कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
प्रथम लम्बक २९
प्रथम लम्बक २९
दूसरे दिन उस बालक के सोकर उठने पर, उसके सिरहाने में सुवर्ण पाकर मम्मट की
पतिव्रता पुत्रियाँ अपने व्रत को सफल समझकर अत्यन्त आनन्दित हो उठीं ॥२३॥
इस प्रकार प्रतिदिन एकत्र होते हुए सोने से खजाना बढ़ जाने पर धीरे-धीरे पुत्रक राजा
बन गया। सच है 'सिद्धियाँ तप के अधीन होती हैं' ॥२४॥
एक बार एकान्त में यज्ञदत्त ने पुत्रक से कहा—'हे राजन् ! तुम्हारे पितर दुर्भिक्ष के
कारण यहाँ से कहीं चले गये हैं। इसलिए तुम ब्राह्मणों को सदा दान दिया करो। वे भी तुम्हारी
उदारता सुनकर आ जायेंगे। मैं इस विषय में ब्रह्मदत्त राजा की एक कथा सुनाता हूँ,
सुनो' ॥२५ २६॥
राजा ब्रह्मदत्त की कथा
प्राचीन समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त नाम का राजा था। उसने एक बार रात्रि के
समय आकाश में उड़ते हुए हंसों की जोड़ी को देखा जिसके चारों ओर बिजली के समान
चमकती हुई, सोने के पंखों की प्रभा छिटक रही थी। उसके चारों ओर श्वेत हंस ऐसे उड़ रहे
थे जैसे आकाश में ही श्वेत मेघ-खण्डों से व्याप्त विद्युत्पुंज हों ॥२७-२८॥
उस हंस-युगल को देखने की राजा की लालसा ऐसी तीव्र हुई कि वह राज्य के सुखों से
भी विरक्त रहने लगा ॥२९॥
तब राजा ने मन्त्रियों के साथ सम्मति करके एक सुन्दर सरोवर बनवाया और अपने
राज्य में समस्त प्राणियों को अभयदान दिया ॥३०॥
कुछ समय के पश्चात् वे हंस पुनः उस सरोवर पर आये और उनके विश्वस्त होने पर
राजा ने उनके स्वर्ण के शरीर होने का कारण पूछा ॥३१॥
तब वे हंस स्पष्ट वाणी में राजा से बोले—'हे राजन् ! पहले जन्म में हम कौए थे ॥३२॥
बलि (भोजन) के लिए लड़ते हुए हम दोनों एक शून्य और पवित्र शिवालय में गये और
वहाँ जाकर जल की टंकी में गिरे और मर गये ॥३३॥
इसी कारण इस जन्म में हमलोग सुवर्णमय हंस हुए। राजा इस प्रकार सुनकर और
जी भरकर उन्हें देखकर प्रसन्न हुआ ॥३४॥
अतः तुम भी असाधारण रूप से दान करते हुए अपने पितरों को प्राप्त करोगे। ऐसा
सुनकर पुत्रक ने असाधारण रूप से दान करके ख्याति प्राप्त की ॥३५॥
इस प्रकार पुत्रक के दान की ख्याति सुनकर वे ब्राह्मण यहाँ आये और पहचाने जाने पर
अतुल सम्पत्ति और अपनी पत्नियों को प्राप्त कर सुखी हुए ॥३६॥
यह आश्चर्य है कि मदिरा से अन्ध बुद्धिवाले दुष्ट जातियों का ज्ञान और नष्ट होते
देखकर भी अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते ॥३७॥