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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पंचम लम्बक ५११

पंचम लम्बक ५११
उसे देखते ही मन्त्रमाता विद्युत्प्रभा के नेत्र-चकोरों के लिए चन्द्रमा के समान वह युवक
देवदत्त वेताल के सहित जालपाद की ओर दौड़ पड़ा। जालपाद ने भी उसे अकस्मात् आये हुए
देखकर, भय और व्याकुलता के कारण उसके हाथ से तलवार के गिर जाने पर वह सिंहासन से
भूमि पर गिर पड़ा ॥ २४६-२४७॥
देवदत्त ने उसकी गिरी हुई तलवार को पाकर भी उसे मारा नहीं उदार पुरुष डरे हुए
शत्रुओं पर भी दयालु होते हैं॥२४८॥
जालपाद को मारते हुए वेताल को भी उसने रोक कर कहा—'इस बेचारे पाखण्डी को
मारने से क्या लाभ? इसे पृथ्वी पर ले जाकर इसी के घर में रख दो। यह पापी फिर यहाँ
कापालिक-व्रत करता रहे तो ठीक है।॥२४९-२५०॥
इस प्रकार की घटना होने पर उसी क्षण देवी पार्वती स्वर्ग से उतरकर आई और देवदत्त
से प्रेमपूर्वक कहने लगीं—'बेटा तेरे इस असाधारण भार्योत्कर्ष से मैं प्रसन्न हूँ। इसलिए
अब मैं तुझे स्वयं विद्याधरराज्यपद और विद्याप्रदान करती हूँ' ॥२५१-२५२॥
इतना कहकर और देवदत्त को विद्या प्रदान कर देवी अन्तर्धान हो गई ॥२५३॥
जालपाद को वेताल ने लाकर भूमि पर पटक दिया और उसकी सिद्धि भ्रष्ट हो गई।
सच है अधर्म की सम्पत्ति चिरकाल तक नहीं रह सकती ॥२५४॥
तदनन्तर देवदत्त विद्युत्प्रभा के साथ विद्याधर-राज्य प्राप्त करके सुखपूर्वक वहाँ रहने
लगा और उन्नति करने लगा ॥२५५॥
मधुरभाषिणी बिन्दुलेखा इस प्रकार अपने पति शक्तिदेव को कथा सुनाकर फिर बोली—
'ये कार्य इस प्रकार के होते हैं। इसलिए, तुम भी बिन्दुमती के कहने के अनुसार मेरे चर्म को पेट
फाड़कर निकाल लो' ॥२५६-२५७॥
शक्तिदेव द्वारा विद्याधरत्व की प्राप्ति
बिन्दुमती के इस प्रकार कहने पर भी पाप की शंका करते हुए शक्तिदेव ने आकाशवाणी
सुनी—'हे शक्तिदेव ! तुम बिना किसी शंका के चर्म को निकाल लो। उस चर्म के शिशु की गर्दन
को मुट्ठी से पकड़ोगे तो वह खड्ग बन जायगा'॥२५८-२५९॥

इति दिव्यां गिरं श्रुत्वा पाटितोदरमाशु सः।
गर्भं तस्याः समाकृष्य पाणिना कच्छपोऽग्रहीत् ॥२६०॥
गृहीतमात्रो जज्ञे च स खड्गस्तस्य हस्तगः।
आकृष्टः सत्वरं सिद्धेः केशपाश इवायतः ॥२६१॥
ततो विद्याधरः क्षिप्रात्स विप्रः समजायत।
बिन्दुरेखा च तत्कालमदर्शनमियाय सा ॥२६२॥
तद्दृष्ट्वा च स गत्वैव वाणपुत्रीं न्यवेदयत्।
बिन्दुमत्यै द्वितीयस्यै पत्न्यै सर्वं यथाविध ॥२६३॥
सा तमाह वयं नाथ विद्याधरपतेः सुताः।
तिस्रो भगिन्यः कनकपुर्याः शापवशच्युताः ॥२६४॥
एका कनकरेखा सा वर्धमानपुरे त्वया।
यस्या दृष्टः स शापान्तः सा च तां स्वां पुरीं गता ॥२६५॥
शापान्तो हीदृशस्तस्या विचित्रो विधियोगतः।
अहमेव तृतीया च शापान्तश्चाधुनैव मे ॥२६६॥
मया चाद्यैव गन्तव्या नगरी सा निजा प्रिया।
विद्याधरशरीराणि तत्रैवास्माकमासते ॥२६७॥
चन्द्रप्रभा च भगिनी ज्यायसी हि स्थिताऽत्र नः।
तदायाहि त्वमप्यद्य खड्गसिद्धिप्रभावतः ॥२६८॥
तत्र ह्यस्मांश्चतस्रोऽपि भार्याः सम्प्राप्य चार्थिकाः।
अनन्येनापिताः पित्रा पुरि राज्यं करिष्यसि ॥२६९॥
इति निजपरमार्थमुक्तवत्या सममनया पुनरेव बिन्दुमत्या।
अथ कनकपुरीं स शक्तिदेवो गगनपथेन तथेति सो जगाम ॥२७०॥
तस्यां च यानि योषिद्वपुषि पर्यङ्कतलवर्त्तीनि।
निर्जीवितान्यपश्यत्पूर्वं त्रिषु मण्डपेषु दिव्यानि ॥२७१॥
तानि यथामत् स्वानमभित्रन्प्रविष्टा स कनकरेखाद्याः।
प्राप्तो भूयः प्रणता अद्वादीता निजप्रियान्निस्त्र ॥२७२॥
तां च चतुर्थीमैक्षत तज्ज्येष्ठां रुचितमङ्गसां तत्र।
चन्द्रप्रभां पिबन्तीं चिरदर्शनमोत्कया दृष्ट्या ॥२७३॥


१ तद्बुद्धिदर्शनान्न विद्याधरत्वं खेचरत्वञ्च सम्प्राप्तम्।