कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
५९९ कथासरित्सागर
५९९ कथासरित्सागर
प्राप्तायां च चतुर्दश्यां सा तं चन्द्रप्रभाब्रवीत्।
अद्य गच्छामि विज्ञाप्य तातस्याहं भवत्कृतम् ॥७०॥
सर्वं परिजनश्चायं मयैव सह यास्यति।
त्वया त्वकाकिना दुःखं न भाव्यं दिवसद्वयम् ॥७१॥
एकेन पुनरतस्मिन्मन्दिरेऽप्यवतिष्ठता।
मध्यमा भवता भूमिर्नारोढव्या कथञ्चन ॥७२॥
इत्युक्त्वा सा युवानं स यस्तस्थिता तदन्तिके।
तदीयचित्तानुगता ययौ चन्द्रप्रभा ततः ॥७३॥
सोऽप्येकाकी ततस्तत्र स्थितश्चन्ता विनोदयन्।
स्थानस्थानञ्च बभ्राम शक्तिदेवा महर्द्धिषु ॥७४॥
किंसविदद्य निषिद्धं मे तया पृष्ठेऽधिरोहणम्।
विद्याधरदुहित्रेति जातकौतूहलोऽथ सः ॥७५॥
तस्यैव मध्यमां भूमिं मन्दिरस्यारुगेह् ताम्।
प्रायो वारितवामा हि प्रवृत्तिर्मनसो नृणाम् ॥७६॥
आरूढस्तत्र चापश्यद् गुप्तान् स्त्रीन् रत्नमण्डपान्।
एकं चोद्घाटितद्वारं तन्मध्यात् प्रविवेश सः ॥७७॥
प्रविश्य चान्तः सद्रत्नपर्यङ्के न्यस्ततूलिके।
पटावगुण्ठिततनुं शयानं कञ्चिदक्षत ॥७८॥
वीक्षते यावदुत्क्षिप्य पटं सार्थमृतां तथा।
परोपकारिनृपतस्तनयां वरनयकाम् ॥७९॥
दृष्ट्वा चाचिन्तयत्तत्सोऽप्यं किमिदं महदद्भुतम्।
किमप्रयोधमुप्तेयं किं वा भ्रान्तिरथाथवा ॥८०॥
यस्याः कृते प्रवासोऽयं मम सर्वेह तिष्ठति।
ममाद्यपगतप्राणा तत्र देशे च जीवति ॥८१॥
अम्लानकान्तिरस्याश्च तद् विद्याया मम ध्रुवम्।
कमापि चारुनटमिन्द्रजालं वितन्यते ॥८२॥
इति सञ्चिन्त्य विगत्य तावन्यौ मण्डपौ क्रमात्।
प्रविश्यान्तं च ददर्श तदृकन्ये च कस्यके ॥८३॥
ततोऽपि निर्गतस्तस्य साश्चर्यो मन्दिरस्य सः।
उपविष्टः स्थितोऽपश्यद् वापीमभ्यस्तमामयम् ॥८४॥
कुछ समय पश्चात् चतुर्दशी के आने पर चन्द्रप्रभा शक्तिदेव से कहने लगी—'आज मैं
तुम्हारे लिए पिता से निवेदन करने जाती हूँ, मेरे सभी सेवक मेरे साथ ही जायेंगे। इन दो
दिनों तक तुम अकेले दुःखी न होना ॥७०-७१॥
इस भवन में अकेले रहते हुए भी तुम बीच की मञ्जिल में कभी न जाना' ॥७२॥
उस युवक को ऐसा कहकर और उसी में अपने हृदय को रखकर तथा इसी प्रकार
उसके हृदय को चन्द्रप्रभा अपने साथ लेकर वहाँ से चली गई ॥७३॥
वह शक्तिदेव अब वहाँ अकेला रहता हुआ मन बहलाने के लिए, इधर-उधर अत्यन्त
समृद्धि-सम्पन्न उन मकानों में घूमता रहता था ॥७४॥
'उस विद्याधर-कन्या ने मेरा ऊपर (बीच की मञ्जिल में) जाना क्यो वारित किया' इस
प्रकार के कुतूहल से वह उसी मञ्जिल में पहुँचा। मनुष्यों के मन की प्रवृत्ति प्रायः निषेध के विपरीत
ही चलती है ॥७५॥
ऊपर चढ़कर उसने मूर्त रूप से सुरचित तीन मंडपों को देखा ॥७६॥
उसमें प्रविष्ट होकर उसने सुन्दर बिछावनों से युक्त रत्नों के पलंग पर दुपट्टा ओढ़ने से
ढंके हुए शरीर से शयन करते हुए किसी व्यक्ति को देखा ॥७७-७८॥
जब उसने कपड़ा उठाकर उसे देखा तब तो उसे परोपकारी राजा की मरी हुई कन्या
कनक-रेखा दिखाई पड़ी ॥७९॥
उसे देखकर शक्तिदेव सोचने लगा—'यह क्या महान् आश्चर्य है? क्या यह अचेतनावस्था
(बेहोशी) में सोई है या मुझ ही भ्रम हो रहा है ॥८०॥
जिसके लिए मेरी इतनी लम्बी और कष्टप्रद यात्रा हुई वह निर्जीव होकर यहाँ पड़ी है
और वहाँ (वर्धमान में) जीवित है ॥८१॥
इसकी मुखकान्ति भी मलिन नहीं पड़ी है। प्रतीत होता है कि विधाता ने किसी कारण
वश मेरे लिए असमय ही यह इन्द्रजाल रचा है ॥८२॥
ऐसा सोचते-सोचते उसने दूसरे दोनों मंडपों के अन्दर क्रमशः जाकर उसी प्रकार सोई
हुई और दो कन्याएँ देखीं ॥८३॥
उन मंडपों से निकलकर आश्चर्यचकित शक्तिदेव ने ऊपर बैठ हुए वहीं से नीचे एक
अत्यन्त सुन्दर बावली देखी और उसके किनारे पर रत्नों की जीनवाले एक सुन्दर घोड़े को
देखा ॥८४॥
१. 'अरेबियन नाइट्स' में तीन राजपोतों की कहानी में ऐसी राजकन्याओं की
चर्चा है और इसी प्रकार एक मंजिल देखने की मनाही है। वहाँ ऐसे ही एक घोड़े का वर्णन
भी है।—अनु.