिश्चला च दृष्टिः सुखिनस्तस्य सदा बभूव राज्ञः ॥९०॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बकेऽष्टमस्तरङ्गः
समाप्तश्चायं कथामुखलम्बको द्वितीयः ।

द्वितीय लम्बक २१७

द्वितीय लम्बक २१७
ऐसा सुनकर ऋषिपुत्र ने अपनी आयु का आधा भाग देकर उसे जीवित किया और उसके
साथ विवाह कर लिया ॥८१॥
विवाह के अनन्तर रुह मुनि सर्पों पर इतना क्रुद्ध हुआ कि वह जहाँ भी किसी सर्प को देखता
था उसे मार डालता था—यह समझकर कि इन सर्पों ने मेरी प्रियतमा के प्राणों का हरण
किया ॥८२॥
एक बार अपने को मारते हुए ऋषि को देखकर डुंडुभ (पानी का निर्विष साँप) मनुष्य की
वाणी में बोला कि 'तुम साँपों पर क्रुद्ध हो तो हम डुंडुभों को क्यों मारते हो? तुम्हारी
प्रियतमा को सर्प ने काटा है ॥८३॥
सर्प और डुंडुभ दोनों पृथक् जातियाँ हैं। अहि (सर्प) सदा विषवाले और डंडुभ सदा
विष-हीन होते हैं। यह दोनों में भेद है। तब रुह ने उससे पूछा कि 'तुम कौन हो? उत्तर में
उसने कहा—'मैं शाप के कारण पतित मुनि हूँ। यह शाप तुमसे वार्तालाप करने तक ही था।
ऐसा कहकर उसके अन्तर्धान हो जान पर रुह ने डडुभों को मारना छोड़ दिया ॥८४-८५॥
महारानी ! यही मैंने उपमा के लिए आपसे कहा कि अहियों पर क्रुद्ध आप डुंडुभों को
व्यर्थ मारती हैं॥८७॥
इस प्रकार विनोद-मिश्रित हास्य के साथ कहकर वसन्तक के चले आने पर पति के साथ
बैठी हुई वासवदत्ता उसके प्रति सन्तुष्ट हुई ॥८८॥
इस प्रकार कामी उदयन कुपिता वासवदत्ता के चरणों में मधुर-मधुर याचना (प्रार्थना)
करता हुआ विदूषक वसन्तक के हास्य-कौतकों से रंजित होकर देवी वासवदत्ता के साथ समय
व्यतीत करने लगा ॥८९॥
उस सुखी राजा की रसना सदा मद्य में निरत कान वीणा की मधुर झंकारों में तल्लीन
और दृष्टि सदा वासवदत्ता के मुख पर निश्चल रहती थी ॥९ ॥
महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर का कथामृत
नामक द्वितीय लम्बक समाप्त।

लावानको नाम तृतीयो लम्बकः

लावानको नाम तृतीयो लम्बकः
इव गुणगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना-
त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्।
प्रसङ्ग रसयन्ति यं विगतविघ्नलब्धर्द्धयो
धुरं दधति बन्धुरीं भुवि भवप्रसादेन त ॥
प्रथमस्तरङ्गः
राज्ञ उदयमस्य कथा (पूर्वानुवृत्त)
निर्विघ्नविश्वनिर्माणसिद्धये यदनुग्रहम्।
मय स वव्रे धातापि तस्मै विघ्नजिते नमः॥१॥
आश्लिष्यमाणः प्रियया शत्रूरोऽपि यदाज्ञया।
उत्क्रमते स भुवनं जयत्यसमसायकः॥२॥
एव स राजा वत्सशः क्रमेण सुतरामभूत्।
प्राप्तवासवदत्तत्सुखासक्तैकमानसः ॥३॥
यौगन्धरायणश्चास्य महामन्त्री दिवानिशम्।
सेनापती रुमण्वंश्च राज्यभारमुदूहतुः ॥४॥
स कदाचिच्च चिन्तावानानीय रजनौ गृहम्।
निजगाद रुमण्वन्तं मन्त्री यौगन्धरायणः ॥५॥
पाण्डवान्वयजातोऽयं वत्सराजोऽस्य च मेदिनी।
कुलक्रमागतं कृत्स्ना पुरं च गजसाह्वयम् ॥६॥
तत्सर्वमजिगीषेण त्यक्तमेतेन भूभृता।
इहैव चास्य सञ्जातं राज्यमल्पे मण्डलम्॥७॥
स्त्रीपद्यमृगयासक्तो निश्चिन्तोऽद्यैव तिष्ठति।
अस्मासु राज्यचिन्ता च सर्वानैव समर्पिता ॥८॥
तदस्माभिः स्वबुद्धयैव तथा कार्यं यथैव तत्।
समग्रपृथिवीराज्यं प्राप्नोत्येष क्रमागतम् ॥९॥
एवं कृते हि भक्तिश्च मन्त्रिता च कृता भवेत्।
सर्वं च साध्यते बुद्ध्या तथा चैतां कथां शृणु॥१०॥
१ हस्तिनापुर मित्यर्थः।
२ धीर ललित नायक स्वस्यामिदमतिनिश्चिन्तो मुहुदर्शितं कलापरो वीरकलित स्यात्

