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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

५७६ कथासरित्सागर

५७६ कथासरित्सागर

तत्र बद्धः स्थितो रात्रौ शशयानः स्वजीवित।
स शक्तिदेवो देवीं तां चण्डीमेवं व्यजिज्ञपत् ॥१४५॥
'बालार्कबिम्बनिभया भगवति मूर्त्या त्वया परित्रातम्।
निर्भरपीतप्रविसृतरुग्दानवकण्ठरुधिरयेव जगत् ॥१४६॥
सं मां सततप्रणतं निष्कारणविधुरवर्गहस्तगतम्।
रक्षस्व सुदूरागतमिष्टजनप्राप्तितृष्णया वरदे ! ॥१४७॥
इति देवीं स विज्ञप्य प्राप्य निद्रां कथञ्चन।
अपश्यद्योषितं स्वप्ने तद्गर्भगृहनिर्गताम् ॥१४८॥
सा दिव्याकृतिरभ्येत्य सद्येव जगाद तम्।
भो शक्तिदेव ! मा भैषीर्न तेऽनिष्टं भविष्यति ॥१४९॥
अस्येषां दासपुत्राणां नाम्ना विन्दुमती । स्वसा।
सा प्रातर्वीक्ष्य कन्या त्वां भर्तृत्वेऽभ्यर्थयिष्यति ॥१५०॥
तच्च त्वं प्रतिपद्येथाः सैव त्वां मोचयिष्यति।
न चा सा धीवरी सा हि दिव्या स्त्री शापतःच्युता ॥१५१॥
एतच्छ्रुत्वा प्रबुद्धस्य तस्य नेत्रामृतच्छटा।
प्रभाते दाशकन्या सा तद्देवीगृहमाययौ ॥१५२॥
जगादे चैनमभ्येत्य निर्वेदात्साममुत्सुका।
इतोऽहं मोचयामि त्वां तत्कुरुष्वेप्सितं मम ॥१५३॥
भ्रातॄणां सम्मता ह्येते प्रत्याख्याता वरा मया।
त्वयि दृष्टे तु मे प्रीतिः सञ्जाता तद्द्‌भजस्व माम् ॥१५४॥
इत्युक्तः स तया बिन्दुमत्या दाशेन्द्रकन्यया।
शक्तिदेवः स्मरन् स्वप्नं हृष्टस्तत्तथ्यपद्यत ॥१५५॥
तयैव मोचितस्तां च सुमुखीं परिणीतवान्।
स्वप्नलब्धाम्बिकादेवीऋतुभिर्विहितेप्सिताम् ॥१५६॥
तस्थौ च सुखसिद्धयेव तत्र पुष्यकरुम्भया।
रूपान्तरोपागतया स तया सह दिव्यया ॥१५७॥
एकदा हर्म्यपृष्ठस्थो धृतगोमांसभारकम्।
मार्गगतं स चण्डालं दृष्ट्वा तामब्रवीत् प्रियाम् ॥१५८॥
वन्द्यास्त्रिजगतोऽप्येता याः कृशोदरि धेनवः।
तासां पिशितमश्नाति पश्यायं पापकृत्कथम् ॥१५९॥

वहाँ बाँधकर रखा गया शक्तिदेव अपने जीवन में संशय करता हुए चण्डिका की स्तुति
करने लगा—॥१४५॥
'हे भगवति भरपेट पिये हुए दैत्य के रुधिर समानों उदय होते हुए सूर्य-बिम्ब के समान
वर्णवाली (अपनी) मूर्ति से तुमने संसार की रक्षा की है। इसलिए निरन्तर प्रणाम करते हुए, बिना
कारण ही पामरों के हाथों में पड़े हुए और प्रेमी जनों की प्राप्ति के लिए दूर देश से आये हुए मेरी
रक्षा करो'॥१४६ १४७॥
शक्तिदेव इस प्रकार देवी की स्तुति करके सो गया। उसने स्वप्न में देखा कि उस मन्दिर
के गर्भगृह से एक दिव्य स्त्री निकली और उस पर मानों दया करती हुई कहने लगी—
'हे शक्तिदेव तेरा अनिष्ट नहीं होगा ॥१४८ १४९॥
इन धीवर-पुत्रों की बिन्दुमती नाम की बहिन है। वह अभी कुमारी है। प्रातःकाल तुझ
देखकर अपना पति बनाने के लिए तुमसे प्रार्थना करेगी॥१५० ॥
तुम उसे स्वीकार कर लेना वही तुम्हें छुड़वा देगी। वह निषाद-जाति की कन्या नहीं है
प्रत्युत शाप के प्रभाव से पतित दिव्य-स्त्री है"॥१५१॥
यह सुनकर शक्तिदेव के जागने पर प्रातःकाल ही आँखों में अमृत वर्षा करनेवाली
धीवर कन्या उस देवी-मन्दिर में आई॥१५२॥
वह धीवर-कन्या शक्तिदेव के समीप आकर और अपना परिचय देकर उत्सुकता के साथ
कहने लगी—'मैं तुम्हें छोड़वा दूँगी पर प्रतिज्ञा करो कि तुम मेरी इच्छा पूरी करोगे।
मेरे विवाह के लिए मेरे भाइयों द्वारा सम्मत और लाये गये सभी वरों को मैंने अस्वीकृत
कर दिया है किन्तु तुम्हे देखकर मुझे तुम पर प्रेम हो गया है इसलिए मुझे स्वीकार
करो ॥१५३ १५४॥
धीवर-राज की कन्या बिन्दुमती के इस प्रकार कहने पर अपने स्वप्न को स्मरण करते
हुए शक्तिदेव ने उसके प्रस्ताव को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया। और, इसी प्रतिज्ञा पर
छुड़ाये गये उसने बिन्दुमती से विवाह भी कर लिया क्योंकि स्वप्न में चंडिका का आदेश
पाकर उसके भाई बहिन की इच्छा से सम्मत हो गये थे॥१५५ १५६॥
पुण्य से प्राप्त की हुई सिद्धि के समान दूसरा रूप धारण की हुई उस दिव्य रमणी बिन्दु
मती के साथ वह वहीं रहने लगा। एक बार भवन की छत पर उमा के साथ बैठे हुए शक्तिदेव ने
सिर पर गोमांस का बोझ उठाये हुए और मार्ग पर चलते हुए एक चांडाल को देखकर
अपनी पत्नी से पूछा—॥१५७-१५८॥
हे कृशोदरि, जो गाय तीनों लोकों के लिए वन्दनीय है उसका मांस यह पापी कैसे
खाता है ? ॥१५९॥
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