तृतीय लावणक लम्बक

तृतीय लावणक लम्बक
प्रथम तरंग
वत्सराज उदयन की कथा (क्रमशः)
ब्रह्मा भी जगत् के निर्माण की निर्विघ्न सिद्धि के लिए जिसका स्मरण करता है उस
विघ्ननाशक गणेश जी को नमस्कार है ॥१॥
प्रिया से निरन्तर लिपटे रहने पर भी शंकर भगवान् त्रिनयन कौतुक हैं उस कामदेव की
जय हो ॥२॥
इस प्रकार वासवदत्ता के साथ सांसारिक सुखों का उपभोग करता हुआ वत्सराज एकमात्र
वासवदत्ता के प्रति तल्लीन हो गया ॥३॥
राजा का प्रधान मंत्री यौगन्धरायण और सेनापति रुमण्वान् दोनों राज्य भर
का भार वहन करते थे (राजकार्य चलाते थे) ॥४॥
एक बार चिन्तित यौगन्धरायण ने रुमण्वान् को रात में अपने घर पर लाकर कहा—
यह उदयन पाण्डव-वंश में उत्पन्न हुआ है, यह सारी पृथ्वी कुलपरम्परा से इसकी ही है और
राजधानी हस्तिनापुर है ॥५-६॥
पर यह अनुरागी उदयन ने वह सब कुछ छोड़ दिया। अब इसका राज्य केवल उस
छोटे से वत्सप्रदेश-मात्र में रह गया है ॥७॥
स्त्री, मद्य और शिकार के व्यसनों में निमग्न यह राजा सब निश्चिन्त रहता है। राज्य
की सारी चिन्ता इसने हमारे ऊपर छोड़ रखी है। इसलिए अब हम लोगों को ही यह प्रयत्न
करना चाहिए जिससे कुल-परम्परा प्राप्त समस्त पृथ्वी का राज्य इसे पुनः प्राप्त हो सके। ऐसा
करने से हम अपनी राज्यभक्ति और बुद्धिमत्ता दोनों को सफल कर सकेंगे। और बुद्धि के द्वारा
सब कुछ सिद्ध हो सकता है। इस प्रसंग में एक कथा सुनो ॥८—१० ॥

२४ कथासरित्सागर

२४ कथासरित्सागर
महासेनगुल्मचतुरवैद्ययोःकथा
आसीत्कश्चिन्महासेन इति नाम्ना पुरा नृपः।
स चान्येनाभियुक्तोऽभूद्भूपेनातिबलीयसा ॥११॥
ततः समस्य सचिवैः स्वकार्यभ्रंशरक्षिभिः।
दापितः स महासेनो दण्डं तस्मै किल द्विषे ॥१२॥
दत्तदण्डश्च राजाऽसौ मानी भृशमतप्यत।
किं मया विहितः क्षत्रो प्रणाम' इति चिन्तयन् ॥१३॥
तेनैव चास्य गुल्मोऽभूत्' शोकेन हृद्यपद्यत।
गुल्माक्रान्तश्च शोकेन स मुमूर्षुरभून्नृपः ॥१४॥
ततस्तदौषधासाध्यं मत्वैको मतिमाग्भिषक्।
मृता ते देव देवीति मिथ्या वक्ति स्म तं नृपम् ॥१५॥
तच्छ्रुत्वा सहसा भूमौ पततस्तस्य भूपतेः।
शोकावेगेन वह्निना स गुल्मः स्वयमस्फुटत् ॥१६॥
रोगोत्तीर्णश्चिरं दब्ध्वा तथैव च सहेप्सितान्।
भोगान्त्स बुभुजे राजा जिगाय च रिपून् पुनः ॥१७॥
तद्यथा स भिषग्बुद्ध्या चक्रे राजहितं तथा।
वयं राजहितं कुर्मः साधयामोऽस्य मेदिनीम् ॥१८॥
परिपन्थी च तत्रैकः प्रद्योतो मगधेश्वरः।
पाष्णिग्राहः स हि सदा पश्चात्कोपं करोति सः ॥१९॥
सतस्य कन्यकारत्नमस्ति पद्मावतीति यत्।
समस्य वत्सराजस्य कृते याचामहे वयम् ॥२०॥
छन्नां वासवदत्तां च स्थापयित्वा स्वबुद्धितः।
दत्वाग्निं वासकं ब्रूमो देवी दग्धति सर्वतः ॥२१॥
नान्यथा तां सुतां राज्ञे ददाति मगधाधिपः।
एतदर्थं स हि मया प्राथितः पूर्वमुक्तवान् ॥२२॥
नाहं वत्सदवरायेतां दास्याम्यात्माधिकां सुताम्।
तस्य वासवदत्तायां स्नेहो हि सुमहानिति ॥२३॥
१ गुल्मरोगाेनाम ग्रन्थि विशेषः स च पंचसु स्थानेषु भवति कन्ठे हृदये उदरे
नाभीचेति। शोकाद्गुल्मो बलेनेत्युच्यते। यथोक्तं माधव निदाने-दुष्टाश्च पात्तं विषयानि चापि
विशेषदत्तं वेगविधिप्रहृष्टः। शोकाभिघातोत्प्रेति मस्रायदश्व विरक्तताचाग्निित गुल्म हेतुरिति। तत्र
शोकाभिघातजो गुल्मोऽत्र राज्ञ उदरे संजातः।

तृतीय लम्बक २४१

तृतीय लम्बक २४१
निपुण वैद्य की कथा
पूर्व समय में महासेन नाम का एक राजा था। वह अत्यन्त बलवान् दूसरे किसी राजा से
पराजित कर दिया गया। उसके मन्त्रियों ने स्वार्थवश अपने स्वामी राजा को शत्रु से दंड
दिला दिया। दंड प्राप्त होने पर वह आत्माभिमानी राजा--'मुझे शत्रु के आगे प्रणाम
करना पड़ा'--इस चिन्ता से अत्यन्त सन्तप्त रहने लगा। इसी शोक के कारण राजा के शरीर
में एक गुल्म उत्पन्न हुआ। उससे आक्रान्त राजा मरणासन्न हो गया। एक वैद्य ने उस फोड़े
को औषधियों से असाध्य समझकर राजा से झूठ कह दिया कि 'महाराज ! आपकी महारानी
मर गई ॥११-१५॥
भीषण संवाद को सुनकर शोक से भूमि पर गिरते हुए राजा का फोड़ा धक्का लगने से
स्वयं फूट गया। फोड़ा फूट जाने से राजा धीरे-धीरे स्वस्थ होकर रानी के साथ सांसारिक भोगों
का उपभोग करता हुआ पूर्व-शत्रु पर विजय प्राप्त कर सका ॥१६-१७॥
उस वैद्य ने अपनी बुद्धि से उस अवसर पर जिस प्रकार राजहित का साधन किया था
उसी प्रकार हमलोग भी करें ॥१८॥
हमारे पृथ्वी-विजय करने में सबसे बड़ा बाधक मगध का राजा प्रद्योत है, जो हमारे पीछे
का राजा है। यदि हम विजय करने चल पड़ें पीछे से वह हमारे मूल राज्य पर ही कब्जा कर
ले ऐसा सम्भव है॥१९॥
उससे हमारा प्रेम भी नहीं है, वह अवश्य क्रोध करके आक्रमण कर देगा। इसलिए उसकी
कन्या पद्मावती है, जो कन्याओं में रत्न है, उसे हम वत्सराज के लिए माँगते हैं ॥२०॥
वासवदत्ता को बुद्धि-बल से कहीं छिपाकर निवास-स्थान में आग लगाकर कह देंगे
कि 'वासवदत्ता जल गई' ॥२१॥
वासवदत्ता के रहते मगधराज अपनी कन्या उदयन को न देगा। मेरे एक बार प्रार्थना
करने पर उसने यही कहा था कि प्राणों से प्यारी कन्या वत्सराज को न दूँगा क्योंकि
वासवदत्ता पर राजा का स्नेह अत्यधिक है॥२२-२३॥
३१

२४२ कथासरित्सागर

२४२ कथासरित्सागर
तस्यां दग्धां च वत्सेशो नवाम्यां परिणेष्यति।
देवी दग्धति जातायां ख्यातौ सर्वस्तु रोत्स्यति ॥२४॥
पद्मावत्यां च रुष्टायां सम्बन्धी मगधाधिपः।
पश्चात्कोपं न कुरुते सहायत्वं च गच्छति ॥२५॥
ततः पूर्वां विदां जतु गच्छामोऽन्यांश्च सत्क्रमात्।
इत्थं वत्सेश्वरस्यैतां साधयामोऽखिलां भुवम् ॥२६॥
कृतोद्योगेषु चास्मासु पृथिवीमेष भूपतिः।
प्राप्नुयादेव पूर्वं हि देव्या यागवमद्रवीत् ॥२७॥
ध्रुवेति मन्त्रिवृषभाद् वचो यौगन्धरायणात्।
साहसं चेतनाशङ्क्यं रुमण्वांस्तमभाषत ॥२८॥
व्याजः पद्मावतीहेतोः क्रियमाणः कदाचन।
दोषायास्माकमेव स्यात्तथा ह्यत्र कथां शृणु ॥२९॥
मूर्खमठाधीशकथा
अस्ति माकन्दिका नाम नगरी जाह्नवीतटे।
तस्यां मौनव्रतः कश्चिदासीत्प्रव्राजकः पुरा ॥३०॥
स च भिक्षाशनोऽनेकपरिव्राट्परिवारितः।
आस्त देवकुलस्यान्तमंठिकायां कृतस्थितिः ॥३१॥
प्रविष्टो जातु भिक्षार्थमेकस्य वणिजो गृहे।
स ददर्श शुभां कन्यां भिक्षामादाय निर्गताम् ॥३२॥
दृष्ट्वा चाद्भुतरूपां तां स कामवशगः शठः।
'हा हा कष्ट' मितिस्माह वणिजस्तस्य शृण्वतः ॥३३॥
गृहीतभिक्षश्च ततो जगाम निलयं निजम्।
ततस्तं स वणिग्गत्वा रहः पप्रच्छ विस्मितः ॥३४॥
किमद्यैवमकस्मात्त्वं मौनं त्यक्त्वोक्तवानिति।
तच्छ्रुत्वा वणिजं तं च परिव्राडेवमब्रवीत् ॥३५॥
दुर्लक्षणेयं कन्या ते विवाहोऽस्या यदा भवेत्।
तदा ससुतदारस्य क्षयः स्यात्तव निश्चितम् ॥३६॥
तदेतां वीक्ष्य दुःखं मे जातं भक्तो हि मे भवान्।
तेनेवमुक्तवानस्मि त्यक्त्वा मौनं भवत्कृते ॥३७॥
तदेषा कन्यका नक्तं मञ्जूषायां निवेशिता।
उपरि न्यस्तदीपायां गङ्गायां क्षिप्यतां त्वया ॥३८॥

तृतीय लम्बक २४३

तृतीय लम्बक २४३
वासवदत्ता के रहते वत्सराज भी दूसरा विवाह न करेगा। उसका अत्यधिक स्नेह है।
'महारानी जल गई' ऐसा घोषित करने पर सब कुछ सिद्ध हो जायगा ॥२४॥
पद्मावती के साथ वत्सराज का विवाह हो जाने पर सम्बन्धी मगध-नरेश पीछे से आक्रमण
न करेगा बल्कि सहायक ही बनेगा ॥२५॥
इसलिए हम पहले पूर्व दिशा की ओर आक्रमण करेंगे और क्रमशः अन्य दिशाओं की ओर
जायंगे इस प्रकार वत्सराज के लिए सारी भूमि को वश में करेंगे ॥२६॥
'हमारे उद्योग करने पर राजा समस्त पृथ्वी का शासक बन सकेगा'—ऐसी आकाशवाणी
भी पहले हो चुकी है' ॥२७॥
मन्त्रिश्रेष्ठ यौगन्धरायण की इस योजना को सुनकर और इसे एक साहस-मात्र
समझकर रुमण्वान् उससे बोला—पद्मावती के लिए किया हुआ बहाना कदाचित् हमारे लिए
प्रतिकूल बैठे ? और कहीं हमी न दोषी ठहराये जायें ? यह सम्भव है। इस सम्बन्ध में एक
कथा सुनो —॥२८ २९॥
धूर्त साधु की कथा
गंगा-तट पर माकन्दिका नाम की एक नगरी है। उस नगरी में मौनव्रत धारण किये हुए
एक परिव्राजक रहता था ॥३०॥
भिक्षाटन द्वारा भोजन करनेवाला वह संन्यासी अनेक संन्यासी चेलों के साथ किसी
दैव-मन्दिर के अन्दर मठिया में रहता था ॥३१॥
एक बार वह भिक्षा माँगते-माँगते किसी वैश्य के घर में गया और उसने वहाँ भिक्षा लेकर
निकली हुई एक सुन्दरी कन्या को देखा। उस अद्भुत सुन्दरी कन्या को देखकर वह दुष्ट
परिव्राजक काम के वशीभूत होकर 'हाय रे ! मर गया !' इस प्रकार बोला जबकि वह वैश्य
(कन्या का पिता) सुन रहा था ॥३२ ३३॥
तदनन्तर भिक्षा लेकर अपने स्थान पर लौट आया। तब वह वैश्य उसके समीप जाकर
प्रणाम व आश्चर्य से पूछने लगा कि हे संन्यासी ! आज तुमने अकस्मात् अपना मौन-व्रत
क्यों भंग किया और चिल्ला उठा। यह सुनकर संन्यासी बोला — तुम्हारी कन्या का लक्षण अशुभ
है। इसका जब विवाह होगा तब तुम्हारा स्त्री पुत्र आदि के साथ अवश्य नाश हो जायगा।
अतः उस कन्या को देखकर मुझे दुःख हुआ क्योंकि तुम मेरे भक्त हो। मैं तुम्हारी हानि नहीं
देख सकता। अतः तुम्हारे लिए ही मैंने मौन का त्याग किया। इसलिए इस कन्या को काठ
के सन्दूक में बन्द करके उसपर दिया जलाकर नदी में बहा दो ॥३४ ३८॥

२४४ कथासरित्सागर

२४४ कथासरित्सागर
तथेति प्रतिपद्यैतद् गत्वा सोऽथ वणिग्भयात्।
नक्तं चक्रे तथा सर्व निर्विमर्शा हि भीरवः ॥३९॥
प्रव्राजकोऽपि तत्कालमुवाचानुचराद्विजान्।
गङ्गां गच्छत तन्मान्तर्वहन्ती यां च पश्यथ ॥४०॥
पृष्टोर्ध्वदीपां मञ्जूषां गुप्तमानयतह ताम्।
उद्घाटनीया न च सा धृतज्येष्ठार्चनाविति ॥४१॥
तथेति चागता यावद् गङ्गां न प्राप्नुवन्ति च।
राजपुत्र किमप्येकस्तावत्तस्यामवातरत् ॥४२॥
सोऽत्र तां वणिजा क्षिप्तां मञ्जूषां वीक्ष्य दीपतं ।
भृत्यैरानाय्य सहसा कौतुकादुदघाटयत् ॥४३॥
ददर्श चान्तःकन्यां तां हृद्योन्मादकारिणीम्।
उपयेमे च गान्धर्वविधिना तां च सत्क्षणम् ॥४४॥
मञ्जूषां तां च गङ्गायां तथैवोर्ध्वस्पदीपिकाम्।
कृत्वा तस्याञ्च निक्षिप्य, घोरं वानरमन्तरे ॥४५॥
गवेष्य तस्मिन्सम्प्राप्तकन्यारत्ने नृपात्मजे।
आययुस्तस्य चिन्वन्त शिष्याः प्रव्राजकस्य ते ॥४६॥
ददृशुस्तां च मञ्जूषां गृहीत्वा तस्य चान्तिकम्।
निन्यु प्रव्राजकस्यैनां सोऽथ हृष्टो जगाद तान् ॥४७॥
एकोऽह साधय मन्त्रमादामैतामिहोपरि।
अधस्तूष्णीं च युष्माभि स्थातव्यमिमां निशाम् ॥४८॥
इत्युक्त्वा तां स मञ्जूषामारोप्य मठिकोपरि।
स परिव्राट् विवृतवान् वणिक्कन्याभिकामुक ॥४९॥
सत्तश्च तस्या निर्गत्य वानरो भीषणाकृतिः।
तमभ्यधावत् स्वकृतो मूर्त्तिमानिव दुर्नयः ॥५०॥
स तस्य दशनैर्नासां नखैः कर्णौ च तत्क्षणम्।
चिच्छेद पापस्य कपिर्निग्रहज्ञ इव क्रुधा ॥५१॥
तथाभूतोऽथ स तत परिव्राडवतीर्णवान्।
यत्नस्तम्भितहासाश्च शिष्यास्तं ददृशुस्तदा ॥५२॥
प्रातर्बुद्ध्वा च तत्सर्वं जहाम सकलो जनः।
ननन्द स वणिक सा च तत्सुता प्राप्सत्पति ॥५३॥
१ प्राप्ता स्पृष्टदीपिका येति बहुव्रीहिः।

तृतीय लम्बक २४५

तृतीय लम्बक २४५
वह बनिया उसी प्रकार स्वीकार करके घर गया और भय के कारण रात में उसने उसी
प्रकार किया—अर्थात् कन्या को सन्दूक में बन्द करके नदी में बहा दिया क्योंकि भीरु (डरपोक)
लोग विवेकहीन होते हैं॥३९॥
संन्यासी ने भी मठ में रहनेवाले अपने चेलों से कहा कि जाओ नदी में देखो। यदि पीठ
पर जलते हुए दीयेवाले बहते हुए सन्दूक को देखना तो उसे चुपचाप मेरे पास लाओ। यदि उसके
अन्दर से आवाज भी आती हो तो उसे खोलना मत॥४०-४१॥
जब साधु के चेले गंगा-तट पर पहुंचे तब उससे पहले ही कोई राजपुत्र गंगा
तट पर उतरा और उसने उस बनिये के द्वारा दीप जलाकर गंगा में बहाई हुई पेटी को
देखा तथा अपने नौकरों से पेटी को मँगाकर खोला तो उसमें हृदय को उन्मत्त कर देनेवाली
सुन्दरी कन्या को देखा। राजकुमार ने उस सुन्दरी को निकालकर वहीं उसके साथ तुरन्त
गन्धर्व-विवाह कर लिया और पेटी में एक भयानक बन्दर को बन्द करके उसी प्रकार दीप-सहित
पेटी को नदी में छोड़ दिया॥४३-४५॥
उस कन्यारत्न को लेकर राजकुमार के चले जाने पर उसी पेटी को खोजते हुए
संन्यासी चेलों ने उस पेटी को देखा और उसे निकालकर गुरु के पास ले गये तथा प्रसन्न मुद्रा में गुरु
ने उनसे कहा—अकेला ही इस पेटी पर बैठकर मन्त्र सिद्ध करता हूँ और तुमलोग नीचे जाकर
रातभर चुपचाप सो जाओ ॥४६-४८॥
ऐसा कहकर उस संन्यासी ने सुन्दरी वैश्य-कन्या की प्राप्ति की उत्कंठा से एकान्त में
उस पेटी को खोला। उसे खोलते ही संन्यासी की दुर्नीति के मूर्तिमान स्वरूप के समान एक
भीषण बन्दर उससे निकलकर उछला॥४९-५०॥
बन्दर ने निकलते ही दांतों से संन्यासी की नाक और नखों से उसके कान काट लिये।
मानों बानर संन्यासी की दुष्टता का दंड देने के लिए ही आया हो। तदनन्तर वह संन्यासी उसी
रूप में नीचे उतरा। उसे उस रूप में देखकर उसके शिष्यों ने बड़ी ही कठिनाई से हंसी
को रोका॥५१-५२॥
प्रातःकाल यह समाचार जानकर वह बनिया तथा अन्य सभी लोग खूब हँसत रहे।
वह वैश्यकन्या एक राजकुमार को सुन्दर पति के रूप में प्राप्त कर आनन्द करने
लगी॥५३॥

२४६ कथासरित्सागर

२४६ कथासरित्सागर
एवं यथा स हास्यत्वं गतः प्रव्राजकस्तथा ।
व्याजप्रयोगम्यसिद्धौ वयं गच्छेम जातुचित् ॥५४॥
बहुदोषो हि विरहो राज्ञो वासवदत्तया ।
एवं रुमण्वतोक्त सन्नाह यौगन्धरायणम् ॥५५॥
नान्यथोद्योगसिद्धिः स्यादनुद्योगे च निश्चितम् ।
राजनि व्यसनिन्येतत्क्षयेदपि यथास्थितम् ॥५६॥
लब्धापि मन्त्रिताख्यातिरस्माकं चान्यथा भवेत् ।
स्वामिसम्भावनायाश्च भवेम व्यभिचारिणः ॥५७॥
स्वायत्तसिद्धे¹ राज्ञो हि प्रज्ञोपकरणं मताः ।
सचिवाः परे भवत्सर्वे कृते वाऽप्यभवत्कृते ॥५८॥
सचिवायत्तसिद्धस्तु तत्प्रभावसाधनम् ।
त एव चन्निहत्साहाः श्रियो दत्तो जलाञ्जलिः ॥५९॥
अथ देवी पितुश्चण्डमहासनाद् विवक्त्सुसे ।
स सुपुत्रश्च देवी च वचः कुरुत एव मे ॥६०॥
इत्युक्तवन्तं धीराणां धुर्यं यौगन्धरायणम् ।
प्रमादशङ्किहृदयो रुमण्वानपुनरब्रवीत् ॥६१॥
अभीष्टस्त्रीवियोगार्त्या सविवेकोऽपि बाध्यते ।
किं पुनर्वत्सराजोऽयमात्र चैतां कथां शृणु ॥६२॥
पुराभूद्देवसेनाख्यो राजा मतिमतो वरः ।
श्रावस्तीति पुरी तस्य राजधानी बभूव च ॥६३॥
तस्यां च पुर्यामभवद् वणिगेशो महाधनः ।
तस्योदपद्यतानन्यसदृशी दुहिता किल ॥६४॥
उन्मादिनीति नाम्ना च मन्यथा सापि पप्रथे ।
उन्माद्यति गतस्तन्म्या रूपं दृष्ट्वाऽखिलो जनः ॥६५॥
मतयय्मनाबञ्च राने वेषा क्वचिन्न मः ।
रा हि कुप्येद्गिति पिता तस्या सोऽर्थयत्प्रयद् वणिक ॥६६॥
ततश्च गत्वा राजान दन्तस्तन व्यजिापन् ।
देवास्ति कन्यारत्न मे गृह्यतामुपयोगि यत् ॥६७॥
१ त्रिविधा हि राजानः— १ स्वायत्तसिद्धिः, २ सचिवायत्तसिद्धि उभयायत्तसिद्धि श्चेति। तत्रायमुद्यमः सचिवायत्तसिद्धिः।

तृतीय लम्बक २४७

तृतीय लम्बक २४७
इसी प्रकार इस क्रूर प्रयोग की असफलता होने पर कहीं हम भी हँसी के पात्र
न बनें। राजा के लिए वासवदत्ता का वियोग अत्यन्त असह्य है, इस कारण और कुछ अनर्थ
भी सम्भव है। राजा के रहते हुए जो भी है उससे भी हाथ धोना पड़ेगा। रुमण्वान् के इस
प्रकार कहने पर यौगन्धरायण ने कहा—'बिना उद्योग के सिद्धि नहीं प्राप्त होगी। यदि उद्योग
न किया जायगा तो उस व्यसनी राजा का जो शेष राज्य है, वह भी न रह जायगा' ॥५४-५७॥
जिन राजाओं की सफलता मन्त्रियों के अधीन होती है, उनके लिए मन्त्रियों की बुद्धि ही
कार्य-साधन करती है, इसलिए राजा का उपकार न करने के कारण हम दोषी होंगे। स्वायत्त-सिद्धि
राजाओं के कर्त्तव्य या अकर्त्तव्य के लिए उनकी निजी बुद्धि ही साधन होती है। उनके लिए
कुछ करने या न करने में मन्त्रियों का उत्तरदायित्व नहीं होता। सचिवायत्त सिद्धिवाले
राजा यदि निरुत्साह और निष्द्योग रहेंगे तो राजलक्ष्मी को तिलांजलि देनी होगी। यदि
तुम महारानी के पिता चंडमहासेन से शंका करते हो तो व्यर्थ है। वह राजा और उसका
पुत्र गोपालक मेरी बात मानते ही हैं, ॥५८-६१॥
धीर-धुरन्धर यौगन्धरायण के ऐसा कहने पर प्रमाद से शंकित चित्तवाला रुमण्वान् फिर
बोला—बड़े-बड़े विवेकी पुरुष भी अति प्रिय स्त्री के वियोग से पीड़ित होते हैं, फिर वत्सराज की
तो बात ही क्या? इस प्रसंग में यह कथा सुनो—॥६१ ६२॥
राजा देवसेन और उन्मादिनी की कथा
पूर्व समय में देवसेन नाम का बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा था। श्रावस्ती नाम की नगरी उसकी
राजधानी थी। उस नगरी में एक अत्यन्त धनी बनिया था। उसकी एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या थी।
वह कन्या उन्मादिनी के नाम से प्रसिद्ध हुई क्योंकि उसे देखकर, देखनेवाले उन्मत्त
हो जाते थे ॥६४-६५॥
वैश्य ने सोचा कि राजा को सूचना दिये बिना इस कन्या को कहीं न दूँगा नहीं तो
राजा कुपित होगा ॥६६॥
तब उसने राजा देवसेन के पास जाकर निवेदन किया कि राजन् मेरे यहाँ एक
कन्यारत्न है। यदि आपके उपयोगी हो तो आप उसे ग्रहण करें ॥६७॥

२४८ कथासरित्सागर

२४८ कथासरित्सागर
सच्छल्या व्यसृजद्राजा सोऽथ प्रत्ययितान् द्विजान्।
गत्वा सुलक्षणा सा वा न वेत्यालोच्यतामिति ॥६८॥
तथेति ते द्विजा गत्वा तां दृष्ट्वैव वणिक्सुताम्।
उन्मादिनीं ययुः क्षोभं सद्यः सञ्जातमन्मथाः ॥६९॥
राजास्यां परिणीतायामवश्यमनास्त्यजेत्।
राजकार्याणि नश्येच्च सर्वं तस्मात्किमेतया ॥७०॥
इति च प्रकृतिं प्राप्ता द्विजा सम्मन्त्र्य ते गताः।
कुलक्षणा सा कस्येति मिथ्या राजानमब्रुवन् ॥७१॥
ततो राज्ञा परित्यक्तां स सोन्मादिनीं वणिक्।
तत्सेनापत्ये प्रादादन्तर्जात्यभिमानिनाम् ॥७२॥
भर्तुःवेश्मनि हर्म्यस्था साथ जातु समागतम्।
राजानं येन मार्गेण बुद्ध्वात्मानमदर्शयत् ॥७३॥
दृष्ट्वैव च स तां राजा जगत्सम्मोहनौषधिम्।
प्रयुक्तामिव कामेन जातोन्माद इवाभवत् ॥७४॥
गत्वा स्वभवनं ज्ञात्वा तां च पूर्वावधीरिताम्।
उन्मना ज्वरसन्तापपीडां गाढमवाप सः ॥७५॥
सा दासी न परस्त्री' ति गृह्यतां यदि वाप्यहम्।
त्यजामि तां देवकुले स्वीकरोतु ततः प्रभुः ॥७६॥
इति तेन च तद्भर्त्रा स्वसेनापतिना ततः।
अभ्यर्थ्यमानो यत्नेन जगादैव स भूपतिः ॥७७॥
माहुः परस्त्रीभावास्ये त्वं वा त्यक्ष्यसि तां यदि।
ततो नङ्क्ष्यति ते धर्मो दण्ड्यो मे च भविष्यसि ॥७८॥
सन्द्रुध्या मन्त्रिणोऽन्यं च तूष्णीमासन्स च क्रमात्।
स्मरज्वरेण तेनैव नृपः पञ्चत्वमाययौ ॥७९॥
एव स राजा नष्टोऽभूद्धीरोऽप्युन्मादिनीं विना।
विना वासवदत्तां तु वत्सराजः कथं भवेत् ॥८०॥
१. अत्र प्राचीन भारते प्रचलिताया देवदासित्व प्रथाया आभास उपलभ्यते साम्प्रतमपि
दक्षिणदेशे उत्कलेऽपि सैषा प्रथा दृश्यते।

तृतीय लम्बक २४९

तृतीय लम्बक २४९
यह सुनकर राजा ने विश्वस्त ब्राह्मणों को कन्या को देखने के लिए भेजा कि जाकर
देखो कि कन्या सुलक्षणा और विवाह के योग्य है या नहीं। ब्राह्मणों ने वहाँ जाकर जैसे ही
उन्मादिनी को देखा वैसे ही वे स्वयं उस पर आसक्त होकर लुब्ध हो गये। उन्होंने
सोचा कि इसे पाकर राजा इसपर आसक्त होकर राज्य-कार्य करना भी छोड़ देगा। अतः
इससे क्या लाभ ? ॥६८-७०॥
सावधानतापूर्वक ऐसा सोचकर ब्राह्मणों ने राजा से झूठ कह दिया कि 'महाराज! कन्या
कुलक्षणा है' ॥७१॥
इस प्रकार राजा ने उसे छोड़ दिया। इस कारण वणिक् ने अपमान से कुपिता
कन्या का राजा के सेनापति से विवाह कर दिया ॥७२॥
एक बार अपने घर में बैठी हुई उस कन्या ने ऊपर से जाते हुए राजा को जानकर
खिड़की से अपने रूप को दिखा दिया ॥७३॥
राजा विश्व-वशीकरण औषधि के समान उस सुन्दरी को देखकर कामवश से पागल-सा
हो गया ॥७४॥
अपने घर जाकर और पहले स्वयं छोड़ी हुई उस वैश्य-कन्या का पता पाकर व्याकुल
राजा गहरे कामज्वर से पीड़ित हो गया ॥७५॥
इस वृत्तान्त को जानकर सेनापति ने राजा से कहा कि 'वह आपकी दासी है
परस्त्री नहीं है। अतः आप उसे स्वीकार करें। मैं उसे देवमन्दिर में छोड़ देता हूँ। आप
उसे वहीं से ग्रहण कर लें।' ॥७६॥
सेनापति के द्वारा इस प्रकार दण्डवत्पूर्वक प्रार्थित राजा बोला—'यदि तू उसे त्याग देगा
तो भी मैं परस्त्री को ग्रहण न करूँगा। यदि तू ऐसा करेगा तो तेरा धर्म नष्ट होगा और
मैं तुझे स्त्री-परित्याग करने के कारण दण्ड भी दूँगा।' ऐसा सुनकर सभी मंत्री घर गये और
राजा कामवेदना से मर गया ॥७७-७९ ॥
वह राजा धैर्यवान् और विवेकी होने पर भी जिस प्रकार उन्मादिनी के बिना मर गया
उसी प्रकार कामवेदना के बिना उदयन की क्या स्थिति होगी ? ॥८० ॥
१ प्राचीन काल में मन्दिरों को देवदासी भेंट करने की प्रथा थी। विशेष रूप से कन्याओं
को भेंट किया जाता था। कहा जाता है कि गीतगोविन्द के कर्त्ता जयदेव की भार्या पद्मावती भी
इसी प्रकार देवताओं को भेंट की गई कन्या थी। दक्षिण के संडोवा मन्दिर में, उड़ीसा के जगन्नाथ
के मन्दिर में, गुजरात के बहुचरा तथा कालिका के मन्दिर में अभी कुछ दिन पहले तक यह प्रथा
थी। दक्षिण भारत में मात्र मठनायकों को भी कन्याएँ भेंट की जाती थीं, किन्तु यह प्रथा अनर्थकारी
होने से अब प्रायः समाप्त सी हो रही है।
३२